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Archive for जून, 2008

कहीं बहुत गहरे कुछ चुभ सा गया है
हमने भी चाहा कोई सिर्फ़ हमें प्यार की हद तक चाहे
मगर प्यार सब का नसीब नही होता
चाहत पैदा तो नही की जा सकती
शायद हम ही न थे इस काबिल किसी की चाहत बन सकते
प्यार की किस्मत में सिर्फ़ रुसवाई ही होती है
कोई होता जो सिर्फ़ हमें चाहता
सिर्फ़ हमें…………….
उसके आगे रिश्ता न चाहता
मगर किसी की चाहत के काबिल बनना आसान नही होता
इसलिए बहुत गहरे कुछ दरक गया है
कांच से भी नाजुक है जो
ऐसे दिल को कैसे कोई समझाए
सब कुछ मिला इसे मगर
सिर्फ़ दिल को चाहने वाला न मिला
कुछ अपनी कहने वाला
कुछ इसकी सुनने वाला न मिला
इसलिए बहुत गहरे कुछ चुभ सा गया है

आहत हो जाती है वो जब कोई दुत्कार देता है

हर किसी के लिए जीती है और मरती है
कभी उफ़ नही करती फिर भी न जाने क्यूँ
हर किसी की निगाह में कसूरवार होती है
कोई जुर्म न करके भी हर सज़ा भोगती है वो
ख़ुद को तबाह करके भी कुछ नही पाती है वो
प्यार के दो लफ्जों को तरसती है वो
कभी बहन बनकर तो कभी पत्नी बनकर
कभी बेटी बनकर तो कभी माँ बनकर
पल पल मरती है वो
हर लम्हा सिसकती है वो
क्या कभी मिल पायेगी उसे अपनी हस्ती
क्या कभी ख़ुद को दिला पायेगी सम्मान वो
एक ऐसे समाज में जो हर पल बदलता है?
नारी आज भी वहीँ है जहाँ पहले थी
उसकी जगह आज भी वहीँ है जहाँ पहले थी
हर किसी की नज़र आज भी वैसी ही है जैसी पहले थी
कहीं कुछ नही बदला और न ही कभी बदलेगा
यह समाज जैसा है वैसा ही रहेगा
नारी का जीवन भी जैसा था वैसा ही रहेगा

अहसास

हर गम दुनिया में सभी को नसीब नही होता
कोई चाहने वाला दिल के करीब नही होता
मुस्कुराते हम भी हर महफ़िल में ज़माने की
गर किसी का दिया दर्द दिल के करीब नही होता

यह कहाँ ले आई तकदीर आज मुझे
की अपना साया भी आज नज़र आता नही
किसी और को अब क्या चाहेंगे
जबकि अपने आप को भी चाह जाता नही

हर सुबह मेरी अँधेरी हो गई
हर शाम मेरी कहीं खो गई
कहाँ गए वो मदमस्त दिन
खो गया कहीं अल्हड़पन
ज़िंदगी मेरी गम की शाम हो गई
हर रात मेरी परेशां हो गई
यूं तो होती हूँ हर वक्त ही तनहा
फिर भी तन्हाई मेरी तनहा हो गई

दिल जो एक बार टूटा टूटता ही चला गया
तेरा प्यार जो मुझसे rootha तो toothta ही चला गया

ऐ खुदा मेरे हिस्से की सब खुशी उन्हें दे दे
उनके हिस्से के सभी गम मुझे दे दे
मेरे नसीब की महफिलें हों उन्हें नसीब
उनके नसीब की तन्हैयाँ भी मुझे दे दे

तनहाइयों की महफिलें सज़ा लेंगे हम
वीरानियों में दिल बहला लेंगे हम
मगर तुझसे खुशी न मांगेंगे कभी
अपनी हर खुशी भी तुझपे लुटा देंगे हम
तेरे नाम पे यह ज़िंदगी लुटा देंगे हम
ऐसी मौत को हंसकर गले लगा लेंगे हम

ग़मों का काफिला है पीछे मेर यह पता है उसे
फिर भी जहाँ का हर गम दे गया है मुझे

मुझे ज़िंदगी मिली आंसू बनकर
हर गम मिला ज़ख्म बनकर
बेरुखी मिली दर्द में ढलकर
प्यार भी मिला तो नफरत बनकर

दूरियां इतनी न बढाओ की फिर पास न आ सकें
गर पास आयें तो नज़रें मिला न सकें
नज़रें मिला भी लें तो एक दूसरे को अपना भी न सकें
इसलिए तोड़ दो यह बंधनों की दीवार,जिसके पार हम जा सकें

ज़िंदगी तड़प रही थी किसी की
मौत हंस रही थी उसकी
ज़िंदगी ने चाह मिल जाए मौत ही
मगर उसने भी साथ न दिया ज़िंदगी का
कितनी मजबूर थी ज़िंदगी जीने के लिए
तड़प के आगोश में जलने के लिए

बहुत तरसा था यह दिल तनहाइयों के लिए कभी
अब घेरा है तन्हैयेओं ने इस कदर की फुरसत नही महफिलें सजाने की

खामोश निगाहों की जुबान हैं आंसू,
दिल पर किसी ज़ख्म का निशाँ हैं आंसू,
यूं टू हसरतों के जज्ब होने का नाम हैं आंसू,
फिर भी आँख से न dhalakne का नाम हैं आंसू।

उदास आंखों से आंसू नही गिरते हैं,
यह टू मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं।

दर्द में मैंने जिसको भी करीब पाया था
आंसू बहता वो मेरा ही साया था

काँटों भरी राह का बाम है ज़िंदगी,
दर्द में सिमटी हर शाम का नाम है ज़िंदगी,
नफरतों के जहाँ में हंसने का नाम है ज़िंदगी,
दिन के उजालों में जलने का नम है ज़िंदगी,
रात के वीरानों में भटकने का नाम है ज़िंदगी,
असल में फूलों से बचकर चलने का नाम है ज़िंदगी।

बहारों का आँचल नही है हर किसी के लिए
पतझड़ का दमन नही है हर किसी के लिए
बहारों में फूल खिलते हैं,दिल भी मिलते हैं
फिर कभी न मिलने के लिए,पतझड़ में दिल बिचादते एन।

ऐ अश्कों जज्ब हो जाओ आखों की कोरों में
तुम्हें नही दी इजाज़त बाहर निकलने की ज़माने ने।

ज़ख्म कागज़ पर लिखकर , दर्द दिल का मिटा लेते हैं
अपनी तकदीर से रु-बी-रु होकर ख़ुद को जीने की सज़ा देते एन।

डूब गया हूँ ग़मों में कुछ इस कदर
की दरिया-ऐ-जिंदगानी अब पार नही होती
मैं टू वो माझी हूँ जिसे तलाश है एक कश्ती की
और यह तलाश है की ख़त्म नही होती।

दिल के टूटने की चटख बहुत दूर तक गई
मगर आवाज़ सुनने वाला रह में कोई न था

दिल की आवाज़ सुन रही थी में
खामोश वातावरण में जी रही थी में
न जाने यह कैसा तूफ़ान आ गया
भा में ज़िंदगी की कश्ती फंस गई है
न डूब रही है और न निकल रही है
साहिल भी साथ है मगर किनारे की तलाश है

आज ज़िंदगी बन गई है ऐसा पिंजरा
जिसमें बंद पंछी पंख फद्फादा भी नही सकता

जीने की इच्छा हो चुकी है ख़त्म
सिर्फ़ जीने की रस्म निभाए जा रही हूँ मैं
हँसी का रंग भी बदल चुका है अब
सिर्फ़ खोखले अंदाज़ मैं हँसे जा रही हूँ में
दिल से टू टूट चुकी थी बहुत पहले ही
अब टू और टूटने के लिए जिए जा रही हूँ में

मेरा घर

विरानियाँ हैं घर मेरा
तन्हैयाँ हैं साथी
और गम हैं पड़ोसी
दिल कभी परेशां कैसे हो
जब ऐसा सुखद साथ हो
कोई खुशी दमन को छुए कैसे
जब हर तरफ़ रंजो गम की बरसात हो
मेरे घर में हमेशा दर्द का पहरा रहता है
अश्कों से हमेशा दामन भीगा रहता है

यह तो वो हरियाली है
जो कभी मुरझाती नही
ऐसी ब्हार है जो
आकर कभी जाती नही

दर्द -ऐ – दिल

दिल के टूटने की आवाज़ वो सुनकर भी नही सुनता ,
सब कुछ समझ कर भी वो कुछ भी नही समझता,
किसी के दिल पर क्या बीती है —-वो जानता है ,
इतना भी नासमझ नही ——फिर क्यों वापस बुलाता नही ,
दर्द जब हद से बढ़ जाएगा वो तब भी न वापस आएगा ,
जब हम न रहेंगे ——-यह जानकर भी ,
वो हमको न वापस बुलाएगा।

इन्सान

आज इन्सान सिर्फ़ अपनी सोच और अपने लिए ही जीता है । उसे फर्क नही पड़ता की कोई क्या सोचता है । उसे किसी की चाहत से कोई मतलब नही । अपने लिए जीना और सिर्फ़ अपने मन की सुनना और करना सिर्फ़ इतना चाहता है। क्या यही है ज़िंदगी की सच्चाई?कहीं कोई प्यार नही,किसी की इच्छा का सम्मान नही। रिश्ते भी सिर्फ़ अपनी जरुरत के लिए नीभाना फिर भूल जाना………क्या यही इंसान है? क्यों इन्सान की सोच इतनी मतलबी हो गई है ?

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