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Archive for सितम्बर, 2012

बरसात के बाद शिशिर के आगमन से पहले

बरसात के बाद
जब मौसम करवट लेता है
शिशिर के आगमन से पहले
और बरसात के बाद की अवस्था
मौसम की अंगडाई का दर्शन ही तो होती है
शिशिर के स्वागत के लिए
हरा कालीन बिछ जाता है
वैसे ही
जब मोहब्बत की बरसात के बाद
जब इश्क करवट लेता है
पूर्णत्व से पहले की प्रक्रिया
मोहब्बत की सांसों को छीलकर
उसे सजाना संवारना
और पूर्णता की ओर ले जाने का उपक्रम
किसी मौसम का मोहताज नहीं होता
वहाँ मोहब्बत जब
प्रेम में तब्दील होती है
और प्रेम जब इबादत में
तब खुदाई नूर की चिलमन के उस तरफ
आगाज़ होता है एक नयी सुबह का
महबूब के दीदार से परे
उसकी रूह में उतरने का
उसके अनकहे को पढने का
उसकी चाहतों पर सजदा करने का
और मिल जाती है वहाँ
परवान चढ़ जाती है वहाँ
मोहब्बत कहो या इश्क कहो या प्रेम कहो या खुदा …………अपने वजूद से
समा जाती है मोहब्बत ……….मोहब्बत में 

बरसात के बाद शिशिर के आगमन से पहले………..…
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कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी………भाग 69

जब विरह की उच्चतम अवस्था हुई
और प्रभु ने देखा
अब ये बस मेरी हुईं
तभी प्रभु ने खुद को प्रकट किया
यहाँ एक कारण नज़र आता है
प्रभु के अंतर्धान होने का
वो बतलाना चाहते हैं
जो गोपियाँ  दिन रात
मेरे नाम की माला जपती थीं
जिनका मेरे सिवा ना दूजा ठिकाना था
उनकी परीक्षा लेने से भी ना चूकता हूँ
जिन्होंने सर्वस्व  समर्पण किया था
उनको भी किसी भी मोड़ पर
परीक्षा में बैठा देता हूँ
तो जीव जो उनकी तरफ आते हैं
और अपने प्रेम का दावा करते हैं
तो उन्हें कैसे छोड़ सकता हूँ
प्रभु देखना चाहते हैं
ये कच्चा है या पक्का
क्या इसका भाव वास्तव में
प्रेम समर्पण का है
या अभी भी दुनियावी
बातों से भरा है
जब प्रभु ठोक बजाकर परख लेते हैं
तब उसे रास में शामिल कर लेते हैं
और उसका योगक्षेम स्वयं वहन कर लेते हैं

जब प्रभु ने जान लिया
अब ये प्राण छोड़ देंगी
पर विरह में ना जीवित रहेंगी
तब प्रभु ने उनकी अलौकिक प्रीति जान
स्वयं को प्रकट किया
खिले कमल सा प्रभु का मुखकमल
वैजयंती माला पहने
मंद मंद मुस्कुराते
मुरली मधुर बजाते
प्रभु का जब दर्शन किया
गोपियों में प्राणों का संचार हुआ
ज्यों रेत पर पड़ी मीन पर
बरखा ने जीवनदान दिया
सब गोपियों के ह्रदय आंगन  खिल उठे
कान्हा को सबने घेर लिया
किसी गोपी ने उनका हाथ पकड़ लिया
किसी ने उनका चरण स्पर्श किया
किसी ने उन्हें नेत्र द्वार से
ह्रदय में बिठा लिया
और नेत्र बंद कर
अन्दर ही अन्दर उनका
आलिंगन कर
प्रेम समाधि में डूब गयी
कोई गोपी अपने कटाक्ष बाणों से
बींधने लगी
कोई गोपी प्रेम गुहार करने लगी
तो कोई गोपी निर्मिमेष नेत्रों से
प्रभु के मुखकमल का
मकरंद रस पान करने लगी
फिर भी ना ह्रदय तृप्त होता है
सभी गोपियों ने प्रभु में ध्यान लगाया है
जिसे देख उनका ह्रदय हर्षाया है
प्रभु विरह की वेदना से
जो दुःख उपजा था
वो अब दूर हुआ था
परम शांति का गोपियों को
अनुभव हुआ था
प्रभु के दर्शन से
गोपियाँ पूर्णकाम हुईं
इतना आनंदोल्लास हुआ
ह्रदय की सारी आधि व्याधि मिट गयी
अब गोपियों ने चन्दन केसर युक्त
अपनी ओढनी बिछा
प्रभु को विराजमान किया
जिन प्रभु को योगसाधन से भी
पवित्र ह्रदय में
ऋषि मुनि ना
ह्रदय सिंहासन पर बैठा पाते हैं
वो कृष्ण आज प्रेम के वशीभूत हो
यमुना की रेती में
गोपियों की ओढनी पर बैठे दिखाई देते हैं
ये ही तो प्रेम की सगाई है
जो सिर्फ गोपियों ने ही निभाई है
प्रभु के संसर्ग का , संस्पर्श का
गोपियाँ आनंद लेती हैं
और कभी कभी कह उठती हैं
कितना सुकुमार है
कितना मधुर है
और मन ही मन
प्रभु के छिपने से नाराज होने का
अभिनय कर उन्हें
दोष स्वीकारने को कहती हैं
गोपियों ने यहाँ प्रभु से प्रश्न किया
हे नटवर ज़रा इतना तो बतलाना
कुछ लोग ऐसे होते हैं
जो प्रेम करने वालों से ही प्रेम करते हैं
और कुछ लोग
प्रेम ना करने वालों से भी प्रेम करते हैं
परन्तु कोई कोई तो
दोनों से ही प्रेम नहीं करते हैं
प्यारे ज़रा बतलाओ
इन तीनों में से तुम्हें
कौन अच्छा लगता है ?
तब प्रभु ने जवाब यूँ दिया
गोपियों जो प्रेम करने पर प्रेम करे
ये तो सिर्फ स्वार्थियों का व्यापार हुआ
इसमें ना कोई सौहार्द हुआ
और ना ही धर्माचरण का पालन हुआ
जो लोग ना करने वालों से भी प्रेम करते हैं
वहाँ ही निश्छल सत्य और पूर्ण धर्म का पालन हुआ
जैसे सज्जन, माता पिता , करुणाशील लोग
बिना कारण दया करते हैं
और सबके परम हितैषी होते हैं
कुछ ऐसे होते हैं
जो प्रेम करने वालों से भी
प्रेम नहीं करते
और प्रेम ना करने वालों का तो वहाँ
प्रश्न ही नहीं उठता है
ऐसे लोग भी चार प्रकार के होते हैं
एक जो निज स्वरुप में मस्त रहते हैं
जहाँ द्वैत का ना भास होता है
दूसरे वे जिन्हें द्वैत तो भासता है
पर वो कृतकृत्य हो चुके हैं
उनका ना फिर किसी से कोई प्रयोजन रहता है
तीसरे वे हैं जो जानते ही नहीं
हमसे कौन प्रेम करता है
और चौथे वे हैं जो जान बूझकर
अपना हित करने वालों को भी सताना चाहते हैं
उनसे भी द्रोह रखते हैं
गोपियों मैं तो प्रेम करने वालों से भी
प्रेम का वैसा व्यवहार ना कर पाता हूँ
जैसे करना चाहिए
और ऐसा मैं इसलिए करता हूँ
ताकि उनकी चितवृत्ति मुझमे लगी रहे
निरंतर मेरा ही ध्यान उन्हें बना रहे
इसलिए ही उन्हें
मिल मिल कर छुप  जाता हूँ
और इस तरह
उनका प्रेम बढाता हूँ
निस्संदेह तुम लोगों ने
लोग मर्यादा वेदमार्ग
सगे सम्बन्धियों को त्यागा है
तभी मुझे पाया है
अब तुम्हारी मनोवृत्ति
मुझमे लगी रहे
निरंतर मेरा ही चिंतन तुम्हें होता रहे
इसलिए परोक्ष रूप से
तुमसे प्रेम करता हुआ भी
मैं छुप गया था
इसलिए मेरे प्रेम में
तुम ना दोष निकलना
तुम मेरी सर्वथा प्यारी हो
जन्म जन्म के लिए
तुम्हारा ऋणी हुआ  हूँ
क्योंकि तुमने उन बेड़ियों को तोडा है
जिसे बड़े बड़े ऋषि मुनि भी ना तोड़ पाते हैं
यदि मैं अपने अमर शरीर से
अमर जीवन से
अनंत काल तक
तुम्हारे प्रेम, सेवा और त्याग का
बदला चुकाना चाहूँ
तो भी ना चुका सकता हूँ
और तुम्हारे ऋण से ना कभी
उऋण हो सकता हूँ
प्रभु के मुख से उनकी
सुमधुर वाणी सुन
जो विरह्जन्य ताप शेष था
उससे गोपियाँ मुक्त हुईं
अब प्रभु ने यमुना के पुलिन पर
गोपियों संग रासलीला प्रारंभ की 
क्रमश:…………

तुम कहाँ हो ?

तुम कहाँ हो ?
युगों युगों की पुकार
ना जाने कब तक चलेगी
यूँ ही अनवरत
बहती धारा
प्रश्न चिन्ह बनी
अपने वजूद को ढूंढती
क्योंकि
तुमसे ही है मेरा वजूद
तुम नहीं तो मैं नहीं
मैं ………..कौन
कुछ भी तो नहीं
अस्तित्वहीन सा कुछ
जो तुम्हारे बिना कुछ नहीं
तुम ही तो वीणा में राग भरते हो
साज़ में आवाज़ भरते हो
धडकनों में स्पंदन करते हो
तुमसे पृथक “मैं” कहाँ ?
और कौन हूँ?
कुछ भी तो नहीं
तो बताओ
कैसे तुम्हें ढूंढूं
कहाँ तुम्हें खोजूं?
कौन सा रूप दूँ?
कौन सा आकार दूँ
जिसे नैनन में भर लूँ
जिसकी छाप अमिट हो जाये
वो छवि बस अंतरपट पर छा जाये
बोलो ………दोगे मुझे
वो अनिर्वचनीय सुख
समाओगे मेरे नैनों के कोटर में
मेरे ह्रदय स्थली में
देखो
ढूँढ ढूँढ हार चुकी हूँ
नहीं मिल रहा वो तुम्हारा रूप
ना वो रंग
जिसे देखने के बाद
कुछ देखना बाकी नहीं रहता
जिसे पाने के बाद
कुछ पाना बाकी नहीं रहता
तो बोलो
हे अनंत ……………चितचोर
माधव नन्द किशोर
कहाँ हो तुम ?
आओगे ना एक बार
जीवन रहते जवाब देने
और मुझे संपूर्ण करने
हे केशव
हे मदन मुरारी
तुझ पर मैं सब कुछ हारी
तुम कहाँ हो मुरारी ?
मेरी अधूरी प्यास के अमृतघट ……………
आ जाओ ना अब तो ………………
ओ बिहारी ! ओ गिरधारी !
लो मैं खुद को हारी !
अब तो सुन लो पुकार
दे दो दीदार !
तुम कहाँ हो ? तुम कहाँ हो ? तुम कहाँ हो?
सुन लो मन पपीहे की ये करुण पुकार
पीर का आर्तनाद तुम तक पहुँचता तो होगा ना ……….केशव !

"दश पुत्र समां कन्या, यस्या शीलवती: सुता "

दश पुत्र समां कन्यायस्या शीलवतीसुता ” 

कितना हास्यास्पद लगता है ना 
आज के परिप्रेक्ष्य में ये कथन 
दोषी ठहराते हो धर्मग्रंथों को
अर्थ के अनर्थ तुम करते हो 
नारी को अभिशापित कहते हो
दीन हीन बतलाते हो
मगर कभी झांकना ग्रंथों की गहराइयों में
समझना उनके अर्थों को
तो समझ आ जायेगा
नारी का हर युग में किया गया सम्मान
ये तो कुछ जड़वादी सोच ने 
अपने अलग अर्थ बना दिए 
और नारी को कहो या बेटी को या पत्नी को
सिर्फ भोग्या बना डाला 
सिर्फ अपने वर्चस्व को कायम रखने को
तुमने बेटी के अधिकारों का हनन किया
जबकि इन्ही ग्रंथों ने 
एक शीलवान कन्या को 
दस पुत्रों समान बतलाया 
तो बताओ कैसे तुमने
गर्भ में ही कन्या का गला दबाया
और पुत्र की चाहत को सर्वोपरि बतलाया
पुत्र भी कुल कलंकी होते हैं
बेटियां तो दो घरों को संजोती हैं
ये सब तुम्हारा रचाया व्यूह्जाल था 
जिसमे तुमने नारी को फंसाया था
समाज मर्यादा का डर दिखलाया था 
वरना नारी कल भी पूजनीय थी
वन्दनीय थी शक्ति का स्त्रोत थी
और आज भी उसकी महत्ता कम नहीं
बस अब इस सच को तुम्हें समझना होगा
धर्मग्रंथों का फिर से विश्लेषण करना होगा
क्यूँकि तुमने इन्हें ही नारी के खिलाफ हथियार बनाया था 
एक बार फिर से सतयुग का आह्वान करना होगा
और हर कथन का वास्तविक अर्थ समझना होगा 


कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी………भाग 68

विरह अगन में गोपियाँ पुकारने लगीं
मधुदूदन तुमने हमारे लिए
तो है अवतार लिया
प्रभु भला फिर क्यूँ हमसे
मुँह फेर लिया
ये बृज की भूमि तुम्हें बुलाती है
तुम्हारी चरण रज की प्यासी है
तुमने तो बृज की खातिर
लक्ष्मी को भी
दासी बना दिया
बैकुंठ को भी ठुकरा दिया
अब क्यों देर लगाते हो
मोहन क्यों छुप छुप जाते हो
हमारी रक्षा को ही तो तुमने
इतने असुरों का संहार किया
जो हमें छोड़कर जाना था
फिर क्यों
बकासुर, अघासुर, वृत्तासुर , पूतना , तृणावर्त से था बचाया
क्यों दावानल की अग्नि से
तो कभी कालिया के विष से
तो कभी इन्द्र के कोप से
तुमने था बचाया
देखो तुम्हारे विरह में हम
बावली हुई जाती हैं
और उलटे सीधे आक्षेप लगाती हैं
पर प्रेम में इतना तो अधिकार होता है
प्रीतम को मनाने का
ये ही तो तरीका होता है
हे प्राणनाथ ! तुम्हारी मंद मंद मुस्कान पर
हम बलिहारी जाती हैं
गोधुली वेला में अधरों पर
वंशी सजाये
मोर मुकुट धारण किये
मुरली बजाते जब तुम
प्रवेश करते हो
उसी मनमोहिनी छवि के दर्शन को तो
दिन भर हमारे नैना तरसते थे
तुम्हारी अद्भुत झांकी देख
ह्रदय ज्वाला शांत हो जाती थी
मगर हाय ! प्यारे अब हम कहाँ जायें
कहाँ तुम्हें खोजें
हमसे बड़ी भूल हुई
कह गोपियाँ पछताती हैं
हे श्यामसुंदर ! क्यों छोड़ चले गए
कैसे छुए छुपे फिर रहे हो
जिन चरणों को
लक्ष्मी भी अपनी छाया से दबाती है
वो चरण आज
कंकड़ पत्थरों से भरे
ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर चल रहे हैं
जिन चरणों से कालिया पर
नृत्य किया वो ही चरण
आज वनों की कंटकाकीर्ण
कुश, झाडी से लहूलुहान होते होंगे
हमारी गलती की सजा उन्हें मत दो
इन्हें चरण कमलों पर तो
हमारे नयन गड़े रहते हैं
आपकी हम चरण दासी हैं
हे स्वामी ! प्रकट हो जाओ
और अपने चरण कमल
हमारे वक्षस्थल पर रख
विरह ज्वाल शांत करो
हा गोपीनाथ! अपने नाम की लाज रखो
हा मदनमोहन ! यूँ कठोरता ना तुम्हें शोभा देती है
हम अपने बधू बांधव
पति बच्चे
सब छोड़ कर आई हैं
यूँ ना हमारा बहिष्कार करो
गर तुमने ठुकरा दिया तो कहाँ जाएँगी
तुम्हारे बिना तो हम
यूँ ही मर जाएँगी
जब मरने की गोपियों ने बात कही
तो कहीं से आवाज़ आई
तो फिर मर क्यों नहीं जातीं ?
इतना सुन गोपियाँ बोल पड़ीं
अरे चितचोर! मरना तो हम चाहती हैं
तुम बिन एक सांस भी नहीं लेना चाहती हैं
पर जैसे ही मरने को उद्यत होती हैं
वैसे ही तुम्हारा भेजा कोई
संत आ जाता है
और तुम्हारी मधुर मंगलकारी कथा
सुनाने लगता है
तुम्हारी कथा रुपी अमृत ही
हमें जिला देता है
वरना तो ये शरीर प्राण विहीन  ही रहता है
प्राण तो तुम्हारे साथ गए हैं
यहाँ तो बस मिटटी को रख गए हैं
तुम्हारे नाम का अमृत ही
मिटटी में प्राण फूंकता है
हा राधारमण! अब तो दर्श दो गिरधारी
हम हैं तुम्हारी बिना मोल की दासी
अपनी मधुर वंशी की धुन सुना दो
हमें भी अपनी वंशी बना
अधरों पर सजा लो
हे प्यारे ! हमें प्रेमामृत पिलाओ
अब जी सो की
आगे ना कोई गलती होगी
कह गोपियाँ करुण स्वर से विलाप करने लगीं
जब -जब वेदना चरम पर पहुँच गयी
तब -तब एक- एक ठाकुर का प्रकटीकरण हुआ
हा गोपीनाथ! हा राधारमण ! हा मदनमोहन !
ऐसे पांच बार जब
विरह वेदना हर सीमा को लाँघ गयी
और गोपियों ने पुकारा
तब पांच ठाकुर प्रकट हुए
जिनमे से तीन आज भी
वृन्दावन में आसान जमाये हैं
दो दूसरे राज्यों में पहुँच गए हैं
क्रमश:…………

खरोंच

कल तक जो
आन बान और शान थी
कल तक जो
पाक और पवित्र थी
जो दुनिया के लिए
मिसाल हुआ करती थी
अचानक क्या हुआ
क्यों उससे उसका ये
ओहदा छीन गया
कैसे वो मर्यादा
अचानक सबके लिए
अछूत चरित्रहीन हो गयी
कोई नहीं जानना चाहता
संवेदनहीन ह्रदयों की
संवेदनहीनता की यही तो
पराकाष्ठा होती है
पल में अर्श से फर्श पर
धकेल देते हैं
नहीं जानना चाहते
नकाब के पीछे छुपे
वीभत्स सत्य को
क्योंकि खुद बेनकाब होते हैं
बेनकाब होती है इंसानियत
और ऐसे में यदि
कोई मर्यादा ये कदम उठाती है
तो आसान नहीं होता
खुद को बेपर्दा करना
ना जाने कितने
घुटन के गलियारों में
दम तोडती सांसों से
समझौता करना पड़ता है
खुद को बताना पड़ता है
खुद को ही समझाना पड़ता है
तब जाकर कहीं
ये कदम उठता है
अन्दर से आती
दुर्गन्ध में एक बूँद और
डालनी पड़ती है गरल की
तेज़ाब जब खौलने लगता है
और लावा रिसता नहीं
ज्वालामुखी भी फटता नहीं
तब जाकर परदगी का
लिबास उतारना  पड़ता है
करना होता है खुद को निर्वस्त्र
एक बार नहीं बार बार
हर गली में
हर चौराहे पर
हर मोड़ पर
तार तार हो जाती है आत्मा
लहूलुहान हो जाता है आत्मबल
जब आखिरी दरवाज़े पर भी
लगा होता है एक साईन बोर्ड
सिर्फ इज्जतदारों को ही यहाँ पनाह मिलती है
जो निर्वस्त्र हो गए हों
जिनका शारीरिक या मानसिक
बलात्कार हुआ हो
वो स्वयं दोषी हैं यहाँ आने के
यहाँ बलात्कृत आत्माओं की रूहों को भी
सूली पर लटकाया जाता है
ताकि फिर यहाँ आने का गुनाह ना कर सकें
इतनी ताकीद के बाद भी
गर कोई ये गुनाह कर ही दे
तो फिर कैसे बच सकता है
बलात्कार के जुर्म से
अवमानना करने के जुर्म से
जहाँ पैसे वाला ही पोषित होता है
और मजलूम पर ही जुल्म होता है
ये जानते हुए भी कि साबित करना संभव नहीं
फिर भी आस की आखिरी उम्मीद पर
एक बार फिर खुद को बलात्कृत करवाना
शब्दों की मर्यादाओं को पार करती बहसों से गुजरना
अंग प्रत्यंग पर पड़ते कोड़ों का उल्लेख करना
एक एक पल में हजार हजार मौत मरना
खुद से इन्साफ करने के लिए
खुद पर ही जुल्म करना
कोई आसान नहीं होता
खुद को हर नज़र में
“प्राप्तव्य वस्तु” समझते देखना
और फिर उसे अनदेखा करना
हर नज़र जो चीर देती है ना केवल ऊपरी वस्त्र
बल्कि रूह की सिलाईयाँ भी उधेड़ जाती हैं
उसे भी सहना कुछ यूँ
जैसे खुद ने ही गुनाह किया हो
खरोंचों पर दोबारा लगती खरोंचें
टीसती भी नहीं अब
क्योंकि
जब स्वयं को निर्वस्त्र स्वयं करना होता है
सामने वालों की नज़र में
शर्मिंदगी या दया का कोई अंश भी नहीं दिखता
दिखता है तो सिर्फ
वासनात्मक लाल डोरे आँखों में तैरते
उघाड़े जाते हैं अंतरआत्मा के वस्त्र
दी जाती हैं दलीलें पाक़ साफ होने की
मगर कहीं कोई सुनवाई नहीं होती
होता है तो सिर्फ एक अन्याय जिसे
न्याय की संज्ञा दी जाती है
इतना सब होने के बावजूद भी
मगर नहीं समझा पाती किसी को
नहीं साक्ष्य उपलब्ध करवा पाती
और हार जाती है
निर्वस्त्र हो जाती है खोखली मर्यादा
और हो जाता है हुक्म
चढ़ा दो सूली पर
दे दो उम्र कैद पीड़ित मर्यादा को
ताकि फिर कोई खरोंच ना इतनी बढे
ना करे इतनी हिम्मत
जो नज़र मिलाने की जुर्रत कर सके
आसान था उस पीड़ा से गुजरना शायद
तब कम से कम खुद की नज़र में ही
एक मर्यादा का हनन हुआ था
मगर अब तो मर्यादा की दहलीज पर ही
मर्यादा निर्वस्त्र हुई थी प्रमाण के अभाव में
और अट्टहास कर रही थी सुना है कोई 
आँख पर पट्टी बाँधे हैवानियत की चरम सीमा……..
ये खोखले आदर्शों की जमीनों के ताबूत की आखिरी कीलों पर
मौत से पहले का अट्टहास सोच की आखिरी दलदल तो नहीं
किसी अनहोनी के तांडव नृत्य का शोर यूँ ही नहीं हुआ करता ………गर संभल सकते हो तो संभल जाओ

भागो भागो भूत आया ……..

भागो भागो भूत आया
संग ऍफ़ डी आई को लाया
कभी कोयला तो कभी डीज़ल
कभी पेट्रोल तो कभी महंगाई

कभी बोफ़ोर्स तो कभी चारा घोटाला
कभी टेलिकॉम घोटाला
तो कभी कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला,
अच्छी सबने बिसात बिछायी
जनता तो बेचारी बाज आयी
अब ये कैसा विनिवेश आया
जो निवेश भी साथ ले जाएगा
बस भ्रष्टाचारियों के पेट भर जायेगा
और जनता का ध्यान बँट जाएगा
मगर सत्ता पर तो अंगद का पैर काबिज रहेगा
इतना भर सुकून काफी होगा
सरकार तो चैन से सोएगी
बस भूखी जनता ही बिलख बिलख रोएगी
शोषण की महामारी में
जेब ही कुलबुलाएगी
जब ना होगी फूटी कौड़ी जेब में
तो सिलेंडर की जरूरत ना नज़र आएगी
बस तुम्हें यूँ सब्सिडी मिल जाएगी
झुनझुना हाथ में तुम्हारे पकड़ा दिया
हुक्मरानों ने ये समझा दिया
जो हमें चुनाव जितवाओगे
तो यूँ ही शोषित किये जाओगे
यूँ घोटालों के शहंशाह का खिताब
देश को मिल जाएगा
और देश का नाम समूचे विश्व में
अपना परचम लहराएगा
हम तो अपनी मनमानी तुम पर थोपेंगे
सोये हुओं को जरूरत क्या होती है
खाने पीने और पहनने की
बस सोते रहना ही उनकी किस्मत होती है
अब चाहे ऍफ़ डी आई का बोलबाला हो
चाहे देश दोबारा यूँ गुलाम हो
कहो तो क्या फर्क पड़ जायेगा
गुलामी के बीज तुम्हारे लहू में पैबस्त हैं
आदत से तुम मजबूर हो
क्या हुआ जो एक बार फिर से
व्यापारियों को बुलाया जायेगा
और देश को इस बार खुद ही बेचा जायेगा
तुम्हें फर्क नहीं पड़ने वाला है
तुम बस कुम्भकर्णी नींद सोते रहना
और हमारा शासन यूँ सुचारू रूप से चल जायेगा

घोटालों का इतिहास देश के नाम लिख जायेगा
यूँ देश का एक और स्वर्णिम इतिहास बन जायेगा
मगर जनता का दोष
ना जनता को नज़र आएगा
जब तक क्रिमिनलों को सत्ता पर
काबिज होने का मौका मिलता रहेगा
देश का ऐसे ही बंटाधार होता रहेगा
जब तक ना हर हिन्दुस्तानी जागेगा
अपने लिए ना आवाज़ उठाएगा
खुद ना सड़क से संसद तक जाएगा
तब तक तो यूँ ही शोषित किया जायेगा
कभी ऍफ़ डी आई के तो कभी मंहगाई के
तो कभी घोटालों के भूतों से डराया जायेगा
फिर आने वाली पीढ़ी के लिए
ये नया गाना बन जायेगा
भागो भागो भूत आया ……..संग नए नए घोटाले लाया

टैग का बादल