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Archive for अक्टूबर, 2010

>घर से ऑफिस के बीच

>घर से ऑफिस 
के लिए जब 
निकलता है आदमी
जाने कितनी चीजें 
भूलता है आदमी
घर से ऑफिस 
तक के सफ़र में
दिनचर्या बना 
लेता है आदमी
कौन से 
जरूरी काम 
पहले करने हैं
कौन सी फाइल 
पहले निपटानी है
किसका लोन 
पास करना है
किसका काम 
रोक कर रखना है
सारे मानक तय 
कर लेता है
साथ ही आज 
वापसी में
कौन से सपने
लेकर जाने  हैं
बीवी बच्चों के 
कामों की 
फेहरिस्त भी 
बना लेता है
आदमी
किसकी फीस 
जमा करवानी है
किसे डॉक्टर के 
लेकर जाना है
बेटी के लिए
लड़का ढूंढना है 
बेटे का एड्मीशन
करवाना है
किसे रिश्वत 
देकर काम 
निकलवाना है
हर काम के
मापदंड तय 
कर लेता है
आदमी
मगर इसी बीच
कुछ पल वो
भविष्य के भी
संजो लेता है 
कुछ पल अपनी
कल्पनाओं की
उडान को भी 
देता है आदमी
जब देखता है
किसी गाडी में 
सवार किसी 
परिवार के 
चेहरे पर 
खिलती 
मुस्कान को
या किसी 
आलिशान
मकान को 
या शौपिंग माल 
या मूवी देखने 
जाते किसी 
परिवार को 
तब वो भी
उसी जीवन की
आस संजो 
लेता है आदमी
खुशहाली का
एक बीज
अपने अंतस में
रोप लेता है 
आदमी
दुनिया की हर 
ख़ुशी की चाह में
कुछ सपने
सींच लेता है 
आदमी
बेशक पूरे 
हों ना हों
मगर फिर भी
वो सुबह कभी
तो आएगी 
इस चाह में 
एक जीवन 
जी लेता है 
आदमी
घर परिवार को
ख़ुशी देने की
चाह में
ख्वाबों की
उड़ान भर
लेता है आदमी 
उम्मीद की 
इस किरण पर
आस का दीपक 
जला लेता है 
आदमी
घर से ऑफिस 
के बीच 
ज़िन्दगी की 
जद्दोजहद से 
कुछ पल
स्वयं के लिए
चुरा लेता है
आदमी

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>पर्दा हटा दिया………

>इक 
पर्दा लगाया 
आज तेरी 
यादों को 
ओट में 
रखने को
जब जी 
चाहे चली 
आती थीं
और हर 
ज़ख्म को
ताज़ा कर 
जाती थीं
मगर बेरहम
हवा ने 
यादो का ही
साथ दिया
जैसे ही 
आई यादें 
पर्दा 
हटा दिया
और
एक बार
फिर
हर ज़ख्म 
को झुलसा दिया

>मोहब्बत की ना कोई मिसाल होती है

>
कौन कहता है कि मोहब्बत की किताब होती है
ये तो दिल पर लिखी दिल की जुबान होती है

मोहब्बत तूने कौन सी जुबान में कर ली यारा
मोहब्बत तो हर जुबान में बेजुबान होती है

मोहब्बत के ये कैसे खेल खेल लिए तुमने
इस खेल में तो बस हार ही हार होती है  

जब इसकी महक़ फिजाओं में फैलती है यारा
तब मोहब्बत की दुल्हन भी बेनकाब होती है 

सुना है मौसम भी बदलते हैं रंग अपना
मगर मोहब्बत तो बेमौसम बरसात होती है

रंग कितने उँडेलो  जिस्म पर इसके 
ये तो मोहब्बती रंग का गुलाल होती है

तख्त-ओ-ताज के पहरों मे ना कैद होती है
ये तो किसी खास दिल की मेहमान होती है
 

मोहब्बत की ना कोई मिसाल होती है
ये तो हर युग मे बेमिसाल होती है


>जब चाँद जमीं पर उतर आया हो

>जब आसमाँ के चाँद से पहले
मेरा चाँद आ जाता है फिर
और क्या हसरत रही बाकी

हर हसरत को पंख मिल जाते हैं
परवाज़ बेलगाम हो जाती है

जब मोहब्बत रुहानी होती है
तब बिना कहे बात होती है
मेरा चाँद बिना बोले सब सुनता है
और एक बोसा रूह पर रखता है

उसकी प्रीत दीवानी सहेज लेती है
उसके प्रेम की तपिश को आगोश मे
उसके प्रेम की चाँदनी मे नहा लेती है
और प्रेम के हर रंग को पा लेती है
बताओ
अब कौन सी हसरत रही बाकी?
जब चाँद जमीं पर उतर आया हो

मेरा चाँद मुझमे ही नज़र आया हो


>जब आत्मिक मिलन हो जाए………….

>यूँ तो 
करती हूँ 
हर साल
करवाचौथ 
का व्रत 
तुम्हारी 
लम्बी उम्र 
की दुआएँ 
करने का 
रिवाज़ मैं भी
निभाती हूँ 
हर सुहागिन 
की तरह
मगर फिर भी
कहीं एक 
कमी लगती है
एक कसक सी
रह जाती है
कोई अदृश्य 
रेखा बीच में
दिखती है
किसी अनदेखी

अनजानी
कमी की
जो डोर को
पूर्णता से
बाँध नही
पाती है
इसलिए 
चाहती हूँ
अगले 
करवाचौथ 
तक मैं
तुम्हें तुमसे
चुरा लूं
और तुम्हारे
ह्रदय 
सिंहासन पर 
अपना आसन
जमा लूं
जब तुम 
खुद को 
ढूँढो तो
कहीं ना मिलो
सिर्फ मेरा ही
वजूद  तुम्हारे
अस्तित्व का
आईना बन
चुका हो
जहाँ तुम 
मुझे और
मैं तुम्हें
सामाजिकता 
के ढांचे से 
ऊपर उठकर
व्यावहारिकता
की रस्मों से
परे होकर
एक दूजे के
हृदयस्थल 
पर अपने 
अक्स चस्पां
कर दें
तन के 
सम्बन्ध तो
ज़िन्दगी भर
निभाए हमने
चलो एक बार
मन के स्तर पर
एक नया
सम्बन्ध बनाएँ
जिस दिन
“तुम” और “मैं”
दोनों की चाह
सिर्फ इक दूजे
की चाह में
सिमट जाए
प्रेमी और 
प्रेयसी के 
भावों में
हम डूब जाएँ
राधा – कृष्ण 
सा अमर प्रेम
हम पा जाएँ
जहाँ शारीरिक
मानसिक
स्तर से 
अलग रूहानी
सम्बन्ध बन जाए
जहाँ तन के नहीं
मन के फूल
मुस्कुराएं
कुछ ऐसे 
अगली बार
अपनी 
करवाचौथ 
को अपने 
अस्तित्वों
के साथ संपूर्ण
बना जायें
और व्रत 
मेरा पूर्ण हो जाये
जब आत्मिक 

मिलन 
हो जाए
तब
सुहाग अमर 
हो जाये

>किसका दायित्व ?

>वेदना का चित्रण
नैनों का दायित्व 
नैनों का चित्रण
अश्रुओं का दायित्व 
मगर
अश्रुओं का चित्रण 
किसका दायित्व ?

>हाँ , चैट कर लेती है

>२१ वीं सदी की नारी है
 हाँ , चैट कर लेती है
तो क्या हुआ ?
बहुत खरपतवार 
मिलती है 
उखाड़ना भी
जानती है
मगर फिर
लगता है
बिना खरपतवार
के भी आनंद 
नहीं आता 
इसलिए
साथ- साथ 
अच्छी फसल के 
उसे भी झेल लेती है
२१ वीं सदी की नारी है
हाँ , चैट कर लेती है

हर किसी से
हँसकर मिलती है 
तो सबको
अपनी लगती है
चाहे अन्दर से
गालियाँ देती है
मगर ऊपर से
स्वागत करती है
हर किसी को
इसका 
कोई ना कोई 
रूप भा जाता है 
कोई दोस्त 
तो कोई भाभी
तो कोई माँ 
बना जाता है
किसी को बहन की 
तलाश होती है
और सबसे ज्यादा 
बुरा हाल तो
 दिलफेंक 
प्रेमियों का
होता है
जो हर दूसरी
चैट पर 
मिलने वाली 
नारी में 
अपनी प्रेमिका 
खोजता है
कभी डियर
कभी डार्लिंग 
तो कभी 
लाइफ़लाइन
कहता है
मगर
कहते वक्त 
ज़रा नहीं सोचता 
जिसे तू
कह रहा है
वो तेरे बारे में
क्या सोचती है
तू भरम में जीता है
और वो खुश होती है
आज उसे 
ये लगता है
बरसों गुलामी 
की जिनकी
देखो आज कैसे 
दुम हिलाता है
पालतू जानवर- सा 
कैसे पीछे- पीछे 
आता है
सोच- सोचकर 
खुश होती है
और उसके 
अरमानों से खेलती है
हर बदला 
वो लेती है
जो वो सदियों से 
देता आया है
उसका दिया 
उसी को 
सूद समेत 
लौटा देती है
शायद 
इसीलिए इस 
खरपतवार को 
उखाड़ नहीं पाती है
कुछ इस तरह
आत्म संतुष्टि पाती है
ये २१ वीं सदी की नारी है
हाँ , चैट कर लेती है
मगर अब
बेवक़ूफ़ नहीं बनती है

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