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Archive for मई, 2011

>हाय रे ब्लोगर तेरी यही कहानी

>

हाय रे ब्लोगर तेरी यही कहानी
हाथों मे कीबोर्ड और आँखो मे पानी
कैसे कैसे ख्वाब संजोता है
कभी पद्म श्री तो कभी पद्म विभूषण
की आस लगाता है
पर इक पल चैन ना पाता है
ये ब्लोगिंग की कैसी कहानी

कहीं है झूठ तो कहीं है नादानी
कोई खींचता टांग किसी की
तो कोई आसमाँ पर बैठाता है
किसी को धूल चटाता है तो
किसी को तिलक लगाता है
हाय रे ब्लोगिंग ये कैसी कारस्तानी
बड़े बड़ों को तूने याद दिला दी नानी
बेचारा ब्लोगर इसके पंजों में फँस जाता है
अपनों से जुदा हो जाता है
फिर टर्र टर्र टार्राता है
ब्लोगिंग के ही गुण गाता है
शायद कोई मेहरबान हो जाये
और दो चार टिप्पणियों का दान हो जाये
या कोई अवार्ड ही मिल जाये
और किसी अख़बार में उसका नाम भी छप जाए
इसी आस में रोज अपना खून सुखाता है
ब्लोगिंग का कीड़ा रोज उसे काट खाता है
और राम नाम की रटना छोड़
रोज ब्लोगिंग ब्लोगिंग गाता है
नाम के फेर में पड़ कर
की बोर्ड चटकाता है
मगर चैन कहीं ना पाता है
हाय रे ब्लोगर तेरी यही कहानी
हाथों मे कीबोर्ड और आँखो मे पानी

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>प्रेम का कैनवस

>

तुम्हारी ख्वाबों की दुनिया 
का कैनवस कितना
विस्तृत है 
है ना ………..
उसमे प्रेम के 
कितने अगणित रंग
बिखरे पड़े हैं 
कभी तुम मेरे साथ
किसी अन्जान शहर की
अन्जान गलियों में 
विचर रहे होते हो   
तो कभी तुम 
मेरे जूडे में 
फूल लगा रहे होते हो 
कभी तुम किसी 
मंदिर की सीढ़ी पर 
मेरे प्रेम की 
आराधना कर रहे होते हो
तो कभी किसी 
बियावान  में 
अकेले , तन्हा 
मेरी यादों के साथ
भ्रमण कर रहे होते हो
कभी तुम किसी 
गुलमोहर से मेरा 
पता पूछ रहे होते हो
तो कभी किसी
अन्जान स्टेशन पर
मुझसे बिछड़ रहे होते हो
कभी खुद को 
लहूलुहान कर रहे होते हो
तो कभी यादों को
ख्वाबों के दामन से
खुरच रहे होते हो 
कितना विस्तृत है
तुम्हारे प्रेम का कैनवस
कहीं भी तुम 
तन्हा नहीं होते
हमेशा मेरी यादों के साथ
अपनी ख्वाबगाह में 
सैर कर रहे होते हो
फिर कहाँ से 
यादों की परछाइयाँ 
तुम्हें सताएंगी 
वो तो हर पल
तुम्हारे साये में 
स्वयं को 
महफूज़ महसूस 
करती होंगी 
मगर देखो तो
हमारे प्रेम के
कैनवस का
दूसरा पक्ष
ज़रा पलटकर तो देखो 
इस कैनवस को
इसके पीछे 
सिर्फ और सिर्फ 
एक ही रंग है
जानते हो तुम
वो रंग जिस पर
कभी कोई रंग 
चढ़ा ही नहीं 
जो किसी के 
कपोलों पर लग जाये 
तो सुन्दरता 
निखर जाती है
है ना………..
अब देखो मुझे
उस रंग में 
क्या दिखाई देती हूँ ?
नहीं ना ……….
क्यूंकि मेरे प्रेम का कैनवस
सिर्फ मुझमे ही
सिमट कर रह गया है
उसमे तुम्हारा वजूद
न जाने कहाँ खो गया है
जब भी कोई रंग 
भरना चाहा तुमने
कैसे इस रंग में 
सिमट गया 
क्योंकि 
मैंने तो प्रेम का
सिर्फ एक ही रंग जाना है 
प्रेम कब किसका
संपूर्ण हुआ है 
विरहाग्नि की तप्त ज्वाला में
दग्ध प्रेम ही शायद
पूर्ण हुआ है 
इसलिए उसका सिर्फ 
एक ही रंग हुआ है
ख़ामोशी में भीगता
विरह का रंग
इक दूजे में 
एकाकार होता 
सम्पूर्णता को पाता 
प्रेम का रंग 
तन से परे
मन के पार
तुम्हारे और मेरे
ख्वाबों के दामन में सिमटा
सिर्फ वो ही है
हमारे प्रेम का रंग 
क्यों है ना………… 
 

>यहाँ तो आसमाँ बचा ही नहीं

>

अब नही होगा कोई पुनर्गठन
जानती हूँ ………..
कुछ बचे तो होता है
पुनर्गठन …………
मगर जहाँ कुछ बचा ही ना हो
हाथ से लकीरें भी
छिन गयी हों
लाश से कफ़न भी
छिन गया हो
दीपक से लौ
छिन गयी हो
आसमाँ से सूरज
और धरती से वायु
छिन गया हो
वहाँ तो सिर्फ
दूर दूर तक
भयावह सन्नाटे
चीखते हैं
और सन्नाटों की चीखें
सन्नाटों में ही
दफ़न हो जाती हैं
बिना कोई आवाज़ किये
बिना अपनी पहचान दिए
तो कहो फिर
किसका हो पुनर्गठन ?
और कैसे ?
यहाँ तो आसमाँ बचा ही नहीं
फिर दिन कैसे ढलेगा
और शाम कैसे उतरेगी
सात फेरों की अग्नि
में होम हुए उस
नाम वाले बेनाम रिश्ते में
सुबह तो कब की
दफ़न हो चुकी है

>अब कैसे मिलन हो पाए?

>

किशोरी जी तुम बिन
चैन ना आये
कान्हा बुलाये
मन भरमाये
तुम बिन चैन ना आये
एक बार दर्शन
करने को
खुद वृन्दावन आये
फिर भी चैन ना आये
तुम्हारे चरणन के दर्शन को
कान्हा भी दौडा आये
प्रेम की गागर
छलक – छलक जाये
प्रीत की रीत
निभा न पाए 
तुम बिन चैन ना पाये
कान्हा तुम बिन
चैन ना पाये
चरण कमल पर 

बलि बलि जाए

फिर भी उॠण
न हो पाए
प्रेम का मोल
कैसे चुकाए
इतना समझ न पाए
किशोरी जी
कान्हा तुम बिन 
चैन न पाए 
तुम्हरे चरणों में
वास करन को
कान्हा भी अकुलाये  
दिव्य प्रेम के 
आगे उसकी
एक न चलने पाए 

किशोरी जी तुम्हरे
दरस बिन
कान्हा अश्रु बहाये
पर तुम बिन 
चैन न पाए

किशोरी जी
तुम बिन
कैसे
कान्हा
मुरली बजाये 

हर पल तुम्हारे विरह में
तड़प – तड़प जाये
पर तुम बिन चैन ना पाए
विरह अगन की तीव्र वेदना
कान्हा को झुलसाये
जो बीती तुम्हरे जीया पर
वो कान्हा खुद पर
सहता जाये
पर तुम बिन चैन ना पाये
किशोरी जी 
अब कैसे मिलन हो पाए?
 
 
दोस्तों 
ये दुर्लभ चित्र मुझे फ़ेसबुक पर कल मिला
तो सोचा आप सबको भी 
इसके दीदार कराऊँ
और मन मे जो भाव जागृत हुये
वो आपसे साझा कर रही हूँ 
उम्मीद है पसंद आएगा

>बताओ ना क्या कहती हो तुम मुझसे…………300 वीं पोस्ट

>

हाँ……
कहो………….
क्या कहा………..
समझ नहीं आ रहा
कुछ स्पष्ट कहो ना
तुम्हारे शब्द अस्पष्ट हैं
अस्पष्ट शब्दों के अर्थ
अनर्थ को जन्म देते हैं
कुछ कहती तो हो
मगर समझ नहीं पाती
कब से कह रही हो
कब तक कहती रहोगी
और मैं तुम्हें सुनती हूँ
मगर समझ नहीं आती हो
कैसी पहेलियाँ सी बुझाती हो
कभी सब कह जाती हो
कभी सिर्फ कानों में मंत्र सा
फूंक जाती हो
मगर उस मंत्र के
उच्चारण में होने वाली अशुद्धि
फिर वहीँ ले आती है
जहाँ से चलती हूँ
कहो कैसे जानूं तुम्हें
कैसे तुम्हारी अनकही समझूं
कौन सी चेतना जगाऊँ
जो तुम्हारे अनकहे शब्दों को
साकार कर दे
ना जाने क्या चाहती हो
जब कहती हूँ
आओ गले लगा लूँ तुम्हें
तो दूर छिटक जाती हो
और जब तुम से भागती हूँ
तो करीब चली आती हो
कितने ही प्रलोभन दिखाती हो
अपनेपन का आभास कराती हो
मगर जैसे ही तुम्हारी तरफ
कदम बढाती हूँ …….तुम फिर
ना जाने किस मोड़ पर
मुड जाती हो
और मैं फिर एक
गुबार में खो जाती हूँ
और अपना अक्स भी
धुंधलाने लगता है
मगर तुमको ना
पकड़ पाती हूँ
और ना ही
समझ पाती हूँ
आखिर तुम मुझसे
चाहती क्या हो
हाँ ………तुम्हारी ही
बात कर रही हूँ
क्यूँकि तुम हो
तो मेरा अस्तित्व है
और तुम नहीं
तो मेरा वजूद
मेरी रूह
का कहीं कोई
मोल नहीं
बताओ ना
क्या कहती हो
तुम मुझसे
ए मेरी ज़िन्दगी ?

>आखिर पतझड मे कब पेड हरे हुये हैं?

>

क्या हुआ जो भुला दिया तुमने
क्या हुआ जो कोई राह नही मुडती
मेरे चौबारे तक
क्या हुआ जो कंक्रीट का जंगल
बन गया दिल मेरा
क्या हुआ जो आस का सावन
नही बरसा मेरे ख्वाबों पर
क्या हुआ जो हवा का रुख
बदल गया
नही छुआ तुम्हारा दामन उसने
नही पहुंचाई कोई सदा तुम तक
क्या हुआ जो तेरी महक
फ़िज़ाँ मे नही लहराई
कोई फ़र्क नही पडता
कुछ फ़िज़ाओं पर
मौसम का असर नही होता
और जहाँ पतझड उम्र के साथ
ठहर गया हो
वहाँ कोई फ़र्क नही पडता
आखिर पतझड मे कब पेड हरे हुये हैं?

>नीम हर दर्द की दवा नहीं होता

>

वेदना को शब्द दे सकती
तो पुकारती तुम को
शायद नीम के पत्ते
तोड़ लाते तुम और
लगा देते पीस कर
मेरे ज़ख्मो पर
जानती हूँ
नीम भी बेअसर है
मगर तुम्हारी
खुशफहमी तो दूर
हो जाती और शायद
मेरी वेदना को भी
खुराक मिल जाती
मगर शायद तुम नहीं जानते
नीम हर दर्द की दवा नहीं होता
क्या ला सकते हो कहीं से
मीठा नीम मेरे लिये?

टैग का बादल