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Archive for मई, 2012

श्रापित मोहब्बत हो कोई और उसे मुक्तिद्वार मिल जाये

आज भी कुंवारी है मेरी मोहब्बत

जानते हो तुम
रोज आती हूँ नंगे पाँव परिक्रमा करने 
उसी बोधिवृक्ष की
जहाँ तुमने ज्ञान पाया 
जहाँ से तुमने आवाज़ दी 
उस मृतात्मा को 
जिसका होना ना होना 
खुद के अस्तित्व के लिए भी दुरूह है
काठ की दुल्हनें कब डोलियों में बैठी हैं
फिर भी तुमने देवदार बन कर
छाँव के औसारे पर 
मेरे पाँव की जमीन की 
मिटटी पर अपने दिल की 
तस्वीर बनाई थी 
और वो मिटटी धडकने लगी 
साँसों पर ठहरी इबारत
आकार लेना चाहकर भी ना ले सकी
जानते हो ना 
मैं होकर भी नहीं हूँ
देवदासी तो नहीं हूँ
पर उससे कम भी नहीं
कैसे श्रृंगार पर अधिकार करूँ
मोहब्बत का श्रृंगार मेरी
माँग का सिन्दूर नहीं 
पत्थर की राजकुमारियां 
शापित होती हैं 
डूब कर मरने के लिए 
मगर तुम्हारी साधना की आराधना बनना 
तुम्हारे हाथों में सुमिरन की माला बन
ऊंगलियों में फिरना 
जीवित काष्टों का नसीब नहीं 
देखो मत छूना मुझे
ये ग्रीवा पर ऊंगलियों के स्पर्श 
मुझमे चेतना का संचार नहीं करेंगे
अरे रे रे ……रुको वहीँ
पीछे बहता दरिया मेरी कब्रगाह है
नहीं है इजाज़त मुझे 
बाँध बाँधने की 
सिर्फ प्रवाहित हो सकती हूँ
अस्थियों की तरह 
गर तुमने मेरी माँग में 
अपने प्रेम का सिन्दूर भरा
वैधव्य का दुशाला कैसे ओढूंगी
श्रापित हूँ मैं
दूर रहो मुझसे
मैं कहती रही ………तुम सुनते रहे
और तुम्हारे कदम बढ़ते रहे
बलिष्ठ भुजाओं में भर 
स्नेह्जनित चुम्बन 
शिव की तीसरी आँख पर
अंकित कर 
मुझे श्राप से मुक्त किया  
मेरा भरम तोड़ दिया ………श्रापित होने का
सुदूर पूरब में 
सूर्योदय की लालिमा का रंग 
मेरे मुखकमल पर देख 
तुमने इतना ही तो कहा था 
पिघलती चट्टान का रंग-ओ-सुरूर  हो तुम ………ओ मेरी दिवास्वप्ना!!!!!!!

बस फिर यूँ लगा ……

श्रापित मोहब्बत हो कोई और उसे मुक्तिद्वार मिल जाये ……


कृष्ण लीला ……भाग 50

दोस्तों आज प्रभु की असीम कृपा से कृष्ण लीला इस मुकाम तक पहुँच गयी और अपने 50 पायदान पूरे किये उम्मीद है प्रभु आगे भी कृपा बरसाते रहेंगे और लीला का आनन्द दिलवाते रहेंगे.उनकी लीला को लिखने की हिम्मत मुझ जैसी अदना जीव तो नही कर सकती थी बस सब उन्ही की अहैतुकी कृपा है ये जो वो शब्द बनकर उतर रहे हैं और मुझे माध्यम बनाया है । सबका उन्हीं का उन्हीं को समर्पित है।





इक दिन नटवर रूपधारी 
यमुना किनारे मुरली बजाते थे 
राधा प्यारी सखियों सहित 
पनिया भरन को आई थीं
ग्वालों की भीड़ देख घबरायी थीं
माखनचोर खड़ा राह में
ये जरूर अब छेड़ेगा
राधा ने सखियों से कहा
इधर श्यामसुंदर ने
राधा  का रुख जान लिया
और सखाओं सहित
रास्ता छोड़ दिया
जब राधे हंसिनी सी
चाल चलती घड़ा भर
गोपियों के बीच 
चली आती थीं
तभी कान्हा ने जुगत लडाई
गोपियों के बीच आ गए
और एक कंकरी गगरी में मार
मधुर मुस्कान से 
सबके मन का हरण किया 
ये देख एक चतुर सखी ये बोल पड़ी
मोहन क्या बिगाड़ा हमने तुम्हारा
जो राह में ठिठोली करते हो
मधुर मुस्कान तिरछी चितवन से 
प्राण और मन हर लेते हो
वंशी की धुन हमारा मन हर लेती है
कहो कहाँ से तुमने ये
चित चुराना सीखा है
इतना सुन मोहन बोले 
जैसे तुमने अपनी छवि से
मेरे मन को मोहा है
वैसे ही तुमको भी ऐसा लगता  है
तब गोपियाँ बोल उठीं
तुम तो कान्हा बहुत बरजोरी करते हो 
कभी चीर खींच लेते हो
कभी धक्का दे देते हो
कभी गगरी फोड़ देते हो
कभी माखन चुराते हो
बाज आ जाओ इन बातों से मोहन
नहीं मैया को हाल बतायेंगी
फिर ऊखल से तुम्हें बन्धवाएँगी
इतना कह गोपियों ने
यशोदा से जाकर कहा
कहते लज्जा आती है
ऐसे हमें सताते हैं
हम यमुना पर ना जा पाती हैं
नंदरानी तुम्हारे लाल की
सब करतूत  तुम्हें सुनाती हैं
तब यशोदा ने उत्तर दिया
जब ऊखल से बांध देती हूँ
तो खुद ही छुड़ाने आती हो
पूरी सजा भी ना देने पाती हूँ
आज आने दो कान्हा को
ऐसी मार लगाऊँगी
तुम्हारी राह ना रोकेगा
बस एक बार और क्षमा कर दो
कह गोपियों को विदा किया
कान्हा ओट में खड़े सब सुनते थे
जाकर बोले ,जो  भी गोपियाँ कहती हैं
तुम उसे सच मान लेती हो
पर उन गोपियों का 
चरित्र क्यों नहीं जान लेती हो
बरजोरी कर मुझे 
कदम्ब के नीचे  ले जाती हैं  
फिर गाल पर मुक्का मारती हैं
और जब मटक मटक कर चलती हैं
तब गगरी फूट जाती है
और मेरा नाम लगाती हैं
तुमसे शिकायत करती हैं
इतना सुन यशोदा  चंद्रमुख देख विह्वल हुई 
क्रोध करना सब भूल गयी
अपने प्यारे को गोद में बिठाया है
और समझाया है
मना करने पर भी
क्यों उनके समीप जाते  हो
ये झूठी ग्वालिने हीं झूठी बात बनाती  हैं 
और हम माँ बेटे को उलझाती हैं
प्रतिदिन नवलीला करते हैं
मोहन सभी को ऐसे सुख देते हैं





पूर्व जन्म  संस्कार से 
राधा की प्रीती निराली थी
मोहन मूर्ति के दरस बिना
ठौर  कहीं ना पाती थीं
लोकलाज का भय सताता था
बाहर नहीं जा पाती थीं
मगर घर में रहकर भी
राधे का मन 
कान्हा की तरफ दौड़ लगाता  था 

चित को बहुत समझाती थीं
पर चितचोर की तरफ से
मोड़ नहीं पाती थीं
जब राधा ने ऐसी दशा अपनी पाई
तब  कान्हा से प्रकट प्रीती की राह अपनाई
अपने दिल का हाल 
गोपियों को सुनाया है
सखी मुझे ना लगे प्यारा अब घर बार
लोक लाज को दिया है त्याग
विरह में जब प्राण जायेंगे निकल
तब लज्जा बोलो जाएगी किधर
अब मोहन को पति बनाना है
यही मैंने मन में ठाना है
सुन ललिता आदि सखियाँ बोली हैं
राधे तू बड़ी भोली है
उस मनमोहन की मूरत बहुत सलोनी है
जो सबका दिल चुराती है
वंशी की धुन से 
प्यारे ने सब पर मोहिनी डारी है
हमारा भी वो ही हाल हुआ है
संसार के जड़ चैतन्य जीवों का
कौन है जो ना मोहित हुआ है
गर प्यारे हमें अपनाते हैं
फिर लाज के घूघट पट हम हटाती हैं
और उनकी  प्यारी बन जाती हैं 
कुछ ऐसे गोपियाँ राधा संग बतलाती हैं 
उनके विरह में दिन गुजारा करती हैं
संध्या में दर्शन कर 
ह्रदय तपन मिटाया करती थीं


क्रमश: ……….



मेहनत का आज सिला मिल ही गया








आज मेरे बेटे ईशान का सी बी एस सी बारहवीं का रिज़ल्ट आ गया 


उसके 94% मार्क्स आये हैं और पी सी एम 96% है ।इतने वक्त की 


मेहनत का आज सिला मिल ही गया और अब उसका उसके मनपसन्द 


सब्जैक्ट के साथ इंजीनियरिंग मे और एडमीशन हो जाये तो जीवन 


सफ़ल है । बस आप सबकी दुआओं और आशीर्वाद की जरूरत है ।



डायलाग तो डायलाग ही था……कमाल तो होना ही था


डायलाग कार्यक्रम की एक झलक

फ़ेसबुक पर मिले दोस्त कुछ ब्लोगजगत के तो कुछ नये मगर लगा ही 

नही पहली बार मिले हों ………एक मित्रवत माहौल यूँ लगा अपने ही घर 

मे आये हों ……….सुशीला पुरी जी, अमितेश जैन , अवनीश सिंह

 , जितेन्द्रकुमार पाण्डेय जी, आनन्द द्विवेदी जी, त्रिपुरारि कुमार शर्मा ,
राजीव तनेजा जी, कितने तो ब्लोगजगत के दोस्त मिल गये उनके 

अलावा फ़ेसबुक के दोस्तों से रु-ब-रु होने का मौका मिला जिसने माहौल

 को खूबसूरत बना दिया

 दोस्ताना माहौल मे


 मिथिलेश जी ओम थानवी जी के साथ

 नवोदित कवि काव्य पाठ करते हुये

 मस्तमौला ने मस्ती ला दी सारे प्रांगण मे बहार ला दी

 ओम थानवी जी अपनी पुस्तक मोहनजोदडो के अंश पढते हुये

 नंद भारद्वाज जी काव्य पाठ करते हुये

 मिले कुछ नये पुराने दोस्त

 हम भी हैं शामिल इस आलम मे



प्रसिद्ध कवि नंद भारद्वाज जी, मिथिलेश जी ,अंजू शर्मा जी


प्रसिद्ध कवि नंद भारद्वाज जी, मिथिलेश जी ,अंजू शर्मा जी
नंद जी तल्लीनता से नवोदित कवियों पर राय लिखते हुये
नवोदित कवि काव्य पाठ करते हुये

राजीव तनेजा जी अपने अन्दाज़ मे
ओम थानवी जी के साथ बाकी सभी
नवोदित कवि काव्य पाठ करते हुये

 ओम थानवी जी नंद भारद्वाज जी के साथ


नवोदित कवियों ने दिखाया दम खम 
बात उनमे भी कुछ नही है कम
 सबका है अन्दाज़ जुदा
ये प्रेरणा ने बतलाया

 ध्यानपूर्वक सुनते हुये

अनौपचारिक वातावरण और युवाओं का जोश बुलन्दी पर

हाय रे !कूकर विदेशी क्यों ना भया 
प्रभु तुमने ये क्या किया
 ये है त्रिपुरारि कुमार शर्मा जिसे सब जानते हैं
 दोस्तों के साथ


 इतनी बडी हस्ती के साथ मुझ अदना को मिलना परम सौभाग्य


ये हैं वो नंद भारद्वाज जिनके साथ मेरी कवितायें भी “स्त्री होकर सवाल करती है” पुस्तक मे छपीं ………इससे बढकर और क्या होगा …… और सबसे बडी बात उन्होने मुझे ऐसे पहचाना जैसे कब से जानते हों एकदम बोले ……आप वन्दना गुप्ता हो ना ………उफ़ ! मै तो कभी सपने मे भी नही सोच सकती थी कि इतनी बडी हस्ती मुझे पहचान लेगी ………ह्रदय भाव विह्वल हो गया …………बस इन्हीं लफ़्ज़ों के साथ कल वहाँ जाना सार्थक हो गया ……इसीलिये कहती हूँ जो मेरे साथ हुआ………डायलाग तो डायलाग ही था……कमाल तो होना ही था

डॉलर अट्टहास करता रहेगा ………….




सुना है जब देश आज़ाद हुआ 
रुपया डॉलर पौंड का भाव समान था 
फिर कौन सी गाज गिरी 
क्यों रुपये की ये हालत हुयी 
किस किस की जेब भरी 
किसने क्या घोटाला किया 
क्यों दाल भात को भी 
सट्टे की भेंट चढा दिया 
जब से कोमोडिटी मे डाला है 
तभी से निकला दिवाला है 
तभी मंहगाई आसमान छूती है 
अब क्यों हाय हाय करते हो 
क्यों रुपये की हालत पर हँसते हो 
जो बोया था वो ही तो काटना होगा 
बबूल के पेड पर आम नही उगा करते 
यूँ ही देश आत्मनिर्भर नही बना करते 
जब तक ना सच्चाई का बोलबाला हो 
भ्रष्टाचार का ना अंत होगा
मल्टी नैशनल कम्पनियां हों या सरकारी दफ्तर
जब तक ना बेहिसाब तनख्वाह का हिसाब होगा
रुपया तो यूँ ही कमजोर होगा
जब तक ना टैक्स का सही सदुपयोग होगा
जब तक ना जनता को बराबर अधिकार मिलेगा
रुपया तो यूँ ही कमजोर होगा
जब तक ना भ्रष्ट शासन से छुटकारा होगा
जब तक ना हर नागरिक वोट के महत्त्व को समझेगा
रुपया तो यूँ ही कमजोर होगा
जब तक ना हर नागरिक अपने कर्तव्यों पर खरा उतरेगा
सिर्फ अधिकारों की ही बात नहीं करेगा 
रुपया तो यूँ ही कमजोर होगा
परिवर्तन सृष्टि का नियम है
बाज़ार की दशा भी उसी का आधार है 
मगर लालच घोटालों का ही ये परिणाम है 
रुपया रोज गिरता रहा 
सेठ का पेट भरता रहा 
तिजोरियों स्विस बैंकों में 
रुपया दबता रहा 
फिर अब क्यों हल्ला मचाया है
मंहगाई का डमरू बजाया है 
मंहगाई खुद नहीं आई है 
हमारे लालच की भेंट ने 
मंहगाई को दावत दी और 
रूपये की शामत आयी है
फिर कहो कैसे बाहर निकल सकते हो
जब तक खुद को नहीं सच के तराजू पर तोल सकते हो 
सरकारें पलटने से ना कुछ  होगा
तख्तो ताज बदलने से ना  कुछ  होगा 
जब तक ना खुद को बदलेंगे
लालच को ना बेड़ियों में जकडेंगे
देश और जनता का भला ना सोचेंगे
तब तक रुपया तो यूँ ही गिरता रहेगा
डॉलर के नीचे दबता रहेगा और 
           डॉलर अट्टहास करता रहेगा ………….

बाबुल मेरो नैहर छूटो ही जाये


यादों की कस्तूरी कैसे छुपाऊँ
ज़ेहन में बसी याद कैसे मिटाऊँ
जीवन के वो पल कैसे भुलाऊँ
जहाँ सफ़र का पहला कदम पड़ा
जहाँ रूह को इक जीवन मिला



टिमटिमाता दिया बुझने की कगार पर है
आ सहेज लूं पलों को रौशनी के कतरे सा 

कौन जाये दिल्ली की गलियाँ छोड़कर 
मगर परदेसियों को तो इक दिन है जाना 

हर मौसम की साक्षी बनी 
मगर अपनी दुर्दशा पर आखिर पहुँच ही गयी

यहीं तो मेरी रूह थी बसी
जहाँ मै जन्मी पली और बढी

वक्त हाथ से फिसलता रहा
धूल कपड़ों पर चढ़ती रही

ज़िन्दगी सीढियाँ चढती गयी
उम्र हाथ से फ़िसलती गयी

सूखे पत्ते हैं मिट जायेंगे
बस यादों की धरोहर बन जायेंगे

आस्था जहाँ परवान चढी
ये है वो मेरे मन की गली

तस्वीर चाहे हट जायेंगी
मगर यादें बताओ किधर जायेंगी

ज़िन्दगी धूप छांव का खेल ही सही
हार जीत का कोई गम नही
बस इस खेल के किरदार हम बने
सोच आँखे हुयी नम ही सही

कभी जहाँ बसती थी इक बसती
ज़िन्दापरस्तों की
आज बंद दरवाज़ों पर लगे ताले
अपना हाल बताते हैं

किसे आवाज़ दूँ कौन सा अब दरख्त सींचूँ
गुजरे ज़माने को कैसे मै हथेली मे भींचूँ 

रहेंगी सब ख्वाबों ख्यालों की बातें
कैसे भुलाऊँगी वो जीवन की रातें 

बाबुल का आंगन हो जायेगा स्वप्नवत

मिटना शाश्वत सत्य सही
फिर भी ना जीने की हसरत गयी

छज्जे के चारों तरफ़ बिखरा उजास
कहता आ जरा बैठ मेरे पास
कुछ यादों के गोले बुन ले
सर्दी की धूप और गर्मी की तपिश का कुछ तो मज़ा ले

इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल 

जाने वाले फिर नही आते
जाने वालों की याद आती है

रंग चाहे उड जाये रूप चाहे मिट जाये
पर यादों के बटुये मे मन पंछी कैसा फ़डफ़डाये

दरो दीवार चाहे बदल जाये
गुजरी यादें ना बिसरी जायें

मिट्टी मेरे आँगन की ये आवाज़ देती है
कर ले तिलक माथे पर अब सिर्फ़ यही कहती है

 भोर होते कागा शोर मचाता 
किसी परदेसी का संदेसा दे जाता 
शाम का आलम शरमा जाता 
जब छत पर मौसम बदल जाता
कभी बारिश मे तनमन भीग जाता 
कभी पतंगों संग उड जाता 
कभी रात को रेहन रख जाता 
कभी पुरवाई सा मचल जाता 
कभी खेलों मे बदल जाता
कभी छुपन छुपाई का रंग दिखाता 
कभी चारपाई पर रात मे तारे गिनता 
कभी सप्तॠषियों को ढूँढता 
कभी हाथों से पंखा झलता 
कभी पुरों के नाम गिनता
कभी अंताक्षरी चुटकुलों की महफ़िलें सजतीं 
कभी लडाइयों की महाभारत होती 
ये छत के मौसम जब भी बदलते 
जीवन मे नये रंग भरते
मिट्ने की कगार पर हूँ
हाँ ….मै इंतज़ार मे हूँ 

कभी ईमारत बुलंद थी नक्शा बताता है
दरो दीवार की मजबूती भी दिखाता है 

उम्र के आखिरी पड़ाव पर 
अपनी जर्जर अवस्था में वीराना 

कभी आबाद था जो आशियाना
आज बना है देखो वीराना

यादों के ठीकरों पर वक्त की कैसी साजिश हुई
जो कल तक मेरा था रूहों का वहाँ डेरा हुआ 

अब यादों के पुलों पर ही बसेरा होगा
यहाँ न अब चिडियों का डेरा होगा

कभी ईमारत बुलंद थी नक्शा बताता है
दरो दीवार की मजबूती भी दिखाता है 

आने वाले को जाना होगा 
बस तस्वीरों में ही ठिकाना होगा 

कहो अपनी क्या पहचान दूँ
आज हूँ कल रहूँ ना रहूँ 

मुस्कुराया था कभी यहाँ भी जीवन
आज खुद मिटने की कगार पर हूँ

देख लो आज हमको जी भर के
कोई आता नही है फिर मर के

उखडी पपडियाँ , उडा रंग रोगन
रहता था कभी यहां भी जीवन

इमारत आज भी अहसास कराती है
कभी बुलन्द रही होगी इमारत 

उम्र के आखिरी पडाव पर भी बुलन्दी का अहसास कराती हैं
सीढियाँ जो घर को जाती हैं 

दहलीज
देखी जिसने हर रंगत

ये है मेरा घर जहां बीता मेरा बचपन ………कभी जहाँ महफ़िलें सजती थीं  चहल पहल होती थी  अपने पराये का  भेद ना था  आज वीरान हो चुका है ……200 साल पुराना है ये घर जो अब जल्द ही बिक जायेगा ………सब छोड कर जा चुके मगर उन यादों का क्या करूँ इसलिये समेट लायी अपने साथ तस्वीरों मे …………कल बन जायेगी यहाँ नयी इमारत नामो निशान मिट जायेगा बस घर का नम्बर नही बदल पायेगा सिर्फ़ बाकी यही निशान रह जायेगा

यूँ तो जिस दिन बाऊजी छोड कर गये उसी दिन पीहर छूट गया था मगर अब तो निशान भी बाकी नही रहेगा ……ऐसे मे अश्रुपूरित मन यही तो कहेगा

बाबुल मेरो नैहर छूटो ही जाये

ॐ जय पुरस्कार देवता

ॐ जय पुरस्कार देवता

ॐ जय पुरस्कार देवता
जो कोई तुमको पाता
मन प्रसन्न हो जाता
उसका भाव ऊंचा चढ़ जाता 
ॐ जय पुरस्कार देवता

कैसे कैसे रंग दिखाते 
बेचारे ब्लोगर फँस जाते
फिर टंकी पर चढ़ जाते
उतारने की गुहार लगाते
पर पार ना तुम्हारा पाते 
ॐ जय पुरस्कार देवता

जैसे ही तुम्हारा पदार्पण
ब्लोगजगत मे होता 
गुटबाजी के नये नये 
गुट बन जाते 
अपने अपने पैंतरे 
सभी आजमाते 
सम्मान पाने की होड मे 
मर्यादा भूल जाते 
पर तुम्हें पाने की हसरत मे 
नियमों का उल्लंघन भी कर जाते 
ये कैसी तुम्हारी लीला है 
इसका पार ना कोई पाते
ॐ जय पुरस्कार देवता

ऐरे- गैरे भी तुम्हें पाने को
दौड़े दौड़े चले आते 
अपने चमचे भी तुम्हारे
पीछे लगा जाते
वोटिंग के झांसे में
फर्जी वोट डलवाते 
पर पुरस्कार पाने में
कोई कसर ना छोड़ पाते 
ॐ जय पुरस्कार देवता


चाहे कितनी आलोचना करनी पड़े
चाहे कितनी बगावत करनी पड़े
चाहे तुम पर ही तोहमत लगानी पड़े
चाहे उलटे सीधे तिकड़म अपनाने पड़ें
चाहे व्यंग्यबाण चलाने पड़ें
चाहे छिछोरी हरकतों पर उतर जाना पड़े
चाहे दूसरे को नीचा दिखाने के चक्कर में
खुद नीचे गिर जाना पड़े 
पर कोई कसर ना छोड़ पाते
तुम्हें पाने को तो बेचारे
अपना सारा दमखम लगाते
ॐ जय पुरस्कार देवता


पुरस्कार देवता की आरती 
जो कोई ब्लोगर गाता
प्रेम सहित गाता
पुरस्कारों का उसके आगे
ढेर लग जाता 
हर जगह वो सम्मान है पाता
एक दिन का वो बादशाह बन जाता
ॐ जय पुरस्कार देवता
ॐ जय पुरस्कार देवता
जो कोई तुमको पाता
मन प्रसन्न हो जाता
उसका भाव ऊंचा चढ़ जाता 
ॐ जय पुरस्कार देवता

टैग का बादल