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Archive for अप्रैल, 2013

सम्भोग से समाधि तक

संभोग 

एक शब्द 
या एक स्थिति 
या कोई मंतव्य 
विचारणीय  है ………

सम + भोग 
समान भोग हो जहाँ 
अर्थात 
बराबरी के स्तर पर उपयोग करना 
अर्थात दो का होना 
और फिर 
समान स्तर पर समाहित होना 
समान रूप से मिलन होना 
भाव की समानीकृत अवस्था का होना
वो ही तो सम्भोग का सही अर्थ हुआ 
फिर चाहे सृष्टि हो 
वस्तु हो , मानव हो या दृष्टि हो 
जहाँ भी दो का मिलन 
वो ही सम्भोग की अवस्था हुयी 

समाधि 
सम + धी (बुद्धि )
समान हो जाये जहाँ बुद्धि 
बुद्धि में कोई भेद न रहे 
कोई दोष दृष्टि न हो 
निर्विकारता का भाव जहाँ स्थित हो 
बुद्धि शून्य में स्थित हो जाये
आस पास की घटित घटनाओं से उन्मुख हो जाये
अपना- पराया
मेरा -तेरा ,राग- द्वेष 
अहंता ,ममता का 
जहाँ निर्लेप हो 
एक चित्त 
एक मन 
एक बुद्धि का जहाँ 
स्तर समान हो 
वो ही तो है समाधि की अवस्था 



सम्भोग से समाधि कहना 
कितना आसान है 
जिसे सबने जाना सिर्फ 
स्त्री पुरुष 
या प्रकृति और पुरुष के सन्दर्भ  में ही 
उससे इतर 
न देखना चाहा न जानना 
गहन अर्थों की दीवारों को 
भेदने के लिए जरूरी नहीं 
शस्त्रों का ही प्रयोग किया जाए 
कभी कभी कुछ शास्त्राध्ययन 
भी जरूरी हो जाता है 
कभी कभी कुछ अपने अन्दर 
झांकना भी जरूरी हो जाता है 
क्योंकि किवाड़ हमेशा अन्दर की ओर  ही खुलते हैं 
बशर्ते खोलने का प्रयास किया जाए 

जब जीव का परमात्मा से मिलन हो जाये 
या जब अपनी खोज संपूर्ण हो जाए 
जहाँ मैं का लोप हो जाए 
जब आत्मरति से परमात्म रति की और मुड जाए 
या कहिये 
जीव रुपी बीज को 
उचित खाद पानी रुपी 
परमात्म तत्व मिल जाए 
और दोनों का मिलन हो जाए 
वो ही तो सम्भोग है 
वो ही तो मिलन है 
और फिर उस मिलन से 
जो सुगन्धित पुष्प खिले 
और अपनी महक से 
वातावरण को सुवासित कर जाए 
या कहिये 
जब सम्भोग अर्थात 
मिलन हो जाये 
तब मैं और तू का ना भान रहे 
एक अनिर्वचनीय सुख में तल्लीन हो जाए 
आत्म तत्व को भी भूल जाए 
बस आनंद के सागर में सराबोर हो जाए 
वो ही तो समाधि की स्थिति है 
जीव और ब्रह्म का सम्भोग से समाधि तक का 
तात्विक अर्थ तो 
यही है 
यही है 
यही है 

काया के माया रुपी वस्त्र को हटाना 
आत्मा का आत्मा से मिलन 
एकीकृत होकर 
काया को विस्मृत करने की प्रक्रिया 
और अपनी दृष्टि का विलास ,विस्तार ही तो 
वास्तविक सम्भोग से समाधि तक की अवस्था है 
मगर आम जन तो 
अर्थ का अनर्थ करता है 
बस स्त्री और पुरुष 
या प्रकृति  और पुरुष की दृष्टि से ही 
सम्भोग और समाधि को देखता है 
जबकि दृष्टि के बदलते 
बदलती सृष्टि ही 
सम्भोग से समाधि  की अवस्था है 

ब्रह्म और जीव का परस्पर मिलन 
और आनंद के महासागर में 
स्वयं का लोप कर देना ही 
सम्भोग से समाधि  की अवस्था है 
गर देह के गणित से ऊपर उठ सको 
तो करना प्रयास 
सम्भोग से समाधि की अवस्था तक पहुंचने का 
तन के साथ मन का मोक्ष 
यही है 
यही है 
यही है 

जब धर्म जाति  , मैं , स्त्री पुरुष 
या आत्म तत्व का भान  मिट जाएगा 
सिर्फ आनंद ही आनंद रह जायेगा 
वो ही सम्भोग से समाधि की अवस्था हुयी 

जीव रुपी यमुना का 
ब्रह्म रुपी गंगा के साथ 
सम्भोग उर्फ़ संगम होने पर 
सरस्वती में लय  हो जाना ही 
आनंद या समाधि  है 
और यही 
जीव , ब्रह्म और आनंद की 
त्रिवेणी का संगम ही तो 
शीतलता है 
मुक्ति है 
मोक्ष है 


सम्भोग से समाधि तक के 
अर्थ बहुत गहन हैं 
सूक्ष्म हैं 
मगर हम मानव 
न उन अर्थों को समझ पाते हैं 
और सम्भोग को सिर्फ 
वासनात्मक दृष्टि से ही देखते हैं 
जबकि सम्भोग तो 
वो उच्च स्तरीय अवस्था है 
जहाँ न वासना का प्रवेश हो सकता है 
गर कभी खंगालोगे ग्रंथों को 
सुनोगे ऋषियों मुनियों की वाणी को 
करोगे तर्क वितर्क 
तभी तो जानोगे इन लफ़्ज़ों के वास्तविक अर्थ 
यूं ही गुरुकुल या पाठशालाएं नहीं हुआ करतीं 
गहन प्रश्नो को बूझने  के लिए 
सूत्र लगाये जाते हैं जैसे 
वैसे ही गहन अर्थों को समझने के लिए 
जीवन की पाठशाला में अध्यात्मिक प्रवेश जरूरी होता है 
तभी तो सूत्र का सही प्रतिपादन होता है 
और मुक्ति का द्वार खुलता है 
यूँ ही नहीं सम्भोग से समाधि तक कहना आसान होता है 

अपेक्षाओं के सिन्धु

सुनो 

अपनी अपेक्षाओं के सिन्धुओ पर 
एक बाँध बना लो 
क्योंकि जानते हो ना 
सीमाएं सबकी निश्चित होती हैं 
और सीमाओं को तोडना 
या लांघना सबके वशीभूत नहीं होता 
और तुम जो अपेक्षा के तट पर खड़े 
मुझे निहार रहे हो 
मुझमे उड़ान भरता आसमान देख रहे हो 
शायद उतनी काबिलियत नहीं मुझमें 
कहीं स्वप्न धराशायी न हो जाए 
नींद के टूटने से पहले जान लो 
इस हकीकत को 
हर पंछी के उड़ान भरने की 
दिशा , गति और दशा पहले से ही तय हुआ करती है 
और मैं वो पंछी हूँ 
जो घायल है 
जिसमे संवेदनाएं मृतप्राय हो गयी हैं 
शून्यता का समावेश हो गया है 
कोई नवांकुर के फूटने की क्षीण सम्भावना भी नहीं दिखती 
कोई उमंग ,कोई उल्लास ,कोई लालसा जन्म ही नहीं लेती 
घायल अवस्था , बंजर जमीन और स्रोत का सूख जाना 
बताओ तो ज़रा कोई भी आस का बीज तुम्हें दिख रहा है प्रस्फुटित होने को 
ऐसे में कैसे तुम्हारी अपेक्षा की दुल्हन की माँग सिन्दूर से लाल हो सकती है …….ज़रा सोचना !!!

सुन्न

जब सुन्न हो जाता है कोई अंग
महसूस नहीं होता कुछ भी
न पीड़ा न उसका अहसास
बस कुछ ऐसी ही स्थिति में
मेरी सोच
मेरे ह्रदय के स्पंदन
सब भावनाओं के ज्वार सुन्न हो गए हैं

अंग सुन्न पड़ जाए तो
उस पर दबाव डालकर
या सहलाकर
या सेंक देकर
रक्त के प्रवाह को दुरुस्त किया जाता है
जिससे अंग चलायमान हो सके
मगर
जहाँ मन और मस्तिष्क
दोनों सुन्न पड़े हों
और उपचार के नाम पर
सिर्फ अपना दम तोड़ता वजूद हो
न खुद में इतनी सामर्थ्य
कि  दे सकें सेंक किसी आत्मीय स्पर्श का
न ऐसा कोई हाथ जो
सहला सके रिश्ते की ऊष्मा को
या आप्लावित कर सके
रिक्तता को स्नेहमयी दबाव से
फिर कैसे संभव है
खुद -ब -खुद बाहर आना
सूने मन के , तंग सोच के
सुन्न पड़े दायरे से ……………

श्याममय दिखता सब संसार


जब से वैराग्य की मांग निकाली है

भक्ति का सिंदूर डाला है 
ज्ञान का सागर बहने लगा
ह्रदय में कम्पन होने लगा 
प्रेम का अंजन 
अश्रुओं मे बहने लगा
मन मयूर नृत्य करने लगा
सांवरा मन मे बसने लगा 
नित्य रास करने लगा 
अब तो मधुर मिलन होने लगा 
प्रेमरस बहने लगा 
द्वि का परदा हटने लगा
 एकाकार होने लगा 
ब्रह्मानंद मे मन डूबने लगा
 “मै” का ना कोई भान रहा
 “तू” मे ही सब समाने लगा
 आह! कृष्ण ये मुझे क्या होने लगा
 जहाँ ना मै रहा ना तू रहा
 बस अमृत ही अमृत बरसने लगा
 आनन्द सागर हिलोरें लेने लगा 
पूर्ण से पूर्ण मिलने लगा 
ओह ! संपूर्ण जगत स्व- स्वरुप दिखने लगा 
आनंद का ना पारावार रहा 
आहा ! श्याममय आनंदमय 
रसो वयि सः निज स्वरुप होने लगा

गलती से एक नज़र इधर भी करिये :)

आदर्श नगर अपने क्षेत्र में पहली बार कविता पाठ करने का मौका मिला जिसका भी अपना ही मज़ा है…………21-4-2013 को  स्वामी विवेकानन्द की 150 वीं पुण्यतिथि और नव संवत्सर पर आयोजित कार्यक्रम में प्रसिद्ध मंचीय कवियों में कवि विनय विनम्र , महेन्द्र शर्मा, अनिल रघुवंशी , बलजीत कौर तन्हा , रसिक , सत्यवान आदि  के साथ मंच साझा करने का अपना ही अनुभव रहा जिसे बयान करना मुश्किल है …………राजीव तनेजा जी की शुक्रगुजार हूँ जो उन्होने इस कार्यक्रम का विडियो बनाकर यू-ट्यूब पर डाल दिया उनके साथ बलजीत जी ने भी हमारी हौसला अफ़ज़ाई की और यहाँ आकर मान बढाया ।

गर आप सुनना चाहते हैं तो इस लिंक पर सुन सकते हैं 

https://www.youtube.com/watch?v=hZcMlW9bbAA


https://www.youtube.com/watch?feature=player_detailpage&v=hZcMlW9bbAA



अजब बात रही सुबह एन डी टीवी के एक कार्यक्रम “हम लोग ” में जाना हुआ और शाम को अपने क्षेत्र में ………सुबह का कार्यक्रम भी यहाँ उपलब्ध है :

http://www.ndtv.com/video/player/hum-log/video-story/272092

बस निर्णय करो ……….किस तरफ से ?



ना लीक पर
और ना लीक से हटकर
कुछ भी तो नहीं रहा पास मेरे
ना कुछ कहना
ना कुछ सुनना
एक अर्धविक्षिप्त सी तन्द्रा में हूँ
किसी स्वर्णिम युग की दरकार नहीं
और ना ही किसी जयघोष की चाह
खुश हूँ अपने पातालों में
फिर भी कशमकश के खेत
कैसे लहलहा रहे हैं ……..
आदिम वर्ग कितना खुश है
और मेरी जड़ सोच के समूह कितने कुंठित
फिर भी जिह्वया लपलपा रही है
ज्यों मनचाही पतंग काटी हो
ये सोच पर पड़े पालों पर
ना जाने कैसे इतने सरकंडे उग आये हैं
कि  कितना दुत्कारो
कितना समझाओ
मगर आकाश बेल से बढे जा रहे हैं
अब जड़ों को चाहे कितना खोदो
बीज कब और कहाँ रोपित हुआ था
उसका न कोई अवशेष मिलेगा
जीना होगा तुम्हें …………हाँ ऐसे ही
इसी अधरंग अवस्था में
क्योंकि
ना तुम लीक पर हो
ना लीक से हटकर हो
तुम उस दुधारी तलवार पर हो
जिसके दोनों तरफ तुम्हें ही कटना है
बस निर्णय करो ……….किस तरफ से ?

इतिहास की किताब का महज एक पन्ना भर हो तुम
क्योंकि
संस्कृति और संस्कार तो सभ्यताओं संग ही ज़मींदोज़ हो चुके हैं
अब पुरातत्वविदों के लिए महज शोध का विषय हो तुम …………..

इन्साफ हो जायेगा

माँ बचाओ बचाओ 

कहना चाहा मैने
मगर मूँह  बंधा था मेरा माँ 
मैं रो रही थी माँ 
तुम्हें आवाज़ देना चाह  रही थी माँ 
पता नहीं माँ 
वो बुरे अंकल ने 
मेरे कपडे उतार दिए 
मुझे काटा  , नोंचा , मारा 
पता नहीं क्या क्या किया माँ 
मुझे बहुत दर्द हुआ माँ 
मैं बोल नहीं सकती थी 
मुझे अब भी दर्द हो रहा है माँ 
मुझे भूख लगी थी माँ 
मैं तुम्हें बुला नहीं सकती थी माँ 
बुरे अंकल ने मुझे बहुत मारा  माँ 
वो बहुत बुरे हैं माँ 
होश में आने पर 
जब कुछ बोल सकने लायक हुयी 
तब बिलख बिलख  कर , सिसक सिसक कर , तड़प तड़प कर 
जब उस नन्ही जान ने 
खुद पर गुजरा वाकया बयां किया 
और बेटी की मार्मिक व्यथा सुन 
पिता ने जैसे ही सिर पर हाथ धरा 
सहम गयी मासूम हिरनी सी 
आँखों में दहशत का पाला  उभर आया 
और चेतना शून्य हो बिस्तर पर लुढ़क गयी 
आह ! किस मर्मान्तक पीड़ा से , किस वेदना से 
वो मासूम गुजरी होगी 
कि  नन्ही जान ने पिता के 
स्नेहमयी स्पर्श से भी सुध बुध खो दी 
और गश खाकर गिर पड़ी 
ज़रा सोचना हैवानों , दरिंदों 
कैसे न तुम्हारा कलेजा कांपा 
और कैसे इस देश का इन्साफ न अब तक जागा 
और क्यों तुम कानूनी दांव पेंच फंसाते हो 
क्यों नहीं इन दुर्दांत भेड़ियों को फांसी लगाते हो 
जो सीधा सन्देश पहुँच जाए 
कि  अब ना कोई बलात्कारी बच पायेगा 
जैसे ही पकड़ा जाएगा 
तुरंत फांसी  पर चढ़ाया जाएगा 
गर ऐसा अब तक किया होता 
तो मासूम गुडिया का ना  ये हश्र हुआ होता 
जिसने पांच वर्ष की उम्र में 
वो ज़हर पीया है 
वो वेदना सही है जो मौत से भी बदतर होती है 
जो नन्ही जान न इसका कोई अर्थ समझती है 
जो बस बिलख बिलख कर 
बेसुध होती रही होगी 
मगर बलात्कारी के चंगुल में फंसी 
पिंजरे के मैना सी तड़पती रही होगी 
मगर उस हैवान पर ना असर हुआ होगा 
तो अब तो जागो ओ देश के कर्णधारों 
कम से कम दूसरी 
मासूम गुडियों और निर्भयाओं 
को तो बचा लो 
कुछ तो ऐसा कर डालो 
जो ऐसा जुर्म करने से पहले 
बलात्कारी की रूह काँप जाए 
दो ऐसा दंड उसे कि 
आने वाली पीढ़ी भी सुधर जाए 
अब मत कानून की पेचीदगियों में उलझो 
अब न जनता को और भरमाओ 
ओ देश के कर्णधारों 
बस एक बार उस गुडिया में 
अपनी बेटी , पोती या नातिन का 
चेहरा देख लेना तब कोई निर्णय लेना 
कम से कम एक बार तो 
अपने जमीर को जगाओ 
और उस बलात्कारी दरिन्दे को 
जनता को सौंप जाओ 
इन्साफ हो जायेगा 
इन्साफ हो जायेगा 
इन्साफ हो जायेगा 

टैग का बादल