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Archive for अक्टूबर, 2009

स्वीकार करूँ मैं भी तुमको

अंगीकार किया जब तुमने
क्यूँ नही चाहा तब
स्वीकार करूँ मैं भी तुमको
जब बांधा इस बंधन को
गठजोड़ लगा था हृदयों का
फिर क्यूँ नही चाहा तुमने
अंगीकार करूँ मैं भी तुमको
दान लिया था जब तुमने
तब क्यूँ नही चाहा तुमने
वस्तु बना कर
कोई तुम्हें भी दान करे
सिन्दूर भरा था जब माँग में
वादे किए थे जब जन्मों के
तब क्यूँ नही चाहा तुमने
मेरी उम्र भी दराज़ हो
तुम भी बंधो उसी बंधन में
जिसका सिला चाहा मुझसे
अर्धांगिनी बनाया जब मुझको
तब क्यूँ नही चाहा तुमने
तुम भी अर्धनारीश्वर बनो
अपूर्णता को अपनी
सम्पूर्णता में पूर्ण करो
इक तरफा स्वीकारोक्ति तुम्हारी
क्यूँ तुम्हें आंदोलित नही कर पाती है
मेरी स्वीकारोक्ति क्या तुम्हारे
पौरुष पर आघात तो नही
जब तक मैं न अंगीकार करूँ
जब तक मैं न तुम्हें स्वीकार करूँ
अपना वजूद कहाँ तुम पाओगे
फिर क्यूँ नही चाहा तुमने
अपना वजूद पाना मुझमें
फिर क्यूँ नही चाहा तुमने
स्वीकार करूँ में भी तुमको
स्वीकार करूँ मैं …………………..

मोहब्बत ये तूने क्या किया

किसी ने ख्वाब भी बनाया
पलकों में भी बसाया
किसी के दिल की धड़कन भी बनी
ज़िन्दगी की आरजू भी बनी
उसे भी अपने दिल की धड़कन बनाया
उसके ख्वाबों को भी
अपनी आंखों में सजाया
उसकी हर चाहत को अपना बनाया
बस उसकी इक हसरत को
जो न अपनाया
उस इक कसूर की
सज़ा ये मिली
उसने भी
पलकों से गिरा दिया
धडकनों को भी
क़ैद कर दिया
बे-मुरव्वत मोहब्बत का
पाक गला भी घोंट दिया
इश्क के न जाने
कौन से मुकाम पर ले जाकर
शाख से टूटे पत्ते की मानिन्द
दर -दर भटकता छोड़ दिया
आह ! मोहब्बत ये तूने क्या किया

श्रीमद्भागवद्गीता से ………………..

श्रीमद्भागवद्गीता के सातवें अध्याय के २३ वे श्लोक की व्याख्या स्वामी रामसुखदास जी ने कुछ इस प्रकार की है……………

श्लोक

परन्तु उन अल्पबुद्धि वाले मनुष्यों को उन देवताओं की आराधना का फल अन्तवाला(नाशवान) ही मिलता है । देवताओं का पूजन करने वाले देवताओं को ही प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मेरे को ही प्राप्त होते हैं।

व्याख्या

देवताओं की उपासना करने वाले अल्पबुद्धि मन्ष्यों को अन्तवाला अर्थात सीमित और नाशवान फल मिलता है। यहाँ शंका होती है कि भगवन के द्वारा विधान किया हुआ फल तो नित्य ही होना चाहिए फिर उसको अनित्य फल क्यूँ मिलता है? इसका समाधान ये है कि एक तो उनमें नाशवान पदार्थों की कामना की और दूसरी बात , वे देवताओं को भगवान से अलग मानते हैं । इसलिए उनको नाशवान फल मिलता है । परन्तु उनको दो उपायों से अविनाशी फल मिल सकता है ——एक तो वे कामना न रखकर देवताओं की उपासना करें तो उनको अविनाशी फल मिल सकता है और दूसरी बात ,वे देवताओं को भगवान से भिन्न न समझकर , अर्थात भगवत्स्वरूप ही समझकर उनकी उपासना करें तो यदि कामना रह भी जायेगी तो भी समय पाकर उनको अविनाशी फल मिल सकता है अर्थात भगवत्प्राप्ति हो सकती है ।

फल तो भगवान का विधान किया हुआ है मगर कामना होने से वो नाशवान हो जाता है । कहने का तात्पर्य ये है कि उनको नियम तो अधिक धारण करने पड़ते हैं पर फल सीमित मिलता है परन्तु मेरी आराधना में इन नियमों की जरूरत नही है और फल भी असीम और अनंत मिलता है । इसलिए देवताओं की उपासना में नियम अधिक और फल कम और मेरी आराधना में नियम कम और फल अधिक और कल्याणकारी हो , ऐसा जानने पर भी जो मनुष्य देवताओं की उपासना में लगे रहते हैं वो अल्पबुद्धि हैं।

देवताओं की उपासना करने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरी उपासना करने वाले मेरे को इसका अर्थ है कि मेरी उपासना करने वालों की कामना पूर्ति भी हो सकती है और मेरी प्राप्ति भी हो सकती है अर्थात मेरे भक्त सकाम हों या निष्काम , वे सब के सब मेरे को ही प्राप्त होते हैं परन्तु भगवान की उपासना करने वालों की सब कामना पूर्ण हो जायें ऐसा नियम नहीं है । भगवान उचित समझेंगे तो पूरी कर देंगे अर्थात जिसमें भक्त का हित होगा वो तो पूरा कर देंगे और अहित होने पर जितना भी रो लो , पुकार लो वो उसे पूरा नही करते।
भगवान का भजन करने वाले को भगवान की स्मृति रहती है क्यूंकि ये सम्बन्ध सदा रहने वाला है अतः भगवान को प्राप्त करने पर फिर संसार में लौट कर नही आना पड़ता परन्तु देवताओं का सम्बन्ध सदा रहने वाला नही है क्यूंकि वह कर्मजनित है। इसलिए संसार में फिर लौटकर आना पड़ता है।

सब कुछ भगवत्स्वरूप ही है और भगवान् का विधान भी भगवत्स्वरूप है ———-ऐसा होते हुए भी भगवान से भिन्न संसार की सत्ता मानना और अपनी कामना रखना ——–ये दोनों ही पतन के कारण हैं। इनमें से यदि कामना का सर्वथा नाश हो जाए तो संसार भगवत्स्वरूप दिखने लग जाएगा और यदि संसार भगवत स्वरुप दिखने लग जाएगा तो कामना मिट जायेगी।

भावों के टुकड़े

कभी कभी
कुछ भावों को ठांव नही मिलती
जैसे चिरागों को राह नही मिलती

सर्द अहसासों से दग्ध भाव
जैसे अलाव दिल का जल रहा हो

कुछ भाव टूटकर यूँ बिखर गए
जैसे रेगिस्तान में पानी की बूँद जल गई हो

कुछ भावों के पैमाने यूँ छलक रहे हैं
जैसे टूटती साँसे ज़िन्दगी को मचल रही हों

श्रीमद्भागवद्गीता से …………………..

श्रीमद्भागवद्गीता के सातवें अध्याय के २२ वें श्लोक में भगवान् देवताओं की उपासना के बारे में समझाते हैं और इसका बहुत ही सुंदर वर्णन स्वामी रामसुखदास जी ने इस प्रकार किया है ———-

श्लोक

उस (मेरे द्वारा दृढ़ की हुई ) श्रद्धा से युक्त होकर वह मनुष्य (सकामभावपूर्वक )उस देवता की उपासना करता है और उसकी वह कामना पूरी भी होती है ;परन्तु वह कामना -पूर्ति मेरे द्वारा विहित की हुई होती है ।

व्याख्या

मेरे द्वारा दृढ़ की हुई श्रद्धा से संपन्न हुआ वह मनुष्य उस देवता की आराधना की चेष्टा करता है और उस देवता से जिस कामना पूर्ति की आशा रखता है, उस कामना की पूर्ति होती है । यद्यपि वास्तव में उस कामना की पूर्ति मेरे द्वारा की हुई होती है ;परन्तु वह उसको देवता से ही पूरी की हुई मानता है । वास्तव में देवताओं में मेरी ही शक्ति है और मेरे ही विधान से वे उनकी कामनापूर्ति करते हैं।

जैसे सरकारी अफसरों को एक सीमित अधिकार दिया जाता है कि तुम लोग अमुक विभाग में अमुक अवसर पर इतना खर्च कर सकते हो , इतना इनाम दे सकते हो। ऐसे ही देवताओं में एक सीमा तक ही देने की शक्ति होती ;अतः वे उतना ही दे सकते हैं , अधिक नही । देवताओं में अधिक से अधिक इतनी शक्ति होती है कि वे अपने-अपने उपासकों को अपने -अपने लोक में ले जा सकते हैं । परन्तु अपनी उपासना का फल भोगने पर उनको वहां से लौटकर पुनः संसार में आना पड़ता है ।

संसार में स्वतः जो कुछ सञ्चालन हो रहा है वह सब मेरा ही किया हुआ है । अतः जिस किसी को जो कुछ मिलता है , वह सब मेरे द्वारा विधान किया हुआ ही मिलता है । कारण कि मेरे सिवाय विधान करने वाला कोई दूसरा नही है । अगर कोई मनुष्य इस रहस्य को समझ ले । तो फिर वह केवल मेरी तरफ़ ही खींचेगा।
कहने का तात्पर्य ये हुआ कि सर्व शक्ति मान तो एक ही है बस उसी को इंसान नही समझ पाता और इधर उधर भागता -फिरता है । एक का दामन पकड़ ले तो उसका कल्याण निश्चित है। बस वो श्रद्धा और विश्वास अटल होना चाहिए।

सिर्फ़ तू ही तू

कल शाम
जब पर्वतों के
साये में
बादलों के
दामन में
ख्यालों की
फसल पक रही थी
तेरी याद ने
दस्तक दी
अन्दर आने की
इजाज़त मांगी
मगर इजाज़त
देता कौन
कुछ ख्याल
तो मेरे
तेरे ख्यालों में
गुम थे
कुछ ख्याल मेरे
तेरे आगोश में
खो गए थे
ना मैं था वहां
ना मेरे ख्याल
सिर्फ़ तेरा ही
तो वजूद था
फिर ख़ुद से
कैसे इजाज़त
मांग रही हो

ज़ख्मों का बाज़ार

ज़ख्मों को प्यार हमने दिया
तेरे दिए हर ज़ख्म को
दुलार हमने दिया
ज़ख्मों का बाज़ार
हमने भी लगा रखा है
एक बार हाथ लगाओ तो सही
ज़ख्मों को देख मुस्कुराओ तो सही
हर ज़ख्म से आवाज़ ये आएगी
यार मेरे , तुम एक नया ज़ख्म
और दे जाओ तो सही
आओ प्यार मेरे , ज़ख्मो को
नासूर बनाओ तो सही
प्यार का ये रंग भी
दिखाओ तो सही
बेवफाई नाम नही देंगे इसे
मोहब्बत का हर तोहफा कुबूल है हमें

टैग का बादल