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Archive for फ़रवरी, 2011

>नव सृजन का वक्त बुला रहा है

>

समय के धरातल पर
कवितायें उगाना छोड़ो कवि
वक्त की नब्ज़ को ज़रा पहचानो
अब कहाँ फूल बागों में खिलते हैं
अब कहाँ आकाश में उन्मुक्त पंछी उड़ते हैं
अब कहाँ धरती सोना उगलती हैं
अब कहाँ शीतल सुगन्धित मंद मंद
पुरवाई चलती है
अब कहाँ संस्कारों की फसल उगती है
अब कहाँ लहू शिराओं में बहता है
अब कहाँ रिश्तों में अपनापन होता है
कवि एक बार आत्मावलोकन तो कर लो
वक्त की तेज़ रफ़्तार को ज़रा पहचानो
तुम्हारी कवितायें , तुम्हारे भाव
तुम्हारे रंग, तुम्हारे मौसम
किसी का असर क्या  कहीं दीखता है
अब तो खेतों में हथियारों की खेती होती है
हर जमीन अब हथियार उगलती है
अब तो हवाओं में ज़हरीली गैस मिली होती है
साँसों के साथ लहू में घुली होती हैं
अब तो संस्कारों की ही बलि चढ़ाई जाती है
तब जाकर इज्जत कमाई जाती है
अब लहू तो हर चौराहे पर बिखरा होता है
जिसकी ना कोई कीमत होती है
अब तो कैद में हर पंछी होता है
जिसका ना कोई धर्म होता है
अब तो हर मोड़ पर
रिश्तों का क़त्ल होता है
जो रचा था तुमने कवि
सब काल कलवित हो गया
जो बोया था वक्त के धरातल पर
उसमे ज़हर घुल गया
कैसे इस अनजाने प्रदेश में कवि
अब कहाँ खुद को समाओगे
तुम भी इस अंधकूप में
इक दिन सो जाओगे
गर उगाना है तो
इक ऐसा वटवृक्ष उगा देना
जो काल का भी महाकाल बन जाये
वक्त को रसातल से खींच लाये
हर मन में सुरभित सुगन्धित
इक नयी बगिया खिल जाये
अगर कर सको ऐसा तो तभी
नव सृजन करना कवि
वरना तुम भी वक्त की आँधी में
काल कवलित हो जाओगे
कहीं भी अपनी कविताओं का
पार ना पाओगे
गहन अन्धकार में डूब जाओगे
समय की वक्रदृष्टि
पड़ने से पहले
जागो कवि जागो
उठो , करो आवाहन
एक नए युग का
नव सृजन का
वक्त बुला रहा है

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>जिसके नाम का गरल पी जाऊँ

>

प्रेम के पनघट पर सखी री
कभी गागर भरी ही नही


मन के मधुबन मे
कोई कृष्ण मिला ही नही


जिसकी तान पर दौडी जाऊँ
ऐसी बंसी बजी ही नही


किस प्रीत की अलख जगाऊँ
ऐसा देवता मिला ही नही


किस नाम की रट्ना लगाऊँ
कोई जिह्वा पर चढा ही नही


कौन सी कालिन्दी मे डूब जाऊँ
ऐसा तट मिला ही नही

जिसके नाम का गरल पी जाऊँ
ऐसा प्रेम मिला ही नहीं


वो जोगी मिला ही नही
जिसकी मै जोगन बन जाऊँ


फिर कैसे पनघट पर सखी री
प्रीत की मै गागर भर लाऊँ

>हर चीज़ की कीमत होती है…………

>

न जाने 
इतनी क़ुरबानी 
देनी पड़ी होगी
न जाने कितने 
अपनों का 
साथ छूटा होगा
न जाने कितनी 
हसरतों को 
दफ़न किया होगा
न जाने कितने 
मौसमों पर बसंत
आया  ही न होगा
न जाने कितनी
अरमानों की 
लाशों पर
पैर रख तू 
आगे बढ़ा होगा 
सिर्फ एक चाहत को
बुलंदी पर पहुँचाने के लिए 
आसमान को छूने की 

ऊंचाई पर पहुँचने की

चाहत की कुछ तो 
कीमत चुकानी पड़ती है
क्या हुआ गर 
“मैं” तुम से दूर हूँ तो 
क्या हुआ गर आज 
मेरी चाहत की कब्र 
पर पैर रख तुमने 
अपनी चाहतों को 
बुलंद किया 
मैं तो राह का 
वो पत्थर थी 
जो तुम्हारी
ऊंचाइयों में    
मील का पत्थर बनी 
शुक्र है पत्थर ही सही
तुम्हारी कामयाबी में 
कुछ तो बनी 
हर चीज़ की कीमत होती है
और ऊंचाई पर पहुँचने की
कीमत सभी को 
चुकानी पड़ती है
और तुम्हारी
ऊंचाई की
कीमत “मैं ” हूँ

>सीरतों पर भी नकाब होते हैं ……….

>

सीरत पर फ़िदा होने वाले
ये तेज़ाब के खौलते नालों में
अपना पता कहाँ पायेगा
खुद भी फ़ना हो जायेगा
इस शहर को अभी जाना कहाँ तूने
ये दूर से ही अच्छा लगता है 
ज्यूँ हुस्न परदे में ढका लगता है
इस शहर के हर चौराहे पर 
एक होर्डिंग टंगा होता है 
बचकर चलना —आगे तीक्ष्ण खाइयाँ हैं 
जो भी गिरा फिर न वो बचता है
बाहरी सौंदर्य पर मुग्ध होने वाले
सर्प दंश से कब कौन बचता है 
ये ऐसी भयावह कन्दरा है 
उस पार का न कुछ दिखता है 
अन्दर आने का रास्ता तो है
बाहर का न कहीं दीखता है 
 हर सड़क इस शहर की 
एक दहकते अंगार की कहानी है
जहाँ मौत भी रुसवा हो जाये
ये ऐसी बियाबानी है
सीरत अवलोकन भी 
बाहरी दृश्यबोध कराता है
सीरत में छुपे अक्स को 
न दिखा पाता है
यहाँ रेत की दीवारें नहीं 
जो ढह जायें 
चारदीवारी मजबूत 
तूफानों से बनी है
हर तरफ चक्रवात 
चलता रहता है
जो शहर को न 
बसने देता है
ऐसे में तू अपना 
अस्तित्व कहाँ पायेगा ?
इस शहर की रूह की
उबलती , दहकती 
दरकती साजिशों 
में ही मिट जायेगा
मत आ ,
मत कर अवलोकन
मत देख सीरत
सीरतों पर भी नकाब होते हैं ……….
 

>क्या हाऊस वाईफ का कोई अस्तित्व नहीं ?

>

क्या हाऊस वाईफ  का कोई अस्तित्व नहीं ?
क्या उसे financial decision लेने का कोई अधिकार नहीं ?
क्या   हाऊस वाईफ सिर्फ बच्चे पैदा  करने और घर सँभालने के लिए होती हैं ?
क्या हाऊस वाईफ का परिवार , समाज और देश के प्रति योगदान नगण्य हैं ?
यदि नहीं हैं तो
क्यों ये आजकल के लाइफ insurance , बैंक या mutual fund आदि से फ़ोन पर पूछा  जाता हैं कि आप हाऊस वाईफ हैं या वर्किंग  ?

financial decision तो सर लेते होंगे ?
इस तरह के प्रश्न करके ये लोग  हाऊस वाईफ के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह खड़ा नहीं कर रहे ?

क्यों आज ये पढ़े लिखे होकर भी ऐसी अनपढ़ों जैसी बात पूछी जाती हैं और सबसे मज़ेदार बात ये कि पूछने वाली भी महिला होती हैं .

क्यूँ उसे पूछते वक्त इतनी शर्म नहीं आती कि महिलाएं वर्किंग हों या हाऊस वाईफ उनका योगदान देश के विकास में एक पुरुष से किसी भी तरह कमतर नहीं हैं . जबकि  आज सरकार ने भी घरेलू  महिलाओं के योगदान को सकल घरेलू  उत्पाद में शामिल करने का निर्णय लिया हैं ……………..अपने त्याग और बलिदान से , प्रेम और सहयोग से हाऊस वाईफ इतना बड़ा योगदान करती हैं ये बात ये पढ़े लिखे अनपढ़ क्यूँ नहीं समझ पाते ?

आज एक स्वस्थ और खुशहाल समाज इन्ही हाऊस वाईफ की देन हैं यदि ये भी एक ही राह पर निकल पड़ें तो पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण करने में कोई कमी नहीं रहेगी और उसका खामियाजा वो चुका रहे हैं तभी वो भी हम पूरब वालों की तरफ देख रहे हैं और हमारे रास्तों का अनुसरण कर रहे हैं . आज बच्चों की परवरिश और घर की देखभाल करके जो हाऊस वाईफ अपना योगदान दे रही हैं वो किसी भी वर्किंग वूमैन से काम नहीं हैं ———क्या ये इतनी सी बात भी इन लोगों को समझ नहीं आती ?

इस पर भी कुछ लोगों को ये नागवार गुजरता है और वो उनके अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा देते हैं ……….पति और पत्नी दोनों शादी के बाद एक इकाई की तरह होते हैं फिर सिर्फ आर्थिक निर्णय लेने की स्थिति में एक को ही महत्त्व क्यूँ? क्या सिर्फ इसलिए क्यूंकि वो कमाता है ? ऐसा कई बार होता है कि कोई मुश्किल आये और पति न हो तो क्या पत्नी उसके इंतज़ार में आर्थिक निर्णय न ले ? या फिर पत्नी की हैसियत घर की चारदीवारी तक ही बंद है जबकि हम देखते हैं कि कितने ही घरों में आज और पहले भी आर्थिक निर्णय महिलाएं ही लेती हैं……..पति तो बस पैसा कमाकर लाते हैं और उनके हाथ में रख देते हैं ……….उसके बाद वो जाने कैसे पैसे का इस्तेमाल करना है ……….जब पति पत्नी को एक दूसरे पर इतना भरोसा होता है तो फिर ये कौन होते हैं एक स्वच्छ और मजबूत रिश्ते में दरार डालने वाले………….ये कुछ लोगों की मानसिकता क्या दर्शा रही है कि हम आज भी उस युग में जी रहे हैं जहाँ पत्नी सिर्फ प्रयोग की वस्तु थी …………मानती हूँ आज भी काफी हद तक औरतों की ज़िन्दगी में बदलाव नहीं आया है तो उसके लिए सिर्फ हाउस वाइफ  के लिए ऐसा कहना कहाँ तक उचित होगा जबकि कितनी ही वोर्किंग वुमैन  भी आज भी निर्णय नहीं ले पातीं ………..उन्हें सिर्फ कमाने की इजाजत होती है मगर खर्च करने या आर्थिक निर्णय लेने की नहीं तो फिर क्या अंतर रह गया दोनों की स्थिति में ? फिर ऐसा प्रश्न पूछना कहाँ तक जायज है कि निर्णय कौन लेता है ? और ऐसा प्रश्न क्या घरेलू महिलाओं के अस्तित्व और उनके मन सम्मान पर गहरा प्रहार नहीं है ?


 ऐसी कम्पनियों पर लगाम नहीं लगाया जाना चाहिए ……….उन्हें इससे क्या मतलब निर्णय कौन लेता है ………वो तो सिर्फ अपना प्रयोजन बताएं बाकि हर घर की बात अलग होती है कि कौन निर्णय ले ………..ये उनकी समस्या है चाहे मिलकर लें या अकेले……..उन्हें तो इससे फर्क नहीं पड़ेगा न ……..फिर क्यूँ ऐसे प्रश्न पूछकर घरेलू महिलाओं के अस्तित्व को ही सूली पर लटकाते हैं ?


क्या आप भी ऐसा सोचते हैं कि ———–

घरेलू महिलाएं निर्णय लेने में सक्षम नहीं होतीं?
उन्हें अपने घर में दायरे तक ही सीमित रहना चाहिए?
आर्थिक निर्णय लेना उनके बूते की बात नहीं है ?
जो ये कम्पनियाँ कर रही हैं सही कर रही हैं?

>"तुम्हारे इंतजार में "

>

दोस्तों 
अभी थोड़ी देर पहले ही ये फोटो देखी फेसबुक पर विजय सपत्ति जी की और देखते ही ये ख्याल उमड़ आया तो सोचा आपसे भी इसे बांटा जाये  ……………..

देख कब से बैठे हैं तेरे इंतज़ार मे
ये बैंच, ये दरख्त और ये राहें
यहाँ अब कोई मौसम नहीआता
एक खामोश सदा आवाज़ देती है
तुझे बुलाती है और जब
तू नही आता ना तब
वक्त इस दरख्त पर आकर
बैठ जाता है एक बार फिर
इंतज़ार मे सूखने के लिये
देख ना तेरे इंतज़ार की
आस मे राहें भी बंजर
हो गयी हैं ………
एक उदासी इनके
पहलू मे दस्तक
दे रही है …………
कह रही है मुसाफ़िर
कब आओगे फिर
इसी पथ पर्………।
इन राहो पर एक
अजनबियत काबिज़ हो गयी है
और देख ना इस बैंच को
कैसा सूना – सूना खामोश मंज़र
इसे घेरे बैठा है…………
किसी के अरमानो को
सजाने के लिये
ये भी बाहें फ़ैलाये
कब से इंतज़ार की
शाख पर सूख रहाहै
मगर तुम्………
तुम आज भी नही आये
मुसाफ़िर ………बस एक बार
हसरत पूरी कर जाना
दम निकलने से पहले
इंतज़ार को मुकाम
दे जाना…………
फिर जनम हो ना हो
और इंतज़ार अधूरा रह जाये…………

>क्या होती है माँ

>

माँ की महिमा अनंत है कितना ही कह लो हमेशा अधूरी ही रहेगी ………..क्या माँ के प्यार को शब्दों में बांधा जा सकता है ? उसके समर्पण का मोल चुकाया जा सकता है ? जैसे ईश्वर को पाना आसान नहीं उसी तरह माँ के प्यार की थाह पाना आसान नहीं क्यूँकि माँ इश्वर का ही तो प्रतिरूप है फिर कैसे थाह पाओगे? कैसे उसका क़र्ज़ चुकाओगे? 

माँ के प्रति सिर्फ फ़र्ज़ निभाए जाते हैं , क़र्ज़ नहीं चुकाए जा सकते . माँ के भावों को समझा जाता है उसके त्याग का मोल नहीं लगाया जा सकता ………..उसको उसी तरह उम्र के एक पड़ाव पर सहेजा जाता है जैसे वो तुम्हें संभालती थी जब तुम कुछ नहीं कर सकते थे ………..जानते हो जैसे एक बच्चा अपनी उपस्थिति का अहसास कराता है ………कभी हँसकर , कभी रोकर , कभी चिल्ला कर , कभी किलकारी मारकर……… उसी तरह उम्र के एक पड़ाव पर माँ भी आ जाती है जब वो अकेले कमरे में गुमसुम पड़ी रहती है और कभी -कभी अपने से बातें करते हुए तो कभी हूँ , हाँ करते हुए तो कभी हिचकी लेते तो कभी खांसते हुए अपने होने का अहसास कराती है और चाहती है उस वक्त तुम रुक कर उससे उसका हाल पूछो , दो शब्द उससे बोलो कुछ पल उसके साथ गुजारो जैसे वो गुजारा करती थी और तुम्हारी किलकारी पर , तुम्हारी आवाज़ पर दौड़ी आया करती थी और तुम्हें गोद में उठाकर पुचकारा करती थी , तुमसे बतियाती थी ……..ऐसे ही तुम भी उससे कुछ पल बतियाओ , उसकी सुनो चाहे पहले कितनी ही बार उन बातों को तुम सुन चुके होते हो पर उसे तो याद नहीं रहता  ना तो क्या हुआ एक बार और सही ………उसने भी तो तुम्हारे एक ही शब्द को कितनी बार सुना होगा , जब समझ नहीं आता होगा मगर तब भी उस शब्द में तुम्हारी भाषा समझने की कोशिश करती होगी ना …………वैसे ही क्या तुम नहीं सुन सकते ? क्या कुछ पल का इन छोटे छोटे लम्हों में उसे सुकून नहीं दे सकते ? बताओ क्या तुम ऐसा कर पाओगे ? नहीं , तुम ऐसा कभी नहीं कर पाओगे. तुम्हारे पास वक्त ही कहाँ है ? तुम तो यही उम्मीद करते हो कि इतनी उम्र हो गयी माँ की मगर अक्ल नहीं है कब क्या कहना है ………ज़रा सी बात पर ही  दुत्कार दोगे ………..बहुत मुश्किल है माँ होना और बहुत आसान है बेटा बनना ……………ये तो एक बानगी भर है उसने तो अपनी ज़िन्दगी दी है तुम्हें ………..अपने लहू से सींचा है ……….क्या कभी भी कोई भी बेटा या बेटी इसका मोल चुका सकते हैं ?  क्या कभी भी मातृॠण  से उॠण  हो सकते हैं ? ये तो सिर्फ अपना फ़र्ज़ भी ढंग से निभा लें और माँ को प्यार से दो रोटी दे दें दो मीठे बोल बोल दें और थोडा सा ध्यान दे दें तो ही गनीमत है ………….इतना करने में भी ना जाने कितने अहसान उस बूढी काया पर डाल दिए जायेंगे और वो अकेली बैठी दीवारों से बतियाएगी मगर अपना दुःख किसी से ना कह पाएगी आखिर माँ है ना ……..कैसे अपने ही बच्चों के खिलाफ बोले …………….हर दर्द पी जायेगी और ख़ामोशी से सफ़र तय कर जायेगी ……….जाते जाते भी दुआएँ दे जायेगी ………बस यही होती है माँ ……….जिसके लिए शब्द भी खामोश हो जाएँ .

वक्त की सलीब पर लटकी
एक अधूरी ख्वाहिश है माँ
बच्चे के सुख की चाह में पिघली
एक जलती शमा है माँ
ज़िन्दगी के नक्कारखाने में
बेआवाज़ खामोश पड़ी है माँ
वक्त पर काम आती है  माँ
मगर वैसे बेजरूरत है माँ
घर के आलीशान सामान में
कबाड़ख़ाने का दाग है माँ
सांसों संग ना महकती है माँ
अब तो उम्र भर दहकती है माँ 
जब किसी काम ना आये
तो उम्र भर का बोझ है माँ
वक्त की सलीब पर लटकी
एक अधूरी ख्वाहिश है माँ


टैग का बादल