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Archive for जुलाई, 2013

नज़र में अपनी ही गिर जाती

जो दुआ को उठा देती हाथ 
नज़र में अपनी ही गिर जाती 
ए खुदा तेरी नेमत हैं ये हाथ …जानती हूँ
इसलिये कर्म के बीज बोती हूँ
कर्म की फ़सल उगाती हूँ
हाथ की रेखाओं को आज मैं खुद बनाती हूँ

स्त्री हूँ ना
जान गयी हूँ
मान गयी हूँ
पहचान गयी हूँ
अपने होने को
इसलिये
अब किसी खुदा के आगे ना सिर झुकाती हूँ
कर्मठ बन स्वंय अपना मार्ग प्रशस्त किये जाती हूँ
और अपनी उपलब्धियों का तेज़
अपने मुखकमल पर स्वंय खिलाती हूँ
यूँ जीवन में आगे बढती जाती हूँ
मगर हाथ अब दुआ के लिये भी ना उठा उठाती हूँ

क्योंकि ………जानती हूँ
ना जाने कितनी फ़रियादें तेरे दरबार में अलख जगाती होंगी
कितने हाथ तेरी चौखट को छूते होंगे
कितने बेबस रोज तुझे बेबस करते होंगे
और उनके उठे हाथों को देख जब
तेरी रहमत बरसती होगी
दिल में तेरे भी इक खलिश सी उठती होगी
उफ़ ! क्या इसीलिये मैने संसार बनाया
मेरे होकर मुझसे माँग रहे हैं
खुद पर ना विश्वास कर रहे हैं
कैसे खुद्दारी को ताक पर रख रहे हैं
तू भी इक बेबसी जीता होगा
जब सबके गम पीता होगा
इसलिये
आज़ाद किया तुझे अपनी दुआओं से …………ओ खुदा !

(कर्मठता और खुद्दारी के बीज बो दिये हैं फ़सल का लहराना लाज़िमी है )



“कवि….सपनों का सारथी ,सत्य का प्रहरी …के इस लिंक में मेरी इस

कविता को सर्वश्रेष्ठ चुना गया 
http://www.facebook.com/photo.php?fbid=568581683183483&set=gm.542030849196281&type=1&theater

जी चाहता है——–

जी चाहता है——–
दिल को तोड के लिख दूँ
कलम को मोड के लिख दूँ
फ़लक को  फ़ोड के लिख दूँ
जमीँ को निचोड के लिख दूँ

जी चाहता है————-
दर्द को  घोल के पी लूँ
ज़हर को भी अमर कर दूँ
मोहब्बत को ज़हर कर दूँ
गंगा को उल्टा बहा दूँ

जी चाहता है————
नकाबों को आग लगा दूँ
बुझता हर चिराग जला दूँ
रेत से चीन की दीवार चिनवा दूँ
ज़िन्दगी को मौत से जिता दूँ

जी चाहता है————-
हर रोक को आज हटा दूँ
हर पंछी को उडना सिखा दूँ
रस्मों की हर रवायत मिटा दूँ
बेफ़िक्री का डंका बजा दूँ

जी चाहता है————
ब्रह्माँड को उलट दूँ
ब्रह्मा की सृष्टि को पलट दूँ
पाप पुण्य का भेद मिटा दूँ
इंसान को देवता बना दूँ

जी चाहता है——————
हर नियम कानून की नींव मिटा दूं
मौत को भी रास्ता भुला दूँ
अमीरी गरीबी का भेद मिटा दूँ
रिश्वतखोरों  की कौम मिटा दूँ
भ्रष्टाचारियों को फ़ांसी चढा दूँ

एक नया जहान बसा दूँ

मगर मनचाहा कब होता है?

( भ्रष्ट तंत्र से परेशान हर ह्रदय की व्यथा )

छहों ऋतुएं मोहे ना भायी सखी री


छहों ऋतुएं मोहे ना भायी सखी री 
जब तक ना हो पी से मिलन सखी री
विरही मौसम ने डाला है डेरा
कृष्ण बिना सब जग है सूना
जब हो प्रीतम का दर्शन
तब जानूं आया है सावन
ये कैसा छाया है अँधेरा
सजन बिना ना आये सवेरा
पी से मिलन को तरस रही हैं
अँखियाँ बिन सावन बरस रही हैं
किस विधि मिलना होए सांवरिया से
प्रीत की भाँवर डाली सांवरिया से
अब ना भाये कोई और जिया को 
विरहाग्नि दग्ध ह्रदय में 
कैसे आये अब चैन सखी री
सांवरिया बिन मैं बनी अधूरी 
दरस लालसा में जी रही हूँ
श्याम दरस को तरस रही हूँ
मोहे ना भाये कोई मौसम सखी री
श्याम बिन जीवन पतझड़ सखी री
ढूँढ लाओ कहीं से सांवरिया को
हाल ज़रा बतला दो पिया को
विरह वेदना सही नहीं जाती
आस की माँग भी उजड़ गयी है
बस श्याम नाम की रटना लगी है 
मीरा  तो मैं बन नहीं पाती
राधा को अब कहाँ से लाऊं 
कौन सा अब मैं जोग धराऊँ
जो श्यामा के मन को भाऊँ
ए री सखी ……….उनसे कहना
उन बिन मुझे ना भाये कोई गहना
हर मौसम बना है फीका
श्याम रंग मुझ पर भी डारें
अपनी प्रीत से मुझे भी निखारें
मैं भी उनकी बन जाऊँ
श्याम रंग में मैं रंग जाऊँ
जो उनके मन को मैं भाऊँ
तब तक ना भाये कोई मौसम सखी री 
कोई तो दो उन्हें संदेस सखी री………….

कल शाम डायलाग के नाम

कल शाम डायलाग के नाम ( 27-7-2013 ) 
एकेडमी आफ़ फ़ाइन आर्टस एंड लिटरेचर द्वारा आयोजित कार्यक्रम में लीलाधर मंडलोई जी की अध्यक्षता में अंजुम शर्मा द्वारा संचालित किया गया जिसमें अनिरुद्ध उमट , असंग घोष , सुमन केशरी, मिथिलेश श्रीवास्तव और अनिल जनविजय ने कविता पाठ किया । एक बेहतरीन शाम की कुछ यादें समेट लायी हूँ । एक से बढकर एक कविताओं ने मन मोह लिया। कविता का वृहद आकाश पंछियों को पंख पसारने के लिये उत्साहित करता है जिसकी झलक कल देखने को मिली। कौन सा क्षेत्र ऐसा है जिस पर कवि की कलम ना चली हो फिर चाहे देश हो या समाज , प्रेम हो या स्त्री विमर्श छोटी छोटी चीजों पर कवि की दृष्टि पहुँचती रही फिर चाहे किसी प्रदेश या जनपद की व्यथा हो या कोई दुर्घटना या जीवन और मृत्यु के भेद या फिर पौराणिक गाथा सभी पर कवियों की दूरदृष्टि एक संसार रचा जो हर मन को अन्दर तक छू गया। कौन कहता है कि कविता की माँग नहीं है ………जो ये कहता है उसे कल आकर देखना चाहिये था । भावुक हृदयों की भावमाला के सुमन की खुशबू हर श्रोता अपने मन में बसा कर लाया है।


लीलाधर मंडलोई जी के साथ मैं , अंजू शर्मा , सुमन केशरी और शोभा रस्तोगी 

अंजुम शर्मा मंच का संचालन करते हुये 

श्रोताओं के साथ अलका भारतीय 


शोभा रस्तोगी
ब्यूटी विद ब्रेन इंदु सिंह के साथ अंजू शर्मा 

 कला का उत्कृष्ट नमूना 

अनिरुद्ध उम्मट कविता पाठ करते हुये 

असंग घोष कविता पाठ करते हुये

श्रोतागण कवितासिंधु में गोता लगाते हुये 



सुमन केशरी कविता पाठ करते हुये
मिथिलेश श्रीवास्तव कविता पाठ करते हुये


अनिल जनविजय कविता पाठ करते हुये
लीलाधर मंडलोई जी अपने अध्यक्षीय वक्तव्य के साथ 


उसके बाद विचारों का आदान प्रदान और जलपान कर सबने अपने घर को प्रस्थान किया 

एक थिरकती आस की अंतिम अरदास


जो पंछी अठखेलियाँ किया करता था कभी 

मुझमें रिदम भरा करता था जो कभी 
बिना संगीत के नृत्य किया करता था कभी 
वो मोहब्बत का पंछी आज धराशायी पड़ा है 
जानते हो क्यों ?
क्योंकि ………तुम नहीं हो आस पास मेरे 
अरे नहीं नहीं ………ये मत सोचना 
कि शरीरों की मोहताज रही है हमारी मोहब्बत 
ना ना …………मोहब्बत की भी कुछ रस्में हुआ करती हैं 
उनमे से एक रस्म ये भी है ……क़ि तुम हो आस पास मेरे 
मेरे ख्यालों में , मेरी सोच में , मेरी साँसों में 
ताकि खुद को जिंदा देख सकूं मैं ………
मगर तुम अब कहीं नहीं रहे
ना सोच में , ना ख्याल में , ना साँसों के रिदम में 
मृतप्राय देह होती तो मिटटी समेट  भी ली जाती 
मगर यहाँ तो हर स्पंदन की जो आखिरी उम्मीद थी 
वो भी जाती रही…………….तुम्हारे न होने के अहसास भर से 
और अब ये जो मेरी रूह का जर्जर पिंजर है ना 
इसकी मिटटी में अब नहीं उगती मोहब्बत की फसल 
जिसमे कभी देवदार जिंदा रहा करते थे 
जिसमे कभी रजनीगंधा महका करते थे 
यूं ही नहीं दरवेशों ने सजदा किया था 
यूं ही नहीं फकीरों ने कलमा पढ़ा था 
यूं ही नहीं कोई औलिया किसी दरगाह पर झुका था 
कुछ तो था ना ……………क़ुछ तो जरूर था 
जो हमारे बीच से मिट गया 
और मैं अहिल्या सी शापित शिखा बन 
आस के चौबारे पर उम्र दर उम्र टहलती ही रही 
शायद कोई आसमानी फ़रिश्ता 
एक टुकड़ा मेरी किस्मत का लाकर फिर से 
गुलाब सा मेरे हाथों में रखे 
और मैं मांग लूं उसमे खुदा से ……तुम्हें 
और हो जाए कुछ इस तरह सजदा उसके दरबार में 
झुका  दूं सिर कुछ इस तरह कि फिर कहीं झुकाने की तलब न रहे 
उफ़ …………कितना कुछ कह गयी ना 
ये सोच के बेलगाम पंछी भी कितने मदमस्त होते हैं ना 
हाल-ए -दिल बयाँ करने में ज़रा भी गुरेज नहीं करते 
क्या ये भी मोहब्बत की ही कोई अनगढ़ी अनकही तस्वीर है …………जानाँ
जिसमे विरह के वृक्ष पर ही मोहब्बत का फूल खिला करता है 
या ये है मेरी दीवानगी जिसमे 
खुद को मिटाने की कोई हसरत फन उठाये डंसती रहती है 
और मोहब्बत हर बार दंश पर दंश सहकर भी जिंदा रहती है 
तुम्हारे होने ना होने के अहसास के बीच के अंतराल में 
एक नैया मैंने भी उतारी है सागर में 
देखें …उस पार पहुँचने पर तुम मिलोगे या नहीं 
बढाओगे या नहीं अपना हाथ मुझे अपने अंक में समेटने के लिए 
मुझमे मुझे जिंदा रखने के लिए 
क्योंकि …………जानते हो तुम 
तुम  , तुम्हारे होने का अहसास भर ही जिंदा रख सकते हैं मुझमे मुझे 

क्या मुमकिन है धराशायी सिपाही का युद्ध जीतना बिना हथियारों के 
क्योंकि 
उम्र के इस पड़ाव पर नहीं उमगती उमंगों की लहरें 
मगर मोहब्बत के बीज जरूर किसी मिटटी में बुवे होते हैं 

( एक थिरकती आस की अंतिम अरदास है ये ……जानाँ )

भावों के टुकडे ……2

1
अब पीरों के समंदर न उफनते हैं 

हूँ मुफलिसी में मगर फिर भी 
अब ना दरिया में भावों के  जहाज चलते हैं 
ये कौन सा दरिया -ए -शहर है दोस्तों 
जहाँ दिन में भी ना दिन निकलते हैं 
खो से गए थे जो आंसू कहीं 
जाने क्यों यहीं उमड़ते दिखते  हैं 
खारेपन में जो घुला है नमक 
जाने क्यूँ तेरे दर्द का कहर दिखते हैं 
कोई कहीं होगा तेरा खुदा किसी शहर में 
मेरी हसरतों के खुदा तो तेरी दहलीज में ही दिखते हैं 

2
राह तकते तकते 

मेरे इंतज़ार की फांकें यूँ बिखर गयीं 

गोया चाँद निकला भी हो 
और चाँदनी बिखरी  भी ना हो 

ये इश्क की तलबें इतनी कमसिन क्यूँ हुआ करती हैं ?


3
होती हैं कभी कभी 

ज़िन्दगी की तल्खियाँ भी 
और खुश्गवारियां भी 
शामिल कविताओं में 
तो क्या मूंह मोड़ लूं हकीकतों से 
जब विरह प्रेम और दर्द लिख सकती हूँ 
तो सच्चाइयां क्यों नहीं 
फिर चाहे खुद की ज़िन्दगी की हों या कल्पनाओं के समंदर का कोई मोती 

4
मौन की घुटन बदस्तूर जारी है …………पकती ही नहीं हँडिया में पडी कहानियाँ ………और आँच ना कम होती है ना तेज़ 


5
कोई नहीं साथ मेरे 
मैं भी नहीं 
मेरे शब्द भी नहीं 
मेरे ख्याल भी नहीं 
मेरे भाव भी नहीं 


कभी कभी लगता है फिर से कोरा कागज़ हो गयी हूँ मैं 

क्या सच में ?


6
उम्र भर एक चेहरा अदृश्य बादलों में ढूँढा 
ना मिलना था नहीं मिला 
सुनो !
तुम ही क्यों नहीं बन जाते वो चेहरा ……मेरे ख्वाब की ताबीर 
जो मुझे मुझसे ज्यादा जान ले 
जो मुझे मुझसे ज्यादा चाह ले ………
क्योंकि 
अब हर चेहरा ना जाने क्यों तुम में ही सिमट जाता है 
हा हा हा ………पागल हूँ ना मैं ! ख्वाब को पकडना चाहती हूँ
शायद भूल गयी हूँ हकीकत की रेतीली जमीनों पर गुलाब नहीं उगा करते ……

7
कितनी कंगाल हूँ मैं रिश्तों और दोस्तों की भीड में 
एक कांधा भी नसीब नहीं कुछ देर फ़फ़कने को 
ना जाने कैसा कर्ज़ था ज़िन्दगी का 
उम्र गुज़र गयी मगर कभी चुकता ही ना हुआ

8
धारा के विपरीत तैरने का भी अपना ही शऊर होता है 

जमीं को आसमान संग चलने की ताकीद जो की उसने 
उम्र तमाम कर दी तकते तकते 

9
बनाना चाहती हूँ 
अपने आस पास 
एक ऐसा वायुमंडल 
जिसमें खुद को भी ना पा सकूँ मैं 
जानते हो क्यूँ ? 
क्यूँकि मेरे होने की 
मेरे श्वास लेने की 
मेरे धडकने की
पावर आफ़ लाइफ़ हो तुम 
जब तुम नहीं ……तो कुछ नहीं 
मैं भी नहीं …………
ये है मेरा प्रेम 
और तुम्हारा ……???

10

सिर्फ़ एक साँस की तो अभिव्यक्ति थी 
जाने क्यों मैने शब्दों की माला पिरो दी 
अब ढूंढों इसमें ग़ज़ल , कविता या छंद 
मगर मेरे तो दृग अब हो गये हैं  बंद


ओ मेरे !…….10

आँख में उगे कैक्टस के जंगल में छटपटाती चीख का लहुलुहान अस्तित्व कब हमदर्दियों का मोहताज हुआ है फिर चाहे धुंधलका बढता रहा और तुम फ़ासलों से गुजरते रहे ……ना देख पाने की ज़िद पर अडी इन आँखों का शगल ही कुछ अलग है …………नहीं , नहीं देखना ………मोहब्बत को कब देखने के लिये आँखों की लालटेन की जरूरत हुयी है …………बस फ़ासलों से गुजरने की तुम्हारी अदा पर उम्र तमाम की है तो क्या हुआ जो तुम्हें मैं नज़र ना आयी , तो क्या हुआ जो तुम्हारे कदमों में ना इस तरफ़ मुडने की हरकत हुयी ………इश्क के अंदाज़ जुदा होते हैं फ़ासलों में भी मोहब्बत के खम होते हैं ………जानाँ !!! 

अब मुस्कुराती हूँ मैं अपने जीने के अन्दाज़ पर ………फिर क्या जरूरत है रेगिस्तान में भटकने की …………कैक्टस के फ़ूल यूँ ही नहीं सहेजे जाते …………उम्र फ़ना करनी पडती है धडकनो का श्रृंगार बनने को…………और मैंने तो खोज लिया है अपना हिमालय …………क्या तुम खोज सकोगे कभी मुझमें , मुझसा कुछ ………यह एक प्रश्न है तुमसे ओ मेरे !


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