Just another WordPress.com weblog

Archive for मार्च, 2012

"मोहन के बापू का हाथ ज़रा तंग है " :))))))))

कभी कभी दुनिया किसी की कैसे बदल जाती है 
इसकी एक दास्ताँ ये अलबेली सुनाती है 
यूँ तो उसका इक नाम भी है
अच्छा खासा बड़ा व्यापार भी है
हाई सोसाइटी में ऊंची शान भी है 
अपनी एक पहचान भी है 
पर कभी कभी किसी मोड़ पर
जब किस्मत पलटी खाती है 
तब छम्मकछल्लो कोई जीवन में आती है  
जिसके रूप सौंदर्य के आगे सारी अक्ल
घुटनों को छोड़ तलवों से भी बाहर निकल जाती है 
और वो सम्मोहन जाल में यूँ फँस जाता है 
फिर परकटे पंछी सा फ़डफ़डाता है 
पर बाहर ना निकल पाता है
ऐसा ही कुछ उसके साथ हुआ
रूप पर ऐसा निसार हुआ
घर बार छोड़ने को तैयार हुआ
जब देखा पगला गया है
तो शिकार तो होना ही था ……सो हो गया
बिना कुछ जाने बूझे 
इस मधुर जाल में खो गया
कुछ साल यूँ ही निकल गए
अब वो काम धंधे में बिजी हुआ 
और उस रूपमती का भी कायापलट हुआ
हाई प्रोफाइल सोसाइटी में जाती थी
पर अक्ल के मामले में मात खा जाती थी
बस रूप और पैसे के घमंड पर इतराती थी
अब किट्टी पार्टी हो या खरीदारी
उसका तकिया कलाम इक बन गया था
जब भी शौपिंग करने जाती या
बाजी कोई हार जाती 
बस एक ही बात थी दोहराती
“मोहन के बापू का हाथ ज़रा तंग है”
वरना ऐसी चीजों की मेरे यहाँ ना कोई कमी है
कभी कोई भिखारी कुछ मांगता था 
तब भी यही वो दोहराती थी
“मोहन के बापू का हाथ ज़रा तंग है”
वरना तुम जैसे भिखारियों की रोज लाइन लगती है
बस चिल्लर ही नहीं मिलती है 
किसी संस्था का उद्घाटन हो या भाषण हो
रूपमती का एक ही नारा था
“मोहन के बापू का हाथ ज़रा तंग है” 
इस नारे ने प्रसिद्धि बहुत दिला दी थी
पर मोहन के बापू की तो वाट लगा दी थी
बेचारा मोहन का बापू अब होश में आया था
मुझसे तो बेहतर फ़ाक्ता  था 
जो कबूतर उडाया करता था 
यहाँ तो इज्जत का कबूतर हर जगह उड़ता है 
पीठ पीछे उसे हर कोई सिर्फ यही कहता है
“मोहन के बापू का हाथ ज़रा तंग है “
इज्ज़त का फालूदा बन गया है 
फिर चाहे वो लाखों का दान दे देता है
पर इस तकिये कलाम से ना मुक्ति पाता है
रूप के जाल में फँसा उसका मन पंछी 
अब बिलबिलाता है 
पर उगल पाता है ना निगल पाता है
सपनों में भी बस यही दिखाई देता है
कानों में भी बस यही सुनाई देता है 
“मोहने के बापू का हाथ ज़रा तंग है”
और मोहन का बापू बस 
अपने हाथ मलता रहता है
और एक ही घोषणा करता है
“मोहन के बापू ” के टैग से 
कोई आज़ाद करा दे 
मेरी खोयी इज्ज़त कोई लौटा दे
तो उसे मुँह माँगा ईनाम दूँगा
तो दोस्तों कोई उपाय जरूर बतलाना
साँप के मुँह में छछूंदर है 
क्या करे ज़रा बतलाना
वरना तो सभी जानते हैं 
“मोहन के बापू का हाथ ज़रा तंग है “
देखो तुम ना कहीं कभी ऐसे फँस जाना
रूप के साथ गुणों को भी आँक लेना
वरना तुम्हें भी पड़ेगा ऐसे ही पछताना
और ज़िन्दगी भर यही पड़ेगा दोहराना
जिसके बारे में सभी जानते हैं 
“मोहन के बापू का हाथ ज़रा तंग है “:)))))))))))

Advertisements

.कृष्ण लीला ……भाग 42



आठवें वर्ष में कन्हैया ने
शुभ मुहूर्त में दान दक्षिणा कर
वन में गौ चराने जाना शुरू किया
मैया ने कान्हा को 
बलराम जी और गोपों के 
सुपुर्द किया
वन की छटा बड़ी निराली थी
सुन्दर पक्षी चहचहाते थे
हिरन कुलाचें भरते थे
शीतल मंद सुगंध 
समीर बहती थी
वृक्ष फल फूलों से लदे खड़े थे 
आज मनमोहन को देख
सभी प्रफुल्लित हुए थे 
वहाँ कान्हा नई- नई 
लीलाएं करते थे
गौ चरने छोड़ देते
और खुद ग्वालों के संग
विविध क्रीडा करते थे

कभी मुरली की मधुर तान छेड़ देते थे 
जिसे सुन पशु – पक्षी स्तब्ध रह जाते थे 
यमुना का जल स्थिर हो जाता था
कभी मधुर स्वर में संगीत अलापा करते थे
कभी पक्षियों की बोलियाँ निकाला करते थे
कभी मेघ सम गंभीर वाणी से
गौओं को नाम ले पुकारा करते थे
कभी ठुमक- ठुमक कर नाचा करते थे
और मयूर के नृत्य को भी 
उपहासास्पद बनाया करते थे
कभी खेलते खेलते थक कर
किसी गोप की गोद में 
सो जाया करते थे
कभी ताल ठोंककर 
एक दूजे से कुश्ती लड़ते थे
कभी ग्वाल बालों की 
कुश्ती कराया करते थे
और दोनों भाई मिल 
वाह- वाही दिया करते थे 
जो सर्वशक्तिमान सच्चिदानंद 
सर्वव्यापक था
वो ग्रामीणों संग ग्रामीण बन खेला करता था
जिसका पार योगी भी 
ध्यान में ना पाते थे
वो आज गोपों के संग
बालसुलभ लीलाएं करते थे
फिर किसमे सामर्थ्य है जो 
उनकी लीला महिमा का वर्णन करे 

इक दिन गौ चराते दोनों भाई 
अलग- अलग वन में गए
तब श्रीदामा बलराम से बोल उठा
भाई यहाँ से थोड़ी दूर
इक ताड़ का वन है 
जिसमे बहुत मीठे फल लगा करते हैं
वहाँ भांति- भांति के वृक्ष लगे खड़े हैं
पर वहाँ तक हम पहुँच नहीं पाते हैं
धेनुक नामक दैत्य गर्दभ रूप में
वहाँ निवास करता है 
जो किसी को भी उसके
मीठे फल ना खाने देता है
ये सुन बलराम जी वहाँ पहुँच गए
और एक वृक्ष को हिला
सारे फल गिरा दिए
जैसे ही फल गिरने की आवाज़ सुनी
दैत्य दौड़ा आया और
बलराम जी पर वार किया
बलराम जी ने उसकी 
टांग पकड़ पटक दिया
बलराम जी को दुलत्तियाँ मारने लगा
तब बलराम जी ने उसे वृक्ष पर
मार उसका प्राणांत किया 
ये देख उसके दूसरे साथी दौड़े आये
पर बलराम जी के आगे 
कोई ना टिक पाए
ये देख देवताओं ने 
पुष्प बरसाए

जब मोहन बलराम और ग्वालों संग
गोधुली वेला में वापस आते हैं
ये मधुर वेश कान्हा के 
हर दिल को भाते हैं
संध्या समय ब्रज में प्रवेश करते हैं
घुंघराली अलकों पर धूल पड़ी होती है
सिर पर मोर पंख का 
मुकुट शोभा देता है 
बालों में सुन्दर सुन्दर 
जंगली पुष्प लगे हैं 
जो मोहन की सुन्दरता से
शोभित होते हैं
मधुर नेत्रों की चितवन 
मुख पर मुस्कान ओढ़े 
अधरों पर बंसी सुशोभित होती
मंद मंद गति से 
मुरली बजाते जब 
श्याम ब्रज में प्रवेश करते हैं
तब दिन भर विरह अगन से 
तप्त गोपियों के ह्रदयो को
मधुर मतवारी चितवन से 
तृप्त करते हैं 
गोपियाँ अपने नेत्र रुपी 
भ्रमरों से 
प्रभु के मुखारविंद के 
मकरंद रस का पान कर 
जीवन सफल बनाती हैं 
और प्रभु के ध्यान में 
चित्र लिखी सी खडी रह जाती हैं 
यशोदा रोहिणी तेल उबटन लगा
उन्हें स्नान करती हैं
फिर भांति भांति के भोज करा
सुन्दर शैया पर सुलाती हैं 
इसी प्रकार कान्हा 
रोज दिव्य लीलाएं करते हैं 
ग्वाल बाल गोपियों और ब्रजवासियों को
जो वैकुण्ठ में भी सुलभ नहीं
वो सुख देते हैं 

क्रमशः ………

शायद तभी बेमौसमी बरसातों से सैलाब नहीं आया करते …….



सुना है कान्हा 
जब सब हरते  हो 
तभी हारते हो 
मगर यहाँ तो 
कभी कोई जंग छिड़ी ही नहीं
तुमने ही अपने इर्द गिर्द
ना जाने कितनी दीवारें 
खडी कर रखी हैं
कभी कहते हो 
सब धर्मों को छोड़ 
एक मेरी शरण आ जा 
मैं सब पापों से मुक्त करूंगा
तुम सब चिंताएं छोड़ दे 
तो कभी कर्मयोग में फँसाते हो
और कर्म का उपदेश देते हो
और तुम्हारी बनाई ये दीवारें ही
तुम्हारा चक्रव्यूह भेदन नहीं कर पातीं
तुम खुद भी उनमे बंध जाते हो
और जब जीव तुमसे मिलना चाहे
तो तुम इनसे बाहर नहीं आ पाते हो
क्योंकि याद आ जाते हैं उस वक्त 
तुम्हें अपनी बनाये अभेद्य दुर्ग 
एक तरफ कर्म की डोर 
दूसरी तरफ पूर्ण समर्पण
और गर गलती से कोई कर ले
तो खुद उलझन में पड़ जाते हो
और फिर उसे बीच मझधार में 
खुद से लड़ने के लिए छोड़ देते हो
एक ऐसी लडाई जो जीव की विवशताओं से भी बड़ी होती है
एक ऐसा युद्ध जिसमे समझ नहीं आता 
कहाँ जाये और कौन ?
और उसमे तुम्हारा अस्तित्व भी 
कभी कभी एक प्रश्नचिन्ह बन 
तुम्हें भी कोष्ठक में खड़ा कर देता है 
और तुम उसमे बंद हो , मूक हो 
ना बाहर आने की गुहार लगाते हो
ना अन्दर रहने को उद्यत दीखते हो 
बस किंकर्तव्य विमूढ़ से हैरान परेशान 
अपने अस्तित्व से जूझते दीखते हो
क्यों मोहन …..खुद को भी भुलावा देते हो
छलिये ………छलते छलते जीव को
तुम खुद को भी छल लेते हो 
क्योंकि मिलन को आतुर तुम भी होते हो ……उतने ही 
उफ़ ………..तुम और तुम्हारा मायाजाल 
खुद जीतकर भी हार जाते हो …….खुद से ही 
शायद तभी बेमौसमी बरसातों से सैलाब नहीं आया करते …….

ना जाने क्या हुआ है कुछ दिनो से

ना जाने क्या हुआ है कुछ दिनो से
सारे भाव सुप्त हो गये हैं
जैसे जन्मो के थके हों
और अब लुप्त हो गये हैं
कोई छोर नही दिखता
किसी कोने मे , किसी दराज़ मे
किसी अल्मारी मे
कहीं कोई भाव नही मिलता
जैसे गरीब की झोंपडी
नीलाम हो गयी हो

या शाहजहाँ से किसी ने
कोहिनूर छीन लिया हो
या मुमताज़ की खूबसूरती पर
कोई दाग लग गया हो
देखा है किसी ने ऐसा
भावों का अकाल
जहाँ सिर्फ दूर दूर तक
सूखा पड़ा हो
हर संवेदना बंजर जमीन सी
फट चुकी हो
और किसी भी बारिश से
जहाँ की मिटटी ना भीजती  हो
फिर कौन से बीज कोई डाले
जब मिटटी ही अपनी
उर्वरा शक्ति खो चुकी हो
कहीं देखा है किसी ने
ऐसा भावो का भीषण अकाल
कुछ मिट्टियों को किसी खास
 उर्वरक की जरूरत होती है
आखिर दर्द ही तो संवेदनाओं
और भावों की उर्वरा शक्ति है
लगता है एक बार फिर
दर्द का सैलाब लाना होगा
मृत संवेदनाओं को पुनर्जीवित करने के लिए

मोहब्बत से इतर भी एक अमृता थी जो खुदा से मिल खुदा ही बन गयी थी

 “खामोशी से पहले “——–अमृता प्रीतम
इसमे अमृता का दूसरा ही रूप नज़र आयेगा मोहब्बत से इतर भी एक अमृता थी जो खुदा से मिल खुदा ही बन गयी थी 

पुस्तक मेले से अमृता को साथ ले आयी और उसकी “खामोशी से पहले” के सफ़र को गुनने लगी । शायद अमृता ने वो सब पा लिया था जो अन्तिम यात्रा से पहले का जरूरी सामान होना चाहिये ……पूरा सामान इकट्ठा कर लिया था अन्तिम पडाव का ………खुद को पा चुकी थी ………अब किसी दरवेश की ना उसे जरूरत थी …………नूर की बूँद उसके माथे पर बिन्दिया बन दमक रही थी जहाँ काया का नमक भी घुल गया था और उसकी मोहब्बत के धागे बीज दीक्षा के साथ ही काया की किताब मे दुआ बन झलक रहे थे ………अब किसी पीर की जरूरत नही थी उसने शायद वो राह खोज ली थी जहाँ स्वंय से सम्वाद हो सकता था और करती थी वो ………मिलती थी खुदा की शीतलता बरसाती किरणों की दीवानगी से ………अब उसका शहर बदल चुका था मगर मंज़िल पर पहुँच कर फ़र्क नही पडता …………ये ऐसा सफ़र था अमृता का जहाँ मुझे लगा कि बस अब इसके आगे तो और कुछ हो ही नही सकता …………हम सब इसी राह की कशिश मे ही तो जी रहे हैं और खोज रहे हैं अपनी अपनी मंज़िलें …………और अमृता मंज़िल पा चुकी थी शायद तभी “खामोशी से पहलेका सफ़र भी अंकित कर दिया।

पा चुकी थी वो अपने “घर का पता” जिसकी बानगी उनकी इस कविता में दिखती है जहाँ उनका अपने खुदा से संवाद हो रहा है मन के घोड़ों को बाँध दिया है और घर का पता उसे मिल गया है जिसने खुद को जान लिया हो उसे और कुछ जानना नहीं रहता ,जिसने उसे पा लिया हो उसे और कुछ पाना बाकि नहीं रहता और अमृता हर मील के पत्थर को पार कर चुकी थी अगर उनकी ये किताब पढ़ी जाए तो यही लगेगा कोई फकीर अपनी बोली में इबादत कर रहा है ………अब पता नहीं खुद की या खुदा की …………ये संवाद यूँ ही नहीं होता कहीं ना कहीं किसी ना किसी रूप में जब खुदा दस्तक देता है तभी लफ़्ज़ों में उतरता है ……..

और बंद घरों को देखती
एक गली से गुजरी
ले जाने ——मन में क्या आया
मैंने एक दरवाज़े को खटखटाया 
मैं नहीं जानती ———वह कौन था
दरवाज़े पर आया ,बोला—–
तू आ गयी ———-कई जन्मों के बाद
मैं उसकी ओर देखती रही
पहचाना नहीं, पर लगा
खुदा का साया ………..जमीन पर आया है
यह रहस्य नहीं पाया
पर एक सुकून सा बदन में उतार आया
कहा ——-जिस शाह से आई हूँ
तुम नहीं जानते

वह हँस दिया , कहने लगा ——जनता हूँ
मैंने पूछा ——अगर जानते हो—-
तो उस घडी कहाँ थे ?
कहने लगा ——–वहीँ था ,जब—–
बेलगाम घोड़े से उतारा
घोड़े कि पकड़ से छुड़ाया
अँधेरे में रास्ता दिखाया
फिर इस द्वार पर रोक लिया
और तुम्हें
तेरे घर का पता दिया ——-

सारी ज़िन्दगी का कहो या जन्मों की भटकन का अंत यहीं तो होता है और इस किताब को पढ़कर लगा शायद अमृता की भटकन समाप्त हो चुकी थी उसे उसके घर का पता मिल चुका था ………..यूँ ही नहीं “ख़ामोशी से पहले” के सफ़र का आगाज़ हुआ .

पता है ऐसा लगा जैसे खुद को पढ़ रही होऊं इसलिए ये किताब ज्यादा करीब सी लगी और अमृता को खुद में रेंगता सा पाया मैंने 


(ग्रीन कलर में जो शब्द हैं वो अमृता की कविताओं  के शीर्षक हैं …….)

सुस्वागतम



नमन करूँ

बारम्बार तुम्हें माँ 


जीवन धन्य 





दर्शन पाऊँ 


दिव्य ज्योति निहारूँ 


एक हो जाऊँ 



महिषासुर 

“मैं” रुपी अंतस में 


मर्दन करो

कृपा बरसे

होवे जीवन धन्य 


हर घर में 



फंद छुड़ाओ

लोभ मोह अहं के 


पूर्णत्व पाऊँ 



तुम्हारे साथ 

आत्म विलास पाऊँ 


धन्य हो जाऊँ
 






सुस्वागतम 

नव संवत्सर हो  

मंगलमय  









सभी को नवरात्रि शुभ हो  

फिर लाशों का तर्पण कौन करे ?


यहाँ ज़िन्दा कौन है
ना आशा ना विमला
ना लता ना हया
देखा है कभी
चलती फिरती लाशों का शहर
इस शहर के दरो दीवार तो होते हैं

मगर कोई छत नहीं होती
तो घर कैसे और कहाँ बने
सिर्फ लाशों की
खरीद फरोख्त होती है
जहाँ लाशों से ही
सम्भोग होता है
और खुद को वो
मर्द समझता है जो शायद
सबसे बड़ा नामर्द होता है
ज़िन्दा ना शरीर होता है
ना आत्मा और ना ज़मीर
रोज़ अपनी लाश को
खुद कंधे पर ढोकर
बिस्तर की सलवटें
बनाई जाती हैं
मगर लाशें कब बोली हैं
चिता में जलना ही
उनकी नियति होती है
कुछ लाशें उम्र भर होम होती हैं
मगर राख़ नहीं
देखा है कभी
लाशों को लाशों पर रोते
यहाँ तो लाशों को
मुखाग्नि भी नहीं दी जाती
फिर लाशों का तर्पण कौन करे ? 

टैग का बादल