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Archive for दिसम्बर, 2011

सिर्फ कोहिनूर ही मुकुट में जड़े जाते हैं ………..

सिन्दूर ,बिंदिया
बिछुए , मंगलसूत्र
कितने आवरण ओढा दिए 
सिर्फ एक सच को 
ढांपने के लिए
अस्तित्व बोध ना 
होने देने  के लिए 
सात भांवरों की दुहाई 
तो कभी सात 
वचनों के पैरहन 
ओढाये जाते रहे 
और मैं बावरी 
इन्ही आवरणों में
खुद के अस्तित्व को
ढूंढती रही
गलतफहमियों के 
लिबास ओढती रही
कभी ताबीज बना
तो कभी जंजीर बना
तुम्हारे वजूद को 
जिस्म से लपेटती रही
करवाचौथ के व्रत में
अपनी मोहब्बत की उम्र की
आहुति देती रही 
नहीं जानती थी
खोखली दीवारें 
रेत के  महल
और ताश के पत्तों 
से बने पिरामिड 
ढहने के लिए ही होते हैं
जानकर या शायद 
अनजाने में 
भूल गयी थी 
इस सच्चाई को
लिबास तो बदलने
के लिए होते हैं  
सिर्फ कोहिनूर ही मुकुट में जड़े जाते हैं ………..
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कृष्ण लीला ………..भाग ३०





सबसे पहला भाव बतलाता है
प्रभु को तो सिर्फ प्रेम रंग भाता है
प्रेम रज्जू से बंध प्रेमी के वश होना ही उन्हें आता है 
अगला भाव दर्शाता है
जब मैया द्वैत भाव से दूर ना हो पाती है
फिर मैं क्यों व्यर्थ
असंगता प्रगट करूँ
जो मुझे बद्ध समझता है
उसके लिए बद्ध
समझना ही उचित जान
प्रभु बँधन में बंध गए
अगला भाव दर्शाता है
प्रभु ने प्रण लिया है
अपने भक्त के छोटे से भाव को परिपूर्ण करना
फिर मैया के रस्सी से बाँधने के भाव को
कैसे ना पूर्ण करते
इक भाव ये बताता है
चाहे मैं कितना ही गुणवान कहाता हूँ
पर भक्त के अर्थात मैया के 
वात्सल्य स्नेह रुपी रज्जू से ही
स्वयं को पूर्ण पाता हूँ
यूँ सोच कान्हा रस्सी से बंध गए
इक भाव ये बताता है
भगवान् भक्त का कष्ट 
परिश्रम ना सह पाते हैं 
और स्वयं बँधन में बंध जाते हैं
और अपनी दयालुता को दर्शाते हैं
कितने करुणा वरुणालय हैं प्रभु 
जिनका ना हम ध्यान लगाते हैं
भगवान ने  मध्य भाग में बँधन स्वीकारा है 
जो ये तत्वज्ञान बतलाता है
तत्व दृष्टि से कोई 
बँधन नहीं होता है
ये तो सिर्फ आँखों का धोखा है
जो वस्तु आगे पीछे 
ऊपर नीचे नहीं होती है
केवल बीच में भासती है
उसका ना कोई अस्तित्व होता है
वह तो  केवल झूठ का आवरण होता है
तो फिर बँधन भी झूठा कहाता है
यूँ तो भगवान किसी बँधन में 
ना समाते हैं
जब मैया उद्यम  कर हार जाती है
तब ग्वालिनें समझाती हैं
लगता है तुम्हारा लाला
अलौकिक शक्ति वाला है
यूँ तो कमर में छोटी सी किंकिनी 
रुन झुन करती है
पर रस्सी से ना बंधती है
शायद विधाता ने इसके ललाट पर
बँधन लिखा ही नहीं
क्यों व्यर्थ परिश्रम करती हो
पर मैया ने आज हठ किया है
चाहे शाम हो या रात
आज तो इसे बांध कर रहूँगी
और जब भक्त हठ कर लेता है
तब भगवान अपना हठ छोड़ देता है
और भक्त का हठ ही पूरा कर देता है
लेकिन बंधता तब हैं जब
भक्त थक जाता है
और प्रभु को पूर्ण समर्पण करता है 
तब ही प्रभु बँधन स्वीकारते हैं
अहंता ममता की दीवारें 
जब तक ना गिराओगे
कैसे भला प्रभु को पाओगे 
ये प्रसंग यही दर्शाता है
भक्त का श्रम या समर्पण और भगवान की कृपा 
ही ये दो अंगुल की कमी बताई गयी है
या कहो जब तक भक्त अहंकारित  होता है
मैं भगवान को बांध सकता हूँ
तब एक अंगुल दूर हो जाता है
और प्रभु भी एक अंगुल की दूरी बना लेते हैं
यूँ दो अंगुल कम पड़ जाता है
आत्माराम होने पर भी भूख लगना
पूर्णकाम होने पर भी अतृप्त रहना
शुद्ध सत्वस्वरूप होने पर भी क्रोध करना 
लक्ष्मी से युक्त होने पर भी चोरी करना
महाकल यम को भी भय देने वाला होने पर भी
मैया से डरना और भागना
मन से भी  तीव्र गति होने पर भी
मैया के हाथों पकड़ा जाना
आनंदमय होकर भी दुखी होना , रोना
सर्वव्यापक होकर भी बंध जाना
भगवान की भक्त वश्यता  दर्शाता है
उनके करुणामय रूप का ज्ञान कराता है
जो नहीं मानते उनके लिए
ना ये दिव्य ज्ञान उपयोगी है
पर जिसने उसको पाया है
वो तो कृष्ण प्रेम में ही समाया है
ये सोच जब माँ को प्यार करने का अधिकार है 
तो फिर सजा देने का भी तो अधिकार है
और अब मैं बाल रूप में आया हूँ
और ये मेरी माँ है तो 
अब बँधन स्वीकारना होगा
माँ को उसका हक़ देना होगा
यों कृपा कर कान्हा बँधन में बंध गए

क्रमशः …………

क्या कर सकोगे तुम ऐसा

जानती हूँ
हाल तेरा तुझसे ज्यादा
जो बातें तेरा दिल
तुझसे नहीं कह पता
वो मुझे आकर बता जाता है
देख कितना अपना है
मत रातों को ख्वाब
सजाया कर
मत रात के तकिये पर
मोहब्बत सजाया कर
खामोश दीवारें
कब बोली हैं
वहाँ तो सिर्फ
मोहब्बत चिनी है
मोहब्बत की है
दर्द भी सहना होगा
वियोग का गम भी
हँस के पीना होगा
ये तू भी जानता है
और मैं भी
फिर इतनी बेकरारी क्यूँ
चाहत को मंजिल मिल जाये
तो बुलंद कब होती है
जो मिटटी में मिल जाये
हर आग में जल जाये
हर सितम सह जाये
मौत भी जहाँ
रुसवा हो जाये
तब जानना
वो ही मोहब्बत होती है
छोड़ दे रातों को जागना
छोड़ दे दरो दीवार से लिपटना
करनी है तो ऐसे कर मोहबब्बत
कि काँटों को भी रश्क होने लगे

चाँद तारे भी सजदा करने लगें
जमीं आसमाँ भी तेरे क़दमों तले
झुकने लगें
मोहब्बत में फ़ना होना बड़ी बात नहीं
मज़ा तो तब है जिए तो ऐसे
तेरे जीने से दुनिया को
रश्क होने लगे
क्या कर सकोगे तुम ऐसा
मोहब्बत की खातिर
दे सकोगे मोहब्बत का इम्तिहान

और जी सकोगे हँस कर…………

बरस सच मे नव वर्ष बन जाये

किसे दूँ कैसे दूँ 
कौन सी दूँ कामना 
जो शुभ हो जाए 
बरस सच मे 
नव वर्ष बन जाये 

यहाँ तो खाली गिलास है 
और दूध भी पास नही
प्यास कोई है नही 
तो दरिया भी पास नही 
कैसे भरे पैमाना 
जो छलक छलक जाये 
बरस सच मे 
नव वर्ष बन जाये 

यहाँ तो रुका हुआ कारवाँ है 
और साथी ना कोई साथ है 
भीड है , महफ़िल है 
मगर फिर भी 
तन्हाई का साथ है 
किसे दूँ आवाज़ 
जो गीत कोई बन जाये 
बरस सच मे 
नव वर्ष बन जाये 

ज़रा एक नज़र इधर भी………हम भी खडे हैं राह में………ये है मेरा सफ़र

वंदना गुप्ता का खामोश सफ़र


प्रिय मित्रो
सादर ब्लॉगस्ते
इये मित्रो आज क्रिसमस के शुभ अवसर पर काजू और किशमिश खाते हुए मिलते हैं ब्लॉग जगत के एक सक्रियसदस्य सेजी हाँ मैं बात कर रहा हूँ वंदना गुप्ता जी कीदिल्ली के आदर्श नगर में रहते हुए अपने मातापिता केआदर्शों को मन में संजोये हुए ये लगी हुईं हैं ब्लॉग लेखन द्वारा हिंदी माँ की सेवा मेंइनके पिता तो चाहते थे  किउनकी बेटी आई..एसअधिकारी बने लेकिन बन गयीं ये लेखक और ब्लॉगरअब होनी को जो मंज़ूर होता है वो हीहोता हैअब सोचिये यदि ये आई..एसअधिकारी  बन जाती तो ब्लॉग जगत की रौनक का क्या होताअथवा ब्लॉगर सम्मेलन उबाऊ  हो जातेतो आइये धन्यवाद दें उस दुनिया बनाने वाले को जिन्होंने इस दुनिया कोऔर वंदना गुप्ता जी को बनाया और इन्हें आई..एसअधिकारी नहीं बनायावंदना गुप्ता जी लेखन की विविधविधाओं में लिखती हैं और बाकी बचाखुचा चलिए इन्हीं से पूछ लेते हैं
आगे पढ़ें…

अनोखी यात्रा ………अनोखे पल

चलिए मेरे साथ एक सफ़र पर 
अरे ये क्या 
ये पिलर ४२० बीच में कहाँ से आ गया 
कसम से टू मच हो गया ये तो 
 उफ़ ………..ब्लोगर मिलन के मारे 
बेचारे पिलर ४२० पर ही अटक गए 
 आधी ब्लोगर मीट तो नांगलोई में सिमट गयी
ब्लोगर्स की मस्ती तो यहीं शुरू हो गयी 
चाय काफी की चुस्की साथ में मौसम सुहाना
ये सफ़र तो रहा बड़ा मस्ताना

ये सांपला में कौन पधारे
देखें सारे सांपला वाले  
कोई इच्छाधारी तो नहीं आया
हाँ हाँ ……….आया न 
सारे ही तो इच्छाधारी थे ………हा हा हा 
हमने दी नहीं कोई झूठी खबर 
देख लो अंतर्राष्ट्रीय मिलन ही था
बोर्ड लगवा दिया गया
स्वागत समारोह में
ब्लोगर्स ने धमाल  किया
 अब जाट देवता संग मीट  का आनंद जो  लिया
तो धूपने भी हमारा साथ दिया 
अंतर सोहेल उर्फ़ अमित ने किया कमाल
ब्लोगर्स मिलन में किया धमाल
 अपने अपने गुट बना लिए
केवल राम और संजय को तो मौका मिल गया 
देखो तो सही कैसे बतियाते हैं
कब के बिछड़े हुए आज कहाँ आ के मिले 
सर्जना जी राकेश जी ने आकर मिलन को 
चार चाँद लगा दिया
देखो तो  ……चेहरे कैसे खिल रहे हैं
आपस में गले कैसे मिल रहे हैं  
खुशदीप जी और मुकेश 
पता नहीं कौन सी सोच ने घेरा है
चेहरे पर देखो छाया कैसा अजब अँधेरा है  
 ये है ब्लोगर्स  की मस्ती
गन्ने खाए जा रहे हैं
और छिलकों ने लगाया डेरा है 
 खाए जाओ ….खाए जाओ 
ब्लोगर मीट  के गुण गाये जाओ 
 राज भाटिया जी न जाने कौन सा वाइरस ढूंढ रहे हैं 
वैसे रस में तो कुछ मिलना नहीं
लगता है देख रहे हैं 
कहाँ से आया  इसमें इतना रस 
जो सारे खाने में लगे हैं 
 हम किसी से कम नहीं 
सब खायेंगे तो हम कैसे पीछे रहेंगे 
 दीपक बाबा आये तो सही
मगर बक बक को कान तरस गए 
 ये लो जी हास्य व्यंगकार भी आ गए
मगर मूंह पर तो जैसे टेप लगा ली 
अरे बोलो बोलो ……….कुछ तो बोलो 
 अंजू संजू ……….इतना गुस्सा ठीक नहीं यार
एक बार मुस्कुरा दो न ………………हा हा 
 वैसे ये गुस्सा नहीं ………धूप पड़ेगी तो त्योरियां तो चढ़ेंगी न 
देखा झूठ नहीं कहा न
गन्ने खाए हैं 
और ढेर वहीँ छोड़ आये हैं  
 राज जी ने कैमरे में समेटी यादें हैं 
 कैसी कैसी सोचों ने घेर लिया 
मगर संजय को न फर्क पड़ा

 इंदु जी ने भावनाओं में सबको बहा डाला
बाढ़ आई थी , सैलाब आया था
बड़ी मुश्किल से ब्लोगरों को बचाया था 
 परिचय ने अब जोर पकड़ा 
सबने अपना अपना परिचय दिया 
 अब नंबर लगा है तो  कुछ तो बोलना होगा
चाहे परिचय दो या सबको लपेट लो 
 महिला शक्ति कब पीछे रही 
उसने भी अपना परचम  लहराया 
 देखो कैसे कैसे रंग जमाया
परिचय भी यादगार बनाया 

 मिलन में मिलन का आनंद आया
कोई क्या जाने ब्लोगिंग क्या है 
इसका महत्त्व बतलाया 
 ब्लोगिंग को बुलंदी पर पहुँचाया 
हर ब्लोगर ने ब्लोगिंग को अपनी जान बताया 
 कुछ सांपला वासियों ने भी 
ब्लोगर बनने का उत्साह दिखाया 
 फिर चाहे डॉक्टर हो या बिजनेस मैन
सबके  मन को ब्लोगिंग ने मोह लिया 
 परिचय का दौर ऐसा चला
किसी को न समय का पता मिला 

 सबके जुदा अंदाजों ने परिचय दौर को बेजोड़ बनाया 
 अति उत्साहित मन की भाषा सबने जानी
ब्लोगिंग की महिमा सबने बखानी 

सभी ब्लोगर ऐसे मिले
कोई जान न पाया 
कौन है विदेश से आया
यही तो ब्लोगिंग ने किया कमाल
दूरियों को नजदीकियों में बदल डाला

बड़ी दूर से आये हैं प्यार का तोहफा लाये हैं 

 सांपला वासीके चेहरे भी खिल गए
ब्लोगर मिलन को सार्थक  कर गए 
 अब  कविराज कैसे पीछे रहते
अपना रंग जमा गए 
ब्लोगर महफ़िल में छा गए 
 एक अनोखा अंदाज़ रहा 
डॉक्टर ने भी खुद को इंसानी डॉक्टर जब बतलाया
हंसी का था फव्वारा छाया 
 हर अंदाज़ मन भाया
यही तो ब्लोगिंग ने है सिखलाया 
 अलबेले काम करते हैं
हास्य में कमाल  करते हैं
अलबेला खत्री नाम बताते हैं
ब्लोगिंग में भी धमाल मचाते हैं 
 हम कहीं रहे सब जगह छा जाते हैं
अपना परिचय आप बन जाते हैं 
 सुपर स्टार भी आया था
ब्लोगिंग का हीरो कहाया था 
सबके मन को भाया था
लेखनी उठाने का निर्णय सुनाया था 
 हम कहीं रहे वकालत का परचम लहरायेंगे
कानून की सभी विधाएं बतलायेंगे
ब्लोगिंग को उसका मुकाम दिलाएंगे
ऐसा प्रण करके आये हैं

 जब आये हैं तो हमने भी 
बहती गंगा में हाथ धोने का निर्णय लिया
एक फोटो तो चिपका ही दिया 
लो हमें भी सबने जान लिया
ये तो एक कमाल हुआ 

तो दोस्तों
अविस्मरनीय पलों को 
हमने सहेज दिया
स्वादिष्ट  भोजन का भी
आनंद लिया 
अंतर सोहेल ने कमाल किया
अंतर्राष्ट्रीय स्टार पर 
ब्लोगिंग का परचम लहरा दिया
शाम को काव्य गोष्टी का आयोजन किया
रात के आलम का अब करो इंतज़ार
रुकने वाले रिपोर्ट दे देंगे
मगर हमने तो सबसे गले मिल
अपने घोंसलों को प्रस्थान किया
आखिर प्रवासी ठहरे 
अपने नीड़ में तो जाना होगा
अगली ब्लोगर मीट तक का 
करो इंतज़ार
और मिलन के पलों को सहेजने को
आने की कोशिश करो
कोई लखनऊ से तो कोई करनाल से 
तो कोई जर्मनी से आया
सारे  ब्लोगर्स को अपना बनाया

लो दोस्तों
अंतर्राष्ट्रीय ब्लोगर्स मीट का
आँखों देखा हाल बतलाया
मगर सांप खोजने वालों को 
वहां न कोई सांप मिला
मगर हनुमान  जी के भक्तों ने 
जाते ही सबका स्वागत किया
मगर जैसे ही ब्लोगर्स की टोली देखी
बेचारों ने भाग जाने में ही अपनी भलाई समझी
ये कहाँ से कौन परदेसी आ गए
जिनसे सरकार भी डर गयी 
फिर हमारी क्या बिसात है
ये सोच सेना कूच कर गयी 
फोटो लेना चाह तो 
उन्होंने मूंह छुपा  लिया
इसलिए फोटो लाभ से 
हमें वंचित  किया 
शायद किसी ब्लोगर के कैमरे 
ने  यदि पकड़ा होगा 
तो उनका भी आपको दर्शन  होगा 
हा हा हा हा …………….

दोस्तों ……….मस्ती की बातें हैं इसलिए मस्ती में की हैं यदि किसी ब्लोगर को बुरा  लगे तो माफ़ी चाहती हूँ 



पहचान प्रश्नचिन्ह तो नहीं

पहचान प्रश्नचिन्ह तो नहीं
पहचान तो खुद बोलती है
बिना किसी शब्द के
बिना किसी मोल भाव के
पहचान तो बनती ही है 
फिर चाहे जड़ हो या चेतन
चाहे कोई भी रूप हो रंग हो 
बिना पहचान के तो अस्तित्व बोध नहीं 
हवा की भी तो पह्चान है ना 
गुजरती है तो स्पर्श करती है ना 
जो दृश्यमान नही फिर भी 
अपनी पहचान दे जाती है 
फिर इंसान तो एक बोलती घडी है समय की 
रुकने से पहले अपनी पहचान बनाता ही है 
चाहे अच्छी हो या बुरी 
यूँ ही नही बनते शेक्सपीयर या लिंकन
यूं ही नहीं याद किया जाता 
सिर्फ़ नाम ही पहचान नही बन गया 
एक पहचान ने ही तो नाम अमर कर दिया………
पहचान पर तो प्रश्नचिन्ह लग ही नहीं सकता ……….

टैग का बादल