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Archive for नवम्बर, 2011

स्वीकार सको तो स्वीकार लेना



सुना है
आज के दिन 
वरण किया था
सीता ने राम का 
जयमाल पहनाकर
और राम ने तो 
धनुष के तोड़ने के साथ ही
सीता संग जोड़ ली थी
अलख प्रीत की डोरी
कैसा सुन्दर होगा वो दृश्य
जहाँ ब्रह्माण्ड नायक ने
आदिसृष्टि जगत जननी के साथ
भांवरे भरी होंगी
उस अलौकिक अद्भुत
अनिर्वचनीय आनंद का अनुभव
क्या शब्दों की थाती कभी बन सकता है
आनंद तो अनुभवजन्य प्रीत है
फिर भुवन सिन्धु का भुवन सुंदरी संग
मिलन की दृश्यावली 
जिसे शेष ना शारदा गा पाते हैं
वेद भी ना जिनका पार पाते हैं
तुलसी की वाणी भी मौन हो जाती है 
चित्रलिखि सी गति हो जाती है 
उसका पार मैं कैसे पाऊँ
कैसे उस क्षण का बखान करूँ
बस उस आनंद सिन्धु में डूबने को जी चाहता है
कोटि कोटि नमन करती हूँ
 जीव हूँ ना ………..
बस नमन तक ही मेरी शक्ति है
यही मेरी भक्ति है ……….स्वीकार सको तो स्वीकार लेना 

जहाँ बाड खेत को खुद है खाती

ये जग झूठा
नाता झूठा
खुद का भी
आपा है झूठा
फिर सत्य माने किसको

मन बंजारा
भटका फिरता
कोई ना यहाँ
अपना दिखता
फिर अपना बनाए किसको

कैसी मची है
आपाधापी
कोई नहीं
किसी का साथी
सब मुख देखे की लीला है
फिर दुखडा सुनायें किसको

जहाँ बाड खेत को
खुद है खाती
लुटेरों के हाथ में
तिजोरी की चाबी
वहाँ किससे बचाएं किसको 

लो फिर आ गयी छब्बीस बटा ग्यारह……….अब तो कुछ शर्म कर लो

लो फिर आ गयी

छब्बीस बटा ग्यारह
एक दिन का शोर शराबा
फिर वो ही मंजर पुराना
सब  कुछ भुला देना
चादर तान के सो जाना
क्या फर्क पड़ता है
मासूमों की जान गयी
क्या फर्क पड़ता है
जिनके घर ना 
अब तक जले चूल्हे
क्या फर्क पड़ता है
जिसकी बेटी रही अनब्याही
क्या फर्क पड़ता है
दूधमुंहे से छिन गयी ममता प्यारी
क्या फर्क पड़ता है
माँ की आँख का ना सूखा पानी
क्या फर्क पड़ता है
जिसके घर ना मनी दिवाली
क्या फर्क पड़ता है
सूनी माँग में ना भरी लाली
क्या फर्क पड़ता है
अपाहिज के जीवन को मोहताज हुआ
क्या फर्क पड़ता है
जब स्कूल जाने की उम्र में
थाम ली हो घर की चाबी
दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में
बेच दी हों किताबें सारी
पेट की आग बुझाने को
ज़िन्दगी से लड़ जाने को
बिटिया ने हो घर की
बागडोर संभाली
किसी को फर्क ना 
तब पड़ना था
ना अब पड़ना है
ये तो सिर्फ तारीख की 
भेंट चढ़ता कड़वा सच है
जिसे खून का घूँट 
समझ कर पीना है
जहाँ अँधियारा 
उम्र भर को ठहर गया है
जहाँ ना उस दिन से 
कोई भोर हुई
किसी को ना कोई फर्क पड़ना है 
दुनिया के लिए तो 
सिर्फ एक तारीख है
एक दिन की कवायद है
राजनेताओं के लिए 
श्रद्धांजलि दे कर्त्तव्य की
इतिश्री कर ली जाती है
उस बाप की सूखी आँखों में ठहरा
खामोश मंजर आज भी ज़िन्दा है
जब बेटे को कंधे पर उठाया था
उसका कन्धा तो उस दिन
और भी झुक आया था 
बदल जाएगी तारीख 
बदल जायेंगे मंजर
पर बूढी आँखों में ठहर गया है पतझड़
अब तो कुछ शर्म कर लो
ओ नेताओं ! मत उलझाओ 
कानूनी ताने बानों में
मत फेंको कानूनी दांव पेंचों को
दे दो कसाब को अब तो फाँसी
शायद आ जाये 
उस बूढ़े के होठों पर भी हँसी
मरने से पहले मिल जाये उसे भी शांति
माँ की आँखों का सूख जाए शायद पानी
या फिर उसकी बेवा की सूनी माँग में 
सूने जीवन में , सूनी आँखों में 
आ जाए कुछ तो लाली 
मत बनाओ इसे सिर्फ
नमन करने की तारीख
अब तो कुछ शर्म कर लो 
अब तो कुछ शर्म कर लो……………..

यूँ ही नहीं कोई मौत के कुएं में सिर पर कफ़न बाँधे उतरता है

दोस्तों
 ओपन बुक्स ऑनलाइन द्वारा आयोजित प्रतियोगिता ” चित्र से काव्य तक” में मेरी इस कविता को द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ है जिसका लिंक निम्न है जहाँ तीनो विजेताओं की रचनायें लगी हैं ………http://openbooksonline.com/group/pop/forum/topic/show?id=5170231%3ATopic%3A169440&xg_source=मशग



यूँ ही नहीं कोई मौत के कुएं में सिर पर कफ़न बाँधे उतरता है


ये रोज पैंतरे बदलती ज़िन्दगी
कभी मौत के गले लगती ज़िन्दगी
हर पल करवट बदलती है
कभी साँझ की दस्तक
तो कभी सुबह की ओस सी
कभी जेठ की दोपहरी सी तपती
तो कभी सावन की फुहारों सी पड़ती
ना जाने कितने रंग दिखाती है
और हम रोज इसके हाथों में
कठपुतली बन 
एक नयी जंग के लिए तैयार होते 
संभावनाओं की खेती उपजाते
एक नए द्रव्य का परिमाण तय करते
उम्मीदों के बीजों को बोते 
ज़िन्दगी से लड़ने को 
और हर बाजी जीतने को कटिबद्ध होते
कोशिश करते हैं 
ज़िन्दगी को चुनौती देने की
ये जानते हुए कि 
अगला पल आएगा भी या नहीं
हम सभी मौत के कुएं में 
धीमे -धीमे रफ़्तार पकड़ते हुए 
कब दौड़ने लगते हैं 
एक अंधे सफ़र की ओर
पता भी नहीं चलता
मगर मौत कब जीती है
और ज़िन्दगी कब हारी है
ये जंग तो हर युग में जारी है
फिर चाहे मौत के कुएं में
कोई कितनी भी रफ़्तार से
मोटर साइकिल चला ले
खतरों से खेलना और मौत से जीतना
ज़िन्दगी को बखूबी आ ही जाता है
इंसान जीने का ढंग सीख ही जाता है
तब मौत भी उसकी जीत पर
मुस्काती है , हाथ मिलाती है
जीने के जज्बे को सलाम ठोकती है 
जब उसका भी स्वागत कोई
ज़िन्दगी से बढ़कर करता है
ना ज़िन्दगी से डरता है
ना मौत को रुसवा करता है 
हाँ , ये जज्बा तो सिर्फ 
किसी कर्मठ में ही बसता है 
तब मौत को भी अपने होने पर
फक्र होता है ……….
हाँ , आज किसी जांबाज़ से मिली 
जिसने ना केवल ज़िन्दगी को भरपूर जिया
बल्कि मौत का भी उसी जोशीले अंदाज़ से
स्वागत किया
समान तुला में दोनों को तोला 
 मगर
कभी ना गिला – शिकवा किया 
जानता है वो इस हकीकत को 
यूँ ही नहीं कोई मौत के कुएं में
सिर पर कफ़न बाँधे उतरता है
क्यूँकि तैराक ही सागर पार किया करते हैं 

जो ज़िन्दगी और मौत दोनो से

हँसकर गले मिलते हैं

काश मैं वसीयत कर पाती……….

काश मैं वसीयत कर पाती
कभी सोचा ही नहीं इस तरफ
आज सोचती हूँ तो लगता है
किस किस चीज की वसीयत करूँ
कौन सा सामान मेरा है
और बैठ गयी जमा घटा का हिसाब रखने
सबसे पहले तो बात की जाती है
धन दौलत की
और मैं सोच रही थी
कौन सी दौलत किसके नाम करूँ
रुपया पैसा तो मेरे पास नहीं
और ये कभी मैंने कमाया भी नहीं
और कमाती तो भी उसे क्या सहेजना
तो कौन सी दौलत किसके नाम करूँ
क्या अपने विचारों की दौलत
की भी कभी वसीयत की जाती है भला
और ये तो गली गली में पड़े मिलते हैं
वैसे भी जब आज इनका कोई मोल नहीं
तो इनकी वसीयत करने से क्या फायदा
कौन सहेजना चाहेगा
तो फिर कौन सी वस्तु है जिसकी
वसीयत की जा सकती है
आज ना कोई संस्कारों की खेती करता है
ना करना चाहता है
आउट डेटिड चीजों का कब मोल रहा है
तो क्या अपने लेखन की वसीयत करूँ
मगर क्यों और किसके नाम
ये भी तो हर जगह कचरे सा पड़ा दिखता है
इसका कहाँ कोई मोल लगाता है
फिर क्या है मेरे पास जिसकी वसीयत करूँ
मेरा दिल उसके भाव ही बचे
मगर उसे किसके नाम करूँ
बार बार हर तरफ देखा
उसे भी जो पास होकर दूर है और
उसे भी जो दूर होकर भी पास है
मगर फिर भी
बीच में एक गहरा आकाश है
वैसे भी आकाश को कब
किसने छुआ है
किसने उसको मापा है
जो आज मैं उस आकाश
पर एक सितारा अपने नाम का जडूँ
सारा हिसाब लगा लिया
हर गुना भाग कर लिया
जमा और घटा करके
सिर्फ सिफ़र ही हाथ लगा
और यही निष्कर्ष निकला
हर इन्सान की किस्मत
इतनी बुलंद नही होती 

कि वसीयत कर पाए
और फिर जहाँ सिर्फ
सिफ़र बचा हो वहाँ
शून्यों की वसीयतें नहीं की जातीं…………

मगर ओ पुरुष ! तू नहीं अब बच पायेगा

दोस्तों इस रचना का जन्म मायामृग जी की फेसबुक  पर लिखी चंद पंक्तियों के कारण हुआ जो इस प्रकार थीं ………..
……..
उसने कहा, स्‍त्री ! तुम्‍हारी आंखों में मदिरा है…तुम मुस्‍कुरा दीं। 

उसने कहा, स्‍त्री ! तुम्‍हारे चलने में नागिन का बोध होता है…तुम्‍हें नाज़ 


हुआ खुद पर….। 

अब वह कहता है तुम एक नशीली आदत और ज़हरीली नागिन के सिवा 

कुछ नहीं….। 

(ओह..इसका यह भी तो अर्थ होता है)

…..तुम्‍हें पहले सोचना था स्‍त्री…उसकी तारीफ पर सहमति देने से 

पहले….


ये थे उनके शब्द और अब ये हैं मेरे उदगार …………







क्या हुआ जो गर दे दी सहमति
क्या हुआ जो गर दे दिया उसके पौरुष को सम्बल
जानती हूँ …………उसके जुल्म की इंतेहा 
और अपने दीर्घ फ़ैले व्यास
कहाँ जायेगा और कब तक भोग पायेगा
कब तक मोहपाश से बच पायेगा
जहाज का पंछी है 
लौट्कर वापिस जरूर आयेगा
तब ना उसका दंभ ठहर पायेगा
ना उसका पौरुष कहीं आयाम पायेगा
तब ना नागिन कह पायेगा 
ना मदिरापान कर पायेगा
उस दिन उसे नारीशक्ति की अहमियत का
स्वयं पता चल जायेगा
तब वो ना हँस पायेगा
ना रो पायेगा
गर है आदत नशीली तो क्या हुआ
गर है नागिन ज़हरीली तो क्या हुआ
बचकर ओ पुरुष ! तू किधर जाएगा
जो भी तूने बनाया ……..बन गयी
अब बता खुद से नज़र कैसे चुराएगा
क्या नारी जैसा धैर्य और साहस 
फिर कहीं पायेगा
जो खुद से खुद को छलवाती है 
तेरे हर छल को जानते हुए 
तेरी झूठी तारीफों के पुलों की
तेरे हर सब्जबाग की 
नस – नस पहचानती है 
ये सब जानते हुए भी 
जो खुद बन जाये तेरी चाहतों की तस्वीर
और फिर इतना करने पर भी 
 ना तू कहीं चैन पाए
उसका मुस्कुराता खिलखिलाता चेहरा देख
तेरा पौरुष आहत हो जाए
आखिर कब तक बेड़ियाँ पहनायेगा
देखना एक दिन इस मकडजाल में
तू खुद ही फँस जाएगा
अपने चक्रव्यूह में तू खुद को ही घिरा पायेगा 
मगर ओ पुरुष ! तू नहीं अब बच पायेगा 

हर अमावस दिवाली का संकेत नहीं होती ……….

हैलो ….हाउ आर यू

जब कोई पूछता है
दिल पर एक घूँसा सा लगता है
ना जाने कितनी उधेड्बुनो
और परेशानियों से घिरे हम 
हँस कर जवाब देते हैं 
फाईन ………
क्या सच में फाइन होते हैं 
सामने वाला तो जान ही नहीं पाता
फाइन कहते वक्त भी
एक अजीब सी मनः स्थिति से
गुजरते हम 
पता नहीं उसे या खुद को 
भ्रम दिए जाते हैं 
हम सपनो की दुनिया में जीने वाले
कब हकीकत से नज़र चुराने लगते हैं
कब खुद को भ्रमजाल में उलझाने लगते हैं
कब खुद से भागने लगते हैं 
पता ही नहीं चलता
या शायद पता होता भी है
पर खुद को भरमाने के लिए भी तो
एक बहाना जरूरी होता है ना
अब क्या जरूरी है ……..अपने साथ
दूसरे को भी दुखी किया जाए
या अपने गम हर किसी के साथ बांटे जायें
क्यूँकि ……….पता है ना
ये ऐसी चीज नहीं जो बाँटने से बढ़ जाये 
फिर क्या रहा औचित्य 
फाइन कहने का
क्या कह देने भर से 
सब फाइन हो जाता है क्या?
हर अमावस दिवाली का संकेत नहीं होती ……….

टैग का बादल