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Archive for जनवरी, 2013

बेचैन हूँ ………जाने क्यों ?

कोई भी आकलन करने की
खुद को कटहरे में खडा करने की
या दूसरे पर दोषारोपण करने की
किसी भी स्थिति से मुक्त करने की
कोई जद्दोजहद नहीं कर सकती

विश्राम की भी अवस्था नहीं ये
तटबंधों पर खामोश खडा तूफ़ान भी नहीं ये
बेवजह जिरह करने की तबियत भी नहीं ये
सुलगता दावानल भी नही ये

फिर क्या है जो बेचैन किये है
वक्त , हालात या परिस्थितियाँ
या मुक्तिबोध से पूर्व की अवस्था

सिमटने को मुट्ठी ना फ़ैलने को आकाश चाहिये
मुझे बस मेरा एक अदद साथ चाहिये
क्योंकि
बेचैन हूँ …………जाने क्यों ?

बेवजह की बेचैनी का कोई तो सबब होगा यारों ………

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सुनो………।

सुनो
तुम ज़लालत की ज़िन्दगी जीने
और मरने के लिये ही पैदा होती हो
सुनो
तुम जागीर हो हमारी
कैसे तुम्हारे भले का हम सोच सकते हैं
सुनो
तुम इंसान नहीं हो जान लो
कैसे तुम्हें न्याय दे
खुद अपने पाँव पर कुल्हाडी मार सकते हैं
सुनो
तुम बलात्कृत हो या मरो
कानून तुम्हारे लिये नहीं बदलेगा
सुनो
तुम्हारी कुर्बानी को सारा जहान क्योँ ना माने
मगर कानून तो अपनी डगर ही चलेगा
सुनो
शहादत तो सीमा पर होती है
और तुम शहीद नहीं
इसलिये नाबालिग के तमगे तले
बलात्कारी पोषित होता रहेगा
सुनो
तुम , तुम्हारे शुभचिन्तक, ये बबाली
चाहे जितना शोर मचा लो, नारे लगा लो
आन्दोलन कर लो
व्यवस्थायें , शासन और देश
तुम्हारे हिसाब से नहीं चलेगा
सुनो
तुम्हारे जैसी रोज मरा करती हैं
और तुम जैसी के मरने से
या बलात्कृत होने से
देश और व्यवस्थायें , समाज और कानून
परिवर्तित नहीं हुआ करते
संविधान में यूँ ही संशोधन नहीं हुआ करते
जब तक कि कोई कानून बनाने वाले
या देश पर शासन करने वालों के
घर की अस्मिता ही ना बलात्कृत हो
इसलिये
सुनो
सो जाओ एक बार फिर कु्म्भकर्णी नींद में
क्योंकि
नाबालिगता और दो साल की कैद
काफ़ी है तुम्हारे ज़ख्म भरने के लिये
इसलिये जान लो
विशेष परिस्थिति का आकलन और समयानुसार निर्णय लेना हमारे देश का चलन नहीं ………………

प्रसिद्धि का शार्टकट

हर बार विश्व पुस्तक मेले के आयोजन का होना जैसे एक घटना को घटित कर देता है मुझमें और मैं हो जाता हूँ सतर्क हर तरफ़ चौकन्नी निगाह …………कौन , कहाँ और कैसे छप रहा है , किसने क्या जुगाड किया, किसने पैसे देकर खुद को छपवाया, किसने सच में नाम कमाया और किसने अनुचित हथकंडे अपनाये और पा ली प्रसिद्धि, किसने वर्जित विषय लिखे और पहुँच गये मशहूरियत के मुकाम पर …………देख देख मुझमें खून का उबाल चरम सीमा पर पहुँचने लगता है और मैं डूब जाता हूँ विश्लेषण के गणित में………

लिखना वो भी निरन्तर उस पर उसकी साधना करना, अराधना करना मुझ जैसे निष्क्रिय के बस की बात तो नहीं जब सुबह एक बार तस्वीर के आगे नतमस्तक नहीं होता तो यहाँ इसकी अराधना कैसे की जाये और कौन इन पचडों मे पडे । ये तो गये ज़माने की बातें हैं और आज का वक्त तो वैसे भी इंटरनैट का वक्त है ………जहाँ जैसे ही कोई विचार उतरे चाहे उसमें तुक हो या नहीं सीधा चिपका दो दीवार पर और हो जाओ शुरु अपने मन की भडास निकालना …………अब इसमें कोई मोल थोडे लगता है सो हम भी इसी तरह कर लेते हैं एक दिन में ना जाने कितनी बार अराधना शब्दों की और खुद को साबित कर देते हैं महान लिक्खाड्……आज के वक्त में जो जितना ज्यादा बात करे, चाहे तीखी या मीठी वो ही प्रसिद्धि के सोपान चढता है और वहीँ सबसे ज्यादा चटखारे लेने वालों की भीड नज़र आती है ………बस इस बात को गिरह में बाँध हमने भी जोर -शोर से धावा बोल दिया और लगे बतियाने, ताज़ा -ताज़ा माल परोसने, कभी घर की तो कभी बाहर की बात , तो कभी देश और समाज पर अपने ज्ञान का परचम फ़हराते हम किसी के भी लेखन के बखिये उधेडने में बहुत ही जल्द परिपक्व हो गये …………आहा! क्या दुनिया है ……जब चाहे जिस पर चाहे अपनी भडास निकालो और अपनी पहचान बना लो क्योंकि सीधे रास्ते पर चलकर कितने मुकाम पाते हैं …………उन जैसों को तो कोई पूछता भी नहीं और यदि गलती से कोई पूछ भी ले तो सारे परिदृश्य पर असर पडता हो ऐसा भी नज़र नहीं आता तो सुगम , सरल , सहज रास्ता क्यों ना अपनाया जाये और प्रसिद्धि के मुकाम पर खुद को क्यों ना पहुँचाया जाये और उसका सबसे आसान रास्ता एक ही है …………आप चाहे कवि हों या कथाकार या लेखक आपको आलोचना करना आना चाहिये ………कोई चाँद को चाँद कहे तो भी आपमें उसके नज़रिये को बदलने का दमखम होना चाहिये………जहाँ से उसे चाँद में भी दाग साफ़ – साफ़ नज़र आ जाये और वो आपके लेखन का, आपकी आलोचना का कायल हो जाये और सफ़लता की सीढी का ये पहला कदम है बस इतना काफ़ी है और ये हमने बखूबी सीख लिया और चल पडे मंज़िल की ओर …………

अपनी धुन में हमने भी लिख मारी काफ़ी कवितायें, तुकबंदियाँ और आलेख …………आहा ! एक एक शब्द पर वाह- वाही के शब्दों ने तो जैसे हमारे मन की मुरादों में इज़ाफ़ा कर दिया । बडे – बडे कवियों , लेखकों से तुलना उत्साह का संचार करने लगी ……चाहे पुराने हों या समकालीन ………अब तो हमारा आकाश बहुत विस्तृत हो गया जहाँ हमें हमारे सिवा ना कोई दूसरा दिखता था ………समतुल्य तो दूर की बात थी …………अब जाकर सोचा हमने भी चलो अब छपना चाहिये क्योंकि अभी तक तो एक पहला पडाव ही तो पार किया था …………इंटरनैट महाराज की कृपा से ।

और करने लगे हम भी जुगाड किसी तरह छपने का और पुस्तक मेले में विमोचित होने का …………आहा ! कितना गौरान्वित करता वो क्षण होता होगा जब अपार जनसमूह के बीच खुद को खडे देखा जाये, सम्मानित होते देखा जाये …………बस इस आशा की किरण ने हमें प्रोत्साहित किया और हम चल पडे ………यूँ तो इंटरनैट महाराज की कृपा से काफ़ी प्रकाशन जानने लगे थे और छापते भी थे मगर अकेले अपना संग्रह छपवाना किसी उपलब्धि से कम थोडे था सो नामी- गिरामी प्रकाशनों से बात करके सबसे बडे प्रकाशन के द्वारा खुद को छपवाने का निर्णय किया और साथ ही प्रचार- प्रसार में भी कोई कमी नहीं होने देने का वचन लिया । दूसरी सबसे बडी बात इंटरनैट महाराज की कृपा से इतने लोग जानने लगे थे कि पुस्तक का हाथों – हाथ बिकना लाज़िमी था क्योंकि सभी आग्रह करते थे कि आपका अपना संग्रह कब निकलेगा ? कब आप उसे हमें पढवायेंगे …सो उन्हें भी आश्वस्त किया और कम से कम हजार प्रतियाँ छपवाने का निर्णय लिया जिसमें से पाँच सौ प्रतियाँ अपने लिये सुरक्षित रखीं क्योंकि चाहने वालों की लिस्ट भी तो कम नहीं थी साथ ही समीक्षा के लिये भी तो कहीं सम्मान के लिये एक – एक जगह दस – दस प्रतियाँ भी भेजनी पडती हैं तो उसके लिये भी जरूरी था और लगा दी अपनी ज़िन्दगी की जमापूँजी पूरे विश्वास के साथ अपनी चिर अभिलाषा के पूर्ण होने के लिये……………

अपने आने वाले संग्रह का प्रचार – प्रसार हमने खुद ही इंटरनैट पर करना शुरु कर दिया ताकि आम जन – जन में , देश क्या विदेशों में भी सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारे संग्रह का ही डंका बजे और सब तरफ़ से बधाइयोँ का ताँता लग गया ………शुभकामना संदेशों की बाढ आ गयी …………और हमारा मन मयूर बिन बादलों के भी नृत्य करने लगा ………एक पैर धरती पर तो दूसरा आकाश में विचरण करने लगा …………संग्रह के आने से पहले ही उसकी प्रसिद्धि ने हमारे हौसलों मे परवाज़ भर दी और हम स्वप्नलोक में विचरण करने लगे …………पुस्तक के छपने से पहले ही उसकी समीक्षायें छपवा दीं अपने जानकारों द्वारा ………यानि हर प्रचलित हथकंडा अपनाया ताकि कोई कमी ना रहे …………

और फिर आ गया वो शुभ दिन जिस दिन हमारे संग्रह का लोकार्पण होने वाला था …………बेहद उत्साहित हमारा ह्रदय तो जैसे कंठ में आकर रुक गया था , पाँव जमीन पर चलने से इंकार करने लगे थे मगर जैसे तैसे खुद को संयत किया आखिर ये मुकाम यूँ ही थोडे पाया था काफ़ी मेहनत की थी …………खुद को समझाया और चल दिये लोकार्पण हाल की तरफ़ …………खचाखच भीड से भरा हाल , कैमरे, विभिन्न मैगज़ीनों अखबारों के  पत्रकार आदि , नामी गिरामी हस्तियाँ और उनके बीच खुद को बैठा देखना किसी स्वप्न के साकार होने से कम नहीं था …………और फिर वो क्षण आया जब हमारी पुस्तक का लोकार्पण हुआ और मुख्य अतिथि ने अपना वक्तव्य दिया …………बस वो क्षण जैसे हमारे लिये वहीं ठहर गया जैसे ही मुख्य अतिथि ने कहा यूँ तो इतने संग्रहों का विमोचन किया और पढे भी और उन पर अपना वक्तव्य भी दिया मगर ऐसा संग्रह हाथ से आज तक नहीं गुजरा …………ये सुनते ही हमारे अरमान थर्मामीटर मे पारे की तरह चढने लगे …………आगे उन्होने कहा …………आज़ इंटरनैट बाबा की कृपा से रोज नये – नये लिक्खाड खुद को साबित करने में जुटे हैं । यहाँ तक कि जैसा लिखने वाले हैं वैसे ही वाह वाही करने वाले हैं वहाँ जो हर लेखक को महान कवि साबित करने मे जुटे हैं । इस इंटरनैट क्रांति ने आज रचनाओं का परिदृश्य ही बदल दिया है , कोई भी ना तो मनोयोग से लिखता है और ना ही मनोयोग से कोई उसे पढता है , सब जल्दी में होते हैं कि इसे पढ लिया अब दूसरे को भी आभास करा दें हम तुम्हें पढते हैं ताकि वो भी आप तक पहुँचता रहे और आपका खुद को तसल्ली देने का कारोबार चलता रहे । जब ऐसा वातावरण होगा जहाँ रचनायें सिर्फ़ वक्ती जामा पहने चल रही हों तो कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वहाँ से कोई महान कवि या लेखक का जन्म होगा सिर्फ़ कुछ एक आध को छोडकर । कोई कोई ही पूरी लगन , मेहनत और निष्ठा से अपने कार्य को अंजाम देता है और प्रसिद्ध भी होता है …………उनका इतना कहना था और हमारा दिल तो बल्लियों उछलने लगा और लगा आज हमारे कार्य का सही मूल्यांकन हुआ है , अब हमें प्रसिद्ध होने से और किताब के बिकने से कोई नहीं रोक सकता क्योंकि जाने माने कवि , आलोचक जब हमारे बारे में ऐसा कहेंगे तो ये सर्वविदित है कि हर कोई उस संग्रह को अपनी शैल्फ़ में सहेजना चाहेगा ………हम अपने ख्यालों के भंवर में अभी डूब -उतर ही रहे थे कि उनकी अगली पंक्ति तो जैसे हम पर , हमारे ख्यालों पर ओलावृष्टि करती प्रतीत हुयी जैसे उन्होंने कहा कि बचकानी तुकबंदियाँ , बेतुकी कवितायें , बे -सिर पैर की रचनाओं से लबरेज़ ये संग्रह सहेजने तो क्या पढने के योग्य भी नहीं है …………हमारे तो पैरों तले जमीन ही खिसक गयी …………कहीं गलत तो नहीं सुन लिया , कहीं हम सपना तो नहीं देख रहे ये देखने को खुद को ही चिकोटी काटी तो अहसास हुआ नहीं हम ही हैं ये ……हमारी तो आशाओं और सपनों की लाश का ऐसा वीभत्स पोस्टमार्टम होगा हमने तो सपने में भी नहीं सोचा था ………तो क्या जो दाद हमें इंटरनैट महाराज की कृपा से मिला करती थी वो सब झूठी थी, जो दोस्त बन सराहते थे वो सब झूठे थे ……… सोचते – सोचते हम कब तक जमीन पर बैठे रहे पता ही नहीं चला ………वो तो भला हो वहाँ के सिक्योरिटी आफ़ीसर का जो उसने हमें हिला कर वस्तुस्थिति से अवगत कराया तो देखा पूरा हाल खाली था और हम अपने 1000 किताबों के संग्रह के साथ अकेले अपने हाल पर हँस रहे थे …………कल तक दूसरों की आलोचना करने वाला , प्रसिद्धि के लिये अनुचित हथकंडे अपनाने वाला आज जमीन पर भी पाँव रखने से डर रहा था , आज उसे अपनी वास्तविक स्थिति का बोध हुआ था और जो उसने दूसरों पर कीचड उछाली थी उसे खुद पर महसूस किया था ………………और सोच रहा था ………प्रसिद्धि का शार्टकट वाकई में शार्ट होता है ……………

"रास्ता है तो पहुँचेगा अपने अन्तिम छोर तक भी "

रास्ता है तो पहुँचेगा अपने अन्तिम छोर तक भी फिर चाहे राह मे कितने गहन अन्धेरे ही क्यों ना हों 
कितने ही बीहड कंटीले बियाबान हों 
फिर चाहे पगडंडी पर ही क्यों ना चलना पडे

मगर यदि रास्ता है तो जरूर पहुँचेगा अपने अन्तिम छोर तक 

फिर चाहे राह मे मोह मत्सर के नाले हों 

या अहंकार के प्याले हों
या फिर क्रोधाग्नि से दग्ध ज्वाले हों

फिर चाहे पगडंडी पर ही क्यों ना चलना पडे 
यदि रास्ता है तो जरूर पहुँचेगा अपने अन्तिम छोर तक

फिर चाहे वेदना नृत्य करती हो
या रूह कितना ही सिसकती हो
चाहे भटकन कितनी हो
पर अन्तिम सत्य तक पहुँचना होगा

पगडंडी पर भी चलना होगा 
क्योंकि
सीधी सपाट राहें जरूरी नहीं मंज़िल का पता दे ही दें
क्योंकि फ़िसलन भी वहीं ज्यादा होती है 
इसलिये

गर हो हिम्मत तो पगडंडियों के दुर्गम 
अभेद , जटिलताओं से भरे किनारों पर 
पाँव रख कर देखना 
गर चल सको तो चल कर देखना 
फिर जटिलताओं की आँच पर तपकर 
कुन्दन जब बन जाओगे
तो मंज़िल भी पा जाओगे

रास्तों के सफ़र मे पगडंडियों की अनदेखी
करने वालों को मंज़िल नहीं मिला करती

हाँ, रास्ता है तो तय करना ही होगा
खुद से अन्तिम छोर पर मिलना ही होगा
वो ही जीवन का वास्तविक उत्सव होगा

योगक्षेम वहाम्यहम तुमने ही तो कहा ना ………

जब आत्मज्ञान मिल जाये

उसमे और खुद में ना
कोई भेद नज़र आये 
बस तब साक्षी भाव से 
दृष्टा बन जाओ 
और देखो उसकी लीला 
हाथ पकडता है या छोडता 
पार उतारता है या डुबोता 
कर दिया अब सर्वस्व समर्पण 
फिर कैसा डर ……… 
योगक्षेम वहाम्यहम तुमने ही तो कहा ना ………
तो अब तुम जानो और तुम्हारा काम 
ना मेरी जीत इसमे ना हार
जो है प्रभु तुम्हारा ही तो है
जीव हूँ तो क्या 
घाटे का सौदा कैसे कर सकता हूँ 
आखिर तुम्हारा ही तो अंश हूँ 


अब देखें क्या होता है 

वो कौन सी नयी लीला रचता है


घट – घट वासी 

कब घट को समाहित करता है 

जहाँ ना घट हो ना तट हो
 
बस एक आनन्द का स्वर हो



बस उसी का इंतज़ार है 


जहाँ दूरियाँ मिट जायें 

इक दूजे मे समा जायें 
भेद दृष्टि समता मे बदल जाये 
वो वो ना रहे 
मै मै ना रहूँ 
कोई आकार ना हो 
बस एक ब्रह्माकार हो 
आनन्दनाद हो
सब अन्तस का विलास हो

जब शब्द निशब्द जो जाये 


अखंड समाधि लग जाये 


आनन्द ही आनन्द समा जाये 

ज्योति ज्योतिपुंज मे समा जाये 

बस वो तेजोमय रूप बन जाये 

ये धारा ऐसी मुड जाये 

जो खुद राधा बन जाये 

तो कैसे न कृष्ण मिल जाये 

वो भी उतना खोजता है 

जितना जीव भटकता है 

वो भी उतना तरसता है 

ब्रह्म भी जीव मिलन को तडपता है

जब आह चरम को छू जाये 

वो भी मिलन को व्याकुल हो जाये 

तो कैसे धीरज धर पाये 

खुद दौडा दौडा चला आये

यूँ  मिलन को पूर्णत्व मिल जाये ………




देखें क्या होता है ? कब वो भी मिलन को तरसता है कब हमारे भाव उसे

 विचलित करते हैं………बस उस क्षण का इंतज़ार है।

मैं लगा देती हूँ निर्वस्त्रता के सम्पुट जब भी

मैं लगा देती हूँ
निर्वस्त्रता के सम्पुट जब भी
नकाबों की होली जल जाती है
रामायण के सुर बदल जाते हैं
राम नाम धारियों की पेशानी पर
पौरुष के चिन्ह उभर जाते हैं
जो जब भी निर्वस्त्र हुए
तो आग की लपटों में घिरे
खौलता कोलतार ही बने
जो चलने वालों की चप्पल जूतों में चिपक तो जाते हैं
मगर खीज भी उत्पन्न कर देते हैं
मगर चलना मजबूरी होती है
इसलिए कुछ देर झेल लेते हैं
मगर जैसे ही राह की धूल से वास्ता पड़ता है
वो चिपका कोलतार अपना रंग खो देता है
और ध्यान भी वहाँ से हट जाता है
बस यही तो है तुम्हारा अस्तित्व
एक कोलतार से ज्यादा कुछ नहीं
बेशक सड़क बिछ जाती है
मगर फिर कहाँ कोलतार चिपकता है
शायद तभी ध्यान हट जाता है
ऐसे वजूदों से
और चल पड़ता है राही
फिर भी ना जाने क्यों
राम के नाम पर
तो कभी मजहब के नाम पर
तो कभी जूनून के नाम पर
तुम हमेशा सुलगते ही रहते हो
एक अंधे कुएं में
जिसका जिस्म तो होता ही नहीं
सिर्फ रक्त ,मांस , मज्जा का
सुलगता कोई शमशान ही प्रतीत होता है
जो जब भी निर्वस्त्र होता है
तो सतही आवरण ही नहीं 

भीतरी ऊष्मा भी वस्त्रहीन हो जाती है
जो अकेली सिसकती दिखती है 

किसी कोयले की खदान में खदकते कोयले सी
यूँ ही नहीं ज्वालामुखी बना करते
यूँ ही नहीं विस्फोट हुआ करते
यूँ ही नहीं आत्माएं मरा करतीं
जीवित होती है तो सिर्फ शमशान की कालिमा
शायद तभी
मैं लगा देती हूँ
निर्वस्त्रता के सम्पुट जब भी
नकाबों की होली जल जाती है

जवाब दो मनुज ………जवाब दो?

गुफ़्तगू के मार्च अंक (2013)में प्रकाशित मेरी ये कविता ………कुछ लोगों ने सूचित किया मैसेज द्वारा तो पता चला क्योंकि पत्रिका तो मिली नहीं और सुना है वो पत्रिका भी सिर्फ़ सदस्यों को भेजते हैं और हम सदस्य नहीं हैं ………वैसे और जगह भी छप रहे हैं मगर सब जगह से पत्रिका आदि आते रहते हैं ये ही एक जगह है जहाँ से डब्बा गोल है 🙂 ………

इक तरफ़ कटा सिर उसका
जो बना देश का प्रहरी
कहीं ना कोई मचा हल्ला
क्योंकि कर्तव्य है ये उसका
कह पल्ला झाडा जाता हो जहाँ

इक तरफ़ बहन बेटी की आबरू
सरेआम लुट जाती हो
और कातिल अस्मत का
नाबालिगता के करार में
बचने की फ़ेहरिस्त मे जुड जाता हो जहाँ

सफ़ेदपोश चेहरों पर शिकन
ना आती हो चाहे कितना ही
मुश्किल वक्त आ पडा हो
घोटालों के घोटालों  मे जिनके चेहरे
साफ़ नज़र आते हों जहाँ 



न्याय के नाम पर

खिलवाड किया जाता हो जहाँ 
कानून के ही मंदिर में
कानून का अपमान किया जाता हो जहाँ
फिर चाहे संविधान की कोई
कितनी धज्जियाँ उडाये
कैसे कोई संवैधानिक पर्व मनाये वहाँ

वहाँ कैसे कोई आस्था का पर्व मनाये
क्यों ना शर्म से डूब मर जाये
क्यों नहीं एक शमशीर उठाये
और झोंक दे हर उस आँख में
जहाँ देखे दरिन्दगी के निशाँ
जहाँ देखे वतन की पीठ पर
दुश्मन का खंजरी वार
जहाँ देखे घर के अन्दर बसे
शैतानों के व्यभिचार

कहो तो जब तक ना हो
सभी दानवों का सफ़ाया
जब तक ना हो विषपान
करने को शिव का अवतार
बिना मंथन के
कैसे अमृत कलश निकलेगा
और कैसे घट से अमृत छलकेगा
तब तक कैसे कोई करेगा
आस्था की वेदी पर कुंभ स्नान ?

कुम्भ स्नान के लिये
देनी होगी आहुति यज्ञ में
निर्भिकता की, सत्यता की, हौसलों की
ताकि फिर ना दानव राज हो
सत्य, दया और हौसलों की परवाज़ हो
और हो जाये शक्ति का आहवान
और जब तक ना ऐसा कर पाओगे
कैसे खुद से नज़र मिलाओगे
तब तक कैसे ढकोसले की चादर लपेटे
करोगे तुम कुम्भ स्नान…………?
क्योंकि
स्नान का महत्त्व तब तक कुछ नहीं
जब तक ना मन को पवित्र किया
तन की पवित्रता का तब तक ना कोई महत्त्व
जब तक ना मन पवित्र हुआ
जब तक ना हर शख्स के मन में
तुमने आदर ,सच्चाई और हौसलों का
दीप ना जला दिया
दुश्मन का ह्रदय भी ना साफ़ किया
तब तक हर स्नान बेमानी ही हुआ
इसलिये
जब तक ना ऐसा कर सको
कैसे कर सकोगे कुम्भ स्नान
जवाब दो मनुज ………जवाब दो?

टैग का बादल