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Archive for सितम्बर, 2011

खुशखबरी आपके लिये……दिवाली की सौगात

दोस्तों

आज आप सबके लिए एक खुशखबरी लेकर आई हूँ………अब से हर महीने आपके बेशकीमती ब्लोगों पर आपके विचारों को प्रवासी भारतीयों की मैगजीन गर्भनाल पत्रिका में उतारने का मौका मुझे मिला है जिसका पहला अंक प्रकाशित हो गया है. आपके ब्लोग्स की चर्चा करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है . अपने निजी कारणों से चर्चा मंच पर चर्चा करना छोड़ा तो यहाँ पकड़ ली गयी और आदरणीय आत्माराम जी ने मुझे महीने में एक बार ब्लोग्स की चर्चा के लिए आमंत्रित किया तो न नहीं कह सकी और इतना वक्त तो निकाल ही सकती हूँ कि महीने में एक बार तो आप सबसे जुडी रहूँ और आप सबके ब्लोग्स को न केवल ब्लॉगजगत तक ही बल्कि देश- विदेश तक पहुँचाने में अपना योगदान दे सकूं जिससे और भी ज्यादा से ज्यादा लोग ब्लोगिंग की तरफ आकर्षित हो सकें और हमारी ब्लोगिंग नए- नए आयामों को छूती रहे. 

लगता है चर्चा से एक अटूट नाता जुड़ गया है जिसे अगर छोड़ना भी चाहूँ तो नहीं छोड़ सकती .

इस बार के अक्टूबर माह  की गर्भनाल पत्रिका में आप सबके ब्लोग्स का जिक्र हुआ है और जिनके रह गए हैं उनके आगामी माह में आते रहेंगे इसलिए निराश होने की जरूरत नहीं है. बस सिर्फ इतना करना है जो लिंक दे रही हूँ या तो उस पर क्लिक करके पेज १७ पर पढ़ लीजिये या फिर चाहें तो आप ये पत्रिका भी मँगा सकते हैं उसका पता भी दे रही हूँ. 

https://mail-attachment.googleusercontent.com/attachment?ui=2&ik=83ac09a125&view=att&th=132b8e47252d686f&attid=0.1&disp=inline&realattid=2959bf5d634d8e0e_0.1&safe=1&zw&saduie=AG9B_P-sqdOOtE1oq5h2pgM3cTYR&sadet=1317374484640&sads=6_z4-bB054OIVBr2oWNUSYdo3I4&sadssc=१

अगर ये लिंक न खुले तो इसे कॉपी करके अलग से एड्रेस बार में पेस्ट करके खोल लीजियेगा आराम से खुल जायेगा. या फिर कमेन्ट पर जब आप क्लिक करके खोलेंगे तो वहां से मूल पोस्ट को क्लिक करिये और वहाँ से आप लिंक कापी कर लीजिये और अलग से एड्रेस बार में पेस्ट करके खोल लीजिये ।

कुछ दोस्त शिकायत कर रहे हैं कि ये लिंक नहीं खुल रहा तो आप इसे http://garbhanal.com/ से डाउनलोड करके पढ़ सकते हैं.

ये सबसे आसान लिंक है जो आसानी से खुल जायेगा मुझे दीपक मशाल जी ने उपलब्ध करवाया है.



http://www.garbhanal.com/Garbhanal%2059.pdf


पता ये है : 
DXE23,MEENAL RESIDENCY
J . K. ROAD
BHOPAL——462023
MADHYA PRADESH
BHARAT

MOBILE: 8989015017
EMAIL: garbhnal@ymail.com

उम्मीद है आप सबका सहयोग मुझे और पत्रिका को मिलता रहेगा .

कुछ तो था उसमे

कुछ तो था उसमे
शायद उसकी आदत
बच्चियों सी जिद पकड़ने की
और फिर खिलौना देख
बच्चे जैसे खुश होने की
या शायद उसकी बातें
जिसमे मैं तो कहीं नहीं होता था
मगर सारा ज़माना अपने संग लिए घूमती थी
हर बात पर खिलखिलाना
हर बात की खाल खींच लाना
हर बात पर एक जुमला कस देना
या शायद उसकी वो दिलकश मुस्कान
जिसमे बच्चों की मासूमियत छुपी थी
जैसे किसी फूल पर शबनम रुकी हो
और इंतज़ार में हो कब हवा का झोंका आये
उसके वजूद को हिलाए
और वो नीचे टपक जाए
ना जाने क्या था उसमे
मगर कुछ तो था
शायद ख्वाब को पकड़ने की उसकी आदत
वो मेरी आँखों में चाँद देखने की उसकी जिद
और फिर उस चाँद को
किताब में सहेजने का उसका जूनून
या शायद एक चंचल हवा का
रुके हुए पानी में 

हलचल पैदा कर जाने जैसा 
उसका वजूद
कभी लगती

किसी मदमस्त इठलाती 
पवन की मीठी बयार सी
तो कभी लगती जैसे
जेठ की तपिश में जलती रूह पर
किसी ने बर्फ का फाया रखा हो
या शायद सागर में तैरती वो कश्ती
जिसमे मुसाफिर को मंजिल की चाह ना हो
बस सफ़र चलता रहे यूँ ही
अनवरत …………अनंत की तरफ
बस उसका साथ हो
कुछ तो था उसमे
तभी आज तक
उसकी सरगोशियाँ हवाओं में सरसरा रही हैं
कानों में गुनगुना रही हैं
रूह पर थाप दे रही हैं
एक संगीत जैसे कोई बज रहा हो
और वो कोई गीत गुनगुना रही हो

तभी उसमे कुछ होता है
जिसे भूल पाना नामुमकिन होता है 

कुछ आहटें बिन बुलाये भी दस्तक देती हैं …………..

तेरे बिना जिया लागे ना


सुनो 
देखो ना
इक युग बीता
मगर देखो तो
मेरी आस का टोकरा
कभी रीता ही नही
सबने मुझे बावरी बना दिया
तेरे विरह में ये नाम दे दिया
मगर तुम बिन मेरा ना
कोई पल रहा अछूता
फिर भला कैसे कहूं 
तेरे बिना जिया लागे ना
तुम तो सदा
मेरी आँख की ओट में

करवट लेते रहे
कभी नींद में तो कभी ख्वाब में
मिलते जुलते रहे
सुना है
दुनिया कहती है
तुम यहाँ कहीं नहीं हो अब
अब नहीं आओगे वापस
जाने वाले फिर नहीं आते
मगर ये तो बताओ
तुम गए कहाँ से हो
क्या मेरी यादों से
क्या मेरे नयनों से
क्या मेरे दिल से
हर पल तो तुम्हें
निहारा करती हूँ
हर पल तुम्हारा वजूद
मेरे ख्वाबों से
अठखेलियाँ करता है
कभी रूठा करते हो
कभी मनाया करते हो
कभी मेरी माँग
अपनी प्रीत से सजाया करते हो
कभी चाँदनी रात में
मेरी वेणी में फूल लगाया करते हो
कभी किसी झील के किनारे
ठहरे हुए पानी में
चाँद की सैर पर ले जाया करते हो
कभी तारावली के फूलों से
धरती सजाया करते हो
और मुझे वहाँ किसी
ख्वाब सा सजाया करते हो
तो बताओ ना
कौन है दीवाना
ये दुनिया या मैं
बताओ तो
जब हर पल
हर सांस में
हर धड़कन में
मेरी रूह में
तुम ही तुम समाये हो
फिर कैसे कह दूं
तेरे बिना जिया लागे ना

क्यों आज भी नारी को एक सुरक्षित जमीन की तलाश है?


क्यों है आज भी नारी को एक सुरक्षित जमीन की तलाश ? एक शाश्वत प्रश्न मुँह बाए खड़ा है आज हमारे सामने …………आखिर कब तक ऐसा होगा ? क्या नारी सच में कमजोर है या कमजोर बना दी गयी है जब तक इन प्रश्नों का हल नहीं मिलेगा तब तक नारी अपने लिए जमीन तलाशती ही रहेगी.माना सदियों से नारी को कभी पिता तो कभी भाई तो कभी पति तो कभी बेटे के आश्रित बनाया गया है . कभी स्वावलंबन की जमीन पर पाँव रखने ही नहीं दिए तो क्यूँ नहीं तलाशेगी अपने लिए सुरक्षित जमीन ?


पहले इसके कारण ढूँढने होंगे . क्या हमने ही तो नहीं उनके पाँव में दासता की जंजीर नहीं डाली? क्यूँ उसे हमेशा ये अहसास कराया जाता रहा कि वो पुरुष से कम है या कमजोर है जबकि कमजोरी हमारी थी हमने उसकी शक्ति को जाना ही नही . जो नारी आज एक देश चला सकती है , बड़े- बड़े ओहदों पर बड़े- बड़े डिसीजन ले सकती है , किसी भी कंपनी की सी इ ओ बन सकती है , जॉब के साथ- साथ घर- बार बच्चों की देखभाल सही ढंग से कर सकती है तो कैसे कह सकते हैं कि नारी किसी भी मायने में पुरुष से कम है लेकिन हमारी पीढ़ियों ने कभी उसे इस दासता से आज़ाद होने ही नहीं दिया . माना शारीरिक रूप से थोड़ी कमजोर हो मगर तब भी उसके बुलंद हौसले आज उसे अन्तरिक्ष तक ले गए फिर चाहे विमान उड़ाना हो या अन्तरिक्ष में जाना हो ……….जब ये सब का कर सकती है तो कैसे कह सकते है कि वो अक्षम है . किसी से कम है . फिर क्यूँ तलाशती है वो अपने लिए सुरक्षा की जमीन ? क्या आकाश को मापने वाली में इतनी सामर्थ्य नहीं कि वो अपनी सुरक्षा खुद कर सके ?


ये सब सिर्फ उसकी जड़ सोच के कारण होता है और वो पीढ़ियों की रूढ़ियों में दबी अपने को तिल- तिल कर मरती रहती है मगर हौसला नहीं कर पाती आगे बढ़ने का , लड़ने का .जिन्होंने ऐसा हौसला किया आज उन्होंने एक मुकाम पाया है और दुनिया को दिखा दिया है कि वो किसी से किसी बात में कम नहीं हैं .आज यदि हम उसे सही तरीके से जीने का ढंग सिखाएं तो कोई कारण नहीं कि वो अपने लिए किसी जमीन की तलाश में भटकती फिरे .जरूरत है तो सिर्फ सही दिशा देने की ………उसको उड़ान भरने देने की …………और सबसे ऊपर अपने पर विश्वास करने की और अपने निर्णय खुद लेने की …………..फिर कोई कारण नहीं कि वो आज भी सुरक्षित जमीन के लिए भटके बल्कि दूसरों को सुरक्षित जमीन मुहैया करवाने का दम रखे.



दोस्तों 
दैनिक भास्कर में एक परिचर्चा की गयी कि “नारी को आज भी सुरक्षित जमीन की तलाश है ” तो मेरे मन में प्रश्न उठा कि क्यों है ? क्यों न हम उसके कारण ढूँढें और उसका निवारण करने की कोशिश करें . बस उस सन्दर्भ में जो विचार उभरे आपके समक्ष हैं. 


कृष्ण लीला ……भाग 15





एक दिन वासुदेव प्रेरणा से
कुल पुरोहित गर्गाचार्य
 गोकुल पधारे हैं
नन्द यशोदा ने 
आदर सत्कार किया
और वासुदेव देवकी का हाल लिया
जब आने का कारण पूछा 
तो गर्गाचार्य ने बतलाया है
पास के गाँव में 
बालक ने जन्म लिया है
नामकरण के लिए जाता हूँ
बस रास्ते में 
तुम्हारा घर पड़ता था
सो मिलने को आया हूँ
सुन नन्द यशोदा ने अनुरोध किया
बाबा हमारे यहाँ भी
दो बालकों ने जन्म लिया
उनका भी नामकरण कर दो
सुन गर्गाचार्य ने मना किया

तुम्हें है हर काम 

जोर शोर से करने की आदत

कंस को पता चला तो
मेरा जीना मुहाल करेगा
सुन नन्द बाबा कहने लगे
भगवन गौशाला में चुपचाप
नामकरण कर देना
हम ना किसी को बताएँगे
सुन गर्गाचार्य तैयार हुए
जब रोहिणी ने सुना
 कुल पुरोहित आये हैं
गुणगान बखान करने लगी
सुन यशोदा बोली
गर इतने बड़े पुरोहित हैं 
तोऐसा करो
अपने बच्चे हम बदल लेते हैं
तुम मेरे लाला को और मैं 
तुम्हारे पुत्र को लेकर जाउंगी
देखती हूँ कैसे तुम्हारे कुल पुरोहित
 सच्चाई जानते हैं
माताएं परीक्षा पर उतर आयीं
बच्चे बदल गौशाले में पहुँच गयीं
यशोदा के हाथ में बच्चे को देख
गर्गाचार्य कहने लगे
 ये रोहिणी का पुत्र है
 इसलिएएक नाम रौहणेय होगा 
अपने गुणों से सबको आनंदित करेगा
 तो एक नाम “राम ” होगा
और बल में इसके समान
कोई ना होगा
तो एक नाम बल भी होगा

मगर सबसे ज्यादा 

लिया जाने वाला नाम

बलराम होगा
ये किसी में कोई भेद ना करेगा
सबको अपनी तरफआकर्षित करेगा
तो एक नाम संकर्षण होगा
 और अब जैसे ही 
रोहिणी की गोद के बालक को देखा
 तोगर्गाचार्य मोहिनी मुरतिया में खो गए
अपनी सारी सुधि भूल गए
खुली आँखों से प्रेम समाधि लग गयी
गर्गाचार्य ना बोलते थे ना हिलते थे

ना जाने इसी तरह 

कितने पल निकल गए

ये देख बाबा यशोदा घबरा गए
हिलाकर पूछने लगे बाबा क्या हुआ ?
बालक का नामकरण करने आये हो
क्या ये भूल गए
 सुन गर्गाचार्य को होश आया है
और एकदम बोल पड़े
नन्द तुम्हारा बालक 
कोई साधारण इन्सान नहीं
 ये तो कह जो ऊँगली उठाई
 तभी कान्हा ने आँख दिखाई
कहने वाले थे गर्गाचार्य
 ये तो साक्षात् भगवान हैं
तभी कान्हा ने 
आँखों ही आँखों में
गर्गाचार्य को धमकाया है
बाबा मेरे भेद नहीं खोलना
बतलाया है
मैं जानता हूँ बाबा
यहाँ दुनिया 
भगवान का क्या करती है
उसे पूज कर 
अलमारी में बंद कर देती है
और मैं अलमारी में
बंद होने नहीं आया हूँ
मैं तो माखन मिश्री खाने आया हूँ
माँ की ममता में 
खुद को भिगोने आया हूँ
गर आपने भेद बतला दिया
 मेरा हाल क्या होगा
ये मैंने तुम्हें समझा दिया
मगर गर्गाचार्य मान नहीं पाए 
जैसे ही दोबारा बोले 
ये तो साक्षात् तभी
कान्हा ने फिर धमकाया 
बाबा मान जाओ 
नहीं तो जुबान यहीं रुक जाएगी
और ऊँगली 
उठी की उठी रह जाएगी
ये सारा खेल 
आँखों ही आँखों में हो रहा था
पास बैठे नन्द यशोदा को 
कुछ ना पता चला था
अब गर्गाचार्य बोल उठे 
आपके इस बेटे के नाम अनेक होंगे
जैसे कर्म करता जायेगा
वैसे नए नाम पड़ते जायेंगे
लेकिन क्योंकि इसने 
इस बार काला रंग पाया है
इसलिए इसका एक नाम कृष्ण होगा 
इससे पहले ये कई रंगों में आया है
मैया बोली बाबा 
ये कैसा नाम बताया है
इसे बोलने में तो 
मेरी जीभ ने चक्कर खाया है
कोई आसान नाम बतला देना
तब गर्गाचार्य कहने लगे
मैया तुम इसे कन्हैया , कान्हा , कनुआ कह लेना
सुन मैया मुस्कुरा उठी

ताजिंदगी कान्हा कहकर बुलाती रही

यहाँ तक कि 
सौ साल बाद 
कुरुक्षेत्र में जब 
कान्हा पधारे थे
सुन मैया दौड़ी आई थी
अपने कान्हा का पता
पूछती फिरती थी
अरे किसी ने मेरा कान्हा देखा क्या
कोई मुझे मेरे कान्हा से मिलवा दो
बस यही गाती फिरती थी
तपती रेत पर 
नंगे पाँव दौड़ी जाती थी
नेत्रों से अश्रु बहते थे
पैरों में छाले पड़ गए थे
मगर मैया को कहाँ
अपने शरीर का होश था
उसका व्याकुल ह्रदय तो
कान्हा के दरस को तरस रहा था
१०० साल का वियोग 
मैया ने कैसे सहा था 
आज कैसे वो रुक सकती थी
जिसके लिए वो जी रही थी
जिसकी सांसों की डोर
कान्हा मिलन में अटकी पड़ी थी 
उसकी खबर पाते ही
बेचैन हो गयी थी 
हर मंडप में जाकर 
गुहार लगाती थी
मगर कोई ना उसे 
समझ पाता था
क्यूँकि उनका कान्हा तो अब
द्वारिकाधीश बन गया था
किसी ने ना कभी
ये नाम सुना था
उनके लिए तो सिर्फ
द्वारकाधीश नाम ही 
संबल था
मगर मैया ने ना 
कभी कोई और नाम लिया था
उसके लिए तो
उसका कान्हा आज भी
कनुआ ही था
मैया आवाज़ लगा रही थी
लगाते लगाते जैसे ही
एक मंडप के आगे से गुजरी
ये करुण पुकार सिर्फ
मेरे कान्हा ने सुनी
अरे ये तो मेरी मैया
मुझे बुलाती है
मगर वो यहाँ कहाँ से आ गयी
इस अचरज में पड़े
नेत्रों में अश्रु भरे 
कान्हा दौड़ पड़े
मैया- मैया कह आवाज लगायी
देख तेरा कान्हा यहाँ है
कह मैया को आवाज़ लगायी
सुन कान्हा की आवाज़
मैया रुक गयी
और कान्हा को 
पहले की तरह
गोद में लेकर बैठ गयी
मेरा लाल कितना दुबला हो गया है
क्या कान्हा तुझे माखन 
वहाँ नहीं मिलता है
मैया रोती जाती है

भाव विह्वल हुई जाती है
जैसे बचपन में लाड
लड़ाती थी वैसे ही
आज भी लाड – लड़ाती है 

कान्हा को गले लगाती है
आज तेरा कान्हा मैया
द्वारकाधीश बना है
जो तू मांगेगी 
सब हाजिर हो जायेगा
बोल मैया तू क्या चाहती है
सुन मैया बोल पड़ी
लाला तेरे सिवा ना 
किसी को चाहा है
और माँ तो सदा 
बेटे को देती आई है
तू जो चाहे मुझसे मांग लेना
मेरा तो जीवन धन
सर्वस्व तू ही है कान्हा
सुन कान्हा रो पड़े
तुझसा निस्वार्थ प्यार
मैया मैंने कहीं ना पाया है
तभी तो तेरे प्रेम के लिए
मैं धरती पर आया हूँ 
ऐसा अटल प्रेम था माँ का
तभी तो मैया ने ना
 कभी कृष्ण कहा
उसके लिए तो उसका कान्हा
सदा कान्हा ही रहा 
गर्गाचार्य को दान दक्षिणा दे विदा किया
 नित्य आनंद यशोदा के आँगन
बरसने लगा
बाल रूप में नन्द लाल 
अठखेलियाँ करने लगे
मैया आनंद मग्न 
कान्हा को खिलाती रही
और ब्रह्मा से मानती रही
 कब मेरा लाला
घुट्नन  चलेगा
 कब दंतुलिया निकलेंगी
कब लाला मुझे
 मैया कहकर पुकारेगा
मैया रोज ख्वाब सजाती है
ब्रह्मा से यही मानती है 
वक्त यूँ ही गुजरता रहा 
कान्हा के अद्भुत रूप पर

गोपियाँ मोहित होती रहीं



क्रमशः : …………..

आ मेरी चाँदनी





आ मेरी चाँदनी 

तुझे कौन से 

दामन मे सहेजूँ

कैसे तेरी राहो को

रौशन करूँ
कौन से नव 
पल्लव खिलाऊँ
जो तू मुस्काये तो
मै मुस्काऊँ
ये जग मुस्काये
हर कली खिल जाये
चाँद की चाँदनी भी
तुझसे रश्क खाये

 आ मेरी चांदनी 

तुझे ऐसे संवारूं
जो तू चले तो 
हवाये चले
जो तू रुके तो
वक्त थम जाये
तेरी इक जुम्बिश पर
ये जहाँ हिल जाये
आ मेरी चाँदनी
तुझे सीने मे बसा लूँ
और एक नया जहाँ बसा लूँ
जिसमे तू ऐसे सिमट जाये
कि हर आंगन महक जाये






आ मेरी चाँदनी 

इक दीप जलाऊँ

जिसकी रौशनी में

हर आँगन महक जाये

घर घर गूंजे किलकारी
खिले हर बगिया न्यारी
तू हर घर में महक जाये
तेरी खुशबू यूँ बिखर जाये
हर आँगन में तुझसी 
इक कली खिल जाये 
आ मेरी चाँदनी 
तुझे पलकों में सजाऊँ
तुझे तेरा हक़ दिलाऊँ
और इस जहाँ को 
इक आईना दिखाऊँ
तुझे ऐसे बुलंद करूँ
कि आसमाँ भी छोटा पड़ जाये
और तेरा सितारा 
जहाँ में रोशन हो जाये
आ मेरी चाँदनी
तुझ पर हर ख़ुशी मैं लुटाऊँ 
और तेरी बुलंदियों को 
आसमाँ पे सजाऊँ

बे-दिल हूँ मैं……………

आज भी मुझमे

वसन्त अंगडाइयाँ लेता है
सावन मन को भिगोता है
शिशिर का झोंका
आज भी तन के साथ
मन को ठिठुरा जाता है
मौसम का हर रंग
आज भी अपने
रंगो मे भिगोता है
मै तो आज भी
नही बदली
फिर कैसे कहता है कोई
वक्त की परछाइयां लम्बी हो गयी हैं
आज भी मुझमे
इंद्रधनुष का हर रंग
अपने रंग बिखेरता है
दिल की बस्ती पर
धानी चूनर आज
भी सजती है
शोखियों मे
आज भी हर
रंग खिलखिलाता है
फिर कैसे कहता है कोई
वक्त निशाँ छोड गया है
मै तो आज भी
यौवन की दहलीज़ की
उस लक्ष्मण रेखा को
पार नही कर पायी
लाज हया की देहरी पर
आज भी वो कोरा
दिल रखती हूँ
फिर कैसे कहता है कोई
मुझमे तो दिल ही नहीं

बेदिल हूँ मैं……………

टैग का बादल