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Archive for जून, 2011

>ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

>

ये आस्तीन के साँपों की दुनिया
ये झूठे चालबाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

कभी झूठी बातें कभी झूठे चेहरे
कभी इन्सान को मिटाने के
करते हैं बखेड़े
हर एक शख्स झूठा
हर इक शय है धोखा
अपनों की भीड़ में छुपा है वो चेहरा
गर इसे पहचान भी जायें तो क्या है
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

कभी पीठ में खंजर भोंकती है दुनिया
कभी सच्चाइयों को रौंदती है दुनिया
हर तरफ फैली है नफ़रत की आँधी
हर ओर जैसे बिखरी हो तबाही
बंजर चेहरों में अक्स छुपाती ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है




अब चाहे मिटाओ या फूंक डालो ये दुनिया
मेरे किसी काम की नहीं है ये दुनिया 
बारूद के ढेर पर बैठी ये दुनिया  

किसी की कभी न होती ये दुनिया

कितना बचके चलना यहाँ पर
 किसी को कभी न बख्शती ये दुनिया 
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
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>इतनी जल्दी क्या थी

>

देखो आज
मुझे जरूरत थी
मगर तुम नहीं हो
ऐसा क्यूँ होता है
हमेशा ………….
कभी तो सुन सको मेरे दिल की जुबान
कभी तो बांध सको रेत को मुट्ठी में
कभी तो लगा दो गांठ चुनरी में
कभी तो फाँस बिना चुभे भी निकाल दो
देखो आज तुम्हारी ………..
तुम्हारे बिन
कुम्हला गयी है
देखो कहीं ऐसा ना हो
जब तुम आओ
और देर हो जाये
तुम्हारी ……..
ज़िन्दगी की धड़कन सो जाये
और तुम कहो
जानां  ………..इतनी जल्दी क्या थी जाने की
मैं आ तो रहा था …………..

>क्या ऐसा होगा

>

ये सुबह ठहरती क्यों नही……
कब तक आस के मोती सम्हालूँ
जानते हो ना
तुम्हारी आस ही
ज़िन्दा रखे है
और तुम मेरी ज़िन्दगी की सुबह
जब तुम वापस आओगे
जानते हो ना
उसी दिन सुबह ठहरेगी मेरे आँगन में
कभी ना जाने के लिए ……तुम्हारी तरह
क्या ऐसा होगा ……….
मेरी आस का सूरज उगेगा……..

और आसमां धरती पर उतरेगा

बताओ ना ………..
क्या ऐसा होगा
जब कुमुदिनी दिन में खिलेगी

>ललिता पूछे राधा से , ए राधा

>

ललिता पूछे राधा से , ए राधा

कौन शरारत कर गया
तेरे ख्वाबों में ,ख्वाबों में

आँख का अंजन बिखेर गया गालों पे-२-
ये चेहरा कैसे उतर गया ए राधा
दो नैनों में नीर कौन दीवाना भर गया ए राधा
ललिता पूछे राधा से ए राधा ……………

वो छैल छबीला आया था ओ ललिता -२-
मन मेरा भरमाया था ओ ललिता
मुझे प्रेम सुधा पिलाया था ओ ललिता
मेरी सुध बुध सब बिसराय गया वो छलिया
मेरा चैन वैन सब छीन गया री ललिता
ललिता पूछे राधा से ए राधा………………

वो मुरली मधुर बजाय गया सुन ललिता
वो प्रेम रस  पिलाय गया ओ ललिता
मुझे अपना आप भुलाय गया ओ ललिता
मुझे मोहिनी रूप दिखाय गया ओ ललिता
बंसी की धुन सुनाय गया सुन ललिता
और चित मेरा चुराय गया वो छलिया
ललिता पूछे राधा से ए राधा …………..

अब ध्यानमग्न मैं बैठी हूँ सुन ललिता
उसकी जोगन बन बैठी हूँ सुन ललिता
ये कैसा रोग लगाय गया ओ ललिता
ये कैसा रास रचाए गया ओ ललिता
मोहिनी चितवन डार गया सुन ललिता
ये कैसी प्रीत सुलगाय गया वो छलिया
मुझे अपनी जोगन बनाय गया री ललिता
ललिता पूछे राधा से ए राधा …………..

अब हाथ छुडाय भाग गया वो छलिया
मुझे प्रेम का रोग लगाय गया वो छलिया
मेरी रूप माधुरी चुराय गया वो छलिया
मुझे कमली अपनी बनाय गया वो छलिया
अब कैसे धीरज बंधाऊं री ललिता
अब कैसे प्रीत पहाड़ चढाऊँ री ललिता
मोहे प्रीत की डोर से बाँध गया वो छलिया
मेरी सुध बुध सब बिसराय गया वो छलिया
ललिता पूछे राधा से ए राधा ……………..

>कहो ना ……….

>

उस दिन जब तुमने
उसे पसंद किया
और मैंने भी छुआ
तो एक तरंग सी
अहसासों से गुजर गयी
एक नमकीन सा अहसास
दिल में धड़क गया
स्पर्श का ऐसा अहसास
तो पहले कभी नहीं हुआ था
क्या तरंगें वस्तुओं से भी
पहुँचती हैं या हमारे दिल

इतने जुड़ चुके हैं कि

तरंगे वस्तुओं से गुजरकर
भी हम तक पहुँच जाती हैं
ये कैसे संकेत हैं
क्या प्रेम की तरंगें
इतनी गहरी होती हैं
या प्रेम तरंगें ऐसे ही बहती हैं
बिना माध्यम के
दिल की तारों पर
मचलते स्पंदनों में
ए क्या तुम्हारे साथ भी
ऐसा होता है
क्या तुमने भी कभी
मुझे यूँ ही महसूस किया है
बिना स्पर्श के
मगर अहसास और अनुभूति में
जीवंत किया हो
कहो ना ……….

>पता नही क्यूँ

>

पता नही क्यूँ किनारा कर जाते हैं लोग
कुछ ऐसे मुझे आजमाते है लोग

जब भी मुझे अपना बनाते है लोग
फिर एक नया दगा दे जाते है लोग

अभी खुशफ़हमियों मे जी भी नही पाती
कि एक नयी हकीकत दिखा जाते है लोग

जिसे भी अपना समझ कदम बढाया मैने
उसी कदम पर ठोकर लगा जाते है लोग

दिल को मेरे खिलौना समझने वाले
रोज वो ही खिलौना तोड जाते है लोग

मै भी सिर्फ़ पत्थर नही एक इंसान हूँ
बस इतना सा ना समझ पाते है लोग

>या ये मेरा कोरा भरम था

>

सुना था
कोई याद करे
कोई बात करे
कोई बारिश मे भीगे
कोई सपनो मे देखे
कोई ख्यालो मे संजोये
तो हिचकी आती है
मगर देखो ना
मै तो इक पल को भी
कभी तुमको भूली ही नही
यादों से कभी तुमको
रुखसत ही नही किया
ख्यालों मे …दिन मे
सपनो मे …रात मे
भिगी भीगी बरसात मे
फिर चाहे आसमानी हो
या रुहानी
तुम और तुम्हारी यादो को
हमेशा भिगोये रखा
बताओ ज़रा ……
कभी एक सांस भी
ले पाये मेरी हिचकियों बिन
या  ये मेरा कोरा भरम था
तुम्हे कभी हिचकी आई ही नही

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