Just another WordPress.com weblog

Archive for जून, 2012

यूँ ही नहीं कुर्बान होती मोहब्बत वक्त के गलियारों में ………..

अहसासो ख्यालो की एक अनूठी दुनिया की 

सैर पर निकला हो कोई 
और जैसे पांव किसी सुलगते दिल को छू गया हो …………
आह ! ऐसे ही नही निकला करती। 

सजदे में सिर झुका कर
कर रहा हो कोई इबादत 
और जैसे मुस्कान कोई रूह को छूकर निकल गयी हो ………..
यूँ ही नहीं मिला करता मौला किसी फकीर को 

रेशम के तारों से काढ रहा हो 
कोई अपने सपनो का ताजमहल 
और जैसे मुमताज के जिस्म में हरारत हो गयी हो 
यूँ ही नहीं शहंशाह बना करते है ………

तबियत से लिख रहा हो रात की स्याही से 
कोई फ़साना खुदाई नूर का 
और जैसे खुदा ने हर लफ्ज़ पढ़ लिया हो
यूँ ही नहीं कुर्बान होती मोहब्बत वक्त के गलियारों में ………..
Advertisements

कृष्ण लीला ………भाग 54



इक दिन कान्हा ग्वाल बालों संग
वन में विचरण करते थे
भांति भांति के खेल 
खेला करते थे
जब सब मिल कलेवा करने लगे
तब भोजन कम पड़ गया
किसी की ना क्षुधा शांत हुई
कान्हा से सब कहने लगे
आज तो भूख मिटी नहीं
कोई उपाय करना होगा
ये सुन अंतर्यामी ने विचार किया
पास के वन में मथुरावासी 
ब्राह्मण स्त्रियाँ मेरी
दर्शनाभिलाषी हैं
आज उनका मनोरथ 
सुफल करना होगा
ये सोच  प्रभु ने
ग्वाल बालों को
ब्राह्मणों के पास भेज दिया
अज्ञानता और कर्म के अभिमान में
आकंठ डूबे ब्राह्मणों ने
ना श्याम बलराम की महिमा जानी
जब तक हवन पूजन ना पूरा होगा
किसी को कुछ ना मिलेगा
ये देवताओं के नाम 
यज्ञ हम करते हैं
यज्ञ पूर्ण होने पर ही
सबको प्रसाद मिलेगा
उन  ब्राह्मणों ने कान्हा को
साधारण बालक ही जाना
जिसके नाम का हवन करते थे
उसी आदिशक्ति को ना पहचाना
कोरे ज्ञान की महिमा गाते थे
असलियत को ना पहचान पाते थे
उदास हो ग्वालबालों ने
सारा किस्सा बतलाया है
सुन प्रभु ने उन्हें
दूजा उपाय बतलाया है 
अब की बार तुम सब 
उनकी पत्नियों के पास जाना
जाकर उनसे भिक्षा माँग लाना
वे बड़ा आदर सत्कार करेंगी
जो तुम चाहोगे वे सब देंगी
जब ग्वाल बालों ने जाकर
कृष्ण इच्छा बतलाई
सुन ब्राह्मण पत्नियाँ हर्षायीं
मनसा वाचा कर्मना 
केशव मूर्ति के दर्शन की
वो इच्छा रखती थीं
सोने चांदी के थालों में
हर्षित हो बड़े प्रेम से
मेवा , मिठाई, पकवान , पूरी
कचौरी, दूध , दही , मक्खन रख
ग्वाल बालों संग
केशव मूर्ति के दर्शन को चलीं
पतियों का कहा भी  ना माना
आज तो प्रेम था परवान चढ़ा 



इक ब्राह्मणी को उसके पति ने
बरजोरी घर में बंद किया
उसने उसी क्षण अपना
पंचभौतिक शरीर छोड़ दिया
और सबसे पहले पहुंच 
प्रभु के चरणों में
खुद को समर्पित किया
प्रभु की दिव्य ज्योति में 
स्वयं को लीन किया
इधर अन्य स्त्रियाँ जब पहुंची थीं
प्रभु की शोभा निरख
अति हर्षित हुई थीं 
साँवली सूरतिया
पीताम्बर ओढ़े
एक हाथ में कमल लिए
गले में वनमाला और
मस्तक पर मयूरपंख
प्रभु के स्पर्श से 
शोभायमान होते थे
जिन्हें देख ब्राह्मणियों के
नयन पुलकित होते थे
नयन कटोरों से 
रसपान करती थीं
प्रभु की छवि को 
नेत्र मार्ग से भीतर ले जा
आलिंगन करती थीं
और ह्रदय ज्वाल शांत करती थीं
जब प्रभु ने जाना
ये सब छोड़ मेरे पास आई हैं
सिर्फ मेरे दरस की 
लालसा ही इनमे समायी है
तब प्रभु ने उनका स्वागत किया
और उनके प्रेम को स्वीकार किया
अब तुम मेरा दर्शन कर चुकीं
तुम्हारा आतिथ्य भी हमने स्वीकार किया
मगर अब बहुत विलम्ब हुआ
तुम्हारे पति यज्ञ करते हैं
तुम्हारे बिना ना
यज्ञ सम्पूर्ण होगा
जाओ अब तुम प्रस्थान करो
सुन ब्राह्मण पत्नियों ने कहा
प्रभु आपकी ये बात निष्ठुर है
श्रुतियां भी यही गाती हैं
जिसने संपूर्ण समर्पण किया
जीवन अभिलाषा का त्याग किया
उसे ना फिर संसार में लौटना पड़ा
अपने प्रियजनों की आज्ञा का 
उल्लंघन कर तुम्हारे पास आई हैं
अब ना हमारे पिता , पुत्र, भाई
पति,बंधु- बांधव
ना कोई हमें स्वीकार करेंगे
अब आपके चरण कमलों के सिवा
ना कोई ठिकाना पाती हैं
इतना सुन मोहन बोल पड़े
अब ना तुम्हारा कोई 
तिरस्कार करेगा
उनकी तो बात ही क्या
सारा संसार तुम्हारा सम्मान करेगा
क्योंकि अब तुम मेरी बन गयी हो
मुझसे युक्त हो गयी हो
जो मेरा बन जाता है
फिर वो सबके मन को भाता है
उसे मेरा ही स्वरुप मिल जाता है
इसलिए हर मन में उसे देख
आनंद समाता है 
अब तुम जाओ 
मन मेरे को तुमने दे दिया है
पर गृहस्थ धर्म का भी तो 
निर्वाह करना होगा
और अपने पतियों में ही
मेरा दिग्दर्शन करना होगा
हे प्रभु एक स्त्री यहाँ आती थी
पर उसके पति ने रोक लिया
ना जाने उसका क्या हुआ
ये सुन प्रभु ने उसका
चतुर्भुजी रूप दिखला दिया
जब ब्राह्मण पत्नियाँ वापस आई हैं
जिनके मुखकमल पर 
दिव्य आभा जगमगाई है
जिसे देख ब्राह्मणों को
बुद्धि आई है
अब अपनी अज्ञानता का
उन्हें भान हुआ
जिस प्रभु के दर्शन 
ध्यानादिक  में भी 
नहीं मिलते हैं’
वो आज स्वयं यहाँ पधारे थे
हमारे जन्मों के पुण्यों को
सुकृत करने आये थे
हाय ! हमने ना उन्हें पहचाना
हमारे पत्थर ह्रदयों में 
ना दया का भान हुआ
अभिमान के वृक्ष ने
कैसा बुद्धि को भ्रमित किया
हमारे जीवन को धिक्कार है
सिर धुन – धुन कर पछताते हैं
निज पत्नियों को बारम्बार
शीश नवाते हैं
उनके प्रेम के आगे
नतमस्तक हुए जाते हैं
और प्रभु से क्षमा का दान
मांगे जाते हैं
जब पश्चाताप की अग्नि से
ब्राह्मणों का ह्रदय निर्मल हुआ
तब प्रभु ने उनका 
सब अपराध क्षमा किया
जिसने अपनी पत्नी को रोका था
जब घर में जाकर देखा
उसके मृत शरीर को पाया
ये देख सिर धुन- धुन कर 
वो पछताया
तब ब्राह्मण पत्नियों ने उसे
सारा हाल बतलाया
दौड़ा -दौड़ा प्रभु चरणों में वो आया
अपने अपराध पर बहुत पछताया
तब उसकी स्त्री की भक्ति के प्रभाव से
प्रभु ने उसे भी चतुर्भुज बनाया
और निज धाम में 
दोनों को भिजवाया
अब प्रभु ने ग्वालबालों संग
भोजन का आनंद लिया
मुरली बजा गायों को 
समीप बुला लिया
और वृन्दावन को प्रस्थान किया


क्रमश: ……………

देखा है कभी राख़ को घुन लगते हुए ……..? एक विमर्श से उपजा चिन्तन

दोस्तों 

इस रचना का जन्म एक विमर्श पढकर हुआ उसका लिंक दे रही हूँ ।  

“व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि”



पहले यदि इस लिंक को पढेंगे तभी आप समझ सकेंगे इस दृष्टिकोण को 








नारी के दृष्टिकोण से




सुना है नारी

सम्पूर्णता तभी पाती है
जब मातृत्व सुख से 
आप्लावित होती है
जब यशोदा बन
कान्हा को 
दुग्धपान कराती है
रचयिता की 
अनुपम कृति तब होती है
यूँ तो उन्नत वक्षस्थल
सौंदर्य का प्रतिमान होते हैं
नारी का अभिमान होते हैं
नारी देहयष्टि में
आकर्षण का स्थान होते हैं
पुरुष की कामुक दृष्टि में
काम का ज्वार होते हैं
मगर जब इसमें घुन लग जाता है
कोई रेंगता कीड़ा घुस जाता है
सारी फसल चाट जाता है
पीड़ा की भयावहता में 
अग्निबाण लग जाता है
असहनीय दर्द तकलीफ
हर चेहरे पर पसरा खौफ
अन्दर ही अन्दर 
आतंकित करता है 
कीटनाशक का प्रयोग भी
जब काम ना आता है
तब खोखले अस्तित्व को
जड़ से मिटाया जाता है
जैसे मरीज को 
वैंटिलेटर पर रखा जाता है
यूँ नारी का अस्तित्व 
बिना घृत के
बाती सा जल जाता है
उसका अस्तित्व ही तब
उस पर प्रश्नचिन्ह लगाता  है
एक अधूरापन सम्मुख खड़ा हो जाता है
सम्पूर्णता से अपूर्णता का 
दुरूह सफ़र 
बाह्य सौन्दर्य तो मिटाता है
साथ ही आंतरिक 
पीड़ा पर वज्रपात सा गिर जाता है
जिस अंग से वो
गौरान्वित होती है
साक्षात वात्सल्य की 
प्रतिमूर्ति होती है
जो उसके जीवन की
उसके अस्तित्व की
अमूल्य धरोहर होती है
नारीत्व की पहचान होती है
जब नारी उसी से विमुख होती है
तब प्रतिक्षण काँटों की
शैया पर सोती है
बेशक नहीं होती परवाह उसे
समाज की 
उसकी निगाहों की
किसी भी हीनता बोध की 
सौंदर्य के अवसान की
अन्तरंग क्षणों में उपजी
क्षणिक पीड़ा की
क्योंकि जानती है
पौरुषिक स्वभाव को
क्षणिक आवेग में समाई निर्जनता
पर्याय ढूँढ लेती है
मगर 
स्वयं का अस्तित्व जब
प्रश्नचिन्ह बन 
खड़ा हो जाता है
तब कोई पर्याय ना नज़र आता है
आईना भी देखना तब
दुष्कर लगता है
नहीं भाग पाती 
अपूर्ण नारीत्व से 
स्वयं को बेधती 
स्वयं की निगाह से
हर दंश , हर पीड़ा 
सह कर भी 
जीवित रहने का गुनाह
उस वक्त बहुत कचोटता है
जब मातृत्व उसका 
अपूर्ण रहता है
बेशक दूसरे सुखो से 
वंचित हो जाए
तब भी आधार पा लेती है
मगर मातृत्व सुख की लालसा 
खोखले व्यक्तित्व पर
प्रश्नचिन्ह बन 
जब खडी हो जाती है
वात्सल्य की बलि वेदी पर
माँ का ममत्व 
नारी का नारीत्व 
प्रश्नवाचक नज़रों से 
उसे घूरता है
मृत्युतुल्य कष्ट सहकर
ज़िन्दा रहना उसे
उस वक्त दुष्कर लगता है 
जब ब्रैस्ट कैंसर की
फैली शाखाओं के व्यूह्जाल 
को तोड़ वो खुद को निरखती है 
तब ज़िन्दा रहना अभिशाप बन
उसके संपूर्ण व्यक्तित्व को
अभिशापित कर देता है
जो वास्तविक कैंसर से 
ज्यादा भयावह होता है
अपूर्ण व्यक्तित्व के साथ जीना
मौत से पहले पल- पल का मरना 
उसे अन्दर ही अन्दर 
खोखला कर देता है 
मातृत्व में घुला संपूर्ण नारीत्व 
पूर्ण नारी होने की गरिमा
उसके मुखकमल के तेज को 
निस्तेज कर देती है 
जब अपूर्णता की स्याही उसकी आँखों में उतरती है
चंद लफ़्ज़ों में 
उस भयावहता को बाँधना संभव नहीं
दर्द की पराकाष्ठा का चित्रण संभव नहीं
ये तो कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है 
मगर लफ़्ज़ों में तो ना
वो भी व्यक्त कर सकता है 
क्योंकि 
मौत से आँख मिलाने वाली
खुद से ना आँख मिला पाती है  
यही तो इस व्याधि की भयावहता होती है 

देखा है कभी राख़ को घुन लगते हुए ……..?





पुरुष के दृष्टिकोण से 





जब से विषबेल अमरलता से लिपटी है

मेरे अंतस में भी मची हलचल है
यूँ तो प्रणय का ठोस स्तम्भ होते हैं
मगर जीवन के पहिये सिर्फ 
इन्ही पर ना टिके होते हैं
ये भी जानता हूँ मैं 
अंग में उपजी पीड़ा की भयावहता को 
तुम्हारे ह्रदय की टीस को 
पहचानता हूँ 
संघर्षरत हो तुम 
ना केवल व्याधि से
ना केवल अपने अस्तित्व के खोखलेपन से
बल्कि नारीत्व के अधूरेपन से भी
जो तुम नहीं कहती हो
वो भी दिख रहा है मुझे
तुम्हारी वेदना का हर शब्द
मेरे भीतर रिस रहा है
मकड़ी के जालों ने तुम्हें घेरा है
खोखला कर दिया है तुम्हारा वजूद
कष्टसाध्य पीड़ा के आखिरी पायदान 
पर खडी तुम
अब भी मेरी तरफ 
दयनीय नेत्रों से देख रही हो
सिर्फ मेरे लिए
मेरे स्वार्थ के लिए
मेरी क्षणभंगुर तुष्टि के लिए
सोच रही हो
कैसे गुजरेगा जीवन
अधूरेपन के साथ
मगर तुम अधूरी कब हुईं
तुम तो हमेशा पूरी रही हो 
मेरे लिए 
नहीं प्रिये ………..नहीं
इतना स्वार्थी कैसे हो सकता हूँ
जीवन के दोनों पहियों के बिना 
कैसे गाड़ी चल सकती है
क्या तुमने मुझे सिर्फ इतना ही जाना
क्या मुझे सिर्फ 
विषयानल में फँसा दलदल का 
रेंगता कीड़ा ही समझा
जो अपनी चाहतों के सिवा
अपने रसना के स्वाद के सिवा
ना दूजे की पीड़ा समझता है
नहीं ……….ऐसा संभव नहीं 
क्या हुआ गर 
ज़हरवाद ने तुम्हें विकृत किया है
क्या सिर्फ एक अंग तक ही 
तुम्हारा अस्तित्व सिमटा है
तुम एक संपूर्ण नारी हो
गरिमामयी ओजस्वी 
अपने तेज से जीवन को 
आप्लावित करतीं 
घर संसार को संभालतीं 
अपनी एक पहचान बनातीं 
ना केवल अपने अर्थों में
बल्कि समाज की निगाह में 
संपूर्ण नारीत्व को सुशोभित करतीं
क्या सिर्फ अंगभंग होने से
तुम्हारी जगह बदल जाएगी 
नहीं प्रिये ………नहीं
जानती हो 
ये सिर्फ मन का भरम होता है 
रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए
प्रेम का अमृत ही काफी होता है 
जहाँ प्रेम होता है वासना नहीं 
वहाँ फिर कोई स्थान ना रिक्त दिखता है 
क्योंकि यथार्थ से तो अभी वास्ता पड़ता है 

शायद नहीं यक़ीनन
यही तो प्रणय संबंधों का चरम होता है 
जहाँ शारीरिक अक्षमता ना 
संबंधों पर हावी होती है 
और संबंधों की दृढ़ता के समक्ष 
मुखरित व्याधि भी मौन हो जाती है 

क्या इस तरह प्रस्तुत नहीं किया जा सकता था इस व्याधि की भयावहता को ?

जलती चिताओं का मौन भी कभी टूटा है?

जलती चिताओं का मौन भी कभी टूटा है?
शायद आज फिर से कोई तारा टूटा है


 आज फिर किसी रात का बलात्कार हुआ है
शायद आज फिर किसी का नसीबा रूठा है

दिन के उजाले भी कभी रुसवा हुए हैं
शायद आज फिर अंधेरों का भरम टूटा है

मिटटी के खिलौनों को कब धडकनें मिली हैं
शायद आज फिर खुद से साक्षात्कार हुआ है

बेशर्मी बेईमानी की चिताएं भी कभी सजती हैं
शायद आज फिर से कहीं ईमान होम हुआ है

बस कहानियों की खुरचन बच जाती है


अकाल

जिसमे नही कोई काल

काल तो खुद

काल कवलित हो गया

सिर्फ़ एक दृश्य

बाकी रहता है

जो मूँह जोये 

खडा रहता है
और अपनी बरबादी पर
खुद ही अट्टहास करता है
कल तक जहाँ दरिया बहा करते थे
आज वहाँ एक बूँ द पानी 
भी खुद को ना देख पाता है
छातियाँ धरती की ही नही फ़टतीं
हर छाती पर इतनी गहरी दरारें
उभर आती हैं जिसमे
सागर का पानी भी कम पड जाता है
आकाश की आग तो धरती सह लेती है
पर उस आग की तपिश ना सह पाती है
जिसमे मासूम ज़िन्दगियां झुलस जाती हैं
फ़ाकों पर इंसान तो रह लेता है
पर बेजुबान जानवरों की तो जान पर बन आती है

वक्त की तपती आँच पर जलते
बेजुबानों की सिसकती आवाज़
बिल से बाहर रेंगने लगती है

ना धरती पर जगह मिलती है

ना आकाश ही हमदर्दी दिखाता है

घर ,आँगन ,नदी ,तालाब ,पोखर
कच्ची- पक्की पगडंडियाँ
सूखे झाड- खंखाड 
उजाड बियाबान बस्ती 
बिना किसी आस के
शमशान मे तब्दील हो जाती हैं
एक जलता रेगिस्तान 
बाँह पसारे सबको 
स्वंय मे समाहित कर लेता है

हर चूल्हे की आग तो जैसे

हवाओं मे बिखर जाती है

तवों की ठंडक हड्डियों मे उतर आती है

और लाशों मे तब्दील हो जाती है

उस अकाल मे काल भी झुलस जाता है

सिर्फ़ राख का ढेर ही नज़र आता है

बस कहानियों की खुरचन बच जाती है
धरती का सीना उधेडती हुयी
किसी तश्तरी मे भोज सामग्री उँडेलती हुयी
अकाल का ग्रास बनती हुयी …………




कृष्णलीला……भाग 53



गोपियों को प्रभु मिलन की चाह लगी
मनोरथ पूर्ण करने को अगहन में 
कात्यायिनी देवी का व्रत करने लगीं
हविष्यान्न खाती थीं 
चन्दन, फूल, नैवेद्य, धूप -दीप से
पूजन करती थीं 
हे महामाये , महायोगिनी
तुम्हें नमन हम करती हैं
नंदनंदन को पति बना दीजै
ऐसी प्रार्थना करती हैं
ऐसे गोपियाँ आराधना करती हैं
प्रतिदिन यमुना स्नान को जाती हैं
और ठन्डे पानी में डुबकी लगाती हैं 
फिर देवी का पूजन करती हैं
एक दिन जैसे ही वस्त्र उतार
यमुना जी में प्रवेश किया
गोपियों की अभिलाषा जान
प्रभु ने इक खेल किया
सब गोपियों के वस्त्र चुरा 
कदम्ब पर बैठ गए 
हँसी- ठिठोली करने लगे
गोपियों का ह्रदय 
प्रेम रस में भीग गया 
कान्हा से विनती करने लगीं
तुम्हारी दासी हैं चितचोर
हमारे वस्त्र लौटा दीजिये
हमें अपनी शरण में लीजिये
ठण्ड में ठिठुरी जाती हैं
कुछ तो हम पर रहम कीजिये
जब प्रभु ने जाना
ये सर्वस्व समर्पण कर चुकी हैं
तब कान्हा बोल पड़े
अपने- अपने वस्त्र आकर ले जाओ
गुप्तांगों को छुपाकर 
यमुना से जब बाहर आयीं
तब उनके शुद्ध भाव से
मोहन प्रसन्न हुए
वस्त्र कंधे पर रख लिए
और कहने लगे
तुमने जो व्रत लिया है
उसे मैंने जान लिया है 
तुमने अच्छी तरह निभाया
ये भी मैंने मान लिया
पर एक त्रुटि कर डाली
जब तक ना पश्चाताप करोगी
तब तक ना व्रत का 
संपूर्ण फल लोगी
तुमने यमुना में 
नग्न होकर स्नान किया
वरुण देवता और यमुना का
अपराध किया 
दोष शांति के लिए
हाथ उठा सिर से लगाओ
और प्रणाम करो
फिर अपने वस्त्र ले जाओ
प्रभु की बातों पर
भोली गोपियों ने 
विश्वास किया
व्रत में आई त्रुटि का
परिमार्जन किया
जैसा नंदनंदन ने कहा
वैसी ही आज्ञा का पालन किया 
जब प्रभु ने देखा
सब मेरी आज्ञा का 
पालन करती हैं
तब करुनामय ने
उनके वस्त्र दिए
प्रभु ने कैसी अजब लीला की
पर तब भी ना 
किसी गोपी के मन में 
क्षोभ हुआ 
उसे अपना ही दोष माना
कैसे मोहन ने सबका 
मन वश में कर रखा था 
जब सबने वस्त्र पहन लिए
पर एक पग ना आगे धरा
प्रभु पूजन की इच्छा 
मन में समायी थी
पर लज्जावश कुछ ना कह पाई थीं
अंतर्यामी ने सारा 
भेद जान लिया
शरदपूर्णिमा पर 
मनोरथ पूर्ण करूंगा
कह इच्छा को बल दिया
गोपियाँ प्रभु मिलन की लालसा में
दिन गुजारने लगीं
शरद पूर्णिमा का 
इंतजार करने लगीं
पर यहाँ ज्ञानीजन
चीरहरण के भेद बताते हैं
सभी अपने अपने मत 
बतलाते हैं
हर शंका  मिटाते हैं



जैसे प्रभु चिन्मय 
वैसे उनकी लीला चिन्मय
यूँ तो प्रभु की लीलाएं
दिव्य होती हैं
सर्वसाधारण के सम्मुख
ना प्रगट होती हैं
अन्तरंग लीला में तो
गोपियाँ ही प्रवेश कर पाती हैं
गोपियों की चाहना थी 
श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण
रोम रोम कृष्णमय हो जाये
इसके लिए साधना करती थीं
घर परिवार की ना चिंता करती थीं
लोक लाज का त्याग किया
प्रभु नाम का संकीर्तन किया
पर फिर भी ना पूर्ण समर्पण हुआ
लीला की दृष्टि से थोड़ी कमी थी
निरावरण रूप से नहीं जाती थीं
थोड़ी झिझक बीच में आती थी
साधक की साधना तभी 
पूर्ण मानी जाती है
जब आवरण हटा दिया जाता है
कोई भेद ना किसी में रहता है
उनका संकल्प तभी पूर्ण कहाता है
जब प्रभु स्वयं आकर 
संकल्प पूर्ण करते हैं
ब्रह्म जीव का जब 
भेद मिट जाता है
वो ही पूर्ण साक्षात्कार कहाता है
यूँ तो लीला पुरुषोत्तम 
जब भी लीला करते हैं
किसी मर्यादा का ना
उल्लंघन करते हैं
साधना मार्ग में विधि का अतिक्रमण
गोपियाँ अज्ञानतावश करती थीं
पर उसका मार्जन करवाना था
प्रेम के नाम पर विधि का उल्लंघन 
ना कान्हा को भाता था 
इसलिए गोपियों से 
प्रायश्चित करवाया
चराचर प्रकृति के अधीश्वर
स्वयं कर्ता, भोक्ता और साक्षी हैं
कोई ना व्यक्त अव्यक्त पदार्थ यहाँ
जिसका उन्हें भान ना हो 
या जो उनसे विलग हो
सब उनका और वो सबमे 
व्याप्त रहते हैं 
ये भेद तो सिर्फ
दृष्टि में रहते हैं
गोपियाँ पति रूप में चाहती थीं
वो पति जो उनकी 
आत्मा का स्वामी हो
देह से परे साक्षात्कार पाती थीं
आम जन की दृष्टि 
देह तक ही सीमित होती है
वो क्या जाने दिव्यता प्रेम की
जिसकी बुद्धि विषय विकारों में ही
लिप्त रहती है
जब साधक पर प्रभु की
अहैतुकी कृपा बरसती है
तब ही उसकी बुद्धि 
प्रभु भजन में लगती है
जब सत्संग मनन करता है
तब प्रभु केवट बन 
भवसागर पार करते हैं
जन्म जन्मान्तरों के बंधनों से
जीव को मुक्त करते हैं
तब दिव्यानंद का अनुभव होता है
परम विश्रांति का अधिकारी बन जाता है
जब प्रभु से चिर संयोग होता है
और गोपियाँ कोई
साधारण ग्वालिनें ही नहीं थीं
ये तो प्रभु की नित्यसिद्धा 
प्रकृतियाँ थीं
जो प्रभु इच्छा से लीला में
प्रवेश पाती थीं
जन्म जन्मान्तरों के 
कलुमश  मिटाती थीं 
जब प्रभु गोपियों को 
निरावरण हो सामने बुलाते हैं
यहाँ तरह तरह के भाव आते हैं
प्रभु जानते थे
मुझमे उनमे ना कोई भेद है
पर अज्ञानतावश गोपियाँ
वो भेद ना पाती हैं
यहाँ प्रभु ये समझाते हैं
साधक की दशा बताते हैं
भगवान को चाहना
और साथ में संसार को भी ना छोड़ना
संस्कारों में उलझे रहना
माया का पर्दा बनाये रखना
द्विविधा की दशा में 
साधक जीता है
वो माया का आवरण 
नहीं हटा पाता है
सर्वस्व समर्पण ना कर पाता है
यहाँ भगवान गोपियों के माध्यम से
सिखाते हैं
संस्कार शून्य निरावरण होकर
माया का पर्दा हटाकर 
अपना सर्वस्व समर्पण 
करना ही कल्याणकारी होता है
जहाँ जाकर ही
ब्रह्म जीव का भेद मिटता है 
यह पर्दा ही व्यवधान उत्पन्न करता है 
जब ये पर्दा हट जाता है
तब प्रेमी निमग्न हो 
स्वयं को भी भूल जाता है
लोग लाज को त्याग
प्रभु मिलन की उत्कंठा में
दौड़ा जाता है
वस्त्रों की सुधि भुला देता है
अपना आप मिटा देता है
जब कृष्ण ही कृष्ण नज़र आता है
तब वो ही प्रभु के प्रति
विशुद्ध प्रेम कहाता है
यहाँ प्रभु बतलाते हैं
प्रेम, प्रेमी और प्रियतम
के मध्य पुष्प का पर्दा भी
नहीं रखा जाता है 
क्योंकि प्रेम की प्रकृति यही है
सर्वथा व्यवधान रहित 
अबाध अनन्त मिलन
जब प्रेमी इस दशा को पाता है
तभी स्वयं भी प्रेममय बन जाता है
गोपियां लज्जावनत मुख किये आती हैं
पुराने संकार ना जाते हैं
पर प्रभु इशारे में बतलाते हैं
तुमने कितने त्याग किये
घर बार की मोह माया को त्यागा है
फिर इस त्याग  में क्यों
संकोच की छाया है 
गोपियाँ तो निष्कलंक कहाती हैं
इसलिए त्याग के भाव का भी त्याग
उसकी स्मृति का भी त्याग करना होगा
जहाँ सब संज्ञाशून्य होगा 
तभी पूर्ण समर्पण होगा
और जब गोपियाँ इस भाव में डूब गयीं
जब दिव्य रस के अलौकिक 
अप्राकृत मधु रस में छक गयीं 
फिर ना देह का भान रहा 
जब प्रेमी आत्मविस्मृत हो जाता है
तब उसका दायित्व प्रियतम पर आ जाता है
जब प्रभु ने देखा 
इनका पूर्ण समर्पण हुआ
इन्हें ना कोई भान रहा
तब मर्यादा की रक्षा हेतु
उनको वस्त्र दिया
और उन्हें हकीकत का भान कराया
शारदीय रात्रि में कामना पूर्ण का वचन दिया
यहाँ प्रभु ने साधना सफल होने की
अवधि निर्धारित की
जिससे स्पष्ट हुआ 
प्रभु में काम विकार की 
ना कल्पना हुई 
कामी (आम) मनुष्य अगर वहाँ होता
वस्त्रहीन स्त्रियों को देख
क्षणमात्र भी ना वश में रहता 
जो वस्त्र प्रभु सम्मुख जाने में
विक्षेप उत्पन्न करते थे
वो ही वस्त्र प्रभु स्पर्श से
प्रसाद स्वरुप हुए
इसका कारण भगवान से 
सम्बन्ध दर्शाता है
जब प्रभु ने वस्त्र स्पर्श किया
तब प्रभु स्पर्श से वस्त्र भी
अप्राकृत रसात्मक हो गए
कहने का ये तात्पर्य हुआ
संसार तभी तक 
विक्षेपजनक होता है
जब तक ना साधक का
भगवान से सम्बन्ध और
भगवान का प्रसाद ना बन जाता है
तब वो प्रभु का स्वरुप ही बन जाता है
आनंद में सराबोर हो जाता है
उसके लिए तो नरक भी
बैकुंठ बन जाता है
स्थूलताओं से परिवेष्ठित 
मानव बुद्धि जड़ बँधन तक ही
सीमित रहती है
प्रभु की दिव्य चिन्मयी लीलाओं की
कल्पना भी नहीं  कर सकती है
कोई यदि कृष्ण को
भगवान ना भी माने
तब भी तर्क और युक्ति के आगे
कोई बात ना टिक पाती है
जो कृष्णे के चरित्र पर 
लांछन लगाती हो
मात्र ग्यारह वर्ष की अवस्था तक
प्रभु ने बृज में वास किया
और रास लीला का समय 
यदि दसवां वर्ष माना जाये
और नवें वर्ष में मानो
चीरहरण लीला हुई
कैसे कोई कह सकता है
आठ नौ वर्ष के बालक में
कामोत्तेजना हुई
गर गाँव की ग्वालिनें
प्रभु की दिव्यता को जानतीं
तो कैसे उनके लिए
इतना कठिन व्रत करतीं
आज भी राम- सा वर पाने को
कुंवारी कन्या व्रत रखती हैं
वैसे ही उन कुमारियों ने
कृष्ण को पाना चाहा
और व्रत पूजन किया
फिर कैसे इसमें दोष समाया है
ये तो अज्ञानियों की
तुच्छ बुद्धि को दर्शाता है
ये तो प्रभु ने नग्न स्नान की कुप्रथा
मिटाने को चीरहरण किया
जीव ब्रह्म के बीच
माया का पर्दा हटाना ही
चीरहरण कहलाता है
जिसके भेद अज्ञानी मूढ़ 
ना जान पाता है


क्रमश: ……………

जो होती अलबेली नार



जो होती अलबेली नार 

करती साज श्रृंगार 

प्रियतम की बाट जोहती

नैनो मे उनकी छवि दिखती 

कपोलों पर हया की लाली दिखती 

अधरों पर सावन आ बरसता 

माथे पर सिंदूरी टीका सजता 

जो प्रियतम के मन मे बसता 

जीवन सात सुरों सा बजता  





 जो होती अलबेली नार
तिरछी चितवन से उन्हें रिझाती
नयन बाण से घायल कर जाती
हिरनी सी चाल चल जाती
मतवारी गजगामिनी कहाती 
प्रियतम के मन को भा जाती 
गाता जीवन मेघ मल्हार





जो होती अलबेली नार
बिना हाव भाव के भी
प्रियतम के मन में बस जाती 
अपनी प्रीत से उन्हें मनाती
उनकी सांसें बन जाती 
जीवन रेखा कहलाती 
पाता जीवन पूर्ण श्रृंगार 


जो होती अलबेली नार………..….

टैग का बादल