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Archive for अक्टूबर, 2011

मगर अब धारायें मोडने लगी हूँ

कोई भावुक होता है
तो कोई हँसी की आड मे
दर्द छुपा लेता है
होता है सबके साथ ऐसा भी
और मेरे साथ भी होता है
जब दर्द बहता नही
या सब बांध तोड देता है
 मगर उसे भी ज़िन्दगी का
 एक खूबसूरत हिस्सा मान लेती हूँ
 तो सुकून से जी लेती हूं
अरे अरे ……ये क्या सोचने लगे 

नही……… विदुषी नही हूँ
 साधारण हूँ……आम स्त्री
तुम्हारी तरह्………
मगर अब धारायें मोडने लगी हूँ
अब नही डूबती भंवर मे………
अब बहती हूँ प्रवाह के साथ
अब भावुकता पर मैने नारियल का कठोर आवरण ओढ लिया है
जीना आसान हो जाता है………है ना।


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कुछ चिताएं उम्रभर जलकर भी नहीं बुझतीं


दर्द ऐसे भी कभी छीजता है
ना टपकता है 
ना निकलता है
ना ठहरता है
बस अलाव सा सुलगता है

देखो उम्र की चिता सुलग रही है
और धुंआ भी दमघोटू बन गया है

याद रखना ………बुझी राख भी जला देती है
ठंडे शोले ही छाले बना देते हैं 
फिर चाहे हाथ पर पड़ें या रूह पर 
कभी देखा है जीवित चिता का मृत्यु पूर्व सुलगता तांडव
देख लो आज जी भर के
कुछ चिताएं उम्रभर जलकर भी नहीं बुझतीं 

आखिर रुखसती के भी अपने रिवाज़ होते हैं……

आज एक धडकन तुम्हारे नाम गिरवीं रख रही हूँ
देखो ज़रा संभाल कर रखना अमानत मेरी
बस उस दिन लौटा देना जब रुखसत होउँ जहाँ से
मेरी चिता पर आखिरी आहुति दे देना
बस उस धडकन पर अपना नाम लिखकर
कोई ज्यादा कीमत तो नही मांगी ना ………
आखिर रुखसती के भी अपने रिवाज़ होते हैं……

कृष्ण लीला ………भाग 20







आज कान्हा घर से बाहर
पहली बार निकले हैं
दाऊ दादा संग
दोनो कदम बाहर धरे हैं
बाहर बैठे बैल के
दोनो सींगो को दोनो ने पकडा है
कभी एक इधर से खींचता है
तो दूजा उठ जाता है
तो कभी दूजा खींचता है
तो पहला उठ जाता है
दोनो झूला झूल रहे है
आनन्द मे मग्न हो रहे है
मगर बैल परेशान हुआ
कुछ देर तो बैठा रहा
मगर जब देखा ये तो
तंग किये जाते है
परेशान हो उठ खडा हुआ
अब तो दोनो बालक
सींगो पर झूल गये
और तोरी की तरह लटक गये
जब हाथ छुटने लगे
तब दोनो चिल्लाने लगे
मैया बचाइयो –मैया बचाइयो
शोर सुन
यशोदा रोहिणी दौडी आईं
और दोनो के हाल देख हँसने लगीं
ये कैसे इतने ऊंचे लटक गये
और उन्हे पकडने को दौड पडीं
पर नन्हे हाथ कब तक पकडे रखते
जब तक रोहिणी यशोदा पहुँचती
दोनो धम्म से नीचे पडे
गोबर मे गिर गये
मैया ने उन्हे उठाया है
और सीने से लगाया है
पल्लू से कान्हा को
पोंछती जाती हैं
साथ ही कहती जाती हैं
तुझे कितना संवारूँ सजाऊँ
पर तू गन्दगी मे जा लिपटता है
मुझे लगता है पिछले जन्म मे
तू सूअर था
ये सुन कन्हैया मुस्कुरा रहे हैं
और सोच रहे हैं
जग नियन्ता की माँ होकर
तू कैसे अनपढ़ रह सकती है
माँ तू तो ब्रह्मज्ञानी है
तुझे तो सब पता है
पिछले जन्म मे मैने
सूअर यानी वराह रूप भी
धारण किया था




ऐसी अद्भुत लीलायें
कान्हा करते हैं
कभी गोपियों के  घर जाते हैं
उनके दधि माखन खाते हैं
योगी ॠषि मुनि भी जिनकी
ध्यान मे सुधि ना पाते हैं
वो गोपियों की छाछ पर
नाचे जाते हैं
कभी कोई गोपी
मन मे विचार करती
और कान्हा को याद कर
छींके पर माखन रखती
उसके प्रेममय भाव जान
जब कान्हा आकर खाते हैं
गोपी फ़ूली ना समाती है
आनन्द ना ह्रदय मे समाता
आँखो से छलक छलक जाता
सखियाँ पूछा करतीं
कौन सा तुझे खज़ाना मिला
पर गोपी के मूँह से
ना शब्द निकलता
प्रेम विह्वल गोपी का
रोम रोम पुलकित होता
बहुत पूछने पर इतना ही कह पाती
आज मैने अनूप रूप देखा है
और फिर
वाणी अवरुद्ध हो जाती
अंग शिथिल पड जाते
प्रेमाश्रु बहे चले जाते


क्रमशः —————

सिर्फ एक आत्मदीप जला लिया है……350 वीं पोस्ट









उमंगों का हर दीप अब बुझा दिया है

सिर्फ एक आत्मदीप जला लिया है 

 यहाँ ना पाया कोई अपना

सब जगत है इक बुरा सपना

जिसे भी जाना हमने अपना

उसने ही दिया है हमको धोखा

अँधेरे ने पाँव यूँ फैलाए

हमें ना दिखे उजालों के साये

एक मुट्ठी में अँधियारा घना है

दूजी में उजियारा भरा है

कुछ पाने को कुछ खोना होगा

मिथ्या जगत को छोड़ना होगा

तभी आत्मदीप प्रज्ज्वलित होगा 

और वो ही सार्थक दीपोत्सव होगा

सुना था होता है इक बचपन


सुना था होता है इक बचपन
जिसमे होते कुछ मस्ती के पल
पर हमने ना जाना ऐसा बचपन
कहीं ना पाया वैसा बचपन
जिसमे खेल खिलौने होते
जिसमे ख्वाब सलोने होते
यहाँ तो रात की रोटी के जुगाड़ में
दिन भर कूड़ा बीना करते हैं
तब जाकर कहीं एक वक्त की
रोटी नसीब हुआ करती है
जब किसी बच्चे को
पिता की ऊंगली पकड़
स्कूल जाते देखा करते हैं
हम भी ऐसे दृश्यों को
तरसा करते हैं
जब पार्कों में बच्चों को
कभी कबड्डी तो कभी क्रिकेट
तो कभी छिड़ी छिक्का 
खेलते देखा करते हैं
हमारे  अरमान भी उस 
पल को जीने के 
ख्वाब रचाया करते हैं


मगर जब अपनी तरफ देखा करते हैं
असलियत से वाकिफ हो जाते हैं
सब सपने सिर्फ सपने ही रह जाते हैं
कभी भिखारियों के 
हत्थे चढ़ जाते हैं
वो जबरन भीख मंगाते हैं
हमें अपंग बनाते हैं 
तो कभी धनाभाव में 
स्कूल से नाम कटाते हैं
और बचपन में ही 
ढाबों पर बर्तन धोते हैं
तो कभी गाड़ियों के शीशे 
साफ़ करते हैं
तो कभी लालबत्ती पर
सामान बेचा करते हैं

यूँ हम बचपन बचाओ 
मुहीम की धज्जियाँ उडाया करते हैं 
बाल श्रम के नारों को 
किनारा दिखाया करते हैं
पेट की आग के आगे
कुछ ना दिखाई देता है
बस उस पल तो सिर्फ
हकीकत से आँख लड़ाते हैं 
और किस्मत से लड़- लड़ जाते हैं
बचपन क्या होता है
कभी ये ना जान पाते हैं
जिम्मेदारियों के बोझ तले
बचपन को लाँघ 
कब प्रौढ़ बन जाते हैं
ये तो उम्र ढलने पर ही 
हम जान पाते हैं
सुलगती लकड़ियों की आँच पर
बचपन को भून कर खा जाते हैं
पर बचपन क्या होता है
ये ना कभी जान पाते हैं 

तुम होते तो………

तुम होते…..तो जरुर दीपावली होती….

नहीं हो ….. दिवाली फिर भी है

ना तेरे रहने से ना तेरे जाने से

दिवाली पर कोई फर्क पड़ा 


तुम होते ……..तो जरूर दीप जलते
नहीं हो ………..फिर भी दीप तो जले हैं 
मगर अश्रु घृत में इंतजार की बाती को
आहों की अग्नि से प्रज्वलित किया है 

तुम होते ………तो जरूर पूजन होता
नहीं हो ……….पूजन तो हुआ है
मगर तुम्हारी यादों को ह्रदय की तश्तरी में 
सजाकर कसक के अक्षत कुमकुम से नवाज़ा है 

तुम होते ………तो जरूर अमावस भी रौशन होती 

नहीं हो …………तब भी रौशन तो हुई है 
मगर तेरी मोहब्बत के निशानों ने 
हृदयतम पर छाये घनेरे अँधेरे पर 
याद का दिया जलाया है 

तुम नहीं हो ……..फिर भी दिवाली तो है ना
क्या हुआ ……..जो गुलाब खिल ना सके 
क्या हुआ ………जो मोहब्बत के दीप जल ना सके
दिवाली के लिए कब वजूदों की जरूरत हुई है 
तेरे होने के अहसास ने ही मेरी अमावस रौशन कर दी है …………




दोस्तों पहली लाइन ( तुम होते तो…….जरूर दिवाली होती ) 


मायामृगजी की फेसबुक पर पढ़ी तो इस रचना का जन्म हो गया. 

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