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Archive for अक्टूबर, 2012

तेरी हसरत, तेरी कसम मेरी जाँ लेकर जायेगी

मेरी नज़रों के स्पर्श से 
नापाक होती तेरी रूह को
करार कैसे दूँ 
बता यार मेरे 
तेरी इस चाहत को
“कोई होता जो तुझे तुझसे ज्यादा चाहता”
इस हसरत को 
परवाज़ कैसे दूँ
तुझे तुझसे ज्यादा 
चाहने की तेरी हसरत को
मुकाम तो दे दूँ मैं
मगर
तेरी रूह की बंदिशों से
खुद को 
आज़ाद कैसे करूँ यार मेरे
प्रेम के दस्तरखान पर
तेरी हसरतों के सज़दे में
खुद को भी मिटा डालूँ
मगर कहीं तेरी रूह
ना नापाक हो जाये
इस खौफ़ से 
दहशतज़दा हूँ मैं
अस्पृश्यता के खोल से 
तुझे कैसे निकालूँ
इक बार तो बता जा यार मेरे
फिर तुझे 
“तुझसे ज्यादा चाहने की हसरत” पर
मेरी मोहब्बत का पहरा होगा
तेरे हर पल 
हर सांस 
हर धडकन पर
मेरी चाहत का सवेरा होगा
और कोई 
तुझे तुझसे ज्यादा चाहता है 
इस बात पर गुमाँ होगा
बस एक बार कसम वापस ले ले
“अस्पृश्यता”  की
वादा करता हूँ
नज़र का स्पर्श भी
तेरे अह्सासों को
तेरी चाहत को
तेरी तमन्नाओं को
मुकाम दे देगा
तेरी रूह की बेचैनियों को
करार दे देगा
तेरे अन्तस मे 
तुझे तू नही
सिर्फ़ मेरा ही 
जमाल नज़र आयेगा
कुछ ऐसे नज़रों को
तेरी रूह में उतार दूँगा
और मोहब्बत को भी
ना नापाक करूँगा
मान जा प्यार मेरे
वरना
तेरी हसरत, तेरी कसम
मेरी जाँ लेकर जायेगी ……………
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" इसे प्रश्नोत्तरी कहो या वार्तालाप या आरोप प्रत्यारोप "…भाग 4


प्रभो

ना जाने कौन सा खेल खेल रहे हो
क्यों मन में सवालों के भंवर उठा रहे हो
ये तो तुम ही जानो 
क्या है तुम्हारी माया
मैं तो जीव परवश हूँ
इसलिए जो प्रश्न रूप में तुम 
अवतरित हुए हो
उसे ही तुम्हारे सम्मुख रखता हूँ
आखिर शब्द “मै” ने फिर एक प्रश्न उठाया
लो फिर प्रश्नों की गंगा लेकर
मै तुम्हारे सम्मुख आया
इस बार तुम जरूर अनुत्तरित होंगे
तुम्हें हराना मेरा मंतव्य नही
बस ये भी तुम्हारी ही
कोई माया दिखती है
जिसे तुम्हारे सम्मुख
तो लाना होगा और
खुद को प्रश्न जाल से
बाहर निकालना होगा 
तुम कहते हो 
मैंने जीव को धरती पर भेजा
सिर्फ भगवान को पाने के लिए
और ये आकर यहाँ
विषय विकारों
घर गृहस्थी के चक्कर में
मुझको भूल गया
इसलिए इसे अपने पास बुलाने को
अपनी याद दिलाने को 
कभी कभी विपदाएं देता हूँ
और अपनी याद कराता हूँ
अरे भगवन ये कैसा तुम्हारा कृत्य हुआ?
ऐसे तो तुमने खुद को ही 
महिमामंडित किया 
अपने “मैं ” को प्रधान बताया
सिर्फ अपने को ही 
पुजवाना चाहा 
दूसरी बात 
तुम कहते हो 
जीव तुम्हारा ही अंश है
या कहो 
हर रूप में तुम ही विराजते हो
तो बताओ तो जरा
यदि जीव रूप में तुम ही हो
और जीव भी “मैं मैं “
ही करता है
अपने लिए ही जीता है 
तो क्या बुरा करता है
जब तुम “मैं हूँ एक ब्रह्म”
इस सत्य को उद्घाटित करते हो
तो क्या तुम खुद नहीं
“मैं” के भंवर में फंसते हो 
और अपने ” मैं ” को संतुष्ट करने के लिए
ये अजीबो गरीब चक्रव्यूह रचते हो 
जब घर गृहस्थी में फंसाया है
तो जीविकोपार्जन हेतु
कार्य तो उसे करना होगा
जीवन सञ्चालन के लिए 
उद्योग भी करना होगा
और उसमे झूठ सच का 
सहारा भी लेना ही पड़ता है
हर काम सिर्फ तुम्हारे नाम पर ही
तो नहीं चल सकता है ना
फिर जब सब तुम्हारा है
सब में तुम हो
तो बताओ
भिन्नता कैसी ?
कौन किससे भिन्न हुआ ?
जीव रूप में भी तुम
ईश्वर तो हो ही तुम
तो जीव ने “मैं” कहा 
तो क्यों तुम्हें बुरा लगा
क्या वो “मैं” कहने वाला
तुम ना हुए?
क्या वो “मैं” तुमसे भिन्न हुआ ?
और खुद को खुद से पुजवाना
अपनी याद दिलाना 
ये तो सब तुम्हारे ही 
क्रियाकलाप हुए ना
फिर कैसे जीव इनका कर्ता और भोक्ता हुआ ?
जब हर रूप में तुम ही 
विराजते हो
जब तुम कहते हो
तुम्हारी इच्छा के बिना 
पत्ता तक हिलता नहीं
फिर यहाँ किसे किससे भिन्न कर रहे हो ?
क्यों ये भेद बुद्धि बनाई तुमने
जो जीव और ब्रह्म में फंसाई तुमने
पहले तुम ही सही निर्णय कर लो
कि तुम जीव हो या ब्रह्म
कि तुम ही हर जीव में समाये हो ना नहीं
कि हर रूप में तुम ही तुम होते हो
सब कल्पना विलास हो या यथार्थ
हर रूप , भाव , शब्द, कथन
सबमे तुम्हारा ही तो रूप समाया है
फिर बताओ तो जरा
कौन किससे जुदा है
फिर कौन ये नट का खेल खेलता है 
भोले भक्त की बातें सुन
प्रभु मुस्काते हैं
मन ही मन हर्षित होते हैं
जानते हैं ना 
ये प्रश्न हर दिल में उठता है
शायद तभी आज 
इसे कहने की इसने हिम्मत की है
जो हर कोई नहीं कर पाता है
यदि करता है तो उसके
प्रश्नों का ना सही उत्तर मिलता है 
प्रभु बोले 
प्यारे भक्त मेरे
क्यों तू भूलभुलैया में फंसता है
एक तरफ तू खुद ही कह रहा है
कि सब करने वाला मैं ही हूँ
तो सोच जरा
तेरे मन में उठने वाला प्रश्न 
भी मैं ही हूँ
और जवाब देना वाला भी मैं ही हूँ
मेरी शक्ति अदम्य है
मुझसे ना कुछ भिन्न है
जब नटवर कहा है तो
उसकी जादूगरी में भी 
तो फंसना होगा
गर उसका हर खेल जान लिया 
तो बताओ तो जरा
वो कैसा जादूगर हुआ
फिर भी बतलाता हूँ
हाँ ………मैं हूँ रचयिता
मैं ही हर रूप में समाया हूँ
सब मेरा ही क्रियाकलाप है
कुछ भी ना मुझसे भिन्न है
मैंने ही ये खेल रचा है
मैं ही कार्य, कारण और कर्ता, भोक्ता हूँ 
मैं ही जगत नियंता हूँ
क्या मैं खेल नहीं रच सकता हूँ
बस खेल ही तो खेल रहा हूँ
फिर तू क्यों उलझन में पड़ता है
क्यों नही निर्विकार होकर रहता है
जब तू जान गया 
मेरे सत्य रूप को पहचान गया
फिर क्यों भेद बुद्धि में फंसता है
बस सब आशा, तृष्णा ,अहंता, ममता 
राग- द्वेष, जीवन- मृत्यु, हानि -लाभ 
सब को छोड़ एक मेरा निरंतर ध्यान धर
मुझमे ही अपने स्वरुप का विलय कर 
बस एक बार अपने सब कर्म 
मुझको अर्पण कर दे
फिर मुझमे ही तू मिल जायेगा 
सारे कर्म बंधनों से मुक्त हो जायेगा 
बात तो प्रभु फिर वहीँ आ गयी
जब सब तुम्हारा है
तुम ही कर्ता भोक्ता हो
फिर मेरी क्या हस्ती है ?
कैसे मैं खुद को नियंत्रित कर सकता हूँ
सब तुम्हारा रचाया तो खेल है
उसमे मैं कैसे विघ्न उत्पन्न कर सकता हूँ
क्या मेरे हाथ में तुमने कुछ दे रखा है
क्या मैं अपनी मर्जी से कुछ कर सकता हूँ
नहीं ना ……….तो ये अर्पण समर्पण भी
सब तुम्हारा है
तुम ही जानो
कराओ तो सही ना कराओ तो सही
क्योंकि मेरी दृष्टि में तो 
तुम ही सब करने वाले हो
मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि सबमे 
तुम ही तो समाये हो
और सबके नियंत्रणकर्ता भी तुम ही हो
तो भला मैं कैसे स्वतंत्र हुआ 
मैं तो तुम्हारे हाथ की वो कठपुतली हूँ
जिसे जैसे चाहे नचाते हो
अब ये प्रश्न रूप में भी तुम ही हो
और उत्तर रूप में भी तुम ही हो
फिर भला मेरी क्या हस्ती है
अब मान भी जाओ 
अपने ” मैं ” के पोषण के लिए
तुम ही भिन्न रूप रखते हो
स्वयं को महिमामंडित करते हो
मानो प्रभु ……….तुम भी “मैं ” के जाल से ना मुक्त हो 
ज्ञान के शिखर पर पहुँच कर भी
अज्ञानता के तम में फँस जाता है 
जीव ऐसे ही तो उसके 
चक्रव्यूह में फँस जाता है
जब ये अजीबो गरीब प्रश्न 
उसके मन में उठते हैं
उफ़ ! ये कैसा अजब जाल बिछाया है 
आज तो जग नियंता पालनकर्ता भी
अपने जाल में फँस गया 
मंद मंद मुस्काता है 
मगर कह कुछ ना पाता है 
बस यही तो भक्त और भगवन की 
अजब गज़ब लीलाएं चलती हैं
जो नए नए रूप बदलती हैं 
मगर सत्य हर युग 
हर काल मे एक ही रहता है 
करने कराने वाला तो
 सिर्फ़ वो ही होता है 
हम तो सिर्फ़ माध्यम बनते हैं 
और इसी बल पर ऐंठे फ़िरते हैं 
जरा सी ढील देता है तो 
पतंग लहराने लगती है 
और जरा सी खींच दे तो 
सही राह पर चलने लगती है 
बस कटने से पहले तक ही 
ये प्रश्न मन मे उठते हैं 
जिनके उत्तरों मे हम 
जनम जनम भटकते हैं 
जो उत्तर पा जाता है 
वो निरुत्तर हो जाता है 
ये भी कोई माया है 
ये भी कोई खेल होगा 
यूँ ही तो नही बिना कारण प्रश्नोत्तरी रूप धरा होगा 
हाँ , आज तुम्हें एक नया नाम दे दिया …………मेरे प्रश्नोत्तर! 
शायद ये भी प्रीत का ही कोई रंग होगा 
यूँ ही तो नही ये नाम तुम्हें मिला होगा ……खुश तो हो ना !!!!!!


मेरे पैर नही भीगे ……………देखो तो !!!

मेरे पैर नही भीगे
देखो तो
उतरे थे हम दोनों ही
पानी के अथाह सागर में
सुनो………जानते हो ऐसा क्यों हुआ?

नहीं ना …………नहीं जान सकते तुम
क्योंकि
तुम्हें मिला मोहब्बत का अथाह सागर
तुम जो डूबे तो
आज तक नहीं उभरे
देखो कैसे अठखेलियाँ कर रही हैं
तुम्हारी ज़ुल्फ़ें
कैसे आँखों मे तुम्हारी
वक्त ठहर गया है
कैसे बिना नशा किये भी
तुम लडखडा रहे हो
मोहब्बत की सुरा पीकर
और देखो………इधर मुझे
उतरे तो दोनों साथ ही थे
उस अथाह पानी के सागर मे ………
मगर मुझे मिली ………रेत की दलदल
जिसमें धंसती तो गयी
मगर बाहर ना आ सकी
जो अपने पैरों पर मोहब्बत का आलता लगा पाती
और कह पाती ………
देखो मेरे पैर भी गीले हैं ……भीगना जानते हैं
हर पायल मे झंकार का होना जरूरी तो नहीं …………
सिमटने के लिये अन्तस का खोल ही काफ़ी है
सुना है
नक्काशीदार पाँव का चलन फिर से शुरु हो गया है
शायद तभी
मेरे पैर नही भीगे ……………देखो तो !!!

इसे प्रश्नोत्तरी कहो या वार्तालाप या आरोप प्रत्यारोप…3

प्रभु और भक्त की नोंक झोंक अब अगले मुकाम पर आ पहुँची ………

अगला प्रश्न भक्त ये करता है
प्रभु एक तरफ तुम ये कहते हो
तेरा योगक्षेम मैं वहन करूंगा
तू बस मेरा चिंतन कर
और जब भक्त ऐसा करता है
फिर भी तुम अपनी कलाबाजियों से 
बाज नहीं आते हो
और बीच बीच में उसे 
किसी ना किसी तरह सताते हो
बताओ भक्त कैसे निश्चिन्त हो
जब तुम ही उसे धोखा देते हो
और कठिन परीक्षा की आग में झोंक देते हो
बेचारा भक्त तो निश्चिन्त हो जाता है
अपना हर कर्म , हर सोच , हर विचार 
सब तुम्हें ही अर्पण कर देता है
जहाँ वो अपना कुछ नहीं मानता है
फिर बताओ तो जरा 
तुम कैसे ऐसे भक्त को
परीक्षा की उलझन में डाल देते हो
क्या तुम्हारा दिल नहीं पिघलता है
माना सुना है कि आँच की कसौटी पर
ही सोना कुंदन बनता है 
मगर जिसे तुमने छू लिया हो
जो पारसमणि बन गया हो
उसे अब और क्या प्रमाणित करने को रहा
कहीं ऐसा तो नहीं
तुम्हें इस खेल में ज्यादा मज़ा आता है
और अपनी सत्ता का अहसास कराकर 
तुम आनंदित होते हो
हाय रे मेरे प्यारे ! तू भी आज मुझे
अजब भक्त मिला है
जिसने मेरे सारे खेलों को खोला है
मैं यूँ ही नहीं ऐसे खेल रचता हूँ
पात्र देखकर ही उसमे जल भरता हूँ
ये सब अपने लिए नहीं करता हूँ
जब देखता हूँ मटका पक चुका है
तभी उसे जल में प्रवाहित करता हूँ
ताकि बाकी सब भी उसका अनुसरण करें
और जल्द से जल्द मुझसे आ मिलें
क्योंकि भक्त और मुझमे जब 
कोई भेद नहीं रहता है
तो भक्त पीड़ा भी वहन नहीं करता है
वो सुख दुःख से परे हो जाता है
हर कृत्य में उसे मेरा खेल ही नज़र आता है
और वो भक्ति भाव से 
उसकी पूर्णता में अपनी 
भागीदारी निभाता है
मगर दोष ना कोई मढ़ता है
क्योंकि दो हों तो दोष मढे
खुद को कैसे कोई खुद ही आरोपित करे
जब भक्त ये जान लेता है
तभी तो परीक्षा पर खरा उतरता है
अब तुम्हारी बात ही मैं कहता हूँ
जब तुम ये कहते हो 
मुझमे और जीव में कोई भेद नहीं
मैं ही हर रूप में समाया हूँ
सब मेरा ही लीला विलास है
ना कोई जीव है ना ब्रह्म 
सब मेरा ही रूप मुझमे व्याप्त है
तो फिर प्रश्न कैसा और किससे?
बोलो प्यारे भोले भक्त 
जब सब मैं हूँ 
अपनी परछाईं से खेलता हूँ
तो कहो तो जरा 
सुख में भी मेरा रूप समाया है
और दुःख में भी तो मेरा ही अंतस अकुलाया है
मैं ही मैं चारों तरफ छाया है
फिर तुम पर क्यूँ पड़ी
इन प्रश्नों की छाया है
तुम चाहे दो मानो चाहे एकोअहम 
मगर भेद नहीं कर सकते हो
सुनकर भक्त का माथा झुक गया
वो प्रभु के चरणों में नतमस्तक हुआ
उसे समझ सब आ गया
इसे  प्रश्नोत्तरी कहो या वार्तालाप या आरोप प्रत्यारोप 
इसका भेद भी पा गया
ये पूछने वाला भी एक ब्रह्म है
और जवाब देने वाला भी 
वो ही सर्वस्व  है
बस अपने किस रूप को कैसे प्रस्तुत करना है
किस रूप से क्या काम लेना है
किसे कैसे खुद से मिलाना है
कैसे खुद में समाना है
ये सब प्रभु का ही आनंद विलास  है 
जहाँ कोई ना दूजा अस्तित्व प्रगट होता है
ये तो प्रभु की लीला का मात्र एक अंश होता है
खुद से खुद की प्रश्नोत्तरी 
खुद से खुद के जवाब
खुद से खुद की पहचान
सब उनका है दृष्टि विलास
वास्तव में तो प्रभु ने अपनी सत्ता दर्शायी है
और अपने खेल में अपनी भागीदारी ही निभाई है
फिर कहाँ और कौन भक्त
कैसा समर्पण कैसा बँधन
सब उसी का उसी में आनंद समाया है 
बस दृष्टि भेद से फर्क समझ नहीं आया है
अब भक्त की जय कहो या भगवान की 
इसका प्रश्नकर्ता हो या उत्तरदाता 
सब मे वो ही था समाया 
बस माध्यम मुझे था बनाया 
या कहो वो खुद ही इस रूप मे उतर आया
और एक नया पन्ना इस तरह लिखवाया 
जिसे भिन्न रुपों मे वो गा चुका है
पर एक बार फिर से दोहराया 
भूला बिसरा पाठ फिर से याद करवाया 
प्रभु हैं अजब अजब है उनकी माया 

जिसमे “मै” का ना कोई वजूद कहीं पाया

क्रमश:……………

"कागज़ ही तो काले करती हो "

तोड़ने से पहले तोडना
और जोड़ने से पहले जोड़ना
कोई तुमसे सीखे
कितनी आसान प्रक्रिया है
तुम्हारे लिए
ना जाने कैसी सोच है तुम्हारी
ना जाने कैसे संवेदनहीन होकर जी लेते हो
जहाँ किसी की संवेदनाओं के लिए
कोई जगह नही होती
होती  है तो सिर्फ एक सोच
अर्थ की दृष्टि से
अगर आप में क्षमता है
आर्थिक रूप से कुछ कर पाने की
तब तो आप की कोई जगह है
वर्ना आपका नंबर सबसे आखिरी है
बेशक दूसरे आपको सम्मान देते हों
आपके लेखन के कायल हों
मगर आप के जीवन की
यही सबसे बड़ी त्रासदी होती है
आप अपने ही घर में घायल होती हो
नहीं होता महत्त्व आपका
आपके लेखन का
आपके अपनों की नज़रों में ही
और आसान  हो जाता है उनके लिए कहना
क्या करती हो ………”कागज़ ही तो काले करती हो “
फिर चाहे बच्चे हों या पति
बेटा हो या बेटी
उनकी सोच यहीं तक सीमित होती है
और वो भी कह जाते हैं
आपका काम इतना जरूरी नहीं
पहले हमें करने दो
इतने प्रैक्टिकल हो जाते हैं
कि संवेदनाओं को भूल जाते हैं
उस पल तीर से चुभते शब्दों की
व्याख्या कोई क्या करे
जिन्हें पता ही नहीं चलता
उनके चंद लफ़्ज़ों ने
किसी की इमारत में कितनी दरारें डाल दी हैं
और दिलोदिमाग में हथौड़े से बजते लफ्ज़
जीना दुश्वार करते हैं
और सोचने को मजबूर
क्या सिर्फ आर्थिक दृष्टि से सक्षम
स्त्री का कार्य ही स्वीकार्य है
तभी उसके कार्य को प्रथम श्रेणी मिलेगी
जब वो आर्थिक रूप से संपन्न होगी
और उस पल लगता है उसे
शायद किसी हद तक सच ही तो कहा किसी ने
क्या मिल रहा है उसे …………कुछ नहीं
क्योंकि
ये वो समाज है
जहाँ अर्थ ही प्रधान है
और स्वान्तः सुखाय का यहाँ कोई महत्त्व नहीं …………..
शायद इसीलिये
हकीकत की पथरीली जमीनों पर पड़े फफोलों को रिसने की इजाज़त नहीं होती ……………….

इसलिये आखिरी नहान कर लिया है मैने

1)
देखो ना

आज जरूरत थी मुझे
चादर बदलने की
रंगों से परहेज़ जो हो गया है और तुम
इबादत के लिये माला ले आये
तुलसी की तुलसी के लिये
क्या अपना पाऊँगी मैं
तुम्हारे रंगों की ताब को
जो बिखरी पडी है
शीशम सी काली देह पर
जिसको जितना छीलोगे
उतनी स्याह होती जायेगी
यूँ भी ओस मे भीगे बिछोनों पर कशीदाकारी नही की जाती
फिर कैसे अल्हडता की डोरियों को साँस दोगे
जो हाँफ़ने से पहले एक ज़िरह कर सके
अब यही है तुम्हारी नियति शायद
उम्र भर का जागरण तो कोई भी कर ले
तुम्हें तो जागना है मेरी रुख्सती के बाद भी
पायलो को झंकार देने के लिये
घुंघरूओं का बजना सुना है शुभ होता है
………

2)
आह! …………
कितनी बरसात होती रही
और चातक की ना प्यास बुझी
बस यही अधूरापन चाहिये मुझे
नही होना चाहती पूरा
जानते हो ना
पूर्णता की तिथि मेरी जन्मपत्री मे नही है
वैसे भी देह के आखिरी बीज पर
एक रिक्तता अंकित रहती है अगली उपज के लिये
फिर क्यों ट्टोलते हो खाली कनस्तरों मे इश्क के चश्मे
क्योंकि कुछ चश्मे ख्बाहिशों की रोशनाई के मोहताज़ नही होते
कभी डूबकर देखना भीगे ना मिलो तो कहना
पीठ पर मेरी उंगलियों की छाप मेरे होने का प्रमाण देगी
यहाँ प्यासों के शहर बारिशों के मोहताज़ नही होते…………

3)
नमक वाला इश्क यूँ ही नही हुआ करता
एक कंघी, कुछ बाल और एक गुडिया तो चाहिये 
कम से कम  जिसकी तश्तरी मे
कुछ फ़ांक हों तरबूज़ की और कुछ फ़ांक हों मासूमियत की
डाल कर देखना कभी तेल सिर मे
आंसुओं के बालों मे तरी नही होगी, कोइ वट नही होगा
होगा तो बस सिर्फ़ और सिर्फ़ एक नमकीन अहसास
जो खूबसूरती का मोहताज़ नही होता ,
जो उसकी रंगत पर कसीदे नही पढता
बस इबादत करता है और ये जुनून यूँ ही नही चढता
इश्क की मेहराबदार सीढियाँ
देखा ना कितनी नमकीन होती हैं
दीवानगी की चिलम फ़ूँकना कभी मौसम बदलने से पहले

4)
इश्क की सांसों पर थिरकती हर महज़बीं
मीरा नही होती , राधा नही होती
और मैं आज भी खोज मे हूँ
उस नीले समन्दर मे खडे जहाज की
जिसका कोई नक्शा ही नहीं
सिर्फ़ लहरों की उथल पुथल ही पुल बन जाती है
धराशायी मोहब्बत के फ़ूलों की
जिसकी चादर पर पैर रख
कोई आतिश जमीन पर उतरे और खोल मेरा सिमट ले …………


5)

मोहब्बत के कोण
त्रिआयामी नही हुआ करते 

जिसे कोई गणित सुलझा ले
और नयी  प्रमेय बना दे

इसलिये आखिरी नहान कर लिया है मैने
अब मत कराना स्नान चिता पर रखने से पहले
…………

अंकुरण की संभावना हर बीज मे होती है

लगता है मुझे
कभी कभी डरना चाहिये
क्योंकि डर मे एक
गुंजाइश छुपी होती है
सारे पासे पलटने की…
डर का कीडा अपनी
कुलबुलाहट से
सारी दिशाओं मे
देखने को मज़बूर कर देता है
फिर कोई भी पैंतरा
कोई भी चेतावनी
कोई भी सब्ज़बाग
सामने वाले का काम नही आता
क्योंकि
डर पैदा कर देता है
एक सजगता
एक विचार बोध
एक युक्तिपूर्ण तर्कसंगत दिशा
जो कभी कभी
डर से आगे जीत है
का संदेश दे जाती है
हौसलों मे परवाज़ भर जाती है
डर डर के जीना नही
बल्कि डर को हथियार बनाकर
तलवार बनाकर
सजगता की धार पर चलना ही
डर के प्रति आशंकित सोच को बदलता है
और एक नयी दिशा देता है
कि
एक अंश तक डर भी हौसलों को बुलन्दी देता है
क्योंकि
अंकुरण की संभावना हर बीज मे होती है
बशर्ते उसका सही उपयोग हो
फिर चाहे डर रूपी रावण हो या डर से आँख मिलाते राम
जीत तो सिर्फ़ सत्य की होती है
और हर सत्य हर डर से परे होता है
क्योंकि
डर की परछाईं तले
तब सजगता से युक्तिपूर्ण दिशा मे विचारबोध होता है
और रास्ता निर्बाध तय होता है………
अब डर को कौन कैसे प्रयोग करता है
ये तो प्रयोग करने वाले की क्षमता पर निर्भर करता है………

टैग का बादल