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Archive for नवम्बर, 2013

दो शब्दों के बीच के खालीपन को भरने के लिये

तुम और मैं
दो शब्द भर ही तो हैं
बस इतना ही तो है
हमारा वज़ूद
जो कब शब्दकोष की भीड में
खो जायेंगे
पता भी नहीं चलेगा
फिर भी प्रयासरत रहते हैं
दो शब्दों के बीच के खालीपन को भरने के लिये
जानते हो
ये दो शब्दों के बीच जो खाई होती है ना
उसमें ही सम्पूर्ण दर्शन समाया है
जीवन का, उसकी उपलब्धियों का
सार क्या है खालीपन का
ये खोजना है ?
और खोज के लिये दूरी जरूरी होती है
मैं से तुम तक की
और तुम से मैं तक की
ताकि गर उस सिरे से तुम चलो
और इस सिरे से मैं तो
प्रतिबिम्बित हों आईने में
और भेद मिट जाये खालीपन का
दो शब्दों की दूरी का
क्योंकि शब्द ही तो अक्षर ब्रह्म है
शब्द ही तो प्रणव है
शब्द ही तो ओंकार है
शब्द की तो साकार है
फिर कैसे रह सकता है दरमियाँ कोई परदा खालीपन का………
बस चिन्तन और विश्लेषण की दरकार ही
खोज को पूर्ण करती है जिसका मुडाव अन्दर की तरफ़ होता है
सत्य की तरफ़ होता है ……
और यही खालीपन ही तो सत्य है
क्योंकि सत्य निराकार होता है……तुम और मैं के बीच भी और उनके साथ भी

हवाओं ने रुख बदलना शुरु कर दिया है

तडपती नहीं
घिघियाती नहीं
मिमियाती नहीं
कसमसाती नहीं
तुम्हारे अहम को अब 
पो्षित करती नहीं
जान गयी हूँ अपने होने का औचित्य
अच्छा हो ……ये भेद तुम भी 
जल्द ही समझ लो 
क्योंकि
हवाओं ने रुख बदलना शुरु कर दिया है


बालार्क की तीसरी किरण



बालार्क की तीसरी किरण कैलाश शर्मा :


बालार्क काव्य संग्रह के तीसरे कवि की अनुभूतियों और संवेदनाओं से मिलवाती हूँ। 


कैलाश शर्मा की रचना “अनुत्तरित प्रश्न” एक अशक्त से सशक्ति की और बढ़ती माँ के ह्रदय की वेदना है जिसमें बेटी के जन्म पर खड़े होते प्रश्न को शायद  अब उत्तर मिल गया है। 

“अब मैंने जीना सीख लिया ” ज़िन्दगी की हकीकत बयां करती रचना है पीछे मुड़कर देखने की आदत कैसे आगत को दुखी कर देती है उससे कवि  ने मुक्ति पायी है जब उसे हकीकत समझ आयी है जो इन पंक्तियों में उद्धृत हुआ है :अब पीछे मुड़कर मैं क्यों देखूं /सूनी राहों पर चलना सीख लिया। 

बहुत बहाये हैं आंसू इन नयनों ने / अब तो बाकि कुछ तर्पण रहने दो /चाहत के बीज क्यों बपोये थे ? / क्यों फल पाने कि इच्छा कि ?/ कुछ समय दिया होता खुद को /मन होता आज न एकाकी /देख लिए हैं बहुत रूप तेरे जीवन /अब चिरनिद्रा में मुझे शांति से सोने दो………एकाकीपन की वेदना का सजीव चित्रण करती रचना “क्यों अधर न जाने रूठ गए ?” . ज़िन्दगी के आखिरी पड़ाव का एकांत कैसे घुन की तरह खाता जाता है और अंदर से कितना खोखला कर देता है कि इंसानी मन विश्राम की और कूच करने को आकृष्ट होने लगता है , जरूरी है वो वक्त आने से पहले कुछ वक्त खुद के लिए जीना या खुद के लिए कुछ ऐसा संजो लेना जो इस एकाकीपन से मुक्ति मिल सके का भाव देती रचना सोचने को मजबूर करती है। 

कल की तलाश में /निकल जाता आज /मुट्ठी से / रेत की तरह …. कविता “ख्वाहिशें ” की चंद पंक्तियाँ मगर सब कुछ कहने में सक्षम जिसके बाद कुछ कहने की शायद जरूरत ही नहीं । सारी ज़िन्दगी कुछ ख्वाहिशों की डोर पकडे दौडते हम जान ही नही पाते कब वक्त हाथ से फ़िसला और सरक गया और ख्वाहिशों  की फ़ेहरिस्त में ना कोई कमी हुयी।

कीमोथेरपी का ज़हर /जब बहने लगता नस नस में /अनुभव होता जीते जी जलने का / जीने कि इच्छा मर जाती /सुखकर लगती इस दर्द से मुक्ति/ मृत्यु कि बाँहों में /जीवन और मृत्यु कि इच्छा का संघर्ष /हाँ, देखा है मैंने अपनी आँखों से ………… कैंसर की भयावहता का इससे इतर  सटीक चित्रण और क्या होगा ?”जीवन और मृत्यु का संघर्ष ” कविता मानो खुद जी कर लिखी हो कवि ने , किसी अपने को पल पल उस पीड़ा से गुजरते देखा हो और कुछ ना करने में जब खुद को असमर्थ पाया हो तो उस दर्द की अनुभूति को शायद यूं लिख कर कुछ कम कर पाया हो तभी तो कविता के अंत में कवि ने आखिर स्वीकार ही लिया इस सत्य को कुछ इस तरह : आज भी जीवंत हैं / वे पल जीवन के / काँप जाती है रूह /जब भी गुजरता/ उस सड़क से। रौंगटे खड़े करने को काफी है कविता में उपजी दिल दहला देने  वाली पीड़ा। 


जीवन के विभिन्न आयामों से गुजरते  कवि ह्रदय ने अपने अनुभवों की पोटली से एक एक कर ज़िन्दगी की हर हकीकत से रु-ब -रु करवाया है।  जब तक कोई भुक्तभोगी ना हो नही व्यक्त कर सकता इतनी सहजता से ज़िन्दगी की तल्खियों, दुश्वारियों , खामोशियों , एकाकियों से।  यूँ ही नहीं प्रस्फुटित होते शब्दबंध जब तक ह्रदय में पीड़ा का समावेश ना हो , जब तक कोई खुद ना उन अनुभवों से गुजरा हो और कवि वो सब कहने में सक्षम है जो आम जीवन में घटित होता है मगर हम उन्हें पंक्तिबद्ध नहीं कर पाते। 
अगली कड़ी में मिलते है एक नए कवि से.…। 

मैं स्वयम्भू हूँ


मेरा मैं 

मुझसे बतियाने आया 
अपनी हर अदा बतलाने आया 

मैं 
स्वयम्भू हूँ 
मैं 
अनादि हूँ 
मैं 
शाश्वत हूँ 
हर देश काल में 
न होता खंडित हूँ 
एक अजन्मा बीज 
जो व्याप्त है कण कण में 

मैं 
अहंकार हूँ 
मैं 
विचार हूँ 
मैं 
चेतन हूँ 
स्वयं के शाश्वत होने 
का विचार करता है पोषित 
मेरे अहंकार को 
क्योंकि चेतन भी 
मैं ही हूँ 
विचारों को , बोध को 
सुषुप्ति से जाग्रति की और ले जाना 
यही तो है मेरी चेतनता 
फिर कैसे न हो मुझमे 
सात्विक अहंकार 
मेरे मैं होने में 

जड़ चेतन मेरी ही अवस्था 
ये मेरा ही एक हिस्सा 
ज्ञानबोध चेतना की चेतन अवस्था 
अज्ञानावस्था चेतना की जड़ अवस्था 
मुझसे परे न कोई बोध 
मुझसे परे न कोई और 
मैं ही मैं समाया हर ओर 
दृष्टि बदलते बदलती सृष्टि का 
मैं ही तो आधार हूँ 
तू भी मैं 
मैं भी मैं 
धरती , गगन , जड़ जीव जंतु 
सभी मैं 
फिर कौन है जुदा किससे 
ज़रा करो विचार 
विचार ही ले जाएगा तुम्हें बोधत्त्व की ओर 
और बोध ले आएगा तुममें आधार 
निर्मल मृदु मुस्कान खिलखिलाएगी 
जब मैं की सृष्टि की कली तुम में खिल जायेगी 
फिर खुद से अलग ना पाओगे कुछ 
खुद ही मैं में सिमट जाओगे तब …………

" तेरे नाम के पीले फूल " ………मेरी नज़र से



 ” तेरे नाम के पीले फूल ” मोहब्बत से सराबोर इश्क की दास्ताँ है जहाँ सिर्फ और सिर्फ प्रेम ही प्रेम समाहित है।  ढूंढने निकलो तो खुद को ही भूल जाओ , प्रेम की तासीर में बह जाओ और अपना पता ही भूल जाओ।  और क्या चाहिए भला एक पाठक को , अपने दिल की आवाज़ जब कहीं   उसे सुनाई देती है तब कहाँ भान रहता है दीन और दुनिया का।  एक प्रेम के नगर में प्रवेश करने के बाद बस प्रेम रस में प्रेमी बन बह जाता है।  बस यही तो आकर्षण है जो “तेरे नाम के पीले फूल “काव्य संग्रह में नीलम मेदीरत्ता ने संजोया है ।सभी कवितायेँ अपनी ओर आकर्षित करती हैं इस तरह कि बरबस दिल की खूंटियों पर टंगे अरमान मचलने लगते हैं , कुछ अपनी सी कहानी कहती लगती हैं कवितायेँ तो अनायास एक तारतम्य सा बन जाता है और यही किसी लेखक का सबसे बड़ा पुरस्कार होता है जब उसके पाठक को उसकी रचनाओं में अपना अक्स, अपने पीड़ा , अपनी ज़िन्दगी नज़र आती है .


“प्रेम पिंजरा ” प्रेम का पिंजरा होता ही ऐसा है जिसमे एक बार कैद हो जाओ तो उम्र  निकल सकता और फिर उसमे जब स्त्री प्रेम करती है तो पूरी शिद्दत से करती है ये पुरुष जनता है तभी तो जब वो खुद को आज़ाद करने को कहती है तो वो कह उठता है —-
मूर्ख !! अगर तुझे आज़ाद ही करना था /तो मैं प्रेम क्यों सिखाता / खोल देता हूँ पींजरा।/ अगर उड़ सकती है तो उड़ जा। …………. 
इसके बाद कहने को क्या बचा भला ?

“प्रेम का प्याला “जिसने प्रेम का प्याला पिया या जिसने ये गर्ल पिया उसे भला पीने को क्या बाकि रहा और प्रेम दीवाने तो सबको अपना सा बन्ने कि ही इच्छा रखते हैं फिर चाहे किसी विश्वामित्र कि तपस्या भंग हो या मीरा बन प्रेम का प्याला पिया हो।  


नीलम की कवितायेँ प्रेम का ताजमहल बनाती हैं जहाँ उनकी कविता अधूरी है गर मुकम्मल न हो पाये ज़िन्दगी की आरज़ू कुछ ऐसा ही भाव संजोया है “अधूरी कविता “मे तो “खुद से प्यार ” कविता में खुद को चाहने के भाव इतनी सहजता से उतरे हैं कि किसी को भी खुद से प्यार हो जाये। 


अब जहाँ प्रेम होगा तो वहाँ दर्द भला कैसे पीछे रहेगा वो तो उसका जन्म जन्म का संगी साथी है।  कैसे हिल मिल आँख मिचौली खेल करते हैं दोनों क्या किसी से छुपा है तभी तो “रुदाली” में स्त्री के जीवन की पीड़ा रात के चौबारे पर कैसे मातमपुर्सी करती है और सुबह के मुहाने पर कैसे ओस सी खिलती है इसका बहुत ही मार्मिक चित्रण किया है। 

“तेरी तस्वीर ” , “तेरा नाम ” , ” पीले फूल ” ” द्वार नहीं खटखटाती हूँ ” सभी कवितायेँ प्रेम के विभिन्न आयामों से गुजरती एक प्रेमिका के समर्पण और प्रेम का आख्यान है जहाँ वो खुद को हर पल जी रही है प्रेम के घूँट भर भर पी रही है मगर फिर भी ना तृप्त हो रही है। 

आगे में पकाते पकाते मुझे /उसके हाथ भी जले /मैं तपी पर सोना न बन सकी / रख बन गयी / एक चिंगारी आज भी सुलगा करती है मुझ में कहीं / और वक्त का खेल देखो / आज कोई मुझे कुम्हार / और खुद को कच्ची मिटटी कह गया / और मैंने झट रख में अपने हाथों कि हड्डियां छुपा ली……………… “कच्ची मिटटी ” कविता जैसा चाहे ढाल लो के भाव को पुख्ता करती है तो साथ में कहती है अपना बना लो या मुझे मुझसे जुदा  कर दो , हूँ तुम्हारा ही हिस्सा बस तुम एक नेक दुआ तो करो। 

“नागराज ” कविता प्रेम का डंक जिसे लगा बस वो ही तो जी उठा के भाव को मुखरित करती प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाती है तो ” क़त्ल ” में तो जैसे रूह के कत्लेआम पर रूह भी कसमसाती है।  

संवेदनशील मन प्रहार करता है “सुनो ! लड़कों ” कविता के माध्यम से आज दिए जाने वाले संस्कारों पर जो उसी तरह बोने जरूरी हैं जैसे एक लड़की में रोपित किये जाते हैं।  
कुछ कड़वी लगी न / हाँ ऐसी ही हूँ मैं / ज्यादा  कड़वी /ज्यादा सच्ची /ज्यादा नशीली /
वैधानिक चेतावनी : सिगरेट पीना स्वस्थ्य के लिए हानिकारक है 
“सिगरेट सी हूँ मैं ” कविता में स्त्री के मनोभावों को प्रस्तुत करती कवयित्री ज़िन्दगी की तल्खियों को भी उतार देती हैं। 

बोधि प्रकाशन से प्रकाशित कविता संग्रह प्रेम की दुनिया का भ्रमण तो कराता ही है साथ में मन को भी भ्रमर सा  बहा ले जाता है जो हर  कविता पर पीहू पीहू सा पुकार लगाता है।  मन के तारों पर प्रेम की सरगम जब गुनगुनाती है तब मधुर संगीत उपजता है जिसमे डूबे रहने को जी चाहता है।  बस यही तो हैं ” तेरे नाम के पीले फूल ” जो सहेजे हैं कवयित्री ने जाने किन किन गलियों से गुजरते हुए , किन किन पड़ावों पर ठहरते हुए क्योंकि मोहब्बत के शाहकार यूं ही नहीं बना करते जब तक इश्क के चिनार नहीं खिला करते।  

नीलम और बोधि प्रकाशन को बधाई और शुभकामनाएं देते हुए यही कहूँगी कि ७० रूपये बेशक किताब की कीमत हो मगर कवयित्री के भाव अनमोल हैं जिन्हे जब पाठक पढ़ेगा और उनसे गुजरेगा तभी समझेगा और ऐसे भावों को पढ़ने और उसमे डूबने के लिए ये कीमत कोई ज्यादा नहीं। 

तो दोस्तों यदि आप इस संग्रह को पढ़ने की इच्छा रखते हों तो बोधि प्रकाशन या नीलम मेंदीरत्ता से संपर्क कर सकते हैं :

ईमेल :neelammadiratta@gmail.com

बोधि प्रकाशन 
दूरभाष : ०१४१-२५०३९८९।  ९८२९०-१८०८७ 

ईमेल: bodhiprakashan@gmail.com 

मुझे तो महज तमाशबीन सा खड़ा रहना है

आजकल कुछ नहीं दिखता मुझे 

ना संसार में फैली आपाधापी 
ना देश में फैली अराजकता 
ना सीमा पर फैला आतंक 
ना समाज में फैला नफरतों का कोढ़ 
ना आरोप ना प्रत्यारोप 
कौन बनेगा प्रधानमंत्री 
किसकी होगी कुर्सी 
कौन दूध का धुला है 
किसने कोयले की दलाली में 
मूंह काला किया है 
किस पर कितने भ्रष्टाचार 
के मामले चल रहे हैं 
कौन धर्म की आड़ में 
मासूमों का शोषण कर रहा है 
कौन वास्तव में धार्मिक है 
कुछ नहीं दिखता आजकल मुझे 
जानते हैं क्यों 
देखते देखते 
सोचते सोचते 
रोते रोते 
मेरी आँखों की रौशनी जाती रही 
श्रवणरंध्र बंद हो गए हैं 
कुछ सुनाई नहीं देता 
यहाँ तक की अपने 
अंतःकरण की आवाज़ भी 
अब सुनाई नहीं देती 
फिर सिसकियों के शोर कौन सुने 
और मूक हो गयी है मेरी वाणी 
जब से अभिव्यक्ति पर फतवे जारी हुए 
वैसे भी एक मेरे होने या ना होने से 
कौन सा तस्वीर ने बदलना है 
जोड़ तोड़ का गुना भाग तो 
राजनयिकों ने करना है 
मुझे तो महज तमाशबीन सा खड़ा रहना है 
और हर जोरदार डायलोग पर तालियाँ बजाना है 
और उसके लिए 
आँख , कान और वाणी की क्या जरूरत 
महज हाथ ही काफी हैं बजाने के लिए 
तुम कहोगे 
जब हाथ का उपयोग  जानते हो 
तो उसका सदुपयोग क्यों नहीं करते 
क्यों नहीं बजाते कान के नीचे 
जो सुनाई देने लगे 
जुबान के बंध  खुलने लगें 
आँखों के आगे तारे दिखने लगें 
बस एक बार अपने हाथ का सही उपयोग करके देखो 
है ना …… यही है ना कहना 
क्या सिर्फ इतने भर से तस्वीर बदल जाएगी 
मैं तुमसे पूछता हूँ 
क्या फिर इतने भर से 
घोटालों पर ताले लग जायेंगे 
क्या इतने भर से 
हर माँ , बहन , बेटी सुरक्षित हो जाएगी 
रात के गहन अँधेरे में भी वो 
सुरक्षित घर पहुँच जायेंगी 
क्या इतने भर से 
हर भूखे पेट को रोटी मिल जायेगी 
क्या फिर कहीं कोई लालच का कीड़ा किसी ज़ेहन में नहीं कु्लबुलायेगा 
क्या हर अराजक तत्व सुधर जाएगा 
क्या कानून सफेदपोशों के हाथ की कठपुतली भर नहीं रहेगा 
क्या फिर से रामराज्य का सपना झिलमिलायेगा 
क्या सभी कुर्सीधारियों की सोच बदल जायेगी 
और उनमे देश और समाज के लिए इंसानियत जाग जायेगी 
गर मेरे इन प्रश्नों की उत्तर हों तुम्हारे पास तो बताना 
मैं हाथ का सदुपयोग करने को तैयार हूँ ………एक आज्ञाकारी वोटर की तरह 
जबकि जानता हूँ 
राजनीति के हमाम में सभी वस्त्रहीन हैं  और मैं महज एक तमाशबीन 

तब तक मेरी भावनाओं से खेलना तुम्हारा अपराध नहीं

आओ खेलो मेरी भावनाओं से 

ठगो मेरे विश्वास को 
करो मेरी आस्था का क़त्ल 
खूं करना कितना आसाँ जो है 
क्या हुआ जो मेरा भरोसा टूटा 
क्या हुआ जो मेरी संवेदनायें सूखीं 
क्या हुआ जो मेरा मन अब बंजर हुआ 
तुम तो कुकुरमुत्तों से उगते रहोगे 
तुम तो मेरी भावनाओं का बलात्कार करते रहोगे 
क्योंकि 
नपुंसक हो गया है समाज 
नपुंसक हो गयी है मानवीयता की जमीन 
तभी तो 
नहीं दिखती तुम्हें आज 
हर स्त्री में माँ , बहन और बेटी 
तभी तो 
करते हो तुम बलात्कार 
कभी बाबा बनकर 
कभी नेता बनकर 
कभी कलम का सिपाही बनकर 
तो कभी गली चौराहे पर घूमता 
हवस का पुजारी बनकर 
कैसे और कहाँ और कब तक मैं सुरक्षित हूँ 
कानून की धज्जियाँ तुम उड़ाते हो 
मुझे किसी ना किसी तरह 
अपने चंगुल में फंसाते हो 
कभी हमदर्द बनकर 
कभी मसीहा बनकर 
तो कभी शिकारी बनकर 
आह ! मेरे विश्वास की नींव को 
दीमक बन खोखला कर दिया तुमने 
अब सोचती हूँ तो पाती हूँ 
स्त्री विमर्श के नारों में भी मेरा 
महज उपयोग भर किया तुमने 
मानो बच्चे को मन बहलाने को 
बस झुनझुना दिया तुमने 
जबकि पाशविक मानसिकता पर अपनी 
नकेल ना कसा तुमने 
फिर कैसे सुरक्षित रह सकती हूँ 
ये ना सोचा मैंने 
इसलिए 
जब तक मैं खुद के लिए खुद ही 
कोई पुख्ता ज़मीन नहीं बनाती 
जब तक मैं खुद अपने लिए खुद ही 
अपनी आवाज़ नहीं उठाती 
तब तक 
मेरी भावनाओं से खेलना तुम्हारा अपराध नहीं 
सिद्ध कर दिया तुमने ……………… 

इंसानियत की तहजीबों के नकाब उघाड़ना कोई तुमसे सीखे ……… क्या कहूँ तुम्हें 
इंसान कह नहीं सकती 
तो कह दूं तुम्हें क्या हैवान …………ओ पुरुष रूप में छुपे आदम के छद्म रूप !!!

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