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Archive for दिसम्बर, 2008

ख़ुद को मिटाया था जब सोचा था किसी को पा लेंगे
मगर ख़ुद को मिटाकर भी उसको ना पा सकें
वो मेरा कभी हुआ ही नही मुझको भी अपना बनाया नही
इस कांच से नाज़ुक रिश्ते को उसने कभी अपनाया ही नही
फिर क्या हो उस कोशिश का जो मैं हमेशा करती रही
तुझको पाने की कोशिश में ख़ुद को भी भुलाती रही

यादें

आजकल यादों के पन्ने फिर उखड़ने लगे हैं
हर पन्ने पर एक गहरी याद कुच्छ याद दिलाती है
हम इन यादों को फिर से जीने लगे हैं
आइना बन कर हर याद सामने आ जाती है
और हम इन यादों के समुन्दर में गोते खाने लगे हैं
दिल में यादों के भंवर हैं बड़े गहरे
हम तो इनमें फिर से डूबने लगे हैं
यादों को फिर से जीना इतना आसां नही होता
न जाने कितनी मौत मरकर जिया जाता है

राहुल गाँधी के नाम

आज के अख़बार हिंदुस्तान में मैंने एक ख़बर पढ़ी की राहुल गाँधी एक दलित सुनीता के घर गए उसके बच्चों के पास पहनने को कपड़े भी नही थे और पिता कपड़े इसलिए पह्न्ताथा ताकि बच्चे भूख से न मरें और वो कुछ काम कर ला सके ………मगर मैं कहती हूँ कि वो बच्चे यदि भूख से न भी मरे तो सर्दी से मर जायेंगे ,मुसीबत तो तब भी कम नही हुयी उनके सिर से………….मेरा दिल सुबह से उसी बारे में सोचे जा रहा है ……………….क्या हम उनके लिए कुछ नही कर सकते ………….आज हमारा देश nuclear पॉवर बन गया है मगर हमारी जनता आज भी वहीँ उसी नरक में जी रही है ……………….क्या राहुल गाँधी ने इस मुद्दे को उठाया………………..क्या उनके लिए कुछ किया………..हो सकता है किया हो मगर और भी न जाने कितनी सुनितायें और उनके बच्चे इससे भी बुरी हालत में जी रहे हैं…………………उनके लिए उन्होंने क्या सोचा………………………….हो सकता है कुछ सोचा हो और करना चाहते हों मगर क्या जो वो करना चाहते हैं वो उन तक पहुँच पायेगा ………….इसका कोई इंतजाम किया उन्होंने…………………..मेरी एक राय है …………….क्यूँ नही राहुल देश की हर माता बहन से एक अपील करते कि उन गरीबों के लिए कुच्छ सोचें ………………….वैसी ही अपील जैसी अभी देल्ही विधानसभा चुनावों में हुयी थी की वोट देना जरूरी है वरना पप्पू कहलाओगे ………………..टीवी के मध्यम से बिल्कुल उसी प्रकार जैसे वोटिंग के लिए की उनके लिए भी करें …………क्या गरीबी की रेखा से ऊपर रहने वाले लोगों में इतनी भी दया या vivek नही होगा की वो इस अपील को समझ पाएं ……………….उदाहरण के लिए ……….अगर आज इतनी बड़ी आबादी में से कम से कम २०-२५ करोड़ लोग तो ऐसे होंगे ही जो इस पर ध्यान दें ………….अगर उनसे कहा जाए हर घर एक कपड़ा अपने घर से उनके लिए दो जिन्हें इतना भी नसीब नही की वो तन ढँक सकें तो क्या कोई इस पर ध्यान नही देगा…………………..हर इन्सान उनके लिए कुछ न कुछ करना चाहेगा और इससे करीबन इतने ही दलितों को एक छोटी सी सहायता से तन ढंकने को कपड़ा नसीब हो जाएगा…………..हर गृहिणी उनके लिए कुछ न कुछ देना चाहेगी क्यूंकि हम अपने न जाने कितने ही कपड़े मन से उतर जाते हैं तो छोड़ देते हैं तो क्या एक पहल उनके लिए नही कर पाएंगे ………………राहुल आज के युवा हैं उनसे ये उम्मीद है की वो इस दर्द को समझते हैं और इस सब के लिए कुछ ऐसा करेंगे जिससे वो सब उन्ही को मिले जिनके लिए किया गया है न की आज के भ्रष्ट नेता या अफसर उसे हड़प लें ………….एक अपील ऐसी एक बार अगर वो कर दें तो सारी जनता उनका साथ देने को तैयार हो जाए ……….बस एक कोशिश , एक पहल की जरूरत है……………….तभी देश की असली तरक्की है ।
जो कोई भी इस लेख को पढ़े कृपया आगे प्रेषित करे ।

क्यूँ

क्यूँ हर बार नारी को ही अग्निपरीक्षा देनी पड़ी
क्यूँ हर बार नारी के सर ही हर दोष मढा गया
क्यूँ हर बार उसके हर निर्णय का अपमान किया गया
क्यूँ हर बार पुरूष के दंभ का शिकार बनी
हर अच्छाई का श्रेय नर को ही क्यूँ
क्यूँ हर बुराई का ठीकरा हर बार
नारी के ही सर फोड़ा गया
क्या उसका कोई अस्तित्व नही
क्या वो कोई इन्सान नही
क्या फर्क है नारी और नर में
क्या नारी का यूँ तिरस्कार कर
पुरूष सफलता पायेगा
क्या इतने से ही उसका
पोरुष संबल पा जाएगा
जब शक्ति बिना शक्तिमान
कार्य नही कर पाता है
तो फिर बता ए नर
तू उससे तो बड़ा नही
क्यूँ समझ नही पता है
नारी बिना नर का भी अस्तित्व नही

तुम क्यूँ नही पढ़ पाए मेरा मन आज तक
मैं तो हर मोड़ पर सिर्फ़ तुम्हें ही देखती रही
तुम्हारे लिए जीती रही तुम्हारे लिए मरती रही
मन का सफर तय करना इतना मुश्किल तो न था
इतना वक्त साथ गुजारने के बाद ,उम्र के इस मोड़ पर
अब भी मैं वो ही हूँ फिर तुम क्यूँ बदल गए
मेरे मन में आज भी वहीँ उमंगें हैं
वही अरमान हैं,वही चाहतें हैं
तुमने उन्हें कहाँ दफ़न कर दिया
आज फिर से वो ही पल
हम क्यूँ नही जी पाते
माना वक्त सब कुछ बदल देता है
मगर मन तो हमारा वो ही रहता है
क्यूँ हम एक ही बिस्तर पर पास होकर भी
मन से दूर हुए जाते हैं
क्या ज़िन्दगी ऐसे ही जी जाती है
कब तक हम अपने अपने
विचारों में गुम एक दूसरे से दूर
अपनी अपनी सोचों में जिए जायेंगे
क्यूँ नही तुम मुझे पढ़ पाते हो
क्या मेरी सदाएं तुम तक पहुंच नही पाती हैं
या फिर तुम सब जानते हो
और तुम भी अपनी ही दुनिया में
कहीं खोये जाते हो
क्यूँ हम अब एक दूसरे से
अपने जज़्बात बाँट नही पाते हैं
क्या उम्र इसी तरह दगा देती है
मुझे पता है कि दोनों तरफ़
प्यार कि कोई कमी नही है
फिर भी मन क्यूँ बंटते जा रहे हैं
हम तो दोनों दो जिस्म एक जान हैं
फिर कहाँ से आया ये तूफ़ान है
आओ इस तूफ़ान को मिटा दें
अपने मन को एक बार फिर से मिला लें
अपने अपने मन को एक दूसरे में कुछ ऐसे
डुबो दें कि फिर कोई तूफ़ान
इन्हें जुदा कर न सके
आओ एक बार फिर से
एक कोशिश करके देखें
एक बार फिर से
एक कोशिश करके देखें

पत्थर

ता-उम्र पत्थरों को पूजा
पत्थरों को चाहा
ये जानते हुए भी
पत्थरों में दिल नही होता
पत्थरों के ख्वाब नही होते
पत्थरों में प्यार नही होता
कोई अहसास नही होता
पत्थरों को दर्द नही होता
कोई जज़्बात नही होते
फिर भी पत्थरों को ही
अपना खुदा बनाया
पत्थरों की चोट खा-खाकर
पत्थरों ने ही
हमको भी पत्थर बनाया
हर अहसास से परे
पत्थर सिर्फ़ पत्थर होते हैं
जो चोट के सिवा
कुछ नही देते

मुझमें न ढूंढ मुझे
राख के ढेर में अब
कोई चिनगारी नही
उम्र भर
इक चिता जलती रही
लकडियाँ कम पड़ गयीं
तो अरमान सुलगते रहे
जब कुछ न बचा
तो राख बन गई
बरसों से पड़ी है ये
कोई इसे भी उठाने न आया
अब तो इस राख पर भी
वक्त की धूल जम गई है
इसे हटाने में तो
जन्मों बीत जायेंगे
फिर बताओ
कहाँ से ,कैसे
मुझे मुझमें पाओगे

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