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Archive for the ‘mere pal’ Category

न जाने कहाँ खो गए हम

जाने कहाँ खो गए हम
बहुत ढूँढा पर कहीं मिले हम
जाने कौन से मुकाम पर है ज़िंदगी
हर मोड़ पर एक इम्तिहान होता है
चाहतों के मायने बदल जाते हैं
जिनका इंसान तलबगार होता है
दुनिया की भीड़ में गूम हुयी जाती हूँ
ख़ुद को ढूँढने की कोशिश में
और बेजार हुयी जाती हूँ
क्या कभी ख़ुद को पा सकेंगे हम
इसी विचार में खोयी जाती हूँ

रिश्ते

रिश्ते

मौसम की तरह रंग बदलते यह बेलिबास रिश्ते,
वक़्त की आँधियों में ना जाने कहॉ खो जाते हैं,
हम रिश्तों की चादर ओढ़े हुये ऐसे मौसम में ,
दिल को यह समझाए चले जाते हैं,
मगर रिश्तों का बेगानापन हर पल यह बताता है,
पत्थरों के शहर में अपनों को खोजा जाता नहीं,
हर पल दर्द देते यह रिश्ते बेमानी हैं,
क्यूंकि पत्थरों से पत्थरों को तोड़ा जाता नहीं,
ग़र मौसम कि तरह हम भी बदल जाते हैं,
तो रिश्तों के अर्थ ना जाने कहॉ खो जाते हैं,
फिर क्यों हम ऐसे रिश्तों को ढोने को मजबूर हो,
जिनके लिबास वक़्त के साथ बदल जाते हैं

कुछ तो है

कुछ तो है जो दिल को सुकून नहीं मिलता
कहीँ चैन कहीँ आराम नहीं मिलता
ना जाने यह दिल क्या चाहता है
हर वक़्त कहीँ खोया रहता है
इसको ढूँढा बहुत मगर कहीँ मिलता नहीं
ना जाने कौन सी गलियों में गुम हो गया
इसकी ख्वाहिशों का कहीँ पता नहीं मिलता
कैसे मिले सुकून वो दवा नहीं मिलती
अरमानों को कहीँ मंजिल नहीं मिलती
कुछ तो है जो खो गया है
जिसे पाने के लिए ये दिल बेचैन हो गया है
दिल को खुद का पता नहीं मिलता
कुछ तो है जो दिल को सुकून नहीं मिलता

दिल कहीँ खो गया

आज ना जाने क्या हो गया है ,यह दिल कहीँ खो गया है,
ना पूछो किधर ना पूछो कहॉ,बस कहीँ गुम हो गया है,
ना कोई याद है ना कोई ख्वाहिश फिर भी कहीँ कुछ है,
जिसे ढूँढने के लिए बेचैन हो गया है,
हाँ आज यह दिल कहीँ खो गया है,
कहॉ ढूँढें इसे यह तो आज मचल गया है,
किसी भूली बिसरी याद में उलझ गया है,
कुछ तो है जिसे पाने को मचल गया है,
कैसे पता लगाऊं इसकी चाहत का,
क्या इसे चाहिऐ,बताता भी नहीं,
इस दिल का पता किसी को मिल जाये ,
तो मुझे भी बताना जरूर क्यूंकि
आज यह दिल कहीँ खो गया है,कहीँ खो गया है………………….

ख्वाब

मैंने एक ख्वाब देखा है ,चाहतों का बाज़ार देखा है,
यह कौन सी मंज़िल है,जो मिल कर भी नहीं मिलती ,
हर तरफ एक खामोशी सी छाई है , दर्द है तनहाई है,
यह कौन सा मुकाम है जिन्दगी का, जहाँ कुछ नहीं मिलता ,
सिर्फ ख्वाबों को टूटते देखा और जिन्दगी को हाथ से फिसलते देखा ,
अब इस दौर मैं कैसे ख्वाबों को सजाऊँ ?
किसे आवाज़ दूं और किसे बुलाऊं ?

दिल चाहता है

दिल चाहता है आसमान में ऊड़ना,
पंछियों कि तरह उन्मुक्त ऊड़ना ,
बादलों की तरह हवा में तैरना ,
विशाल आकाश को छूना ,
जहाँ ना कोई बंदिश हो ना पहरे,
बस मैं हूँ और मेरी चाहतें हों,
जहाँ मैं सुन सकूं अपने मन कि बात ,
अपनी आवाज़ को दे सकूं शब्द ,
कुछ दिल की कहूं कुछ दिल की सुनूं
और बस आस्मां में ऊड्ती फिरूं ऊड्ती फिरूं ऊड्ती फिरूं।

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