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Archive for नवम्बर, 2012

गुस्ताखियों को कहो ज़रा

गुस्ताखियों को कहो ज़रा 
मेरे शहर के कोने मे ठहर जायें
रात को घूंघट तो उठाने दो ज़रा

कहीं सुबह की नज़ाकत ना रुसवा हो जाये

एक पर्दानशीं का वादा है
चन्दा भी आज आधा है
लबों पर जो ठिठकी है
वो कमसिनी ज्यादा है
ऐसे मे क्यों ना गुस्ताखी हो जाये
जो सिमटी है शब तेरे आगोश मे
उसे जिलावतन किया जाये
एक तस्वीर जो उभरी थी ख्यालों मे
क्यों ना उसे तस्दीक किया जाये

यूँ ही बातों के पैमानों मे

एक जाम छलकाया जाये

रात की सरगोशी पर

चाँदनी को उतारा जाये
फिर दीदार तेरा किया जाये
कि चाँदनी भी रुसवा हो जाये
ये किस हरम से गुज़री हूँ 
इसी पशोपेश में फँस जाये

पर्दानशीनों की महफ़िल में

बेपर्दा ना कोई शब जाए

गुस्ताखियों को कहो ज़रा 
मेरे शहर के कोने मे ठहर जायें…………

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लेखन के संक्रमण काल में

लेखन के संक्रमण काल में
मैं और मेरा लेखन
क्या चिरस्थायी रह पायेगा
क्या अपना वजूद बचा पायेगा
क्या एक इतिहास रच पायेगा
प्रश्नों के अथाह सागर में
डूबता उतराता
कभी भंवर में
तो कभी किनारे पर
कभी लक्ष्यहीन तो
कभी मंज़िल की तरफ़
आगे बढता हिचकोले खाता
एक अजब
कशमकश की उथल पुथल में फ़ंसे
मुसाफ़िर सा
आकाश की ओर निहारता है
तो कभी अथाह जलराशि में
अपने निशाँ ढूँढता है
जबकि मुकाम की सरहद पर
खुद से ही जंग जारी है
नहीं ………ये तो नहीं है वो देश
नहीं ………ये तो नहीं है वो दरवेश
जहाँ सज़दा करने को सिर झुकाया था
और फिर आगे बढने लगती है नौका
ना जाने कहाँ है सीमा
कौन सी है मंज़िल
अवरोधों के बीच डगमगाती
कश्ती जूझती है
अपनी बनायी हर लक्ष्मणरेखा से
पार करते करते
खुद से लडते लडते
फिर भी नही पाती कोई आधार
सोच के किनारे पर खडी
देखती है
सागर में मछलियों की बाढ को
और सोचती है
क्या लेखन के संक्रमण काल से
खुद को बचाकर
रच पायेगी एक इतिहास
जिसके झरोखों पर कोई पर्दा नहीं होगा
कोई बदसलूकी का धब्बा नहीं होगा
जहाँ ना कोई रहीम ना कोई खुदा होगा
बस होगा तो सिर्फ़ और सिर्फ़
ऐतिहासिक दस्तावेज़ अपनी मौजूदगी का
मगर ………क्या ये संभव होगा?
संक्रमण काल में फ़ैलती संक्रामकता से खुद को बचाकर रखना
भविष्य अनिश्चित है
और आशा की सूंई पर
चाहतों की कसीदाकारी पूरी ही हो ………जरूरी तो नहीं
यूँ भी भरी सर्दी में
अलाव कितने जला लो
अन्दर की आग का होना जरूरी है ………शीत के प्रकोप से बचने के लिये
तो क्या …………यही है प्रासंगिकता
भीतरी और बाहरी खोल पर फ़ैली संक्रामकता की ??????

क्योंकि अगर होती सच्चाई तो देते जवाब जरूर …………….

इबारतों के बदलने का समय यूँ ही नहीं आता
एक जूनून से गुजरना पड़ता है इतिहासकारों को
और तुमने मुझे विषय सबसे दुरूह पकड़ा दिया
देखती हूँ
कर जाते हो कानों में सरगोशी सी और
मैं ढूंढती रहती हूँ उसके अर्थ
क्या कहा था
कहीं गलत तो नहीं सुन लिया
क्या चाहा  तुमने
कभी कभी पता ही नहीं चलता
आज भी तुमने कुछ कहा था
तब से बेचैन हूँ
पकड़ना चाह  रही हूँ सिरा
बात प्रेम की थी
तुम्हारे खेल की थी
कैसे भूलभुलैया में डाला है तुमने
मुझसे प्रेम करो
मगर मैं न तुम्हें चाहूँगा
और तुम करो निस्वार्थ प्रेम
वैसे सोचती हूँ कभी कभी
यदि निस्वार्थ प्रेम करना ही है
तो तुमसे ही क्यों
सुना है प्रेम प्रतिकार चाहता है
प्रेमी भी चाहत की परिणति चाहता है
अच्छा बताओ तो ज़रा
कैसा खेला रचाया है तुमने
बस मुझे खोजो
कोई चाहत न रखो
निस्वार्थ चाहो
अब मेरी मर्ज़ी
मैं मिलूँ या नही
दिखूं या नहीं
ये ज्यादती नहीं है क्या
कोई तुमसे करे तो …………
मगर तुमने प्रेम किया ही नहीं कभी
किया होता तो दर्द को जाना होता
और हम मूढ़ हैं न कितने
बिना तुझे देखे तेरे दीवाने हो गए
और अब तुम अपनी चलाते हो
अजब मनमानी है
तुम पर कोई है नहीं न
कान उमेठने के लिए
एक तरफ भुलावे में रखते हो
कर्त्तव्य को ऊंचा बताते हो
दूसरी तरफ कहते हो
मानव मात्र से प्रेम करो
और जब वो प्रेम करता है
तो उसे कहते हो
आपस में प्रेम नहीं
दिव्य प्रेम करो
अरे ये क्या है
है न तुम्हारी दोगली नीति
कैसे संभव हो सकता है ऐसा
जो संस्कार बचपन से पड़े हों
उनसे कैसे छूट सकता है इन्सान
जिसने सदा प्रेम का पाठ  पढ़ा हो
कैसे इन्सान से विमुख हो सकता है
और सिर्फ तुम्हें चाह सकता है
जिसे कभी देखा नहीं
बस सुना है तुम्हारे बारे में
क्या प्रेम खिलवाड़ है तुम्हारे लिए
कि तुम्हें तो बिना देखे करे
और जिनके साथ
बचपन से लेकर एक उम्र तक
तक साथ निभाया हो
उन्हें भूल जाए उनसे प्रेम न करे
और उस पर कहते हो
अब सबसे मुख मोड़ लो
क्या इतना आसान हो सकता है
सब जानते हो तुम
बस हमें ही गोल – गोल
अपनी परिधि में घुमाते हो
लगता है तुमने ऐसा
अपनी सहूलियत के लिए किया है
तभी सामने नहीं आते
बस भरमाते हो
दिव्य प्रेम के नाम पर
क्योंकि सामने आने पर
प्रेम का उत्तर प्रेम से देने पर
घाटे  का सौदा कर लोगे
और रात  दिन सबकी
चाहतों को  पूरा करने में ही लगे रहोगे
आम इन्सान की तरह
और तुम्हें आम इन्सान बनना पसंद नहीं है
तभी खास बने रहते हो
डरते हो तुम
और देखो हमें
कैसे दो नावों की सवारी कराते हो
सोचो ज़रा
दो नावों का सवार कब सागर के पार उतरा है
ये जानते हो तुम
इसलिए अपने मायाजाल में उलझा रखा है
और खुद तमाशा देखते हो
ओ उलझनों के शहंशाह
या तो बात कर
सामने आ
और प्रेम का अर्थ समझा
मगर यूँ कानों में
हवाओं में
सरगोशियाँ मत किया कर
नहीं समझ पाते हम
तेरी कूटनीतिक भाषा
अगर इंसानी प्रेम से ऊंचा तेरा प्रेम है
तो साबित कर
आ उतरकर फिर से धरती पर
और दे प्रेम का प्रतिकार प्रेम से
रहकर दिखा तू भी हमारी तरह
दाल रोटी के चक्कर में फंसकर
और फिर दे प्रेम का उत्तर प्रेम से
और करके दिखा निस्वार्थ प्रेम
गोपी सा प्रेम, राधा सा प्रेम, मीरा सा प्रेम
तब रखियो ये चाहत
कि  प्रेम करो तो निस्वार्थ करो
या दिव्य प्रेम करो
कभी कभी तुम्हारी ये बातें कोरी  भावुकता से भरी काल्पनिक लगती हैं
क्योंकि अगर होती सच्चाई तो देते जवाब जरूर …………….

बस मूक हूँ ………….पीड़ा का दिग्दर्शन करके

मुझमे उबल रहा है एक तेज़ाब
झुलसाना चाह रही हूँ खुद को
खंड- खंड करना चाहा  खुद को
मगर नहीं हो पायी
नहीं ….नहीं छू पायी
एक कण भी तेजाबी जलन की
क्योंकि
आत्मा को उद्वेलित करती तस्वीर
शायद बयां हो भी जाए
मगर जब आत्मा भी झुलस जाए
तब कोई कैसे बयां कर पाए
देखा था कल तुम्हें 

नज़र भर भी नहीं देख पायी तुम्हें
नहीं देख पायी हकीकत
नहीं मिला पायी आँख उससे
और तुमने झेला है वो सब कुछ
हैवानियत की चरम सीमा
शायद और नहीं होती
ये कल जाना
जब तुम्हें देखा
महसूसने की कोशिश में हूँ
नहीं महसूस पा रही
जानती हो क्यों
क्योंकि गुजरी नहीं हूँ उस भयावहता से
नहीं जान सकती उस टीस को
उस दर्द की चरम सीमा को
जब जीवन बोझ बन गया होगा
और दर्द भी शर्मसार हुआ होगा
कहते हैं “चेहरा इन्सान की पहचान होता है “
और यदि उसी पहचान
पर हैवानियत ने तेज़ाब उंडेला हो
और एक एक अंग गल गया हो
मूंह , आँख , नाक , कान
सब रूंध गए हों
न कहना
न सुनना
न बोलना
जीवन की क्षणभंगुरता ने भी
उस पल हार  मान ली हो
नहीं , नहीं , नहीं
कोई नहीं जान सकता
कोई नहीं समझ सकता
उस दुःख की काली रात्री को
जो एक एक पल को
युगों में तब्दील कर रही हो
एक एक सांस
खुद पर बोझ बन रही हो
और जिंदा रहना
एक अभिशाप समझ रही हो
कुछ देर खुद को
गर गूंगा , बहरा और अँधा
सोच भी लूं
तो क्या होगा
कुछ नहीं
नहीं पार पा सकती उस पीड़ा से
नहीं पहुँच सकती पीड़ा की
उस भयावहता के किसी भी छोर तक
जहाँ जिंदा रहना गुनाह बन गया हो
और गुनहगार छूट गया हो
जहाँ हर आती जाती सांस
पोर पोर में लाखों करोड़ों
सर्पदंश भर रही हो
और शरीर से परे
आत्मा भी मुक्त होने को
व्याकुल हो गयी हो
और मुक्ति दूर खड़ी अट्टहास कर रही हो
नहीं ……….शब्दों में बयां हो जाये
वो तो तकलीफ हो ही नहीं सकती
जब रोज खौलते तेज़ाब में
खुद को उबालना पड़ता है
जब रोज नुकीले भालों की
शैया पर खुद को सुलाना पड़ता है
जब रोज अपनी चिता को
खुद आग लगाना पड़ता है
और मरने की भी न जहाँ
इजाज़त मिलती हो
जिंदा रहना अभिशाप लगता हो
जहाँ चर्म , मांस , मज्जा
सब पिघल गया हो
सिर्फ अस्थियों का पिजर ही
सामने खड़ा हो
और वो भी अपनी भयावहता
दर्शाता हो
भट्टी की सुलगती आग में
जिसने युगों प्रवास किया हो
क्योंकि
जिसका एक एक पल
युगों में तब्दील हुआ हो
वहां इतने वर्ष बीते कैसे कह सकते हैं
क्या बयां की जा सकती है
शब्दों के माध्यम से ?
पीड़ा की जीवन्तता
जिससे छुटकारा मिलना
आसान  नहीं दीखता
जो हर कदम पर
एक चुनौती बनी सामने खड़ी दिखती है
क्या वो पीड़ा , वो दर्द
वो तकलीफ
वो एक एक सांस के लिए
खुद से ही लड़ना
मौत को हराकर
उससे दो- दो हाथ करना
इतना आसान है जितना कहना
“जिस पर बीते वो ही जाने “
यूँ ही नहीं कहा गया है
शब्द मरहम तभी तक बन सकते हैं
जहाँ पीड़ा की एक सीमा होती है
अंतहीन पीडाओं के पंखों में तो सिर्फ खौलते तेज़ाब ही होते हैं
जो सिर्फ और सिर्फ
आत्मिक शक्ति और जीवटता के बल पर ही जीते जा सकते हैं
और तुम उसकी मिसाल हो कहकर
या तुम्हें नमन करके
या सहानुभूति प्रदर्शित करके
तुम्हारी पीड़ा को कमतर नहीं आंक सकती
बस मूक हूँ ………….पीड़ा का दिग्दर्शन करके

दोस्तों कल कौन बनेगा करोडपति में धनबाद की सोनाली को देखा और जिस पीड़ा से वो गुजरी उसे जाना , उसे देखा तो मन कल से बहुत व्यथित हो गया और सोच में हूँ तब से कैसे उसने इतने साल एक एक पल मौत से लड़कर गुजारा है ? विकृत मानसिकता ने एक जीवन को कैसे बर्बाद किया ये देखकर मन उद्वेलित हो गया और उसकी पीडा को सोच सोच कर ही दिल कसमसा रहा है क्या थी और क्या हो गयी और कैसे उसने पिछले दस सालों से जीवन को जीया है ……मुझे सिर्फ़ और सिर्फ़ उसकी पीडा ही तडपा रही है जिसे शब्दों में व्यक्त करना नामुमकिन है।

"कुछ" बचा लो ………

यूँ  तो सब मिट चुका है
हर पन्ने से
स्याही से लिखे हर्फ़ों को
कब तक सहेजे कोई
एक बूँद और सब स्वाहा
मगर जानते हो
उस बूँद में लिखे हर्फ़ों को
पढने की कूवत सबमे नही होती
सुना है …………
तुमने सीखा है
अदृश्य तरंगों को पढना
फिर बूँद में छिपी लिखावट
का अपना कायदा होता है
क्या पढा है कभी उस कायदे को
किया है रियाज़ कभी तुमने
रात के अंधेरों में
तन्हाई के आलम में
सर्द हवा के झोंकों मे सिहरते हुये
या अलाव में जलते हुये
गर किया हो तो करना कोशिश पढने की
शायद तब बाँच सको
अलिखित खत की अबूझ भाषा को
और
“कुछ” बचा लो ………उम्र के दरकने से पहले




क्या करते हो तुम ऐसों का ?

देखो प्रभु
सुना है तुमने 
दीनों को है तारा
बडे बडे पापियों 
भी है उबारा
जो तुम्हारे पास आया
तुमने उसका हाथ है थामा
और जिसने तुम्हें ध्याया
उसके तो तुम ॠणी बन गये
जन्म जन्मान्तरों के लिये
तुम खुद कहते हो
फिर चाहे गोपियाँ हों या राधा
तुम उनके प्रेमॠण से 
कभी उॠण नही हो सकते
ये तुमने ही कहा है
मगर मेरे जैसी का क्या करते हो
देखो मै तो नही जानती कोई
पूजन, अर्चन, वन्दन
मनन, संकीर्तन
ना ही कोई 
व्रत , उपवास , नियम करम करती
ना दान  पुण्य मे विश्वास रखती
ना दीनों पर दया करती
क्यूँकि खुद से दीन हीन किसी को ना गिनती
तुम्हारे बताये किसी मार्ग पर नहीं चलती
ना सुमिरन होता
ना माला जपती
ना तुम्हें पाने की लालसा रखती
ना तुम्हे बुरा भला कहती
ना ही गुण है कोई मुझमें
और अवगुणों की तो खान हूँ
बेशक अत्याचार नही करती
मगर तुम्हें भी तो नही भजती
ना मीरा बनती ना राधा
ना शबरी सी बेर खिलाती
ना विदुरानी से प्रेम पगे केले खिलाती
ना बलि सा तुम्हें बांधने 
का प्रयत्न करती
ना भाव विभोर होकर
नृत्य करती
ना पीर इतनी ऊँची करती
जो तुझसे ट्करा जाये
ना ही वन वन भटकती
ना कोई तपस्या करती
ना पाँव मे छाले पड्ते
ना जोगन बनती
और गली गली भटकती
ना तुम्हें बुलाती
ना तुम्हारे पास आती
ना तुम्हारा कहा कुछ सुनती
ना ही तुम्हारा कहा मानती
अपनी ही मन मर्ज़ी करती
बताओ तो ज़रा मोहन प्यारे
ऐसों के साथ तुम क्या करते हो?
क्या मिले हैं तुम्हें
मुझे जैसे भी कोई
जो तुमसे कोई 
आस नही रखते
और ना ही तुम्हें भजते 
क्या करते हो तुम ऐसों का
क्योंकि सुना है
जो जैसे भी तुम्हारे पास आया
चाहे प्रेम से
चाहे मैत्री से
चाहे शत्रुता से
चाहे किसी भी भाव से
चाहे तुम्हें सखा बनाया
चाहे पति या पिता
चाहे बालक या माँ
तुमने सबका उद्धार किया
शत्रु भाव रखने वाले को भी
तुमने तार दिया
अपना परम धाम दिया
मगर मै तो ना तुम्हारे 
पास आती हूँ
ना तुमसे कुछ चाहती हूँ
तो बताओ ना मोहन
मुझ जैसों का तुम क्या करते हो?
क्या मुझ जैसों को भी
वो ही गति देते हो
या दे सकते हो
और खुद को सबका 
हितैषी सुह्रद सिद्ध कर सकते हो
वैसे सुना तो नहीं
ना कहीं पढा
कि तुमने बिना कारण 
किसी को तार दिया हो
और मेरी जैसी
अकर्मण्य तुम्हें 
दूसरी नही मिलेगी
जो तुम्हारी सत्ता को ही
चुनौती देती है
हाँ —आज कहती हूँ 
नही कर सकती
मैं तुम्हारा श्रृंगार
ना है मेरे पास 
आंसुओं की धार
नही कर सकती
अनुनय विनय
क्या फिर भी कर सकते हो
तुम मुझे भवसागर पार
मोहन हो इस प्रश्न का जवाब
तो जरूर देना
मुझे इंतज़ार रहेगा
क्योंकि 
बिना कारण के कार्य नही होता
और मैने ना कोई 
तुम्हारे अनुसार कार्य किया
हो यदि ये चुनौती स्वीकार
तो सिर्फ़ एक बार
तुम जवाब देने जरूर आना
क्योंकि
कोई परीक्षा देने का
मेरा कोई इरादा नहीं है
ना ही तुमसे कोई
वादा लिया है
बस आज तुम्हें ये भी
चैलेंज दिया है
ये भाव यूँ ही नही 
उजागर हुआ है
कोई तो इसका कारण हुआ है
शायद
तभी आज तुम्हारे चमन पर
बिजलियों का पहरा हुआ है
बच सको तो बच जाना …………

अम्बर तो श्वेताम्बर ही है

रंगों को नाज़ था अपने होने पर

मगर पता ना था
हर रंग तभी खिलता है
जब महबूब की आँखों में
मोहब्बत का दीया जलता है
वरना तो हर रंग 
सिर्फ एक ही रंग में समाहित होता है
शांति दूत बनकर ………
अम्बर तो श्वेताम्बर ही है 
बस महबूब के रंगों से ही
इन्द्रधनुष खिलता है
और आकाश नीलवर्ण दिखता है ………..मेरी मोहब्बत सा …है ना !!

टैग का बादल