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Archive for फ़रवरी, 2009

औरत का घर?

सदियों से औरत अपना घर ढूंढ रही है
उसे अपना घर मिलता ही नही
पिता के घर किसी की अमानत थी
उसके सर पर इक जिम्मेदारी थी
हर इच्छा को ये कह टाल दिया
अपने घर जाकर पूरी करना
पति के घर को अपनाया
उस घर को अपना समझ
प्यार और त्याग के बीजों को बोया
खून पसीने से उस बाग़ को सींचा
हर आह,हर दर्द को सहकर भी
कभी उफ़ न किया जिसने
उस पे ये इल्जाम मिला
ये घर तो तुम्हारा है ही नही
क्या पिता के घर पर देखा
वो सब जो यहाँ तुम्हें मिलता है
यहाँ हुक्म पति का ही चलेगा
इच्छा उसकी ही मानी जायेगी
पत्नी तो ऐसी वस्तु है
जो जरूरत पर काम आएगी
उसकी इच्छा उसकी भावना से
हमें क्या लेना देना है
वो तो इक कठपुतली है
डोर हिलाने पर ही चलना है
ऐसे में औरत क्या करे
कहाँ ढूंढें , कहाँ खोजे
अपने घर का पता पूछे
सारी उम्र अपनी हर
हर तमन्ना की
बलि देते देते भी
ख़ुद को स्वाहा करते करते भी
कभी न अपना घर बना सकी
सबको जिसने अपनाया
उसको न कोई अपना सका
आज भी औरत
अपना घर ढूंढ रही है
मगर शायद ………………….
औरत का कोई घर होता ही नही
औरत का कोई घर होता ही नही

>बचपन के वो कोमल कोमल मासूम हाथ
जिनमें खिलोने और गुडिया होनी चाहिए थी
पढने को किताबें होनी चाहिए थी
दो वक्त की रोटी के लिए
घर में चूल्हा जलाने के लिए
छोटे छोटे हाथों से
लकड़ी का बुरादा
बोरियों में ऐसे भर रहे थे
जैसे कोई सेठ
तिजोरी में
सोना समेट रहा हो
उनके लिए तो शायद
वो बुरादा ही
सोने से बढ़कर था
आंखों में शाम की
रोटी के पलते सपने
ऐसे दिख रहे थे
जैसे किसी प्रेमी को
उसका प्यारा मिल गया हो
बचपन में ही
बड़े होते ये बच्चे
पेट के लिए जुगाड़
करना सीख जाते हैं
और इंसान बड़ा होकर भी
कभी इन्हें न जान पाता है
इन पर अपने सपनो का
महल बना लेता है
अपनी आशाओं को
पंख लगा देता है
अपने दामन को
खुशियों के तोहफों से
तो भर लेता है
मगर इतना नही सोचता कि
जितनी शिद्दत से
हमने ऑस्कर को चाहा है
गर इतनी शिद्दत से
इन मासूमों को चाहा होता
तो …………………………….
इनका भविष्य बदल गया होता
मेरे देश को तो तभी
ऑस्कर मिल गया होता

सिलवटें

बिस्तर की सिलवटें तो मिट जाती हैं
कोई तो बताये
दिल पर पड़ी सिलवटों को
कोई कैसे मिटाए
उम्र बीत गई
रोज सिलवटें मिटाती हूँ
मगर हर रोज
फिर कोई न कोई
दर्द करवट लेता है
फिर कोई ज़ख्म
हरा हो जाता है
और फिर एक नई
सिलवट पड़ जाती है
हर सिलवट के साथ
यादें गहरा जाती हैं
और हर याद के साथ
एक सिलवट पड़ जाती है
फिर दिल पर पड़ी सिलवट
कोई कैसे मिटाए

प्यार हो तो ऐसा

बर्फ की मानिन्द
सर्द हाथ को
जो छुआ उसने
कुछ कहने और सुनने
से पहले
वहीँ साँसे
थम गयीं
आँखें पथरा गयीं
और
रूह खामोश हो गई

कुछ नही बचा अब

अब समटने को कुछ नही है
सब कुछ टूट रहा है
बिखर रहा है
दोनों हाथों से
संभाले रखा था जिसे
वो रिश्ता अब
रेत की मानिन्द बिखर रहा है
कतरा कतरा खुशियों का
समेटा था जिस आँचल में
वो आँचल अब गलने लगा है
कब तक आँचल में पनाह पायेगा
इस आँचल से अब तो खून
रिसने लगा है
कब तक कोई ख़ुद की
आहुति दिए जाए
अपने अरमानों की लकडियों से
हवन किए जाए
अब तो लकडियाँ भी
सीलने लगी हैं
किसी के आंसुओं में
भीगने लगी हैं
फिर कैसे इन लकडियों को जलाएं
अरमानों की अर्थी को
कौन से फूलों से सजाएं
अब समेटने को कुछ नही है

मैं तो हाड़ मांस का वो लोथडा हूँ
जिसके पास दिल ही नही
मगर फिर भी
सबके दर्द में तड़पता हूँ
मुझे तो आह भरने का भी अधिकार नही
मगर फिर भी
सबके लिए मैं रोता हूँ
मुझे तो ख्वाब देखने का भी अधिकार नही
मगर फिर भी
सबके ख्वाब मैं पूरे करता हूँ

पिंजरे का पंछी

पिंजरे का पंछी
उडान चाहे जितनी भर ले
मगर लौट कर वापस
जरूर आता है
ये पंछी न जाने
कहाँ कहाँ भटकता है
हर ओर सहारा
ढूंढता है
मगर हर तरफ़
निराशा ही निराशा है
हर ओर
तबाही ही तबाही है
कहीं कोई नीड़ नही ऐसा
जहाँ एक और
घोंसला बनाया जाए
थक कर , हार कर
टूट कर गिरने से पहले
फिर उसी
पिंजरे की ओर भागता है
उसे पिंजरे का मोल
अब समझ आता है
जहाँ उसे वो सब मिला
जिसकी चाह में उसने
उड़ान भरी
पिंजरे को तोड़कर
भागना चाहा
मगर इस पिंजरे में
उसे जो सुकून मिला
वो तो सारी कायनात
में न मिला
जानते हो……………..
ये पिंजरा कौन सा है …………
ये है प्रेम का पिंजरा
ये है समर्पण का पिंजरा
भावनाओं का पिंजरा
अपने अस्तित्व का पिंजरा
त्याग का पिंजरा
अहसासों का पिंजरा
जहाँ ये सब मिलकर
इस पिंजरे को
नया रूप देते हैं
इसे रहने के
काबिल बनाते हैं
क्यूंकि
ये पिंजरा अनमोल है

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