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Archive for अगस्त, 2013

सोच का फर्क

अभी थोडी देर के लिये बैठ पायी तो सबसे पहली पोस्ट तेजेन्द्र शर्मा जी की वाल पर पढी तो वहाँ की सोच पर ये ख्याल उभर आये तो लिखे बिना नहीं रह पायी अब चाहे तबियत इजाज़त दे रही है या नहीं मगर हम जैसे लोग रुक नहीं पाते चाहे बच्चे डाँटें कि मम्मा रैस्ट कर लो अभी इस लायक नहीं हो मगर खुद से ही मज़बूर हैं हम …………तो ये ख्याल उभरा जो आपके सम्मुख है पश्चिमी सोच और हमारी सोच के फ़र्क को इंगित करने की कोशिश की है: 

ये था उनकी वाल पर जो नीचे लिखा है तो उस पर मेरे ख्याल कविता के रूप में उतर आये 


मित्रो

मेरे साथ हैच-एण्ड स्टेशन पर एक सहकर्मी हैं फ़िलिप पामर। उनसे बात हुई कि मुझे यू.पी. हिन्दी संस्थान द्वारा दो लाख रुपये का सम्मान दिया जा रहा है। 

उसने बहुत मासूम अन्दाज़ में पूछा, “Tej, in terms of real money, how much would it be.” मैनें कल के रेट 1 पाउण्ड = 94 रुपये के हिसाब से बता दिया कि क़रीब क़रीब 2,240/- पाउण्ड बनेंगे। मन में कहीं एक टीस सी भी महसूस हुई कि भारत की करंसी Real Money नहीं है।

उसका जवाब था, “That is still a good amount.”



सोच का फर्क 

कर जाता है फर्क 
तुम्हारे और मेरे नज़रिए में 
तुमने सिर्फ पैसे को सर्वोपरि माना 
तुम बेहद प्रैक्टिकल रहे 
बेशक होंगी कुछ संवेदनाएं 
तुम्हारे भी अन्दर महफूज़ 
किसी खिलते गुलाब की तरह 
मगर नहीं सहेजी होंगी तुमने कभी 
उसके मुरझाने के बाद भी 
यादों के तकियों में तह करके 
नहीं पलटे  होंगे तुमने कभी 
अतीत के पन्ने 
क्योंकि तुम हमेशा आज में जिए 
तुम्हारे लिए तुम महत्त्वपूर्ण रहे 
तुम्हारे लिए तुम्हारी प्राथमिकताएं ही 
तुम्हारा जीवन बनी 
जिन्होंने तुम्हें हमेशा उत्साहित रखा 
बस यही तो फर्क है 
तुम्हारी और मेरी सोच में 
मैं और मेरी संवेदनाएं 
सिर्फ कब्रगाह तक पहुँच कर ही दफ़न नहीं हुयीं 
जीवित रहीं फ़ना होने के बाद भी 
एक अरसा गुजरा 
मगर कभी अतीत से बाहर  न निकल पाया 
बेशक आज में जीता हूँ 
मगर 
अतीत को भी साथ लेकर चलता हूँ 
शायद तभी ज्यादा भावुक 
संवेदनशील कहलाता हूँ 
और जीवन के हर पथ पर मात भी खाता हूँ 
जो तुम्हारे लिए महज पैसे की तराजू में 
तोली जा सकने वाली वस्तु हो सकती है 
जिसका अस्तित्व महज चंद  सिक्के हो सकता है 
तुम्हारे लिए 
मेरे लिए मेरे जीवन भर  की उपासना का प्रतिफल है वो 
मेरे लिए मेरे अपनों का भेज शुभाशीष है वो 
मेरे लिए मेरे अपनों का प्रेम है वो 
किसी भी सम्मान को पाना और सहेजना 
गौरान्वित कर जाता है मन : मस्तिष्क को 
मगर तुम ये नहीं समझ सकते 
क्योंकि 
यही कमी कहो या फर्क है तुम्हारी और मेरी सोच में 
ओ पश्चिमी सभ्यता के वाहक मेरे सफ़र के साथी 
मैं भारतीय हूँ सबसे पहले 
जहाँ नहीं तोले जाते सम्मान सिक्कों के तराजू पर 
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एक्सीडेंट हो गया

एक्सीडेंट हो गया एक बच्चे ने स्कूटी से ऐसी ट्क्कर मारी कि किसी के घर की सीढियों पर गिरी और उस सीढी का कोना रिब्स में लग गया ………॥अब रिब्स मे,न तो प्लास्टर लग नहीं सकता इसलिए कम्पलीट बेड रैस्ट ही करना पडेगा ………ना उठ पा रही हूँ और ना बैठ पा रही हूँ बडी मुश्किल हो रही है ……बेहद पेन है ………अभी कुछ दिन अब सक्रियता कम रहेगी।

फिर शोर में दरारें होंगी

फिर शोर में दरारें होंगी 

फिर मौसम में बहारें होंगी 
तू आवाज़ में सच का दम रख तो सही
फिर इंकलाब की पुकारें होंगी


वरना तो देश को खा जायेंगे 
ये गद्दार यूँ ही चबा जायेंगे 
देश के छलिये नेता नया कानून पारित कर 
एक बार फिर से छल जायेंगे

विधेयक जल्द पारित हो जायेंगे 
अपनी सहूलियतों के लिए कानून बन जायेंगे 
मगर दामिनियों के लिए जल्दी विधेयक 
नहीं बना करते 
ना ही उन्हें बिना आन्दोलनों के 
इन्साफ मिला करते 
ये तो खुद की खातिर बिगुल बजायेंगे 
कानून की भी सरे आम धज्जियाँ उड़ायेंगे 

आम जनता की सहूलियतों का क्यूं सोचें 
अपनी कुर्सी  की जडें क्यों न सींचें 
इसी कारण तो सत्ता में आते हैं 
फिर देश की नींव को ही खाते हैं 
यूं सफेदपोश देशभक्त हुक्मरान कहलाते हैं 
जो गलत को गलत और सही को सही न कह पाते हैं 
सिर्फ कुर्सियों के प्रति उनकी निष्ठां होती है 
बस वही तक उनकी अंधभक्ति होती है 

फिर संसद में दागियों मुजरिमों का बोलबाला होगा 
फिर तेरे सत्य का बार बार मूँह काला होगा 
तू एक बार हौसला रख आगे बढ तो सही 
गलत सही को पहचान तो सही 
अपने अधिकार का सदुपयोग कर तो सही 
फिर मौसम का रख जरूर बदला होगा


फिर तेरे मुख से यूं ही ना निकला होगा 
इन्कलाब जिंदाबाद इन्कलाब जिंदाबाद 
मेरा देश रहे हल पल आबाद , हर पल आबाद 

तो क्या ………… यही है जीवन सत्य , जीवन दर्शन

पता नहीं 

एक अजीब सी वितृष्णा समायी है आजकल 
सब चाहते हैं 
अगले जनम हर वो कुंठा पूरी हो जाए 
जो इस जनम में न हुयी हो 
कोई कहे अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो 
कोई कहे अगले जनम मोहे बेटा ही दीजो 
सबकी अपनी अपनी चाहतें हैं 
अपने अपने पैमाने हैं 
मगर जब मैं सोचने बैठी 
तो खाली हाथ ही रही 
पता नहीं कोई सोच आकार ही न ले सकी 
किसी चाहत ने सर ही नहीं उठाया 
एक अजब सी उहापोह से गुजरती हूँ 
कभी सारे जहाँ को मुट्ठी में कैद करना चाहती हूँ 
तो कभी शून्य में समाहित हो जाती हूँ 
सोच किसी अंजाम तक पहुँच ही नहीं पाती 
अब दिल और दिमाग 
चाहत और सोच 
सब रस्साकशी से मुक्त से लगते हैं 
तो क्या 
अवसरवादी हूँ किसी अवसर की प्रतीक्षा में 
कोई अमरता का वरदान मिल जाये और लपक लूं 
या संवेदनहीन हो गयी हूँ मैं 
या निर्झर नीर सी बह रही हूँ मैं 
उत्कंठा मुक्त होकर , चाहत मुक्त होकर 
या जीते जी मुक्त हो गयी हूँ मैं …….विषय योनि से 
नहीं जान पा रही …………..
तितिक्षा , अभिलाषा , प्रतीक्षा ………..कुछ भी तो नहीं मेरी मुट्ठी में 
हाथ खाली हैं अब वैसे ही जैसे आते वक्त थे 
तो क्या …………
यही है जीवन सत्य , जीवन दर्शन 
शून्य से शून्य में समाहित होता …………
सूक्ष्म जगत का सूक्ष्म व्यवहार ……….

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