Just another WordPress.com weblog

Archive for जनवरी, 2011

>मौत! तुम्हारा स्वागत है

>

मौत! तुम्हारा
स्वागत है
तुम ही तो
जीवन का 
शाश्वत
सत्य हो
जीवन 
क्षणभंगुर 
अस्थिर है 
मगर तुम
अटल हो
जीवन
दुश्वारियों 
दुश्चिंताओं 
उलझनों का 
समन्वय है 
मगर तुम
मुक्तिबोध 
कराती हो
हर चिंता से 
मुक्त कराती हो 
मौत तुम तो
दुखो की 
विश्रांति  का 
काल हो 
एक नव सृजन
के लिए 
जीवन को
राह दिखाती हो
तुम 
विध्वंसकारी कहाँ ?
तुम तो 
नव निर्माण 
कराती हो
मौत तुम तो
निरंतर बहता 
झरना हो
जो मुरझाये
टूटे बिखरे 
जीवन को 
नव चेतना 
से पुनर्जीवित 
करती हो
तुम्हारे अनवरत
बहते झरने में 
डुबकी लगाते ही
नव पुष्प सा 
नव जीवन का 
सृजन होता है
मौत तुम ही तो
सृष्टि का आधार हो
संहारक  नहीं
नव सृजन 
की वाहक हो
हाँ  मौत ! 
तुम्हारा 
ह्रदय से
असीम 
स्वागत है 

>अर्थ

>

इतना मुश्किल है क्या
हँसी का अर्थ ढूंढना
अभी तो सिर्फ एक ही
अर्थ कहा है ढूँढने को
गर रोने के अर्थ
ढूँढने पड़ते
तो शायद सदियाँ
गुजर जातीं
और तुम
रीते हाथ
वापस आ जाते
एक मुस्कान चस्पा
करके
और उस हँसी का
अर्थ तब शायद
मैं बता देती
मगर तुम
तुम तो शायद
किसी भी हँसी
का कोई अर्थ
नहीं जानते
या जान कर
अनजान बनते हो
कहीं अर्थ का
अनर्थ ना बन जाये
और कोई हँसी
तुम्हारा पर्याय
ना बन जाये

>मधु हो तुम

>

मधु हो तुम
और मेरी क्षुधा अनंत
सदियों से अतृप्त 


प्रेम सुधामृत हो तुम
और मेरी तृष्णा अखंड 
सदियों से अपूर्ण

अलोकिक श्रृंगार हो तुम
रूप का अनुपम भंडार हो तुम
और मैं प्रेमी भंवरा
सदियों से रूप पिपासु


पूर्ण  हो तुम
और मेरी यात्रा अपूर्ण
सदियों से भटकता
सदियों तक भटकता
अनंत कोटि मिलन
अनंत कोटि विछोह 
अनंत अपूरित
तृष्णाओं का महाजाल 
ओह! पूर्ण , कहो 
अब कैसे अपूर्ण
पूर्ण  हो ?
कैसे विशालता में
बिंदु समाहित हो?
हे पूर्ण तृप्त
करो मुझे भी 
अब पूर्ण तृप्त !

>कभी सोचना इस पर कैसे मै जीती हूँ …………

>

किसी के धरातल पर उतरना
उसके भावों को महसूसना
फिर उन्हे खुद मे समाहित करना
और फिर वापस मुडकर
अपने धरातल पर आना
क्या समझते हो
आसान होता है क्या?
और देखो मै
रोज तुम्हारे धरातल पर
उतरती हूँ
तुम्हे जीती हूँ
तुम्हारी आकांक्षाओं को
सहेजती हूँ
और फिर खुद मे
समाहित करती हूँ
और फिर खुद से लडती हूँ
तब कहीं जाकर
अपने धरातल पर
वापसी कर पाती हूँ

कभी तुम एक बार
मेरे धरातल पर आकर तो देखो
मुझे कुछ पल जीकर तो देखो
मुझमे बहते तूफ़ान से लडकर तो देखो
मेरी भावनाओं मे सिमट कर तो देखो
मेरे मन के आँगन की मिट्टी को छूकर तो देखो
देखना फिर तुम तुम न रहोगे
वापसी की हर राह बंद हो जायेगी
जिधर भी देखोगे सिर्फ़
तुम्हारा ही वजूद होगा
तुम्हारी ही कहानी होगी
तुम्हारा ही ख्याल होगा
तुम्हारा ही दर्द होगा
बताओ फिर कैसे तुम
खुद से बच पाओगे
और मेरे धरातल से
अपने धरातल तक का
सफ़र तय कर पाओगे

ये मन के धरातल
बहुत कमजोर होते हैं
यहाँ साथी कोई नही होता
और जंग बहुत होती है
कभी खुद से तो कभी
भावनाओ से तो कभी
अतृप्त इच्छाओ से
और फिर दूजे के लिये
अपना वजूद मिटाना होता है
तब कही जाकर
अपने धरातल पर
आना होता है
और मुझे पता है
तुम ऐसा कभी नही कर पाओगे
जानती हूँ तुम पुरुष हो ना
तुम्हारी चाहतें
तुम्हारी क्षमतायें
तुम्हारी सीमायें
तुम्हे ऐसा करने से रोकेंगी
तभी मुझे दोनो रूप
जीने पडते हैं
और तुम्हारे धरातल के साथ
अपने धरातल तक का सफ़र
रोज तय करती हूँ
कभी सोचना इस पर
कैसे मै जीती हूँ …………

>फिर कैसा गणतंत्र प्यारे

>

ये कैसा गणतंत्र है प्यारे
ये कैसा गणतंत्र ?

जो करते  घोटाले 
देश को देते  बेच
उसी को हार पहनाते हैं
देश की खातिर 
जान गंवाने वाले तो
रूखी सूखी खाते हैं
ये कैसा गणतंत्र है प्यारे
ये कैसा गणतंत्र ?


चोर- बाजारी, सीना -जोरी
कपट, छल छिद्र 
जो बढ़ाते हैं
ऐसे धोखेबाजों को ही 
सत्ता सिर पर बैठाती है
इमानदार और मेहनतकश तो 
रोज़ ही मुँह की खाते हैं
ये कैसा गणतंत्र है प्यारे
ये कैसा गणतंत्र?


स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति भी
खरीदी बेची जाती है 
त्राहि- त्राहि करती जनता 
महंगाई से पीसी जाती है
हाहाकार मचा हो जहाँ
वहाँ राष्ट्रमंडल खेल कराते हैं
बची -खुची खुशियाँ भी  
खेलों की भेंट चढाते हैं 
भ्रष्टाचारी को ताज पहनकर
अपनी शान बढ़ाते हैं 
मगर गणतंत्र देने वालों
को ही ह्रदय से भूल जाते हैं
फिर कैसा गणतंत्र प्यारे 
फिर कैसा गणतंत्र ?

>मगर झीलें कब बोली हैं ?

>

एक ठहरी हुई
निश्छल शांत झील
अपनी गति से
प्रवाहमान
जिसमे हर कोई
अपना अक्स
देख सकता है
आते हैं रोज
कुछ लोग
अपनी रूह से
रु-ब-रु होने
अपने ही प्रतिबिम्ब
में छुपे अपने
मूल रूप को
देखकर उद्वेलित
हो जाते
होशो हवास
बेकाबू हो जाते
और फिर
एक कंकड़
मार कर
झील के ठहरे
पानी में
अपने अक्स
की गंदगी
छुपाने की
कोशिश में
झील का भी
सौंदर्य बिगाड़ देते
मगर झीलें
कब बोली हैं ?


हर वेदना
हर कुरूपता
हर ठोकर
की साक्षी बनी हैं
तभी तो
गहनता की
मिसाल बनी हैं
समेट लिया
स्वयं में
हर हलचल को
हर भंवर को
हर उठते
तूफ़ान को
और फिर
एक बार
अपने खामोश
सफ़र पर
चल पड़ती हैं
वेदना की
जलती चट्टानों पर
झीलों की खामोश
आहें जब
सिसकती हैं
तूफ़ान भी
थम जाते हैं
जब ख़ामोशी
उनमे पलती है
मगर
झीलें कब
बोली हैं ?


झीलें तो सिर्फ
अपने वजूद में ही
सिसकी हैं
अपने वजूद में ही
ठहरी हैं
ख़ामोशी की कब्र
में ही दफ़न हुई हैं
मगर झीलें
कभी नहीं
बोली हैं …………..

>एक जरूरी सूचना ………..

>

 एक जरूरी सूचना ………..
मिडिया के साथ ब्लॉगर मीट दिल्ली में 
आज दिल्ली के आदर्श नगर शिव मंदिर में ब्लॉगर मीट का आयोजन किया गया  जिसमे मुख्य अतिथि के रूप में  मदन विरक्त जी लक्ष्मी नगर से तथा डॉक्टर के . डी. कनोडिया आदर्श नगर से पधारे ………..इन सबके अलावा अविनाश वाचस्पति जी , राजीव  तनेजा जी , अजय कुमार झा जी , इंदु पूरी जी , वंदना गुप्ता जी , संगीता स्वरुप जी , पवन चन्दन चौखट जी , केवल राम जी , पदम् सिंह जी , उपदेश सक्सेना जी ,सुमित प्रताप जी और मेरे समेत काफी ब्लोगर्स  तथा मिडिया से जुड़े लोग एकत्रित हुए …………अभी सिर्फ इतना ही बाकी पूरा समाचार कल देखिएगा …………फ़िलहाल एक सूचना ….
आज के कार्यक्रम को 
आप इंडिया न्यूज़ चैनल पर
आज शाम ७:३० बजे देख सकते हैं .

टैग का बादल