Just another WordPress.com weblog

Archive for फ़रवरी, 2012

कृष्ण लीला………. भाग 39


इक दिन कान्हा कलेवा बांधे 
समस्त अंगों पर सुन्दर चित्रकारी किये
फूलों के गहने पहन
पशु पक्षियों की बोली बोलते
ग्वाल बालों संग
बछड़े चराने गए
सभी बालोचित क्रीड़ायें करने लगे
श्याम सुन्दर संग मनोहारी
खेल खेलने लगे
और आनंद मग्न होने लगे
तभी कंस का भेजा
अघासुर नामक दैत्य 
अजगर रूप बनाकर आया है
और राह में पर्वताकार रूप 
रख बैठ गया है
ग्वाल मंडली जब वहाँ पहुंची है
तब उसे देख यूँ बोली है
ये कौन सा पर्वत है
अब से पहले तो नहीं देखा
ये तो अजगर समान लगता है
तो दूसरा बोला
सूर्य किरण से बादल लाल हो गए हैं
मानो किसी अजगर का ऊपरी होंठ हो 
और जो बादलों की परछाईं
धरा पर पड़ती है
मानो वो इसका निचला होंठ हों
तभी तीसरा बोल पड़ा
ये दायीं और बायीं ओर की 
गिरी कंदराएं अजगर के
जबड़े जैसी लगती हैं
और ऊंची- ऊंची शिखर पंक्तियाँ
इसकी दाढें लगती  हैं
चौथा बोला 
ये लम्बी चौड़ी सड़क तो
अजगर की जीभ सरीखी लगती है
और गिरी शिखरों के बीच का अन्धकार
इसके मुख का भीतरी भाग लगता है 
तभी इक ग्वाल बाल बोल पड़ा
देखो – देखो इधर 
जंगल में आग लगी है
तभी तीखी और गरम हवा चली है
मानो कोई अजगर 
गरम- गरम सांस छोड़ रहा हो
तभी इक ग्वाल बाल बोल उठा
चलो आगे बढ़कर देखा जाये
इस गिरी कन्दरा में घुसा जाये
हमें किसी का क्या डर
जब हमारा कान्हा है हमारे संग
गर कोई राक्षस हुआ भी तो
बकासुर सम नष्ट हो जायेगा
कान्हा के हाथों मारा जायेगा
इतना कह ग्वाल बाल
उसके मुख में प्रवेश करते गए
इधर कृष्ण उनकी बात सुन सोचते रहे
इन्हें रोकना होगा
ये तो सर्प को रस्सी समझ रहे हैं
मगर जब तक रोकते
उससे पहले तो ग्वाल बाल
उसके मुख में प्रवेश कर गए


अघासुर और कोई नहीं
बकासुर और पूतना का भाई था
कान्हा से बदला लेने आया था
उसने अपना मुख ना बंद किया
जब तक कृष्ण ने ना प्रवेश किया
जैसे ही प्रभु ने अन्दर प्रवेश किया
अघासुर ने अपना मुख बंद किया
ये दृश्य देख देवता घबरा गए
हाय -हाय का उच्चारण करने लगे
जब भगवान ने देखा
मेरे भक्त परेशान हुए
तब उसके जबड़े में अपने 
शरीर का विस्तार किया
और अघासुर की श्वासों को बंद किया
उसकी आँखें उलट गयीं
व्याकुल हो छटपटा गया
और ब्रह्मरंध्र को फोड़ प्राणांत किया
उसकी दिव्य ज्योति प्रभु में समा गयी
ये देख देवता सब हर्षित हुए
कर जोड़ प्रभु की स्तुति करने लगे
प्रभु ने ग्वाल बाल सब जिला दिए
प्रभु का गुणगान होने लगा 
आकाश में दुदुभी नगाड़े बजने लगे
अप्सराएं नृत्य करने लगीं
मंगलमय वाद्य बजने लगे
जय जयकार की मंगलध्वनि
ब्रह्मलोक तक पहुँच गयी
तब ब्रह्मा जी ने वह ध्वनि सुनी
और आकर अद्भुत दृश्य देखा
और उनका मन भी 
प्रभु माया से मोहित हो गया

जब अजगर का वो शरीर सूख गया
ग्वाल बालों का वो क्रीड़ास्थल बना
मगर ये लीला ठाकुर ने 
पांचवें वर्ष में की 
जिसका वर्णन ब्रज वासियों को
ग्वालबालों ने छठे वर्ष में किया
ये सुन परीक्षित ने 
शुकदेव जी से पूछ लिया
गुरुदेव ये कैसे संभव हुआ
एक समय की  लीला का वर्णन
दूसरे समय में भी वर्तमानकालीन रहे 
अवश्य इसमें जरूर प्रभु की 
कोई महालीला होगी
कृपा कर गुरुदेव वो सुनाइए
प्रभु की  दिव्य लीलाओं का पान कराइए 


क्रमशः ……….
Advertisements

आखिर कोई कैसे खुद ही अपनी चिता को आग लगाये

पलायन 
किस किस से करें 
और कैसे
रिश्तों से पलायन
संभव है
समाज से पलायन 
संभव है
मगर खुद से पलायन
एक प्रश्नचिन्ह है
एक ऐसा प्रश्नचिन्ह
जिसका जवाब भी
अपने अन्तस मे ही
सिमटा होता है
मगर हम उसे
खोजना नही चाहते
उन्हे अबूझा ही
रहने देना चाहते हैं
और अपनी पलायनता का
ठीकरा दूसरों पर
फ़ोडना चाहते हैं
जबकि सारे जहाँ से
पलायन संभव है
मगर खुद से नही
फिर भी उम्र की 
एक सीमा तक
हम खुद से भी
नज़र बचाते फ़िरते हैं
इस आस मे 
शायद ये मेरा 
कोरा भ्रम है
मगर सच से कोई
कब तक नज़रे चुरायेगा
कभी तो मन का 
घडा भर ही जायेगा
और खुद को धिक्कारेगा
वो वक्त आने से पहले
आखिर कोई कैसे 
खुद ही अपनी चिता को आग लगाये

यादों का झुरमुट समेट लायी हूँ मै एक गंगा साथ ले आयी हूँ

दोस्तों
कल मेरा अपने ननिहाल अनूपशहर (छोटी काशी ) जो कहलाता है वहां जाना हुआ . मौका तो ऐसा था कि क्या कहूं ? लेकिन पता था शायद अब आना संभव नहीं होगा तो कुछ यादें समेट लायी . यूं तो मेरी मामी जी ने ४-५ दिन पहले इस दुनिया से विदा ले ली तो उसी सन्दर्भ में जाना हुआ और अब न ही मामा जी रहे तो लगा जैसे अब फिर कभी जाना हो न हो तो क्यों न सब यादों को समेट लिया जाये ……..वैसे उनके दो लड़के वहां रहते हैं मगर कहाँ जाना होगा ………जब अभी पिछले २७-२८ सालों में सिर्फ मामाजी और मामीजी के दुनिया से कूच करने पर ही जाना हुआ तो आगे का क्या सोच सकती हूँ ……….बस इसलिए कुछ यादें हमेशा के लिए ले आई हूँ ………..कुछ ऐसे पलों को संजो लायी हूँ जो अब हमेशा मेरे साथ रहेंगे .


गाडी मे से चलते -चलते एक नज़ारा ये भी उत्तर प्रदेश के खेत खलिहान का


 कहीं ठूंठ तो कहीं हरे- भरे



देखो मिल गया जमीं आसमाँ
कहाँ दीखते हैं ये नज़ारे 
इन कंक्रीट के गलियारों में 


आज भी खुला आसमान दिखता है 

आज भी कहीं खलिहान मिलता है



 ये है मेरे देश की मिट्टी जहाँ 

आज भी अपनापन मिलता है


राह के नज़ारे  
उपलों का संसार 
सिर्फ यहीं दिखता है  

 अनूपशहर का मन्दिर जिसके पास है ननिहाल मेरा

 ये एक छोटा सा मन्दिर जिसके साथ लगती सीढियाँ गंगा जी तक जाती हैं

आहा ! माँ गंगे के दर्शन किए 

अद्भुत आनन्द समाया 

लफ़्ज़ों मे वर्णित ना हो पाया

 बरसात के दिनो मे गंगा जी जो शेड दिख रहे हैं वहाँ तक पहुंच जाती हैं

 ना दिखा फ़र्क जहाँ धरती और आसमाँ मे

क्षितिज़ पर मिलन हुआ गंगा का दर्शन हुआ


हर हर गंगे तुमको नमन 

करो स्वीकार मेरा वन्दन


गंगा को नमन और आचमन
 मेरा भांजा ………राजू उर्फ़ उज्जवल
ये देखो त्रासदी मेरे देश की 

गंगा का पवित्र किनारा 

वहीँ बैठ करते ये मय का पान 

कहो कोई कैसे करे गुणगान

कल कल करती गंगा बहती जाये 

जिसके कदमों मे आस्माँ भी झुक जाये


 गंगा का किनारा 

शांत सुरम्य शीतल

 बहती जलधारा 

मन्द मन्द समीर ने 

मन को मोहा

 हनुमान जी की सेना ने भी लगाया डेरा

 अब कहाँ दिखता है ऐसा खुला आस्माँ और ये नज़ारे

ये वो सीढियाँ जो गंगा की तरफ़ जाती हैं


 मेरे देश के खेल खलिहान

शाम को सरसों के खेत का एक दृश्य
चलो चलें सरसों के खेत मे



 सरसों संग हम भी खिल गये


 राह के नज़ारे


 चलती गाडी से
अद्भुत आनन्द मे डूबे


सूरज को जल देते हुये


इतना अद्भुत आनंद था गंगा किनारे आने का मन ही नहीं हो रहा था ………यूं लग रहा था बस यहीं रुक जाऊं ………अन्दर तक उतार लूं इस अद्भुत आनंद को …….चारों तरफ खुला नीला आसमाँ , शांत सौम्य गंगा का किनारा , हलके -हलके बादल और मंद -मंद बहती हवा ……..उफ़ !यूं लगा जैसे ओक बनाकर एक घूँट में सारा अमृत पी जाऊँ 




कमी थी तो सिर्फ एक उत्तर प्रदेश की सडकें जैसी पहले थीं आज भी वैसी ही हैं ……….अब सरकार कोई हो कुछ कब्रों पर फर्क नहीं पड़ता …..हिचकोले खाते , हड्डियाँ चटकवाते  जैसे तैसे पहुंचे हम बुलंदशहर से अनूपशहर तक ………..तौबा कर ली और इसीलिए लगा अब कभी वापस यहाँ आना नहीं होगा ……..

चाहतें तो तुम्हारे मन में भी भांवरे डालती हैं …….





कान्हा 

चलो आज तुमसे कुछ बतिया लूं
कुछ तुम्हारा हाल जान लूं
सुना है तुम निर्लेप रहते हो
कुछ नहीं करते 
सुना है जब महाप्रलय होती है
तुम गहरी नींद में सो जाते हो
और हजारों वर्ष गहरी नींद में 
सोने के बाद योगमाया जगाती है
और फिर तुम्हें अपने अकेलेपन का भास होता है
और सृष्टि निर्माण का संकल्प मन में उठता है
मगर मैंने तो सुना था
तुम्हारे तो मन ही नहीं होता
फिर संकल्प कैसा और क्यों?
सारे उपद्रव तो मन ही मचाता है ना
तो फिर कैसे तुम्हें अपने अकेलेपन से 
निज़ात पाने की चाह होती है
जबकि तुम्हारे तो मन ही नहीं होता

अच्छा बताओ ज़रा

जब तुम्हारी 
एक से अनेक होने की
इच्छा होती है तो 
बिना मन के तो इच्छा 
नहीं हो सकती ना
फिर कैसे कहते हो 
मन नहीं है तुम्हारे पास?
बहुत चालाक हो तुम छलिये 
बहुत अच्छे से छलना जानते हो
और हमें मूर्ख बनाते हो
छलिये ……..आज जानी हूँ तुम्हें
पहचाना है तस्वीर का दूसरा रुख
सच में दूसरा पक्ष हमेशा काला ही होता है
और तुम………तुम तो दोनों तरफ से काले हो
देखो यूँ नाराज मत हो …………
कहने का अधिकार तो दोनों पक्षों को होता है
और आज मेरी बारी है …………
क्यूँ तुम जब नचाते हो हमें
तो हम कुछ नहीं कर पाते ना
नहीं कह पाते तुम्हें कुछ भी
सिवाय सिर झुकाकर  तुम्हारी बात मानने के
और कोई चारा कभी छोड़ा है तुमने हमारे लिए
मगर आज तो तुम्हारी कारगुजारी
मेरी नज़रों से गुजरी है
आज जाना है मैंने तुम्हारा असली चेहरा
ये सब एक भरम फैलाया है तुमने
एक जाल बिछाया है और दाना डालते हो
देखें कौन सी मछली चुगती है 
और तुम्हारे बिछाए जाल में फंसती है
और फिर तड़पती है ……….तुमसे मिलने को
तुम्हें देखने को …….तुम्हें पाने को
उसकी चाहत का अच्छा सिला देते हो
उम्र भर का रोग लगा देते हो
और दिल के रोग की तो दवा भी कोई नहीं होती 
और फिर खेलते हो खेल ……लुकाछिपी का 
तो बताओ तो ज़रा रंगीले …………
क्या बिना मन के ये सब संभव है ?
मन तो है तुम्हारे भी ……….बस मानते नहीं हो
वर्चस्व टूटने का खतरा नहीं उठाना चाहते ना


वैसे बताना ज़रा 
कैसे रह लेते हो अकेले ?
कहीं कुछ नहीं ……….सिर्फ अपने साथ
मुश्किल होता होगा ना जीना
शायद तभी बनाते हो सृष्टि
और फिर लगा देते हो माया का चक्कर
और इंसान की विवशता से खेलते हो
हाँ सही कह रही हूँ …….खेलते ही तो हो
क्यूँकि है एक मन तुम्हारे पास भी
तभी करते हो तुम भी अपने मन की
जन्म मृत्यु के चक्कर में फँसा कर 
रचते हो एक चक्रव्यूह 
और मानव तुम्हारे हाथ की कठपुतली
जैसा चाहे नाचते हो ………
कभी गीता में उपदेश देते हो 
मन पर लगाम लगाओ 
और सब प्रभु समर्पण करते जाओ 
साथ ही कहते हो 
एक मेरे अंश से ही सारा संसार उपजा है
मेरा ही रूप सब में भास रहा है
तो बताना ज़रा 
क्या तुम लगा पाए 
अपने मन पर लगाम ?
कहो फिर क्यों रच दिया संसार ?
खुद से खेलना या कहो 
अपनी परछाईं से खेलना 
और खुश होना कितना जायज है
खेल के लिए दो तो होने चाहियें
मज़ा तो उसी में होता है 
और तुमने बना दिए 
स्त्री और पुरुष ………..है ना
दो रूप अपने ही 
दोनों को साथ रहने का 
गृहस्थ धर्म निभाने का 
एक तरफ उपदेश देते हो
तो दूजी तरफ 
मोह माया से दूर रहने का
सब कुछ त्यागने का सन्देश देते हो
ज़रा बताना तो सही
कैसे एक ही वक्त में 
इन्सान दो काम करे 
क्या तुम कर सकते हो
ये तुम ही तो इस रूप में होते हो ना
बताओ तो ज़रा क्या फिर कैसे 
खुद से पृथक रह सकते हो
जब तुम खुद से जुदा नहीं हो 
हर रूप में तुम ही भास रहे हो
सिर्फ बुद्धि विवेक की लाठी
 हाथ में पकड़ाकर
नर नारी बनाकर 
कौन सा विशेष कार्य किया
सब तुम्हारा ही तो किया धरा है 
राधा मीरा शबरी के प्रेम का पाठ पढ़ाते हो
कभी भक्तों की दीन हीन दशा दर्शाते हो
क्यों श्याम ये भ्रम फैलाते हो 
जबकि हर रूप में खुद ही भासते हो
या फिर जीने दो इंसानों को भी इन्सान बनकर
खुद की तरह ………जैसे तुम जी रहे हो
अकेले अपने मन के मुताबिक 
करते हो ना मन की इच्छा पूर्ण
सिर्फ अपने मन की ………..
तभी तो इन रूपों में आते हो
प्रेम का ओढना ओढ़ 
सबको नाच नाचते हो
फिर अदृश्य हो जाते हो
क्या है ये सब ?
खुद में खुद का ही विलास 
या करते हो तुम मानव बनाकार
उनका उपहास 
अरे मान भी लो अब 
तुम बेशक ईश्वर हो 
मगर तुम भी मन के हाथों मजबूर हो 
जब तुम मन के हाथों मजबूर हो 
नयी सृष्टि रचाते हो
तो फिर मानव को क्यूँ उपदेशों से भरमाते हो
क्यों नहीं जीने देते 
क्यों उसे दो नाव की सवारी करवाते हो 
जानती हूँ
तुम ही उसमे होते हो…..मैंने ही कहा है अभी
क्योंकि तुमने ही तो कहा है गीता में
धर्म ग्रंथों में ………..हर रूप तुम्हारा है
कण कण में वास तुम्हारा है
वो ही मैं कह रही हूँ …………
फिर बताओ तो सही 
कौन किससे जुदा है
और कौन किसके मन की कर रहा है
तुम और तुम्हारा मन ……….हा हा हा कान्हा 
मान लो आज ………….है तुम्हें भी मन 
और किसके कहने पर
सिर्फ तुम्हारे मन के कहने पर 
तुमने अपने संकल्प को रूप दिया 
तो बताओ तो ज़रा ………….
तुम भी तो मन के हाथों मजबूर होते हो
फिर कैसे ये उपदेश जगत को देते हो


नहीं कान्हा ………तुम्हारी भी 
कथनी और करनी में बहुत फर्क है 
ये तो मानव बुद्धि है 
जो तुम्हारे ही वश में है
जैसे चाहे यन्त्रारूढ चलाते हो 
और व्यर्थ के जाल में सबको फंसाते हो
जबकि सत्य यही है
तुम भी अकेले हो …….नितांत अकेले
और अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए
अपने मन को बहलाने के लिए
तुम दुनिया बनाते हो …………और उसमे खुद ही भासते हो 
खुद को भी उपदेश देते हो 
खुद से ही  खुद को पुजवाते हो 
पर खुद को ही ना जान पाते हो

धर्म ग्रंथों में क्या लिखा है किसने लिखा 
उसका किसने क्या अर्थ निकाला 
सब जाना ……….और तुमने क्या कहा वो भी
तुमने ही तो कहा है ………….
श्री मद भागवद मेरा वांगमय स्वरुप है
तो कहो अब ………क्या तुम्हारी वाणी झूठी है
अंततः तो यही निष्कर्ष निकला ना 
बिना मन के इच्छा का जन्म नहीं होता
और बिना इच्छा के सृष्टि का निर्माण नहीं होता
फिर कहो प्यारे ………..और मान लो 
मन की कालरात्रि के चक्रव्यूह में तुम भी फंसते हो 
तुम कर्तुम अकर्तुम अन्यथा कर्तुम 
ये सन्देश गलत ही देते हो 
चाहतें तो तुम्हारे मन में भी भांवरे डालती हैं …….
बस इतना नहीं समझ पाते हो 
तुम इतना नहीं समझ पाते हो ………….
अगर हो कोई जवाब तो देना जरूर
इंतज़ार करूंगी मोहन उर्फ़ ब्रह्म उर्फ़ निराकार ज्योतिर्पुंज …………



मै ना बांटूँ श्याम आधा आधा

यूँ तो वो सबके हैं 
मगर केवल मेरे हैं
तभी कहता है इंसान 
जब पूरा उसमे डूब जाता है जैसे गोपियाँ …
तुम केवल मेरे हो ,
आँखों के कोटर मे बंद कर लूंगी श्याम 
पलकों के किवाड लगा दूंगी 
ना खुद कुछ देखूंगी 
ना तोहे देखन दूंगी 
ये मेरी प्रीत निराली है 
मैने भी तुझे बेडियाँ डाली हैं 
जैसे तूने मुझ पर अपना रंग डाला है 
अपनी मोहक छवि मे बांधा है 
अब ना कोई सूरत दिखती है 
सिर्फ़ तेरी मूरत दिखती है 
मेरी ये दशा जब तुमने बनायी है 
तो अब इसमे तुम्हें भी बंधना होगा 
सिर्फ़ मेरा ही बनना होगा ………सिर्फ़ मेरा ही बनना होगा 
अब ना चलेगा कोई बहाना 
ना कोई रुकमन ना कोई बाधा 
मुझे तो भाये श्याम सारा सारा 
मै ना बांटूँ श्याम आधा आधा 

कृष्ण लीला ……..भाग 38



इक दिन जब मोहन ने 
राधा जी के कहने पर 
दूध दुहा था
और राधा जी ने जाने का 
उपक्रम किया था 
तब मोहन ने अपनी
चित्ताकर्षक मुस्कान की मोहिनी
राधा पर डाली है
रास्ते में सखियों ने 
जैसे ही मोहन का नाम लिया 
राधा के हाथ से 
दूध का बर्तन छूट गया 
अचेत होते सिर्फ
यह ही शब्द 
अधरों पर आया है
मुझे काले साँप ने काटा है
इतना सुन सखियाँ 
 घर पर ले आयीं
और कीर्ति जी को
राधा की व्यथा बतलाई
जिसे सुन मैया बहुत घबरायी 
और झाड फूंक करवाई 
पर राधा  प्यारी को 
आराम ना आता 
मंत्र यन्त्र भी बेकार हुआ जाता 
जो सखी राधा की प्रीत पहचानती थी 
उसने उपाय बतलाया 
नन्द लाल का बेटा 
साँप काटे का मंत्र जानता है
इतना सुन कीर्ति को याद आ गया
जो राधा ने बतलाया था
वो दौड़ी- दौड़ी यशोदा के पास गयी
हाथ जोड़ विनती करने लगी
श्याम सुन्दर को साथ भेज देना
राधा का जीवन बचा लेना
सुन मैया बोल उठी
मेरा लाला तो बालक है
वो झाड़ फूंक क्या जाने
किसी नीम हकीम को दिखलाओ
अच्छे से राधा का इलाज करवाओ
तब कीर्ति ने सारा किस्सा बयां किया
कैसे मनमोहन ने एक गोपी को बचा लिया

ललिता जी जो दोनों की 
प्रीत पहचानती थीं
किस साँप ने काटा था
सब जानती थीं
जाकर चुपके से 
नंदलाल से कहा
जिसकी तुमने गौ दूही थी
वो अचेत पड़ी है
बस तुम्हारे नाम पर
आँखें खोल रही है
कोई मन्त्र यन्त्र ना काम करता है
तुम्हारे श्याम रंग रुपी 
सांप ने उसे डंसा है
ये विष लहर ना
किसी तरह उतर पाती है
राधा को रह – रहकर
तुम्हारी याद सताती है
विरह अग्नि में जल रही है
अपनी चंद्रमुखी शीतलता से
उसकी अगन शीतल करो
यदि सच में भुजंग ने डंसा हो 
तो भी मैं उन्हें अच्छा कर दूँगा 
कह मोहन घर को गए
वहाँ मैया ने हँसकर पूछा 
कान्हा तुमने साँप डँसे का
मंत्र कहाँ से है सीखा 
जाओ राधा को साँप ने डंसा है
उसे बचा लेना
इतना सुन मोहन
राधिका जू के पास गए
और अपनी मुरली को
राधा से छुआ दिया 
जिससे राधा का ह्रदय
ठंडा हुआ
और प्रेमाश्रु झड़ने लगे
ज्यों ही राधा को होश आया है
 कीर्ति जू  ने सारा हाल
राधा को सुनाया है
और बड़े प्रेम से
नन्कुमार को गोद में उठाया है
इस प्रकार राधा मोहन की 
प्रीत ने रंग चढ़ाया है
जो हर ब्रज वासी के 
मन को भाया है
मगर ललिता जी ने
असल मर्म को पाया है
ये भेद कोई न जान पाया है
अलौकिक प्रीत को लौकिक जन क्या जाने
ये तो कोई प्रेम दीवाना ही पहचाने 
जिसने खुद को पूर्ण समर्पित किया हो
वो ही प्रेम का असल तत्त्व है पहचाने 

क्रमशः ………………….

मोहब्बत के रोजे हर किसी का नसीब नहीं होते ………..



जानती हूँ जीना चाहते हो तुम 
एक मुकद्दस ज़िन्दगी 
ख्वाबों की ज़िन्दगी 
हकीकत के धरातल पर 
सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे संग ………है ना
लिखना चाहते हो सारी कायनात पर 
मोहब्बत का फ़लसफ़ा 
अपने और मेरे नाम के साथ 
हर कण मे समेट देना चाहते हो 
अपनी मोहब्बत को 
जहाँ तक सृष्टि है और जहाँ तक दृष्टि है 
वहाँ तक हर अक्स पर उकेरना चाहते हो
एक तस्वीर , एक नाम , एक शहर मोहब्बत का
जिसकी हवा भी मोहब्बत की खुशबू से महकती हो
सांसों संग रूह में उतरती हो
जर्रे जर्रे पर एक ही नाम अंकित हो
खुदा गवाह हो उस मोहब्बत का 
जहाँ कदम दर कदम 
एक दुआ मोहब्बत की 
उसकी दरगाह पर कलमे पढ़ती हो 
फिर चाहे बहती नदी हो या 
चलता बादल या रूकती जमीं 
या फिर बदलती रुत 
हर स्पंदन में सिर्फ और सिर्फ
मोहब्बत की आवाज़ गूंजती हो
हमारे नाम के साथ………
है ना ………यही चाहते हो ना तुम
नहीं चाहते कुछ भी आधा अधूरा
सब पूरा चाहिए तुम्हें …………
मोहब्बत आधी अधूरी कब रही है 
जब भी सुनो तुम चिड़ियों की चहचाहट 
जब भी देखो तुम उन्हें छत पर 
चुग्गा चुगते हुए 
जब भी सुनो तुम मौन स्पंदन
समझना मोहब्बत ने दस्तक दी है
मौन भी तो बोलता है 
और हम तो हमेशा मौन में ही बतियाते रहे 
शब्दों से परे रहे हमारे अस्तित्व 
तभी तो कायनात के जर्रे जर्रे पर
अंकित करने की है तुम्हारी हसरत 
हमारी मोहब्बत को चाहते हो बनाना
सारी कायनात की सबसे सुन्दर प्रेम कहानी 
सब जानती हूँ ……………
मगर शायद तुम ये नहीं जानते 
ख्वाबों के गलियारों में मोहब्बत 
सुकून नहीं पाती 
अधूरेपन में ही पूर्ण होती है मोहब्बत की जिंदगानी
शायद तभी दूरियों में भी नजदीकियां भासती हैं 
और मोहब्बत लिख देती है एक इबारत ………जुदाई की 
मोहब्बत के रोजे हर किसी का नसीब नहीं होते ……………..है ना सनम !!!!!!!

टैग का बादल