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Archive for मार्च, 2011

>क्यों गुलमोहर का भरम तोड़ दिया?

>

जब भी चाहा तुमने
सिर्फ़ देह को चाहा

रूप के सौदागर बने
भोग सम्भोग के पार
ना जाना तुमने
एक नया आकाश
एक नई धरती
एक नयी दुनिया
तुम्हारे इंतजार में थी
मगर तुमने तो
दुनिया के तमाम
रास्ते ही बंद कर दिए
पता नहीं मिटटी में
तुम्हें कौन सा सुख मिला
जो तुम कभी
मूरत तक पहुँच ही नहीं सके
क्या जीने के लिए
सिर्फ देह ही जरूरी थी
या देह से इतर भी
कुछ होता है
ये ना जानना चाहा
तुम सिर्फ क्षणिक
सुख की खातिर
वक्त के लिबास
बदलते रहे
मगर कभी
अपना लिबास
ना  बदल पाए
और मैं
तुममे
अपना एक
जहान खोजती रही
देह से परे
एक ऐसा आकाश
जिसका कोई
छोर ना हो
जहाँ कोई
रिश्ते की गंध
ना हो
जहाँ रिश्ता
बेनाम हो जाये
सिर्फ शख्सियत
काबिज़ हो
रूहों पर
और ज़िन्दगी
गुजर जाए
मगर सपने
कब सच हुए हैं
तुम भी
वैसे ही निकले
अनाम रिश्ते को
नाम देने वाले
दर्द को ना
समझने वाले
देह तक ही
सीमित रहने वाले
शायद
सबका अपना
आकाश होता है
और दूसरे के आकाश में
दखल देने वाला ही
गुमनाम होता है
जैसे आज तुमने
मुझे गुमनाम कर दिया
जिस रिश्ते को
कोई नाम नहीं दिया था
उसे तुमने आज
बदनाम कर दिया
आह ! ये क्या किया
क्यों गुलमोहर का
भरम तोड़ दिया?

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>निस्वार्थ्

>

कभी कभी शब्द एक खेल बन जाते हैं दिल और दिमाग के बीच ……कभी दिल के हाथ बिकते हैं तो कभी दिमाग के हाथों नीलाम होते हैं.………पर क्या कभी शब्दो को सही मुकाम हासिल होता है? क्या शब्दों की अपनी दुनिया मे उनका कोई निज़ी अस्तित्व होता है जब तक की अभिव्यक्त ना हो जायें ……किसी के हाथ की कठपुतली ना बन जायें तब तक शब्द सिर्फ़ शब्द बन कर ही रह जाते हैं …………अस्तित्व होते हुये भी अस्तित्वहीन …………क्या स्त्री और शब्दों मे कोई समानता है? शायद हाँ, तभी अपने स्वतंत्र अस्तित्व होते हुये भी अपनी पह्चान के लिये किसी के हाथों की कठपुतली बन जाते है दोनो………शायद दोनो का एक ही स्वभाव है………दूसरे को पहचान देना…………दूसरे के भावो को स्वंय मे समाहित करना और बिखर जाना…………खुद को मिटा देना मगर अपना जीना सार्थक कर देना ……………शायद ज़िन्दगी ऐसे भी जी जाती है ……निस्वार्थ्।

>मुझे भी अपना बना लेना

>

पुकारना नही आता
पूजन नही आता
वन्दन नही आता
नमन नही आता
बस
स्मरण करना
व्याकुल होना
और अश्रु बहाना
यही मेरी पूंजी है
मोहन ये आह
क्या तुम तक
पहुंचती है?
क्या तुम्हे भी
याद आती है
क्या तुम भी
विरह मे
तडपते हो?
निर्विकार
निर्मोही
निर्लेप हो
जानती हूँ
फिर भी
सुना है
किसी के लिये
तुम भी तड्पते हो
उस किसी मे
एक नाम मेरा भी
जोड लेना
राधा नही बनना
बस बंसी बना
अधरों पर
सजा लेना
मुझे भी
श्री अंग लगा लेना
प्राण रस फ़ूंक देना
अमृत रस बरसा देना
श्याम ,मुझे भी
अपना बना लेना



ये उस दिन सुबह लिखी गयी थी जिस दिन जापान मे सुनामी का कहर बरपा था और शायद एक कहर इस तरह मेरे दिल पर भी बरपा था या शायद आगत का कोई संदेशा था ये और दिल से ये उदगार फ़ूट पडे।

>मै तो हर मोड पर उनको ढूँढा सदा्

>

मै तो हर मोड  पर
उनको ढूँढा सदा्
होली के बहाने
रंगो को लगाने
ना जाने कौन गली
छुपे हैं सांवरिया
किस बैरन ने
छुपाय लीन्हो
सजनवा हमार
हरण कर लीन्हो
कोई तो पता
बताय दीन्हो
होली म्हारी
सरस कर दीन्हो

टेसू के फ़ूल
कुम्हला गये हैं
अबीर गुलाल भी
रोने लगे हैं
सजन के बिन
मायूस हुये हैं
अब तो पता
बताय दो गुजरिया
फ़ाग को रंग
चढाय दो गुजरिया
हमका सजन से
मिलाय दो गुजरिया
प्रीत रस मे
भीजन दो गुजरिया
हमका सांवरिया से
मिलाय दो गुजरिया
आज प्रेम अटरिया
चढ्न दो बावरिया
होली के बहाने
प्रेम की होली
खेलन दो गुजरिया
श्याम को मेरा
होने दो गुजरिया

>ये हमको क्या होने लगा है

>

होली का रंग असर करने लगा है

सुरूर सा दिल पर चढने लगा है

बिन पिये भांग का असर होने लगा है

बलम जी ये हमको क्या होने लगा है


ये कैसी बयार चलने लगी है 


उमंग सी दिल मे मचलने लगी है

तुम संग फ़ाग खेलन को बलम जी

जियरा हमरा मचलने लगा है



अबीर गुलाल लगाये बहुत हैं

फ़ाग भी सखियों संग खेले बहुत हैं

तुम्हारे रंग मे भीगने को बलम जी

तुम्हे रंगों मे भिगोने को बलम जी

प्रेम रस मे डुबोने को बलम जी

इक नयी शरारत करने को बलम जी

जियरा हमरा मचलने लगा है

ये हमको क्या होने लगा है

ये हमको क्या होने लगा है

>सजन से मिलन का एक रंग

>

होली के रंग… मन में उमंग… दिल में तरंग……
सजन से मिलन का एक रंग


घूंघट की ओट में
सकुचाई लजाई
सजनिया
पी का रास्ता
निहार रही
आँखों में भर के
प्रीत के बादल
सजन का रास्ता
निहार रही
नैनों में छाये
रंग हजार
तन मन में
उठती प्रीत की
बयार
सब से है
छुपाय रही
कब आवेंगे
मोरे सांवरिया
प्रेम के रंगों की
लेके फुहरिया
नैन मूंदे
सोच रही थी
सपनो में उनके
खो रही थी
सुध बुध अपनी
भूल गयी थी
तभी आये
चुपके से सांवरिया
ले के हाथ में
रंगों की पुडिया
सजनिया पर
रंग बरसा गए
प्रेम रंग में
नहला गए
प्रीत का रंग
चढ़ा गए
हर्षित हो गयी
अब तो सजनिया
रंगों में खुद भी
डूब गई बावरिया
साजन ने पकड़ी
नाजुक कलइयाँ
रंग में भिगो दी
सारी चुनरिया
बाहो मे भर लीन्ही
सजनिया
कपोल पर अंकित
कर दीन्ही निशानियां
लाज को ताक पर
रख गये सांवरिया
होरी के बहाने
कर गए
छेड़छाड़ सांवरिया
ऐसी कर गये
ठिठोली सजनवा
प्रीत को कर गये
लाल सांवरिया



>सोन चिरैया

>

मैं और मेरा आकाश
कितना विस्तृत
कितनी उन्मुक्त उड़ान
पवन के पंखों पर
उडान भरती
मेरी आकांक्षाएं
बादलों पर तैरती
किलोल करती
मेरी छोटी छोटी
कनक समान
इच्छाएं
विचर रही थीं
आसमां छू रही थीं
पुष्पित
पल्लवित
उल्लसित
हो रही थीं
खुश थी मैं
अपने जीवन से
आहा ! अद्भुत है
मेरा जीवन
गुमान करने लगी थी
ना जाने कब
कैसे , कहाँ से
एक काला साया
गहराया
और मुझे
मेरी स्वतंत्रता को
मेरे वजूद को
पिंजरबद्ध कर गया
चलो स्वतंत्रता पर
पहरे लगे होते
मगर मेरी चाहतों
मेरी सोच
मेरी आत्मा
को तो
लहूलुहान ना
किया होता
उस पर तो
ना वार किया होता
आज ना मैं
उड़ पाती हूँ
ना सोच पाती हूँ
हर जगह
सोने  की सलाखों में
जंजीरों से जकड़ी
मेरी भावनाएं हैं
मेरी आकांक्षाएं हैं
हाँ , मैं वो
सोन चिरैया हूँ
जो सोने के पिंजरे
में रहती हूँ
मगर बंधनमुक्त
ना हो पाती हूँ

टैग का बादल