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Archive for जुलाई, 2010

>ज़िन्दगी का हिसाब -किताब

>ज़िन्दगी के 
हिस्से होते रहे
टुकड़ों में 
बँटती रही 
बच्चे की
किलकारियों सा
कब गुजर 
गया बचपन 
और एक हिस्सा  
ज़िन्दगी का
ना जाने 
किन ख्वाबों में
खो गया
मोहब्बत ,कटुता 
भेदभाव,वैमनस्यता
अपना- पराया 
तेरे- मेरे 
की भेंट 
दूजा हिस्सा 
चढ़ गया
कब आकर 
पुष्प को
चट्टान 
बना गया
पता ही ना चला
आखिरी हिस्सा 
ज़िन्दगी का
ज़िन्दगी भर के 
जमा -घटा 
गुना -भाग 
में निकल गया
यूँ ज़िन्दगी 
टुकड़ों में
गुजर गयीं
कुछ ना हाथ लगा 
और फिर अचानक
मौसम बदल गया
इक अनंत
सफ़र की ओर
मुसाफिर चल दिया 

>मेरा तो मुझमें कुछ बचा ही नहीं…………150

>सुनो ………….
हाँ ……………..
कुछ कहना था ……..
हाँ कहो ना ………..
मैं सुन रहा हूँ ………….
नहीं , रहने दो ………….
शायद तुम नहीं समझोगे ………
तुम कोशिश तो करो………..
मैं भी कोशिश करूंगा………….
मुझे तुम्हारी चुप में छुपी 
ख़ामोशी का दर्द पीना है 
दे सकोगे…………………..
मैं खामोश कहाँ हूँ ………
बोल तो रहा हूँ (दर्द के गहरे कुएं से निकली आवाज़ सा )
क्या दे सकते हो ?
मेरा तो मुझमें कुछ बचा ही नहीं ………
अच्छा ऐसा करो
अपने अनकहे ज़ज्बात 
कुछ बिखरे अहसास
कुछ टूटे पल 
कुछ सिमटी घड़ियाँ
कुछ अंतस के रुदन 
कुछ वो दिल का 
जला हुआ टुकड़ा 
जिस पर मेरा 
नाम लिखा था 
सिर्फ इतना मेरे 
नाम कर दो
मैं तुम्हारा हर गम
हर आह , हर आँसू 
हर दर्द पी जाना चाहती हूँ 
क्या तुम इतना भी 
नहीं कर सकते 
मेरे लिए …………..
नहीं , मेरा तो मुझमें कुछ बचा ही नहीं……….
सब वक्त की 
आँधियाँ उडा ले गयीं
ज़माने ने मेरा 
हर ख्वाब , हर ख़ुशी
हर तमन्ना ,हर आरज़ू 
कब छीन ली
पता ही ना चला 
अब यहाँ सिर्फ 
अरमानो की
सुलगती हुई 
लकड़ियाँ 
सिसक रही हैं
मेरी जिंदा लाश 
अब सड़ने लगी है
जब से तुम गयी हो…………
कब तक मेरे बुत से 
दिल बहलाओगे 
मैं तुम से जुदा होकर भी
तुम्हारी यादो की
क़ैद से आज़ाद 
ना हो पाई हूँ
बस बहुत हुआ
अब मेरी सारी 
अमानतें मुझे दे दो
तुम तो बुत 
के सहारे जी भी 
लेते हो मगर मैं
मैं तो पल- पल 
तुम्हें सिसकते 
तड़पते देखती हूँ
सोचो मुझ पर 
क्या गुजरती होगी
दे दो ना मुझे
मेरे सारे लम्हात
शायद कुछ पल 
का सुकून मेरी 
रूह को भी मिल जाये 
तुम्हें मेरे सूखे
अश्कों की कसम 
दोगे ना ……….
मगर , मेरा तो मुझमें कुछ बचा ही नहीं…………
रूह और जिस्म 
के इस प्रेम पर 
सितारे भी 
रश्क कर रहे थे 
कुछ पल इस 
पवित्र प्रेम के 
पीने को तरस रहे थे
रूह और जिस्म के
इस अद्भुत मिलन के
गवाह बन रहे थे 

>बस वो ना बनाया ……….

>मैं 
ख्वाब बनी 
हकीकत में ढली
नज़्म भी बनी

गीतों में ढली 
तेरे सांसों की 
सरगम पर 
सुरों की झंकार
भी बनी 
रूह का स्पंदन 
भी बनी
मौसम का खुमार 
भी बनी
सर्दी की गुनगुनी
धूप में ढली
कभी शबनम 
की बूंद बन
फूलों में पली
तेरे हर रंग में ढली 
वो सब कुछ बनी
जो तू ने बनाया
तूने सब कुछ बनाया
 मगर वो ना बनाया
जो तेरे अंतर्मन के
दीपक की बाती होगी
तेरे अरमानों की
थाती होती
तेरे हर ख्वाब की
ताबीर होती
तेरी हर धड़कन की
आवाज़ होती
तेरी रूह की पुकार होती
तेरी जान की जान होती
बस वो ना बनाया 
तूने कभी 
बस वो ना बनाया ……….

>एक पल

>तेरी 
एक पल में 
ज़िन्दगी 
जीने की 
हसरत
मेरे जीने का 
सबब बनी
अब खोजता 
फिरता हूँ
उस एक 
पल को
मगर 
कहीं नहीं मिलता
हर पल पर 
ज़िन्दगी की
उलझनों के 
लगे पहरे
कभी ज़िन्दगी 
को ठहरने 
नहीं देते 
इक पल को
ढूँढते – ढूँढते
बरसों बीत गए
शायद तुम तो 
भूल चुकी होंगी
मगर मैं 
आज भी
उसी इक पल
की तलाश में
भटक रहा हूँ 

>सावन को हरा कर जाये कोई

>कब तक जलाऊँ अश्कों को
भीगी रात के शाने पर 

सावन भी रीता बीत गया
अरमानों के मुहाने पर 

 जब चोट के गहरे बादल से
बिजली सी कोई कड़कती  है 

तब यादों के तूफानों की
झड़ी सी कोई लगती है

खाक हुई जाती है तब
मोहब्बत जो अपनी लगती है

कब तक धधकते सावन की
बेदर्द चिता जलाए कोई

रात की बेरहम किस्मत को
साँसों का कफ़न उढाये कोई

उधार की सांसों का क़र्ज़
हँसकर चुका तो दूँ मगर
इक कतरा अश्क
तो बहाए कोई
और बरसों से सूखे सावन 
को हरा कर जाये कोई

>मानव! व्यर्थ भूभार ही बना

>ज़िन्दगी व्यर्थ 
वक्त की बर्बादी 
नतीजा—शून्य 
अगर किसी एक 
को भी अपना 
ना बना पाया 
या किसी का
बन ना पाया
मानव!
व्यर्थ भूभार 
ही बना
अगर कोई एक
कर्म ना 
किया ऐसा 
जिसे याद 
रखा जा सके 
पूजा का ढोंग
तेरा 
व्यर्थ गया
ढकोसलों में 
ढकी शख्सियत
तेरी 
व्यर्थ गयी
अगर किसी 
एक आँख का
आँसू ना 
पोंछ सका
मानव !
तू तो 
खुद से ही 
हार गया
अगर
“मैं ” को ही
ना जीत पाया
जीवन तेरा
व्यर्थ ही गया
खाली हाथ आया
और खाली ही
चल दिया

>ख़ामोशी पर लगे पहरे

>यूँ तो 
खामोश थी 
हूँ और रहूँगी
ना गिला कोई 
ना शिकवा 
ना आँसू 
ना मुस्कान
ना चाहत कोई
ना अरमान
मगर ख़ामोशी 
पर लगे तेरी 
याद के पहरे ही
ख़ामोशी तोड़ 
जाते हैं 
बता अब 
यादों को तेरी 
किस चीन की
दीवार में
चिनवाऊँ
किस सागर की
गहराई में दबाऊँ
कौन से रसातल 
में छुपाऊँ 
और ख़ामोशी का 
कफ़न ओढ़ 
सो जाऊँ 

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