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Archive for अप्रैल, 2012

कृष्ण लीला ………भाग 46



कालिय के सौ सिर थे
जिसे भी ना वो झुकाता था
उसी को प्रभु अपने पैरों से कुचलते थे
उसके मुख और सिर से
खून निकलता था
जो कान्हा के चरणों पर
लहू की बूंदें पडती थीं
ऐसा लगता मानो
रक्त पुष्पों से पूजा की जा रही हो
प्रभु के इस अद्भुत
ताण्डव रूप नृत्य से
जालिम के फ़णरूप छत्ते
छिन्न भिन्न जब हो गये
हर अंग चूर चूर हो गया
मूँह से खून की उल्टी होने लगी
तब उसे जगतपति प्रभु की स्मृति हुई
वह मन ही मन प्रभु की शरण गया
अपने पति की दशा देख नागपत्नी
बच्चों सहित प्रभु के चरणों मे गिर गयी
हाथ जोड प्रभु को प्रणाम किया
और कालिय को छोडने की
विनती करने लगी
इधर कालियनाग को
बैकुण्ठनाथ के दर्शन और स्पर्श से
ज्ञान उत्पन्न हुआ
और ब्रह्मा की बात का स्मरण हुआ
ब्रज गोकुल मे कृष्णावतार होगा
सो ये वो ही जान पडते हैं
दूसरे की क्या सामर्थ्य जो
मेरे विष से बच जाये
ये सोच कालिया नाग
अपने कृत्य पर लज्जित हुआ
मैने आपको ना पहिचाना
मुझ अधम दीन को
अब अपनी शरण मे लीजिये
इतना कह लज्जावश स्तुति ना कर सका
जब प्रभु ने देखा
कालिय का अभिमान है छूटा
तब अपने चतुर्भुज रूप का है दर्शन दिया
ये देख कालिय नाग की पत्नियाँ
विलाप करने लगीं
और प्रभु से निवेदन करने लगीं
प्रभु आप समस्त जगत के नियन्ता हैं
पापियों को मारने और
अधर्म का नाश करने के लिये
आपने निज इच्छा से है अवतार लिया
जो कोई तुम्हारी भक्ति करता
या शत्रुता से तुम्हारा ध्यान धरता
वो भी भव से है पार उतरता
जैसे अमृत को जान कर पिया जाये
या अनजाने मे
अमर ही बनाता है
वैसे ही तुम्हारा ध्यान
जीव का है कल्याण करता
जिन चरणों का ध्यान
जप –तप ,यज्ञ,दान से भी नही मिलता
उनका दर्शन सहज मे पाया है
आज हमारा भाग्य उदय हो आया है
आपने अभिमानी का दभ चूर किया है
पर ना जाने इसने ऐसा कौन सा
पुण्य किया है
जिन चरणों की सेवा को
लक्ष्मी भी तरसती है
आज उन्ही चरणों की रज
इसे मिली है
इसके समान बडभाती कौन होगा
सर्पयोनि पाकर भी
प्रभु दर्श किया
जिस चरण रज की महिमा
नारद , सनकादिक ,इन्द्रादि गाते हैं
और नित्य उसी मे वास करते हैं
उस समान तीनो लोक की
सम्पदा भी तुच्छ समझते हैं
आज इसने वो पारस पाया है
पर इसके दोष माफ़ करो
प्रभु इसको अभयदान दे, कृतार्थ करो
हम अबला शरण तिहारी हैं
स्तुति सुन कान्हा क्षमा कर
मस्तक से कूद पडे
तब कालिय को कुछ होश आया
और कर जोड विनय करने लगा
मेरा अपराध क्षमा करो
मै तामसी वृत्ति प्राणी हूँ
कैसे तुम्हारा भेद पाता
जब देवता ॠषि मुनि पार ना पाते हैं
मै मूर्ख कैसे तुम्हे पहचानता
आपने ही जातिगत मेरा स्वभाव बनाया है
जैसे गौ घास खाने पर दूध देती है
वैसे ही मै दूध पीने पर
ज़हर उगलता हूँ
ये मेरा स्वभाव आपका ही बनाया है
और स्वभाववश अनजाने ही
मैने आप पर फ़ण चलाया है
पर मेरा अपराध क्षमा कीजिये
मुझे अब अपनी शरण मे लीजिये
जिन चरणों को लक्ष्मी ह्रदय मे धारण करती हैं
देवता ध्यान लगाते हैं
गंगा जिनकी धोवन है
वो चरण कमल आज
मेरे सिर पर विराजे हैं
मेरे जन्मो के सब पाप ताप मिट गये हैं
जो शेषनाग इतनी बडाई पाता है
जब आप उस पर शयन करते हैं
पर मेरे शीश पर आपने जो नृत्य किया
अब अपने बराबर पुण्यभागी
मै किसी को ना समझता हूँ
अब मेरा सब डर छूट गया
स्तुति सुन श्यामसुन्दर ने कहा
अब तुम कालीदह छोड
रमणक द्वीप मे वास करो
यहाँ मै जलक्रीडा करूँगा
महाप्रलय तक तेरा नाम स्थिर रहेगा
जो तेरी मेरी कथा सुनेगा
उसे ना साँप काटे का भय रहेगा
अब जल्दी से एक करोड कमल के फूल लाकर दो
डरते काँपते कालिय नाग ने निवेदन किया
प्रभु फूल तो अभी पहुँचा देता हूँ
पर रमणक द्वीप मे जाने से डरता हूँ
वहाँ गरुड जी मुझे खा जायेंगे
उन्हीके डर से तो यहाँ मै आया हूँ
इतना सुन प्रभु बोल पडे
अब तुम निर्भय रहो
गरुड ना तुम्हारा कुछ बिगाडेगा
मेरे चरणचिन्ह देख
तुम्हारे मस्तक पर
प्रणाम कर चला जायेगा
इतना कह प्रभु ने उसे अभयदान दिया
तब कालिये ने हर्ष सहित
पत्नि सहित विधिपूर्वक
प्रभु का पूजन किया
रत्न मणियाँ भेंट चढाईं
तीन करोड कमल के फूल
अपने ऊपर लाद लिये
इतना सुन परिक्षित ने पूछा
कालिय नाग ने कौन सा
ऐसा अपराध किया
जो रमणक द्वीप छोड
गरुड भय से यमुना मे वास किया
तब शुकदेव जी बतलाने लगे



क्रमशः ………
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आओ ……. सिलवटो को बुहारें


आओ 

सिलवटो को बुहारें यादों की झाड़ू से
शायद अक्स में वक्त नज़र आये 
जो छुप गया है सर्द अँधेरे में
उस अक्स की कुछ गर्द उतारें

ये रोशनियों के आँचल में
ठिठकती तस्वीरें
चलो इक बार फिर से
इनके रंग में रंग भरें  


वो शम्मा के पिघलने पर
पड़ते निशानों पर
कुछ वक्त की और कुछ अपनी
आओ इक उम्र गढ़ें 


जो ठहर गयी थी 
किसी नज़र में
उस नमी को
उस बेकसी को
उस रुकी सी ज़िन्दगी को
चलो इक बार फिर से
कश्ती में सवार करें 
आओ चलो हम दोनों 
फिर से कोई एक
नयी तस्वीर गढ़ें 

बुद्ध ………कौन ? ……..एक दृष्टिकोण

बुद्ध ………कौन ? ……..एक दृष्टिकोण 



बुद्ध ………कौन ? 

सिर्फ एक व्यक्तित्व या उससे भी इतर कुछ और ? एक प्रश्न जिसके ना जाने कितने उत्तर सबने दिए. यूँ तो सिद्धार्थ नाम जग ने भी दिया और जिसे उन्होंने सार्थक भी किया ……….सिद्ध कर दे जो अपने होने के अर्थ को बस वो ही तो है सिद्धार्थ ……….और स्वयं को सिद्ध करना और वो भी अपने ही आईने में सबसे मुश्किल कार्य होता है मगर मुश्किल डगर पर चलने वाले ही मंजिलों को पाते हैं  और उन्होंने वो ही किया मगर इन दोनों रूपों में एकरूपता होते हुए भी भिन्नता समा ही गयी जब सिद्धार्थ खुद को सिद्ध करने को अर्धरात्रि में बिना किसी को कुछ कहे एक खोज पर चल दिए . अपनी खोज को पूर्णविराम भी दिया मगर क्या सिर्फ इतने में ही जीवन उनका सार्थक हुआ ये प्रश्न लाजिमी है . यूँ तो दुनिया को एक मार्ग दिया और स्वयं को भी पा लिया मगर उसके लिए किसी आग को मिटटी के हवाले किया , किसी की बलि देकर खुद को पूर्ण किया जिससे ना उनका अस्तित्व कभी पूर्ण हुआ …….हाँ पूर्ण होकर भी कहीं ना कहीं एक अपूर्णता तो रही जो ना ज़माने को दिखी मगर बुद्ध बने तो जान गए उस अपूर्णता को भी और नतमस्तक हुए उसके आगे क्यूँकि बिना उस बेनामी अस्तित्व के उनका अस्तित्व नाम नहीं पाता , बिना उसके त्याग के वो स्वयं को सिद्ध ना कर पाते ………..इस पूर्णता में , इस बुद्धत्व में कहीं ना कहीं एक ऐसे बीज का अस्तित्व है जो कभी पका ही नहीं , जिसमे अंकुर फूटा ही नहीं मगर फिर भी उसमे फल फूल लग ही गए सिर्फ और सिर्फ अपने कर्त्तव्य पथ  पर चलने के कारण , अपने धर्म का पालन करने के कारण ……..नाम अमर हो गया उसका भी ………..हाँ …….उसी का जिसे अर्धांगिनी कहा जाता है ……….आधा अंग जब मिला पूर्ण से तब हुआ संपूर्ण ……….वो ही थी वास्तव में उनके पूर्णत्व की पहचान …………एक दृष्टिकोण ये भी है इस पूर्णता का , इस बुद्धत्व का जिसे हमेशा अनदेखा किया गया .





पूर्णत्व की पहचान हो तुम 





यधोधरा
तुम सोचोगी
क्यो नही तुम्हे 
बता कर गया
क्यो नही तुम्हे 
अपने निर्णय से 
अवगत कराया
शायद तुम ना 
मुझे रोकतीं तब
अश्रुओं की दुहाई भी
ना देतीं तब
जानता हूँ
बहुत सहनशीलता है तुममे
मगर शायद 
मुझमे ही 
वो साहस ना था
शायद मै ही
कहीं कमजोर पडा था
शायद मै ही तुम्हारे
दृढ निश्चय के आगे
टिक नही पाता
तुम्हारी आँखो मे
देख नही पाता 
वो सच 
कि देखो 
स्त्री हूँ
सहधर्मिणी हूँ
मगर पथबाधा नही
और उस दम्भ से 
आलोकित तुम्हारी मुखाकृति
मेरा पथ प्रशस्त तो करती
मगर कहीं दिल मे  वो 
शूल सी चुभती रहती
क्योंकि 
अगर मै तुम्हारी जगह होता
तो शायद ऐसा ना कर पाता
यशोधरा 
तुम्हे मै जाने से रोक लेता
मगर तुम्हारा सा साहस ना कहीं पाता
धन्य हो तुम देवी
जो तुमने ऐसे अप्रतिम 
साहस का परिचय दिया
और मुझमे बुद्धत्व जगा दिया
मेरी जीवत्व से बुद्धत्व तक की राह में 
तुम्हारा बलिदान अतुलनीय है 
गर तुम मुझे खोजते पीछे आ गयीं होतीं
तो यूँ ना जन कल्याण होता 
ना ही धर्म उत्थान होता 
हे देवी !मेरे बुद्धत्व की राह का
तुम वो लौह स्तम्भ हो 
जिस पर जीवों का कल्याण हुआ 
और मुझसे पहले पूर्णत्व तो तुमने पा लिया 
क्योंकि बुद्ध होने से पहले पूर्ण होना जरूरी होता है
और तुम्हारे बुद्धत्व में पूर्णत्व को पाता सच 
या पूर्णत्व में समाहित तेजोमय ओजस्वी बुद्धत्व
तुम्हारी मुखाकृति पर झलकता 
सौम्य शांत तेजपूर्ण ओज ही तुम्हारी 
वो पहचान है जिसे गर मैं
तुम्हारी जगह होता 
तो कभी ना पा सकता था 
हाँ यशोधरा ! नमन है तुम्हें देवी 
धैर्य और संयम की बेमिसाल मिसाल हो तुम 
स्त्री पुरुष के फर्क की पहचान हो तुम 
वास्तव में तो मेरे बुद्धत्व का ओजपूर्ण गौरव हो तुम 
नारी शक्ति का प्रतिमान हो तुम 
बुद्ध की असली पहचान हो तुम ……..सिर्फ तुम 

कृष्ण लीला ……..भाग 45


टकटकी लगाये सब देख रहे हैं
कब आवेंगे मनमोहन सोच रहे हैं
इधर कान्हा नटवर रूप धरे
कालीदह में पहुंचे हैं
मोहिनी मूरत की सुन्दरता देख
नागिन मोहित हो कहने लगीं
हे स्वरूपवान कोमल तन 
तुम यहाँ क्यों आये हो
अभी तो कालियनाग सोया है
जल्दी यहाँ से तुम जाओ
उसके विष से जल जाओगे
कोमल तन तुम्हारा है
तुम पर तरस मुझे आता है
इतना सुन केशव मूर्ति बोल पड़े
तुम अपने पति को जगा दो
मैं एक करोड़ कमलफूल लेने आया हूँ 
उससे क्या बात करोगे
उसकी विषभरी फुंफकार से ही जल मरोगे
तुम्हारा सुन्दर रूप देख 
दया मुझे आती है 
बालक जान तुझे कहती हूँ
क्यों अपने माता पिता को दुःख देते हो
उस कंस का नाश हो जाये
जिसने तुम्हें यहाँ भेजा है
मुझे तुम्हारी अवस्था पर
बहुत दुःख होता है
नागिन प्रेमभरी ये बोल पड़ी
तब कान्हा ने उपदेश दिया
सोये को मारना ना धर्म होता है
इसलिए जगाने को कहता हूँ
सुन नागिन बोल पड़ी
क्यों छोटे मुँह बड़ी बात करता है
ये कालीनाग गरुड़ तक से लड़ा है
लगता है तेरी मृत्यु 
तुझे यहाँ लायी है
जो मेरी बात तुझे 
समझ ना आई है
तुझमे सामर्थ्य हो तो 
स्वयं जगा ले
इतना सुन वृन्दावन बिहारी ने
नाग की पूँछ पर पाँव धरा 
गरुड़ के डर से वैसे ही
चौंक कर उठ खड़ा हुआ
मगर सामने एक बालक को देख
उसे अचरज हुआ
और बोल उठा
मेरे विष की गर्मी तो
अक्षयवट ना सह पाता है
कोसों तक के पशु पक्षी 
भस्म हो जाते हैं 
फिर ये कैसा बालक है
जो अब तक मेरे सामने खड़ा है
और मुझे नींद से जगाने का 
जिसने दुस्साहस किया है
इतना सोच कालियनाग 
प्रभु की तरफ दौड़ पड़ा 
और अपने सौ फनों से 
उनको काटने लगा



उसके विष से यमुना जल
अदहन सम खौलता है
पर वैकुन्ठनाथ पर ना
कोई असर होता था
जब काली ने देखा
मेरे विष का ना
इस पर असर हुआ
जरूर कोई मंत्र जानता है
तभी ना इसको
इतना भीषण विष
व्यापता है
 ये सोच काली ने
मोहन को अपने
शरीर से कसकर
लपेट लिया
ये देख नागिन
व्याकुल हुई
इतना सुन्दर बालक
बेमौत मारा जायेगा
इसका बचना कठिन
दिखाई देता है
काली मद मे चूर हो बोला
मै सर्पों का राजा हूँ
यहाँ से बचकर ना
तुम जाने पाओगे
इतना सुन मनमोहन ने
अपना शरीर बढाया
जिसके कारण नाग का
अंग अंग टूट गया
और उसने घबराकर
मनमोहन को छोड दिया
फिर आग बबूला हो
फ़ण ऊँचा कर
फ़ुंफ़कार भरी
नथुनों से उसकी विष की
फ़ुहारें निकल रहीँ थीं
आँखें लाल भट्टी सी तप रही थीँ
मूँह से आग की लपटें निकल रही थीं
श्री कृष्ण उसके साथ खेलते हुये
पैंतरे बदलने लगे
नाग भी उन पर चोट करने को
पैंतरे बदलता रहा
जब पैंतरे बदलते बदलते
नाग का बल क्षीण हुआ
तब कान्हा ने उसके
बडे बडे सिरों को
अपने पैर से दबा दिया
और उछल कर उस पर सवार हुये
कालिये के मस्तक पर
लाल लाल मणियाँ चमकती थीं
जिसकी आभा से कान्हा के
तलुवों की आभा और बढती थी
कान्हा उस पर नृत्य करने लगे
ये देख देवता समझ गये
प्रभु नृत्य करना चाहते हैं
इसलिये ढोल नगाडे मृदंग
पुष्प लेकर आ गये
अद्भुत  नृत्य प्रभु का
सबको लुभाता है
शिव समाधि बिसराते हैं
और प्रभु के दिव्य नृत्य को देखने
दौडे चले आते हैं
और मुदित मन नेत्रों को पावन करते हैं
उस दृश्य के आत्मिक आनन्द मे
डूबते उतराते जाते हैं
पर प्रभु के बेजोड नृत्य के आगे
स्वंय के नृत्य को भी तुच्छ पाते हैं
आज प्रभु का अद्भुत श्रृंगार हुआ है
हर मन प्रभु रंग मे रंगा हुआ है
किसी को ने अपना भान रहा है
सिर्फ़ विश्वरूप ही विश्वरूप दिख रहा है

क्रमशः ………..

अपनी कमली बना लो ना मुझे भी



जरूर राधा ने मोहिनी डारी है 
तभी छवि तुम्हारी इतनी मतवाली है 
जो भी देखे मधुर छवि 
अपना आप भुलाता है 
ये राधे की महिमा न्यारी है 
जो तुम पर पडती भारी है 
तुम सुध बुध अपनी बिसरा देते हो 
जब राधा नैनन मे उलझते हो 
जैसी दशा तुम्हारी है मोहन 
बस वैसी ही दशा हमारी है 
घायल की गति घायल जाने 
अब तो समझो गिरधारी 
मै हूँ तुम्हारी जोगनिया न्यारी
उस अनुपम छवि की प्यासी हूँ 
जो राधे नैनन मे बसता है 
राधा का मन हरता है 
चितचोर नाम कहाता है 
छछिया भर छाछ पर रीझ जाता है 
इक बार झलक दिखाओ सांवरिया
अपने चरण लगाओ सांवरिया 
अश्रुबिंदु अर्पण करती हूँ 
भावों से खुद का तर्पण करती हूँ
बस पिया दरस की प्यासी हूँ ………..मोहन 
इक बार गले लगाओ सांवरिया
मेरी तपन मिटाओ सांवरिया 

चाहे चरण दरस ही दिखाओ सांवरिया
बस इक बार तुम आ जाओ सांवरिया 
वो ही मोहिनी मूरत दिखाओ सांवरिया
जिसमे राधा रूप झलकता है 
प्रेम वहीँ परिपूर्ण होता है 
बस इक बूँद तो पिला दो सांवरिया 
जीवन सफल बना दो सांवरिया
जीवन रास महारास बन जाये 
जो तुम्हारा दर्शन हो जाये 
हे मोहन ……..अपनी कमली बना लो ना मुझे भी …….आह !!!!



बस नववधू द्वार से ही वापस मुड जाती है



अभी रात गयी नहीं है
अभी सुबह हुई नहीं है
बस दोनों के 
आगमन और निर्गमन 
के मध्य का वो 
अद्भुत दृश्य 
शीतल पुरवाई 
शांत सुरम्य मनमोहक वातावरण
प्रकृति अपना घूंघट घोलने से पहले
ज्यों सकुचाई सी पल्लू की ओट से 
निरीक्षण कर रही हो दिवस का 
ठिठकी खडी हो ज्यों 
कोई परदेसी कुछ देर रुका हो 
किसी अनजानी राह पर 
प्रभात ध्वनियाँ गुंजारित हो रही हों
कहीं से अजान तो कहीं गुरुग्रंथ जी का पाठ 
तो कहीं मंदिर में बजती घंटियाँ
तो कहीं आरती के स्वर 
हर आते जाते के मुख से 
जय सिया राम की ध्वनि का निकलना
भक्तिमय सुरम्य वातावरण 
और भोर का तारा भी 
यूँ झिलमिलाता हो 
ज्यों आतिशबाजी कहीं चलती हो 
कहीं मुर्गे की बांग 
तो कही चिड़ियों का कलरव
तो कहीं झुण्ड में उड़ते पंछियों का 
आसमाँ के सीने पर पंख फ़डफ़डाना
ज्यों बच्चा कोई पिता के सीने पर 
किलकारियां भरता हो 
मंद मंद बहती शीतल स्वच्छ समीर
साँसों के साथ जैसे 
पूनम की चाँदनी मन में उतरती हो 
सारी कायनात यूँ न्योछावर होती है 
ज्यों नववधू का स्वागत करती हो 
आहा ! सुदूर में खिलती लालिमा 
ज्यों नववधू की मांग का सिन्दूर झिलमिलाता हो 
दिनकर भी नववधू के माथे की बिंदिया सा टिमटिमाता हो 
एक आल्हादित करने वाला रोमांचक 
भोर का वो सुरम्य मनमोहक संगीत 
ओ मनुज ! अब कहाँ से पाऊँ मैं ?
जो आत्मा में आज भी 
सात सुरों की सरगम बन 
दिव्य राग सुनाता हो 
मन मयूर जहाँ नाच जाता हो 
ऊंची अट्टालिकाओं, ह्रदयहीन मानव 
मशीनी ज़िन्दगी के बीच 
सिमटती ज़िन्दगी के चौराहे पर
मेरी रूह कुचली मसली पड़ी है 
उस दृश्य के लिए मचलती है ……..
जो आज भी मेरे गाँव में बिखरा मिलता है
ये कैसा शहरीकरण का प्रकोप मुझे दिखता है 
जिसमे ना कहीं कोई स्पंदन दिखता है
जहाँ भोर भी आने से डरती है 
जहाँ ना कोई उसके स्वागत को उत्सुक दिखता है
बस नववधू द्वार से ही वापस मुड जाती है 
पर घूंघट उठाने की हिम्मत ना करती है 
बस प्रकृति यही सवाल करती है
आह ! कब मैं पुनः अपना स्वरुप वापस पाऊंगी 
हर आँगन में नृत्य करती देखी जाऊंगी 
बता सकते हो ……ओ मनुज !
इस अंधे गहरे कुएं में मेरी वापसी का भी कोई द्वार बनाया है क्या ??????

ना तलाश मुकम्मल हुई और ना ही "मैं" ……….

सुनो 

बदल दो मुझमे
मेरा सब कुछ 
हाँ ………..सब कुछ
कहा था एक दिन तुमसे
और देखो तो ज़रा
मुझमे “मैं” कहीं बची ही नहीं 

तेरी तमन्ना 
तेरी चाहत
तेरी आरजू 
बस यही सब तो 
ज़िन्दगी बन गयी 
मगर कोई तलाश थी बाकी
जो अब भी अधूरी रही 

अलाव का सुलगना
गर्म तवे पर बूँद का वाष्पित होना
और चिनारों के साए में भी 
धूप की तपिश से जल जाना 
बस अब और क्या बचा ?

ना तलाश मुकम्मल हुई और ना ही “मैं” ……….
बदलाव की प्रक्रिया में सुलगते अंगारों की पपड़ी आज भी होठों पर जमी है ………. दो बूँद अमृत की तलाश में 

टैग का बादल