Just another WordPress.com weblog

Archive for दिसम्बर, 2010

>मैंने खुद से खुद को जो जीत लिया …………

>जीवन कब बदलता है
ये तो नज़रों का धोखा  है
खुद से खुद को छलता है
यूँ ही उत्साह में उछलता है

ना कल बदला था
ना आज बदलेगा
ये तो जोगी वाला फेरा है
आने वाला आएगा
जाने वाला जाएगा
पगले तेरे जीवन में
क्या कोई पल ठहर जायेगा
जो इतना भरमाता है
खुद से खुद को  छलता है

क्यूँ आस के बीज बोता है
क्यूँ उम्मीदों के वृक्ष लगाता है
क्या इतना नहीं समझ पाता है
हर बार खाता धोखा है
कभी ना कोई फल तुझे मिल पाता है
फिर भी हसरतों को परवान चढ़ाता है
आम जीवन कहाँ बदलता है
ये तो पैसे वालों का शौक मचलता है
तू क्यूँ इसमें भटकता है
क्यूँ खुद से खुद को छलता है

ना आने वाले का स्वागत कर
ना जाने वाले का गम कर
मत देखादेखी खुद को भ्रमित कर
तू ना पाँव पसार पायेगा
कल भी तेरा भाग्य ना बदल पायेगा
कर कर्म ऐसे कि
खुदा खुद तुझसे पूछे
कि बता कौन सा तुझे
भोग लगाऊं
कैसे अब तेरा क़र्ज़ चुकाऊँ
मगर तू ना हाथ फैला लेना
कर्म के बल को पहचान लेना
कर्मनिष्ठ हो कल को बदल देना
मगर कभी ना भाग्य  के पंछी को
दिल में जगह देना
फिर कह सकेगा तू भी
नव वर्ष नूतन हो गया
मैंने खुद से खुद को जो जीत लिया
मैंने खुद से खुद को जो जीत लिया …………

Advertisements

>लम्हों की कहानी सदियों की जुबानी हो जाये …………..200 वी पोस्ट

>कल तेरे शहर की हवा ने
दस्तक दी मेरे दरवाज़े पर
ना जाने किसने राह दिखाई
कैसे खबर हुई ,किसने पता बताया

गुमनाम पता कौन ढूँढ  लाया
क्या तुम जानते थे मैं कहाँ हूँ ?
…………………………
……………
मुद्दत बाद देखा है तुम्हें
इक अरसा हुआ देखे हुए
लगा जैसे सदियाँ बह गयी हों
सिर्फ एक लम्हे में
कहो ना …………
कैसे जाना मैं कहाँ हूँ ?

क्या करोगी जानकर
ये दिल के सौदे होते हैं
तुम्हारे लिए मैं सिर्फ
एक ख्याल रहा
हवाओं में तैरता हुआ
फिर कैसे जानोगी
दिल के उफनते लावे को
क्या क्या  बह रहा है
तुम्हारे साथ तुम्हारे बिन
मैं पता किससे पूछता
तुमने कब बताया था
ये तो हवाओं ने ही
मुझे  तुमसे मिलवाया है
और पाँव खुद-ब-खुद
तुम्हारे शहर में ले आये हैं

आखिर दिल के मोड़ों पर
तुम्हारा ही तो नाम लिखा है


आज कह लो सब
सुन रही हूँ
वो दरिया जो
सिकुड़ गया था
तुम्हारी उदासियों में
और वो जो दिल की मिटटी पर
ख्यालों का लेप तुमने
लगाया था जब मैंने
अपनी कसम में तुम्हें
और तुम्हारे अरमानों को
जिंदा लिटाया था
उन सभी तुम्हारे
अनकहे जज्बातों  को
शायद आज समझी हूँ
किसी उम्र के उस मोड़ को
जो पीछे छोड़ आई हूँ
आज पकड़ने की ख्वाहिश
जन्म ले रही है
कहो आज दिल की दास्ताँ …………..

तुम क्या जानो
प्रेम डगर की सूक्ष्मता
कैसे तुम्हारे बिना
पलों ने  मुझे बींधा है
देखो ना
मेरे दिल का हर तागा
कैसे ज़ख़्मी हुआ है
जैसे अर्जुन ने शर- शैया पर
भीष्म को बींधा हो
और वो तब भी
हँस रहा हो
आखिर ज़ख्म भी तो
मोहब्बत ने दिया है
तुम्हारे बिना जीया ही
कब था ये तो एक
लाश ने वक्त को
कफ़न में लपेटा हुआ था
शायद कभी कफ़न
चेहरे से हट जाये
शायद कभी दीदार
तेरा हो जाये
शायद कभी जिसे तुमने
नेस्तनाबूद किया
वो बीज एक बार फिर
उग जाए
प्रेम का तुम्हें भी
कभी कोई लम्हा
चुभ जाये
तुम भी शायद कभी
मुझे आवाज़ दो
वैसे ही तड़पो
जैसे कोई चकवी
चकोर को तरस रही हो
मगर
तुमने ना आवाज़ दी
ना तड्पी मेरे लिए
तुम तो वो जोगिन
बन गयीं जिसे
श्याम सिर्फ सपनो
में मिलता है
प्रेम की अनंत ऋचाएं
और तुम उसकी परिणति
सिर्फ अँधेरे कोनो में ही
समेट लेना चाहती थीं
पता है तुम्हें
जब भी तुम
सिसकती थीं
वो आह जब मुझ
तक पहुँचती  थी
देखना चाहती हो
क्या होता था
देखो …………
देख रही हो ना
ये जलता हुआ निशाँ ………..
ये उसी सिसकी की
निशानी है
मेरे सीने पर
देखो ना
कितने निशाँ हैं
तुम्हारी चाहत के
क्या गिन पाओगी इन्हें ………..
देखो तो
अब तक हरे हैं ……….

उफ़ !
ज़िन्दगी ना मैं जी पायी हूँ
ना तुमने कभी करवट ली
जानती हूँ
 मगर देर हो गयी ना
तुम और तुम्हारी दुनिया
मैं और मेरी दुनिया
अपना अपना संसार
दो ध्रुव ज़िन्दगी के
कभी देखा है ध्रुवों को
एकाकार होते हुए

अरे क्या कह रही हो
कब और कैसे ध्रुवीकरण
कर दिया तुमने
मैं तो आज भी
तुम्हें खुद में
समाहित पाता हूँ
जब खुद से भटक जाता हूँ
तुममे खुद को पाता हूँ
जब भी तुम्हारी
याद की ओढनी ओढ़कर
चाहत चली आई
तारों की मखमली चादर
मैंने बिछायी
और उस पर
तुम्हारी याद की
सेज सजाई
कहो फिर कैसे
कहती हो
जुदा हैं हम
क्या नहीं जानतीं
चाहतों का
सुहाग अमर होता है

चलो आओ आज फिर
एक नयी शुरुआत करें
जो छूट गया था
कुछ तुममे और कुछ मुझमे
कुछ तुम्हारा और कुछ मेरा
वो सामान तलाश करें

जो चाहत परवान ना चढ़ी
जो दुनिया के अरमानो पर
जिंदा दफ़न हुयी
चलो आओं आज उसी चाहत को
अपने दिल के आँगन में
एक साथ उगायें
आखिर बरसों की जुदाई के
तप में कुछ तो तपिश होगी
कुछ तो अंकुर होंगे
जो अभी बचे होंगे
जिन्हें अभी नेह के मेह
की तलाश होगी 
कुछ फूल तो जरूर खिलेंगे
है ना …………..

वक्त की दहलीज पर
तेरा मेरा मिलना
ज्यूँ संगम किसी
क्षितिज का होना
तुम और मैं
आज मोहब्बत को
नया आयाम दें
देखो
तुम्हारे लरजते अधर
आमंत्रण देते नयन बाण
ये उठती गिरती पलकें
और दिल की धडकनों का
पटरी पर दौड़ती रेल की
आवाज़ सा स्पंदन
और हया की लालिमा
सांझ की लालिमा को भी
शर्मसार करती हुई
मुझे बेकाबू कर रही है
मैं भीग रहा हूँ
तुम्हारे नेह की धारा में
अब होश कैसे रखूँ
देखो ना ………….
मेरी आँखों में तैरते
गुलाबी डोरों को
क्या इनमे तुम्हें
एक तूफ़ान नज़र नहीं आता
बताओ तो ………..
कहाँ जाऊँ अब?
कैसे सागर की प्यास बुझाऊँ ?
अधरामृत की मदिरा में
कैसे रसपान करूँ ?
कुछ तो कहो ना …………
तुम तो यूँ
सकुचाई शरमाई
इक अलसाई सी
अंगडाई
लग रही हो
क्या तुम्हें मेरे प्रेम  की तपिश
नेह निमंत्रण नहीं दे रही
कैसे इतना सहती हो ?
मैं झुलस रहा हूँ
और तुम्हारा मौन
और झुलसा रहा है

अरे रे रे ………..
ये क्या सोचने लगीं

देखो ये वासनात्मक
राग नहीं है
ये तो प्रेम की
उद्दात तरंगो पर
बहता अनुराग है
तुम इसे कोई
दूसरा अर्थ ना देना
जानती हो ना
प्रेम के पंछी तो
सिर्फ तरंगों में
बहते हैं
वहाँ वासना दूर
कोने में खडी
सुबकती है
ये तो सिर्फ
प्रेमानुभूति की
रूहों के स्पंदन की
नैसर्गिक क्रिया है

जानती हूँ ……….
रूहें भटक रही हैं
मगर तब भी
इम्तिहान अभी बाकी है
बेशक तुम्हारे संग
मैंने भी ख्वाबों की
चादर लपेटी है
जहाँ तुम , तुम्हारी सांसें
तुम्हारे बाहुपाश में बंधा
मेरा अक्स
जैसे कोई मुसाफिर
राह के सतरंगी सपने में
एक टूटा तारा
सहेज रहा हो
जैसे कोई दरवेश
खुदा से मिल रहा हो
जैसे खुदा खुद आज
आसमां में मोतियों की झालर
टांग रहा हो
है ना ……..यही अहसास !
मगर फिर भी
ना तुम ना मैं
अभी अपने किनारों से
अलग हुए हैं
फिर कहो कैसे
बाँध तोड़ोगे ?
क्या भावनाएं बाँधों से
बड़ी हो गयीं
या हमारी पाक़ मोहब्बत
छोटी हो गयी
मोहब्बत ने तो कभी
रुसवा नहीं किया किरदारों को
फिर तुम कैसे झुलस गए
अंगारों पर
माना ………..मोहब्बत है
इम्तिहान भी तो यही है
जब तुम हो और मैं हूँ
दिल भी है धड़कन भी है
अरमान भी मचल रहे हैं
मगर देखो ना यूँ तो
सरे बाज़ार बेआबरू
 नहीं होती मोहब्बत
किसी एक चाहत की लाश पर
नहीं सोती मोहब्बत

तो फिर तुम ही कहो
क्या करें
कैसे अब के मिले
फिर कभी ना बिछडें
अब दूरियां नहीं सही जातीं
जानता हूँ …………….
हालात इक तरफा नहीं
जो तूफ़ान यहाँ ठहरा है
उसी में तुम भी घिरी हो
अपनी मर्यादा की दहलीज पर
मगर अब तो
कोई हल ढूंढना होगा
मोहब्बत को मुकाम देना होगा
जो कल ना मिला
वो सब आज
हासिल करना होगा
बहुत हुआ
जी लिए बहुत
ज़माने के लिए
चलो अब कुछ पल
खुद के लिए भी जी लें
 जो अरमान राख़ बन चुके थे
उन्हें ज़िन्दा कर लें

मगर कैसे?
क्या बता सकोगे ?

कैसे जहाँ से
बचोगे
जो दुनिया
गोपी कृष्ण
भाव को ना
जान पाई
वहाँ भी जिसने
तोहमत लगायी
वो क्या प्रेम की
दिव्यता जान पायेगी
तुम्हारे और मेरे
प्रेम को कसौटी की
चिता पर ना सुलायेगी
जहाँ जिस्म नहीं
आत्माएं सुलगेंगी
वहाँ प्रेम की सुगंध
नहीं बिखरेगी
दुनिया की
नृशंसता नर्तन करेगी
वो तो इसे
जिस्मानी प्रेम
ही समझेगी
ऐसे मे

क्या दुनिया को
समझा सकोगे?
मोहब्बत की पाक़ तस्वीर
दिखा सकोगे?
क्या दुनिया समझ सकेगी?
क्या फिर से मोहब्बत
दीवारों में ना चिनेगी ?

तो बताओ तुम ही
क्या करूँ मैं
अब नहीं जी सकता
एक बार खो चुका हूँ
अब फिर से नहीं
खो सकता

वो तो अब मैं भी
इतनी आगे आ चुकी हूँ
वापस जा नहीं सकती
तुमसे खुद को जुदा
कर नहीं सकती
तुम्हारे बिन इक पल अब
फिर से जी नहीं सकती

तो फिर आओ
आज निर्णय करना होगा
क्या मेरा साथ दोगी उसमे
आज मोहब्बत तेरा
इम्तिहान लेगी
क्या दे सकोगी ?

तुम कहो तो सही
यहाँ ज़िन्दा रहकर
 मिल नहीं सकते
और काँटों की सेज पर
फिर से सो नहीं सकते
तो क्यूँ ना ऐसा करें
…………………..
हाँ हाँ कहो ना
………………….
तुम जानते हो
क्या कहना चाहती हूँ
ये तो जिस्मों की
बंदिशें हैं
रूहें तो आज़ाद हैं

हाँ सही कह रही हो
मेरा तो हर कदम
तेरी रहनुमाई के
सदके देता है
तेरे साथ जी ना सके
गम नहीं
रूह की आवाज़ पर भी
थिरकता है

तो फिर आओ
चलें ………….
उस जहाँ की ओर
जहाँ मोहब्बत
चिरायु हो जाए
लम्हों की कहानी
सदियों की जुबानी हो जाये …………..

>कर्तव्यपालन की सज़ा

>जब जल्दी हो तो सारे काम भी उल्टे होते हैं . कभी हाथ से दूध गिरता है तो कभी बर्तन तो कभी सब्जी . हद हो गयी है आज  तो लगता है अपांटमेंट कैंसल ही करनी पड़ेगी. कितनी मुश्किल से तो एक महीने बाद टाइम मिला था लगता है आज वो भी हाथ  से निकल  जायेगा. चलो कोशिश करती हूँ जल्दी से जाने की .ये सब सोचते हुये मै जल्दी जल्दी काम निबटाने लगी।


फिर जल्दी से काम निपटाकर मैं हॉस्पिटल के लिए निकल गयी मगर रास्ते में ट्रैफ़िक इतना कि लगा आज तो जाना ही बेकार था मगर अब कुछ नहीं हो सकता था क्यूँकि इतना आगे आ चुकी थी कि वापस जा नहीं सकती थी तो सोचा चलो चलते है . एक बार कोशिश करुँगी डॉक्टर को दिखाने की . किसी तरह जब वहाँ पहुची तो देखा बहुत से मरीज बैठे थे तो सांस में सांस आई कि चलो नंबर तो मिल ही जायेगा बेशक आखिर का मिले और आखिर का ही मिला . अब डेढ़ घंटे से पहले तो नंबर आने से रहा इसलिए एक साइड में बैठकर मैगजीन पढने लगी ।


थोड़ी देर बाद यूँ लगा जैसे कोई दो आँखें मुझे घूर रही हैं आँख उठाकर देखा तो सामने एक अर्धविक्षिप्त सी अवस्था में एक औरत बैठी थी और कभी- कभी मुझे देख लेती थी .उसके देखने के ढंग से ही बदन में झुरझुरी -सी आ रही थी  इसलिए उसे देखकर अन्दर ही अन्दर थोडा डर भी गयी मैं. फिर अपने को मैगजीन में वयस्त कर दिया मगर थोड़ी देर में वो औरत अपनी जगह से उठी और मेरे पास आकर बैठ गयी तो मैं सतर्क हो गयी. ना जाने कौन है , क्या मकसद है  , किस इरादे से मेरे पास आकर बैठी है, दिमाग अपनी रफ़्तार से दौड़ने लगा मगर किसी पर जाहिर नहीं होने दिया. मगर मैं सावधान होकर बैठ गयी . तभी वो अचानक बोली और मुझे अपना परिचय दिया और मुझसे मेरे बारे में पूछने लगी क्यूँकि उसे मैं जानती नहीं थी इसलिए सोच- सोच कर ही बातों क जवाब दिए . फिर बातों-बातों में उसने मुझसे अपनी थोड़ी जान -पहचान भी निकाल ली. अब मैं पहले से थोड़ी सहज हो गयी थी.


फिर मैंने उससे पूछा कि उसे क्या हुआ है तो उसके साथ उसकी माँ आई हुई थी वो बोलीं की इसे डिप्रैशन है और ये २-२ गोलियां नींद की खाती है फिर भी इसे नींद नहीं आती और काम पर भी जाना होता है तो स्कूटर भी चलती है . ये सुनकर मैं तो दंग ही रह गयी कि ऐसा इन्सान कैसे अपने आप को संभालता होगा और फिर बातों में जो पता चला उससे तो मेरा दिल ही दहल गया.


उसका नाम नमिता था . एक बेटा और एक बेटी दो उसके बच्चे थे . उसका बेटा कोटा में इंजीनियरिंग के एंट्रेंस की तैयारी कर रहा था और बेटी भी अभी 11वीं में थी . पति का अपना काम था तथा वो खुद किसी विश्वविध्यालय में अध्यापिका थी .पूरा परिवार भी सही पढ़ा -लिखा था फिर मुश्किल क्या थी अभी मैं ये सोच ही रही थी कि नमिता ने कहा ,”रोज़ी (मेरा नाम ) , तुम सोच रही होंगी कि मेरे साथ ऐसा क्या हुआ जो आज मेरी ये हालत है, तो सुनो ——–मुश्किल तब शुरू हुई जब मेरे बेटे का ऐडमिशन कोटा में हो गया और मुझे उसके पास जाकर २-३ महीने रहना पड़ता था . उसके खाने पीने का ध्यान रखना पड़ता था . घर पर मेरे पति और बिटिया होते थे और मुझे बेटे के भविष्य के लिए जाना पड़ता था .


एक औरत को  घर- परिवार, बच्चों और नौकरी सब देखना होता है . पति तो सिर्फ अपने काम पर ही लगे रहना जानते हैं मगर मुझ अकेली को सब देखना पड़ता । हर छोटी बडी चिन्तायें सब मेरी जिम्मेदारी होती थीं। कैसे घर और नौकरी के बीच तालमेल स्थापित कर रही थी ये सिर्फ़ मै ही जानती थी मगर फिर भी एक सुकून था कि बच्चों का भविष्य बन जायेगा और इसी बीच मेरे पति के अपनी सेक्रेटरी से सम्बन्ध बन गए . शुरू में तो मुझे पता ही नहीं चला  मगर ऐसी बातें कब तक छुपी रहती हैं किसी तरह ये बात मेरे कान में भी पड़ी तो मैंने अपनी तरफ से हर भरसक प्रयत्न किया . उन्हें समझाने की कोशिश की मगर जब बात खुल गयी तो वो खुले आम बेशर्मी पर उतर आये और उसे घर लाने लगे जिसका मेरी जवान होती बेटी पर भी असर पड़ने लगा . हमारे झगडे बढ़ने लगे. उन्हें कभी प्यार और कभी लड़कर कितना समझाया , बच्चों का हवाला दिया मगर उन पर तो इश्क का भूत सवार हो गया था इसलिए मारपीट तक की नौबत आने लगी . घर में हर वक्त क्लेश रहने लगा तो एक दिन उसके साथ जाकर रहने लगे और इस सदमे ने तो जैसे मेरे को भीतर तक झंझोड़ दिया  और मैं पागलपन की हद तक पहुँच गयी . सबको मारने , पीटने और काटने लगी . घर के हालात अब किसी से छुपे नहीं थे . बदनामी ने घर से बाहर निकलना दूभर कर दिया था बच्चे हर वक्त डरे- सहमे रहने लगे यहाँ तक कि बेटे को कोटा में पता चला तो उसकी पढाई पर भी असर पड़ने लगा .घर, घर ना रह नरक बन गया . जब हालात इतने बिगड़ गए तब मेरे घरवालों ने उन्हें बच्चों का वास्ता दिया , यहाँ तक की जात बिरादरी से भी बाहर करने की धमकी दी तब भी नहीं माने तो उन्हें कोर्ट ले जाने की धमकी दी तब जाकर वो वापस आये और जब मेरी ये हालत देखी तो अपने पर पश्चाताप भी हुआ क्यूँकि मेरी इस हालत के लिए वो ही तो जिम्मेदार थे . सिर्फ क्षणिक जूनून के लिए आज उन्होंने मेरा ये हाल कर दिया था कि मैं किसी को पहचान भी नहीं पाती थी इस ग्लानि ने उन्हें उस लड़की से सारे सम्बन्ध तोड़ने पर मजबूर कर दिया और उन्होंने मुझसे वादा किया कि वो अब उससे कोई सम्बन्ध नहीं रखेंगे ………ऐसा वो कहते हैं मगर मुझे नहीं लगता , मुझे उन पर अब विश्वास नहीं रहा .उनके आने के बाद मेरी माँ और उन्होंने मिलकर मेरी देखभाल की अच्छे से अच्छे डॉक्टर को दिखाया और मेरा इलाज कराया तब जाकर आज मैं कुछ सही हुई हूँ या कहो जैसी अब हूँ वो तुम्हारे सामने हूँ .  अब तुम बताओ रोज़ी क्या ऐसे इन्सान पर विश्वास किया जा सकता है ?क्या वो दोबारा मुझे छोड़कर नहीं जायेगा ?क्या फिर उसके कदम नहीं बहकेंगे, इस बात की क्या गारंटी है ?क्या अगर उसकी जगह मैं होती तो भी क्या वो मुझे अपनाता? अब तो मैं उसके साथ एक कमरे में रहना भी पसंद नहीं करती तो सम्बन्ध पहले जैसे कायम होना तो दूर की बात है . मेरा विश्वास चकनाचूर हो चुका है . इसमें बताओ मेरी क्या गलती है? क्या मैं एक अच्छी पत्नी नहीं रही या अच्छी माँ नहीं बन सकी? कौन सा कर्त्तव्य ऐसा है जो मैंने ढंग से नहीं निभाया?क्या बच्चों के प्रति , अपने परिवार के प्रति कर्त्तव्य निभाने की एक औरत को कभी किसी ने इतनी बड़ी सजा दी होगी?कहीं देखा है तुमने? एक कर्तव्यनिष्ठ,सत्चरित्र, सुगढ़ औरत की ऐसी दुर्दशा सिर्फ अपने कर्तव्यपालन के लिए?


उसकी बातें सुनकर मैं सुन्न हो गयी समझ नहीं आया कि उसे क्या कहूं और क्या समझाऊँ ? ऐसे हालात किसी को भी मानसिक रूप से तोड़ने के लिए काफी होते हैं . क्यूँकि मैं कभी मनोविज्ञान की छात्रा रही थी इसलिए अपनी तरफ से उसे काफी कुछ समझाया तो वो थोडा रीलेक्स लगने लगी मगर मैं जब तक घर आई एक प्रश्नचिन्ह बन गयी थी कि  एक औरत क्या सिर्फ औरत के आगे कुछ नहीं है ? पुरुष के लिए औरत क्या जिस्म से आगे कुछ नहीं है वो क्या इतना संवेदनहीन हो सकता है कि हवस के आगे उसे घर- परिवार कुछ दिखाई नहीं देता? क्या हो अगर औरत भी अपनी वासनापूर्ति के लिए ऐसे ही कदम उठाने लगे , वो भी अपनी मर्यादा भंग करने लगे? क्या एक औरत को उतनी जरूरत नहीं होती जितनी कि एक पुरुष को ? फिर कैसे एक पुरुष इतनी जल्दी अपनी सीमाएं तोड़ बैठता है ?मैं इन प्रश्नों के जाल में उलझ कर रह गयी और यही सोचती रही कि रोज़ी ने ये सब कैसे सहन किया होगा जब मैं इतनी व्यथित हो गयी हूँ .


मैं आज भी इन प्रश्नों के हल खोज रही हूँ मगर जवाब नहीं मिल रहा अगर किसी को मिले तो जरूर बताइयेगा.


>’कहीं तुम वही तो नहीं हो जाना ‘

>वो जोगी
अलख जगाता रहा
पूजन अर्चन वंदन
करता रहा
तप की अग्नि में
खुद की आहुति 
देता रहा
देवी दर्शन की
चाह में
लहू से अपने
तिलक लगाता रहा
चौखट पर देवी की
‘स्व’ को भस्मीभूत
करता रहा 
कठोर व्रत नियम 
करता रहा
और इक दिन
हो गयी
प्रसन्न देवी
दिए दर्शन
कहा ——
“माँग वरदान “
जोगी को 
नव जीवन मिला
वर्षों के तप का
फल मिला 
देवी को देख
स्व को भूल गया
जोगी के हर्ष का
ना पारावार रहा 
हर्षातिरेक में 
भिक्षा ऐसी 
माँग बैठा 
जीवन ही अपना
गँवा बैठा
भिक्षा में देवी से
‘मोहब्बत’
मांग बैठा
और जन्मों की 
तपस्या को 
पल में 
जन्मों के लिए
गँवा बैठा
‘तथास्तु’ कह 
देवी अंतर्धान 
हो गयी
और अब 
ढूँढता फिरता है
मोहब्बत को
अर्धविक्षिप्त सा 
‘कहीं तुम वही तो नहीं हो जाना ‘

>आहें सिलवटों की……………

>ज़िन्दा हूं मैं………..

अब कहीं नही हो तुम
ना ख्वाब मे , ना सांसों मे
ना दिल मे , ना धडकन मे
मगर फिर भी देखो तो
ज़िन्दा हूं मैं 

ज़िन्दगी………..

ओढ कर ज़िन्दगी का कफ़न
दर्द मे भीगूँ  और नज़्म बनूँ
तेरी आहों मे भी सजूँ
मगर ज़िन्दगी सी ना मिलूँ



 

नींद ……………..

 
दर्द का बिस्तर है
आहों का तकिया है
नश्तरों के ख्वाब हैं
अब बच के कहाँ जायेगी
नींद अच्छी आयेगी ना

अंदाज़ …………..

प्रेम के बहुत अन्दाज़ होते हैं
सब कहाँ उनसे गुजरे होते हैं
कभी तल्ख कभी भीने होते हैं
सब मोहब्बत के सिले होते हैं

या मोहब्बत थी ही नहीं ………..  

बेशक तुम वापस आ गये
मगर वीराने मे तो
बहार आई ही नही
कोई नया गुल
खिला ही नही
प्रेम का दीप
जला ही नही
शायद मोहब्बत
का  तेल
खत्म हो चुका था
या मोहब्बत
थी ही नही
 

सोच मे हूं………

क्या कहूं
सोच मे हूं
रिश्ता था
या रिश्ता है
या अहसास हैं
जिन्हे रिश्ते मे
बदल रहे थे
रिश्ते टूट सकते है
मगर अहसास
हमेशा ज़िन्दा
रहते हैं
फिर चाहे वो
प्यार बनकर रहें
या …………
बनकर

>अंकुर जरूर फ़ूटेंगे एक दिन

>मै तो
कल भी
वही थी
और आज भी
तुम ही
ना जाने
किस मोड
पर मुड गये
अब खाली
मोड ही
रोज चिढाता है
मगर
आस का
दीप अभी
बुझा नही है
शायद
किसी
गोधुलि वेला मे
तुम आओगे
जीवन को
मुकाम देने
और अपने
नेह को
आयाम देने

देखो
सूखने मत देना
इस आस के
वृक्ष को
तुम्हारे इंतज़ार के
पवित्र जल से
सींच देना
अंकुर जरूर फ़ूटेंगे
एक दिन
 —————-
————-

>नैसर्गिक संगीत कभी सुना है

>हवा के बहने से
पत्ते के हिलने से
पैदा होता नैसर्गिक
संगीत कभी सुना है
सुनना ज़रा
कल- कल करती
नदी के बहने का
मधुर संगीत
फूल की पंखुड़ी
पर गिरती ओस की
बूँद का अनुपम संगीत
तितली की पंखुड़ी
के हिलने से पैदा होता
मनमोहक संगीत
सुना है कभी
सुनना कभी
कण -कण में व्याप्त
दिव्य संगीत की धुन
बिना आवाज़ का 
बहता प्रकृति का
अनुपम संगीत
 रोम- रोम 
को महका देगा
ह्रदय को 
प्रफुल्लित 
उल्लसित कर देगा
ब्रह्मनाद का आभास
करा जायेगा
तुझे तुझमे व्याप्त
ब्रह्म से मिला जायेगा
अनहद नाद बजा जायेगा

टैग का बादल