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Archive for अप्रैल, 2009

निर्णय करें …………….क्या मुझे लिखना छोड़ देना चाहिए?

दोस्तों,

आज मैं मजबूर होकर आपके दरबार में आई हूँ .अब आप ही निर्णय करें और बताएं मुझे क्या करना चाहिए।
मेरे एक शुभचिंतक हैं रावेन्द्र रवि जी………….वो बेचारे मेरे लेखन से बहुत त्रस्त हैं। जब भी मौका मिलता है कहने से नही चूकते.उन्हें मेरा लेखन कभी भी पसंद नही आया । मेरे ब्लॉग पर ही कई बार मुझे उनकी टिप्पणियां मिलीं मगर मैंने उन्हें डिलीट नही किया क्यूंकि कहने का सभी को अधिकार है । जब तक कोई बताएगा नही तो कमियां कैसे पता चलेंगी । बस इसीलिए उन्होंने जो कहा मैंने हमेशा वो वैसा ही प्रकाशित भी किया । मगर अब तो उन्हें मेरी की हुई टिप्पणियां भी पसंद नही आतीं या कहिये जहाँ भी मैं टिपण्णी करती हूँ वहीँ जाकर मेरे लेखन के बारे में जी भरकर लिखते हैं ।

मैंने अपने प्रोफाइल में शुरू में ही लिखा है कि जो भी मन में आता है मैं वो ही लिखती हूँ । ये सब मैं आत्संतुष्टि के लिए लिखती हूँ । और मेरे ख्याल से आत्मसंतुष्टि के लिए कुछ भी करना कोई गुनाह तो नही है , कम से कम वो तो जिससे किसी का कुछ बुरा न हो। वैसे भी हम ऐसे देश के नागरिक हैं जहाँ कानून और संविधान भी हमें कुछ भी कहने की इजाज़त देता है। तो ऐसे में अगर मैं अपने सुख के लिए कुछ करती हूँ तो इसमें किसी को भी कोई परेशानी तो नही होनी चाहिए। मेरे बारे में ग़लत बातें कहकर मुझे लिखने से रोकना या मेरे लिखे को ग़लत कहना ————क्या यह मेरे अधिकारों का हनन नही है।
एक बात और कहना चाहती हूँ ………….यह जो रवि जी हैं ………..अपने ब्लॉग पर अपना लिखा कम और दुनिया का ज्यादा लगाते हैं………………क्या ऐसे मैं उन्हें कुछ कहने का अधिकार है? जब आप अपना नही लिख सकते तो मेरे ख्याल से दूसरे को भी कुछ कहने का अधिकार नही बनता । कम से कम उन लोगों को तो नही कह सकते जो कोशिश तो करते हैं अपने दिल की बातों को शब्द देने की । मेरे ख्याल से ………..शीशे के घर में रहने वालों को दूसरे पर पत्थर नही फेंकने चाहिए।

हों सकता है मुझे हिन्दी के व्याकरण पक्ष का कुछ कम ज्ञान हो ,शायद मैं छंद , दोहे,सोरठे,गीत या ग़ज़ल के बारे में इतना कुछ न जानती होऊं ……….मगर किसी के दिल से निकले जज़्बात तो अच्छे से समझती हूँ । और इसीलिए चाहती हूँ …………………अब आप ही निर्णय करें ………….क्या मैं गलत हूँ?
क्या मुझे लिखना छोड़ देना चाहिए?

वो तुम ही तो हो

प्रेम सुधा बरसाने वाली
मन को मेरे हरषाने वाली
ख्वाबों में झलक दिखाने वाली
प्राणप्रिया बन जाने वाली
जीवनाधार बन जाने वाली
रूह में बस जाने वाली
बदली सी छा जाने वाली
मेघों सी बरस जाने वाली
खुशबू से जीवन महकाने वाली
मुझे मुझसे चुराने वाली
जीवन की प्यास बुझाने वाली
होठों पर गीत बन ढल जाने वाली
जीवन को महकाने वाली
प्रिये ,
वो तुम ही तो हो
चित्त को मेरे चुराने वाली
मेरी जीवनसंगिनी बन जाने वाली
वो तुम ही तो हो

क्या खोजा क्या पाया

दोस्तों ,

ज़िन्दगी पर आज मैं अपनी ५० वीं पोस्ट डाल रही हूँ , उम्मीद है हमेशा की तरह इसे भी आपका प्यार मिलेगा।

आज खोजने चली मैं
क्या ? पता नही
पर , फिर भी चली मैं
हर तरफ़ इक
भीड़ नज़र आई
भागती , दौड़ती
ज़िन्दगी नज़र आई
न जाने किस उधेड़बुन में
गुजरती ज़िन्दगी
नज़र आई
अपनी ही उलझनों में
उलझती ज़िन्दगी
नज़र आई
कभी खुशियों को
तो कभी ग़मों को
छूती , ज़िन्दगी नज़र आई
तो कहीं
वक्त रुका हुआ नज़र आया
जैसे कहीं ठहर गया था
कहीं कोई स्पंदन न था
अनुभूतियाँ सब रुक चुकी थीं
अवलंबन सब टूट चुके थे
अपने सब पीछे छूट चुके थे
तो कहीं
सिर्फ़ खामोशी ही नज़र आई
सागर सी गहराई नज़र आई
वक्त की सुइयों पर टिकी
निगाहें ही नज़र आयीं
पल -पल को काटता
वक्त नज़र आया
अकेलेपन को झेलता
वो दर्द नज़र आया
आज खोजने चली मैं
तो पता नही
क्या खोजा क्या पाया

दास्ताँ

इक दास्ताँ तू कह
इक दास्ताँ मैं कहूँ
फ़साना ख़ुद बन जाएगा
गर ना बना तो
ज़माना बना देगा
तेरी मेरी चाहत को
एक नया नाम दे देगा

इक कहानी तू बन जा
इक कहानी मैं बन जाऊँ
तारीख गवाही दे देगी
तेरी मेरी कहानी को
इक नया आयाम दे देगी

इक सवाल तू बन जा
इक सवाल मैं बन जाऊँ
हल तो मिल ही जाएगा
गर ना मिला तो
तेरे मेरे सवालों को
दुनिया मुकाम दे देगी

किसका दोष ?

पता नही चेहरे में दोष था या आईने में
सूरत बदली ही नज़र आई
रुख आईने का बदल बदल कर देखा
हर बार सूरत में भी फर्क पाया
ऐ यार , दोष किसका था , कैसे जानें
यहाँ तो रोज आईने भी बदल जाते हैं
और सूरत भी
कभी आइना सूरत सा लगा
और
कभी सूरत आईने सी लगी
हर सूरत आईने का ही प्रतिबिम्ब लगी
फिर कैसे ढूंढें वो अक्स
जो आईने सा न लगे
या फिर
कैसे ढूंढें वो आईना
जो सूरत सा न लगे

हर इंसान में है साहित्यकार छुपा

ये आसमान में उड़ने वाले
उन्मुक्त पंछी हैं
मत रोको इनकी उडान को
मत बांधो इनके पंखों को
बढ़ने दो इनकी परवाज़ को
फिर देखो इनकी उड़ान को
क्यूँ बांधते हो इन्हें
साहित्य के दायरों में
साहित्य तो ख़ुद बन जाएगा
एक बार उडान तो भरने दो
मत ललकारो प्रतिभावानों को
प्रतिभा स्वयं छलकती है
किसी भी साहित्य के दायरे में
प्रतिभा भला कब बंधती है
साहित्य भी कब बंधा है किसी दायरे में
हर इंसान में है साहित्य छुपा
जिसने भी रचना को रचा
वो ही है साहित्यकार बना
साहित्य ने कब बांधा किसी को
वो तो स्वयं शब्दों में बंधता है
शब्दों के गठजोड़ से ही तो
साहित्यकार जनमता है
हर लिखने वाला इंसान भी
बाँध रहा संसार को
वो भी तो साहित्यकार है
एक घर है परिवार है
इसलिए
मत रोको इनकी उडान को

अमिट छाप

मन के कोरे कागज़ पर तुम
एक कविता लिख दो
अपने प्यार का
एक दिया जला दो
मन को इक
दर्पण सा बना दो
जब भी झांको
अपनी ही छवि निहारो
ओ मेरे प्रियतम
मेरे मन को तुम
अपना मन बना लो
सोचूँ मैं, और
तुम उसे बता दो
मैं , मैं न रहूँ
तेरा ही प्रतिबिम्ब
बन जाऊँ
मन के कोरे कागज़ पर तुम
अपनी अमिट छाप लगा दो

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