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Archive for फ़रवरी, 2013

ये फ़ितूरों के जंगल हमेशा बियाबान ही क्यों होते हैं?

काश !
मौन के ताले की भी कोई चाबी होती
तो जुबाँ ना यूँ बेबस होती
कलम ना यूँ खामोश होती
कोई आँधी जरूर उमडी होती

इन बेबसी के कांटों का चुभना …
मानो रूह का ज़िन्दगी के लिये मोहताज़ होना
बस यूँ गुज़रा हर लम्हा मुझ पर
ज्यूँ बदली कोई बरसी भी हो
और चूनर भीगी भी ना हो

ये फ़ितूरों के जंगल हमेशा बियाबान ही क्यों होते हैं?

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अब इसको कहूँ गज़ल या दिल के उदगार


अब इसको कहूँ गज़ल या दिल के उदगार
कान्हा कान्हा रट रही सांसो की हर तार

मुरली वारो सांवरो बैठो मन के द्वार
मै बैरन बैठी रही करके बंद किवार


श्रद्धा पूजा अर्चना सब भावों के विस्तार
पूर्ण होते एक मे जो मिल जाते सरकार

एक बूँद एक घट एक ही आकार प्रकार
दृष्टि बदलने पर ही व्यापता ये संसार

मधुर मिलन की आस पर जीवन गयो गुज़र
कब आवेंगे श्यामधनी मिटे ना मन की पीर

श्याम रंग की झांई परे श्यामल तन मन होय
मेरी मन की भांवरों मे श्याम श्याम ही होय

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जायें हम दोनों

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जायें हम दोनों
कहना कितना आसान लगता है ना
मगर क्या वास्तव मे ये संभव है
कैसे खुरच कर निकालोगे उन यादों के ढेर को
जो कहीं हीरे – जवाहरात सा
तो कहीं कूडे – कचरे सा
जमा होगा दिल के कोने – कोने में
कहीं यादों की कडवाहट
तो कहीं किलकारियाँ भरती जगमगाहटें
कहीं दर्द के फ़ानूस लटके होंगे
तो कहीं मोहब्बत के दीये जले मिलेंगे
जो कदम – कदम पर अपनी
उपस्थिति का भान कराते रहेंगे
जो कभी डराते रहेंगे
तो कभी उलझाते रहेंगे
और परिस्थिति वो ही दुरूह सी हो जायेगी
क्या आसान है अजनबी हो जाना
एक दूसरे को करीब से इतना जानने के बाद
क्या मुमकिन है एक नयी शुरुआत करना
फिर से अजनबियत का नकाब ओढ कर
जहाँ जानने को अब कुछ बचा ही ना हो
ये सिर्फ़ कहने में ही अच्छा लग सकता है
हकीकत में तो शुरुआत हमेशा शून्य से ही हुआ करती है ………

बेरंग लिफ़ाफ़े सा जिनका वजूद

Photo: सुश्री वन्दना गुप्ता

मुझे कहा गया बेटियों पर 
कुछ लिखो,कुछ कहो 
और मैं सोच में पड गयी
क्या लिखूँ और कैसे लिखूँ 
इस सदी की या उस सदी की व्यथा 
कहो तो किस पर लिखूँ ?
बेरंग लिफ़ाफ़े सा जिनका वजूद 
कभी यहाँ तो कभी वहाँ डोलता रहा
मगर कहीं ना अपना पता मिला
और वो ढूँढती रहीं एक आशियाना
उम्र के ज़िबह होने तक …………
आह ! बेटी शब्द हथौडे सा 
सीने पर पड गया 
जब किसी ने मादा होने का 
उसे दंड दिया 
जब किसी ने अफ़ीम का सेवन
करा दिया 
जब किसी ने पायताने के नीचे
गला रेत दिया
जब किसी ने खौलते दूध में
उबाल दिया
जब किसी ने गर्भ में ही 
मरवा दिया 
बेटी पराया धन 
बेटी का कन्यादान
अब ये घर तेरा नहीं 
जैसे जुमलों ने 
उसके अस्तित्व पर 
प्रश्नचिन्ह बना दिया 
ना जाने कौन सी सोच ने
ना जाने कौन से ग्रंथ ने
ना जाने कौन से धर्म ने
ये फ़र्क पैदा किया 
जो अपने ही शरीर के अंग पर
समाजिक मान्यताओं का तेज़ाब गिरा दिया 
और झुलस गयीं सदियाँ ………
और वो अपना घर आज भी  ढूँढ रही है
फिर कहो तो कहाँ उसकी दशा बदली है 
बात चाहे शिक्षा की हो
चाहे खानपान की
बेटियों से ही त्याग कराया जाता है
कल हो या आज 
कोई खास फ़र्क नही दिखता है
क्योंकि 
तबका कोई भी हो 
ऊँचा या नीचा
छोटा या बडा 
हालात ना कहीं बदले हैं
बल्कि ये चलन तो 
ऊँचे तबके से ही
नीचले तबकों तक उतरे हैं
जिसका असर निरक्षरों पर ज्यादा दिखता है
बेशक आज का पढा लिखा भी यही सब करता है
मगर उसकी बनायी गयी राहों पर जब
कोई अनपढ चलता है तो दोषी नहीं रह जाता है 
क्योंकि 
उसके लिये तो बेटा कमाऊ पूत होता है
और बेटी बोझ …………
किस पर लिखूँ 
सोच मे हूँ 
क्योंकि
कल की तस्वीर ने 
आज भी ना रुख बदला है
कल जन्मने के बाद मरण तय था
आज जन्म से पहले 
फिर कैसे कहते हैं 
सभ्यता बदल गयी है
फिर कैसे कहते हैं 
स्थिति मे बदलाव आया है
पहले से काफ़ी ठहराव आया है
फ़र्क आया है तो सिर्फ़ इतना
कि सोनोग्राफ़ी की तकनीक ने 
खिलने से पहले ही कली को दफ़नाया है
ना सोच बदली ना मानसिकता
ना दशा ना दिशा 
फिर भी प्रश्न उठ जाते हैं 
आज तो बेहद सुखद परिस्थितियाँ हैं
बेटियाँ कल्पना चावला , मैरी काम , इन्दिरा नूई 
बन रही हैं 
उच्च पदासीन हो रही हैं
विश्व स्तर पर नाम रौशन कर रही हैं
फिर कैसे कह सकते हो 
कि व्यवस्था में दोष है 
मगर इस सत्य को ना किसी ने जाना है
सवा करोड की आबादी में
इन महिलाओं का प्रतिशत कितना है?
ना केवल महिलाओं बल्कि 
कितने प्रतिशत बेटियोँ को 
आज भी बेटे पर तरज़ीह दी जाती है
कभी ना इसका आकलन किया गया 
गर आँकडों पर गौर किया जायेगा
तो भयावह सच सामने आयेगा 
बेटियों की दशा और दुर्दशा में 
ना कल कोई फ़र्क था 
और ना आज कोई ज्यादा फ़र्क नज़र आयेगा
जब तक ना बेटियों के महत्त्व को
दिल से स्वीकारा जायेगा
जब तक ना बेटियों के अस्तित्व के लिये 
एक आह्वान खुद की जागृति का 
खुद से ना किया जायेगा
तस्वीर का रुख तो धुँधला ही नज़र आयेगा 
क्योंकि
मोतियाबिंद के इलाज के लिये चीर फ़ाड तो डाक्टर ही किया करता है 
और हम खुद ही बीमार हैं
और इलाज के लिये डाक्टर भी खुद ही हैं 
अब ये हम पर है 
पिछली सडी गली परिपाटियों को पीटते रहें
या एक नया इतिहास लिखें
जो आने वाले कल का स्वर्णिम पल बने
शायद कुछ भी कहना या लिखना तभी सार्थक होगा
और जिस दिन हर घर में बेटियों के आगमन पर ढोल नगाडा बजेगा
वो ही दिन , वो ही पल  पूर्णता का सूचक होगा…………एक नयी क्रांति का आगाज़ होगा

23 फ़रवरी को डायलाग में ” बेटियों”  पर कविता पाठ करते हुये

डायलाग की एक शाम बेटियों के नाम

दोस्तों


23 फ़रवरी की शाम एक यादगार शाम बन गयी जब मिथिलेश श्रीवास्तव जी ने बेटियों के प्रति बढ रही असंवेदनशीलता के प्रति एक जागरुकता का आहवान किया और एकेडमी आफ़ लिटरेचर एंड फ़ाइन आर्टस के अंतर्गत “डायलाग” के माध्यम से सुप्रसिद्ध कवि और आल इंडिया रेडियो के निदेशक श्री लीलाधर मंडलोई जी , श्री लक्ष्मी शंकर वाजपेयी जी , अंजू शर्मा जी के साथ लगभग 25 कवियों को इस आहवान में शामिल किया और बेटियों के प्रति कौन क्या महसूसता है उन भावनाओं को व्यक्त करने को मंच प्रदान किया । 


इस कार्यक्रम के अंतर्गत सुधा उपाध्याय के द्वारा संचालित मंच पर महाकवि निराला की कविता ‘सरोज-स्मृति’ का पाठ कवि लीलाधर मंडलोई जी ने किया।कात्यायनी की कविता ‘हॉकी खेलती लडकियां’ का पाठ करेंगे लक्ष्मी शंकर वाजपेयी और चंद्रकांत देवताले की कविता ‘दो लड़कियों का पिता होने से’ का पाठ अंजू शर्मा ने किया जिसमें वहाँ उपस्थित हर श्रोता और वक्ता डूब गया।

उसके बाद वहाँ उपस्थित सभी कवियों ने अपनी अपनी वाणी के माध्यम से अपने उदगार प्रस्तुत किये जिसमें शामिल थे ………भावना चौहान,शारिक असिर , शोभा मित्तल, शोभा मिश्रा, राजेश्वर वशिष्ठ, उमा शंकर, शशि श्रीवास्तव, सुधा उपाध्याय, अंजू शर्मा, मिथिलेश श्रीवास्तव, ममता किरन, अजय अज्ञात, उपेन्द्र कुमार, विभा शर्मा, भरत तिवारी,विनोद कुमार, अर्चना त्रिपाठी ,विपिन चौधरी, रूपा सिंह ,ओमलता,अर्चना गुप्ता, संगीता शर्मा और मैं यानि वन्दना गुप्ता सहित काफ़ी कवियों ने कविता पाठ के माध्यम से अपने अपने विचार व्यक्त किये। कुछ नाम याद ना रहने की वजह से छूट रहे हैं उसके लिये माफ़ी चाहती हूँ और काफ़ी लोग आये भी नही थे जिनके नाम शामिल थे । इस प्रकार एक यादगार शाम ने ये सोचने को मजबूर कर दिया कि बेटियों का हमारे जीवन मे क्या महत्व है और आम जन बेटियों के प्रति कितना संवेदनशील है और इस तरह के आयोजन समाज की जागरुकता के लिये होते रहना एक स्वस्थ संकेत हैं ।ना जाने कैसे ये कह दिया गया कि लेखक समाज दामिनी के प्रति हुई क्रूरता के प्रति अपनी संवेदनायें प्रकट करने इंडिया गेट आदि जगहों पर नहीं पहुँचा । शायद उन्होने फ़ेसबुक और ब्लोग आदि पर नज़र नहीं डाली जहाँ दिन रात सिर्फ़ और सिर्फ़ दामिनी के प्रति हुयी क्रूरता पर आक्रोश उबल रहा था और यहाँ तक कि किसी ने नववर्ष की शुभकामनायें भी देना उचित नहीं समझा तो कैसे कह दें बेटियों के प्रति असंवेदनशील है ये समाज या इस समाज का लेखक । यदि उसकी एक झलक देखनी होती तो कल का ये कार्यक्रम अपने आप में पूर्ण विवरण प्रस्तुत करता है और समाज मे एक संदेश भी प्रसारित करता है। 

इन सबके अलावा काफ़ी मित्रगण भी वहाँ उपस्थित थे जैसे अमित आनन्द पाण्डेय, निरुपमा सिंह, सुशील क्रिश्नेट, विनोद पाराशर जी , जितेन्द्र कुमार पाण्डेय आदि और भी बहुत से मित्रगण जिन्होने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर ये साबित किया कि कितने जागरुक हैं आज के सरोकारों के प्रति।

इस कार्यक्रम की सबसे बडी उपलब्धि ये है कि इसे मीडिया कवरेज भी मिला और आज के हिन्दुस्तान के पेज पाँच पर पूरा एक आर्टिकल चित्र के साथ उपस्थित है जो दर्शा रहा है कि 

पहुँचती है आवाज़ स्वरभेदी दीवारों के पार भी

गर प्यार से दस्तक तो दे कोई 



अंत में अपने अध्यक्षीय भाषण से लीलाधर मंडलोई जी ने कविता कैसे लिखी जाये , कैसे आत्मसात की जाये और फिर कैसे पढी जाये ताकि सामने वाले के दिल में सीधे उतर जाये के बारे में वहाँ उपस्थित सभी कवियों और श्रोताओं  का ज्ञानवर्धन किया और बेटियों के प्रति हो रही असंवेदनशीलता पर अपनी कविता सुनाकर कार्यक्रम को समापन की ओर ले गये। उसके बाद जलपान करके सबने आपस मे एक दूसरे को अपना परिचय दिया और इस प्रकार एक सौहार्दपूर्ण वातावरण में एक यादगार शाम का समापन हुआ ।



ये है हिन्दुस्तान मे छपी तस्वीर


सुधा उपाध्याय कार्यक्रम का संचालन करती हुई 


लीलाधर मंडलोई जी कविता पाठ करते हुये 


श्रोता सुनते हुये 
लक्ष्मी शंकर वाजपेयी जी कविता पाठ करते हुये 

विभा जी
अंजू शर्मा चन्द्रकांत देवताले की कविता का पाठ करती हुई

रूपा सिंह वक्तव्य के साथ कविता पाठ करती हुई
मिथिलेश श्रीवास्तव कविता पाठ करते हुये 

शोभा मिश्रा कविता पाठ करते हुये 



हमें भी मौका मिला तो हमने भी अपनी बात कह ही दी …………पहचान मे आने की गारंटी नहीं………अरे भाई उम्र का तकाज़ा है …………फ़ोंट छोटे थे तो पढने को आँखों पर आँखें चढानी पडीं 

पहचान तो लिया ना 🙂







विपिन चौधरी कविता पाठ करती हुई








अर्चना त्रिपाठी जी कविता पाठ करती हुयी
शोभा मित्तल कविता पाठ करते हुये 



अर्चना

श्रोता सुनते हुये 

संगीता श्रीवास्तव जी 

मौका था तो कैसे चूकते इसलिये बहती गंगा में हमने भी हाथ धो लिये और एक फ़ोटो लीलाधर मंडलोई जी के साथ खिंचवा ली ………यादों की धरोहर बनाकर 
ये देखिये अंदाज़ खाने पीने का शोभा मिश्रा और निरुपमा का 🙂 

और ये शाम की आखिरी याद कैमरे मे समेट ली 


जिनके नाम याद नहीं उनके नही दिये और कुछ फ़ोटो सही नहीं आये तो वो नहीं लगाये इसलिये कुछ लोग छूट गये हैं 🙂 …………अगली पोस्ट मे उस कविता का जिक्र करेंगे जो कविता पाठ हमने किया था ……झेलने को तैयार रहियेगा 

मेरा प्रेम स्वार्थी है …

मैने तो सीखा ही नही
मैने तो जाना ही नहीं
क्या होता है प्रेम
मैने तो पहचाना ही नहीं
क्योंकि
मेरा प्रेम तुम्हारा होना माँगता है
तुमसे मिलन माँगता है
तुम्हारा श्रंगार मांगता है
तुमसे व्यवहार माँगता है
मेरा प्रेम भिखारी है
मेरा प्रेम दीनहीन है
मेरा प्रेम बलहीन है
मेरा प्रेम छदम नहीं
मेरा प्रेम सिर्फ़ विरह नही
मेरा प्रेम सिर्फ़ रुदन नही
मेरा प्रेम सिर्फ़ मौन नहीं
मुखरता में भी मौन हुआ जाता है
और मौन मे भी मुखरता होती है
मगर उसके लिये प्रेमी की जरूरत होती है
और तुम सिर्फ़ आभास हो
कहो फिर कैसे सिर्फ़ अपने में जीयूँ तुम्हें
जिसे देखा नहीं , जाना नहीं ,व्यवहार नहीं किया जिससे
कहो कैसे तुम्हारे प्रेम में स्वंय को भुला दूँ
कहो कैसे तुम्हारे प्रेम मेंशब्दहीन, स्पंदनहीन ,भावहीन
सारहीन ,संज्ञाशून्य हो जाऊँ और गंध सी बह जाऊँ
देह से परे होना , देह को भुला देना
दूसरे के लिये जीना
खुद को मिटा देना
अस्तित्वहीन हो जाना
कहाँ जाना मैने
क्योंकि
कोई अस्तित्वबोध तो होता
कोई स्वप्न में तो मिला होता
कोई सलोना मुखडा तो दिखा होता
ये आभासी प्रेम की संज्ञायें और उनका अस्तित्व तब तक शून्य ही है
किसी के लिये खुद को मिटाने के लिये
कम से कम उनका एक बार साक्षात्कार तो जरूरी है ना
इसलिये कहती हूँ
तब तक कम से कम मेरे लिये तो……मेरा प्रेम स्वार्थी है …मोहन!
अगर इसे भी प्रेम की संज्ञा दी जाती है तो
अगर ऐसे भी प्रेम परिभाषित किया जाता है तो?

फिर भी ना जाने क्यूँ रह जाता है कुछ अनकहा

सुनो
तुमसे सब कुछ कह देने के बाद भी
रह जाता है कुछ अनकहा
यूं तो हमारा रिश्ता
पहुँच चुका है भेद कर
ज़िन्दगी के हर मुकाम को
मगर फिर भी
न जाने क्यूँ
रह जाता है कुछ अनकहा

दुनियादारी की बातें हों
या सामाजिक बातें
या हो कोई समस्या
हम बेबाकी से कर लेते हैं
बहस और समाधान उस पर
मगर फिर भी
जब बात आती है
हमारे अपने रिश्ते की
न जाने क्यूँ
रह जाता है कुछ अनकहा

हम तुम इक दूजे के
न केवल जीवन साथी बने
बल्कि हमने तो जीवन को
मित्रवत भी जीया
अपने रिश्ते को
अपनेपन की ऊर्जा से
एक नया रूप दिया
तभी तो कर लेते हैं हम
दुनियाजहान की बातें
कार्यक्षेत्र हो या ज़िन्दगी
कर लेते हैं सबकी बातें
फिर भी न जाने क्यूँ
रह जाता है कुछ अनकहा

जानते हो क्या है वो
हमारा अपना रिश्ता
जो हम मुखर नहीं कर पाते हैं
जिसे हम मौन में ही परिभाषित करते हैं
और मौन में ही जीना चाहते हैं
और हमारा रिश्ता मौन की चौखट पर खड़ा
मौन होने लगता है
मौन की चट्टान न जाने क्यूँ
हम तोड़ नहीं पाते हैं
जो इक दूजे से चाहते हैं
जाने क्यूँ कह नहीं पाते हैं
किसी औपचारिकता का मोहताज नहीं
यूं तो हमारा रिश्ता
फिर भी ना जाने क्यूँ
रह जाता है कुछ अनकहा

शायद ये रिश्ते का वो पड़ाव होता है
जहाँ मौन को मुखरता की जरूरत होती है
और हम समझ नहीं पाते हैं
या शायद अपने हाव भाव से
समझा नहीं पाते  हैं
और साथी से सिर्फ यही चाहत होती  हैं
जो मैं सोचूँ वो बिना कहे समझ जाए
जो मैं चाहूं वो बिना कहे कर जाए
इतना वक्त बीता क्या वो अब भी
ना मेरा मन समझा
ना जाने क्यूँ ये चाह  बलवती रहती है
जो अच्छे खासे रिश्ते में
अदृश्य दीवार सी बनी रहती है
ना जाने क्यूँ फिर भी
कुछ अनकहा रह जाता है

उम्र का कोई भी पड़ाव हो
साथी के साथ तो रिश्ता ऐसा होता है
ज्यों नवयुगल का होता है
वहां न कोई पर्दा होता है
इसलिए चाहतें भी वहीँ फन उठती हैं
इक युगलप्रेमी से व्यवहार की
प्यार की , मनुहार की
इक दूजे को समझने की
वहीँ तो ज्यादा दरकार होती है
बस यही वो विषम झाड़ियाँ होती हैं
जो राहों को दुर्गम करती हैं
अच्छे भले रिश्ते में
गहरी खाइयाँ पैदा करती हैं

अबोलेपन की विषमता का जंगल 
हम अपने रिश्ते में ही क्यूँ उगा लेते हैं 
ये प्रेम की पराकाष्ठा होती है 
या चाहत की इंतेहा कि 
बिना कहे भी 
साथी से ही सब कुछ पाने की चाह  
इतनी बलवती होती है
इसलिए सब कुछ जानते समझते भी
फिर भी न जाने क्यूँ
रह जाता है कुछ अनकहा…………

 

टैग का बादल