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Archive for जून, 2009

क्यूँ नेह बढाते हो

क्यूँ नेह बढ़ते हो
मैं तो पत्थर हूँ
पत्थरों में स्पंदन नही होता
एक ऐसी जड़ हूँ
जिसमें जीवन नही होता
वो नदिया हूँ
जिसमें बहाव नही होता
वो आकाश हूँ
जिसका कोई दायरा नही होता
वो ठूंठ हूँ
जिस पर कोई फूल नही खिलता
वो साज़ हूँ
जिसमें कोई आवाज़ नही होती
वो सुर हूँ
जिसकी कोई ताल नही होती
वो ज़ख्म हूँ
जिसकी कोई दवा नही होती
वो ख्वाब हूँ
जिसकी कोई ताबीर नही होती
वो कोशिश हूँ
जो कभी पूरी नही होती
वो दीया हूँ
जिसमें बाती नही होती
वो चिराग हूँ
जिसमें रौशनी नही होती
वो शाम हूँ
जिसकी कोई सुबह नही होती
फिर क्यूँ नेह बढ़ते हो …………….

धरती और आकाश का क्षितिज

धरती और आकाश का क्षितिज
दूर बहुत दूर ……….अनन्त में
कभी मिलकर भी
नही मिल पाते
धरती यूँ ही
आकाश की तरफ़
एकटक , टकटकी बांधे
ताकती रहती है
नेह को उसके
तरसती रहती है
और आकाश
जब मन चाहे तब
बरस जाता है
उसकी चुनरिया को
धानी कर जाता है
और धरती प्रेम के
अथाह सागर में
डूब जाती है
और कभी कभी
ऐसा भी होता है
धरती जो आकाश की ओर
निहारते – निहारते
अपने वजूद को भी
खोने लगती है
तब भी आकाश
अपने अहम् में चूर
धरती की प्रीत को
उसके स्नेह को
उसके धैर्य को
भुलाकर , उसे
वृक्ष के ठूंठ सा
बाँझ बना देता है
उसके रूप – सौष्ठव को
उसकी गरिमा को
उसके त्याग को
बंजर बना देता है
प्रेम के अंकुर को सुखा देता है
उसकी सहनशीलता को
तीक्ष्ण ताप से
कुम्हला देता है
इतनी उपेक्षित होकर भी
धरती आकाश से
मिलन की चाह में
अपने को मिटाती रहती है
एक क्षितिज की चाह में
ख़ुद को भुलाती रहती है
और क्षितिज कभी
नही मिलता उसे
कभी नही मिलता ……….

ये जानती हूँ मैं

एक मुलाक़ात का
वादा चाहा उसने
मैं दे न सकी
मिलने की ख्वाहिश थी
फिर भी
मैं मिल न सकी
कुछ तो चोट लगी होगी
उसे भी
ये जानती हूँ मैं
मगर मेरी मजबूरियां
भी कम न थी
ये वो भी जानता होगा
अपनी ख्वाहिशों को
कैसे जब्त किया होगा
उसने
दिल पर अपने पत्थर
कैसे रखा होगा उसने
खामोशी का ज़हर
कैसे पिया होगा उसने
ये जानती हूँ मैं
मगर
कहीं बेपर्दा न हो जाऊँ
मेरी खातिर वो
कैसे जिया होगा
ये जानती हूँ मैं
दर्द के सैलाब से
गुज़र गया होगा
टीस चेहरे पर
आंखों में भी
न उतारी होगी
ये जानती हूँ मैं
कहीं कोई पढ़ न ले
कोई जान न ले
इस बेनामी
रिश्ते के
अनकहे
अनछुए
उसके जज्बातों को
इसलिए ज़हर का ये
कड़वा घूँट
कैसे पिया होगा उसने
ये जानती हूँ मैं
पल-पल कितनी मौत
मर-मर कर
जिया होगा
हँसी का कफ़न
चेहरे को उढाकर
कैसे हँसा होगा
ये जानती हूँ मैं

क्या यह बालश्रम नही ?

बाल श्रम के बारे में न जाने कब से बातें हो रही हैं और कभी कभी इसके खिलाफ कदम भी उठाये जाते हैं सब जानते हैं बच्चों से काम करवाना कानूनन अपराध है मगर क्या इसका सही ढंग से पालन किया जाता है ? क्या इसमें भेदभाव नही किया जाता?

आज मानवाधिकार आयोग बाल श्रम के ख़िलाफ़ कदम उठाता है । सरकार भी अपनी तरफ़ से भरसक कोशिश करती है मगर तब भी बाल श्रमिक हर जगह मिलते हैं । सवाल उठता है बाल श्रम किस पर लागू होता है ? क्या सिर्फ़ निचले तबके पर ही या फिर हर तबके पर , फिर चाहे वो ऊंचा तबका ही क्यूँ न हो ।

एक निचले तबके वाला बच्चा तो अपने जीने के लिए, दो वक्त की रोटी के लिए श्रम करता है । मगर ऊंचे तबके के लोग क्यूँ अपने बच्चों से काम करवाते हैं या फिर वो बच्चे काम क्यूँ करते हैं ? क्या उन्हें भी पैसों की उतनी ही जरूरत है जितनी कि निचले तबके के बच्चों को।
क्या यह बालश्रम नही ?

आज देखा जाए तो हर दूसरे सीरियल में , विज्ञापनों में बच्चे काम करते नज़र आते हैं। क्या ये बाल श्रम नही ?

एक तरफ़ तो एक बच्चा अपने जीने के लिए, पेट भरने के लिए काम करता है तो उसे पकड़ कर बाल सुधार गृह आदि में डाल दिया जाता है और दूस्रती तरफ़ सबकी आंखों के सामने , खुलेआम हम सब बच्चों को काम करते देखते हैं टेलिविज़न आदि पर , जबकि उन्हें पैसे की या कहो जिंदा रहने के लिए पैसे कमाने की उतनी जरूरत नही होती जितनी कि निचले तबके के बच्चों को होती है , फिर भी उनके खिलाफ न तो सरकार न ही मानवाधिकार आयोग कोई कदम उठता । क्या ये बालश्रम नही ?
अगर नही है तो फिर उन बच्चों को भी नही रोका जाना चाहिए जो जिन्दा रहने के लिए काम करते हैं और अगर रोका जाता है तो सरकार को उनके खाने पीने, रहने आदि के लिए इंतजाम करना चाहिए । या फिर कानून सबके लिए एक जैसा बनाया जाना चाहिए और एक जैसा ही लागू किया जाना चाहिए।

सिर्फ़ कानून को बनाना ही काफी नही है बल्कि उसको सफलता पूर्वक लागू भी किया जाए यह भी देखना सरकार का काम है । इसके साथ देश कि जनता को भी जागरूक होना चाहिए सिर्फ़ अपने खुशी के लिए अपने बच्चों को पैसा कमाने की होड़ में इस नाज़ुक उम्र में ही नही लगा देना चाहिए। उनके बचपन को उन्हें जी लेने देना चाहिए , ये तो उनका जन्मसिद्ध अधिकार है ।

बच्चे हैं हम
हमें जीने दो
रोटी , कपड़े
के लालच में
न ज़हर हमारे
बचपन में घोलो
क्या बचपन मेरा
फिर आएगा
दो घूँट खुशी के
पी लेने दो
बच्चे हैं हम
हमें जी लेने दो

आज इंसान को चाहिए अपनी महत्वाकांक्षाओं को थोड़ा कम करे और बच्चों को बच्चा ही रहने दे ।
बाल श्रम कानून सब पर एक जैसा ही लागू होना चाहिए क्यूंकि बच्चे तो सिर्फ़ बच्चे हैं फिर चाहे वो किसी भी तबके के हों ।

सिर्फ़ एक दिन

अपनी ज़िन्दगी से
सिर्फ़ एक दिन
उधार दे दो मुझे
उस एक दिन में
उम्र गुजार लेने दो मुझे
एक -एक पल को
यादों में सजा लेने दो मुझे
मेरे संग ,
उम्र के हर बंधन को तोड़ते हुए
कुछ पलों के लिए
ज़िन्दगी को जी लेने दो मुझे
तुम मुझमें और मैं तुम में
ऐसे डूब जायें जहाँ
तुम आंखों से बोलो
और मैं उन अंखियों की
हर भाषा को
हर शब्द को
दिल में उतार लूँ
सिर्फ़ एक दिन तुम
मुझे अपना दे दो
और उस एक दिन में
मेरी उम्र बीत जाए
फिर आँख न खुले
फिर ये सपना न टूटे
बस
ज़िन्दगी की हर तमन्ना
पूरी हो जाए
तुम्हारा हाथ हो मेरे हाथ में
उस स्पर्श को
दिल के एक खास हिस्से में
सहेज लूँ
उस अहसास को कुछ पलों
में ही जी लूँ
सिर्फ़ एक दिन तुम
मुझे अपना दे दो
उस एक दिन में
मेरी ज़िन्दगी बसर हो जाए
तुम्हारे हाथों में
रजनीगंधा के फूल हों
मेरे दिल के हर कोने को
उसकी खुशबू से ऐसे महका दो
फिर कोई सुगंध न बसे मन में
तुम्हारी यादों की खुशबू में
तन मन रच बस जाए
बस एक दिन
तुम मुझे अपना उधार दे दो
मुझे मेरी ज़िन्दगी
जी लेने दो
सिर्फ़ एक दिन तुम
प्रेमी बन जाओ
मैं तुमसे रूठ जाऊँ
और तुम
मनुहार करके
मनाओ मुझे
एक दिन के लिए
प्रेमिका अपनी बनाओ मुझे
और उस एक दिन में
प्रेम के सारे रंग
दिखाओ मुझे
प्रेम रंग में ऐसे डूब जाऊँ
फिर न कोई रंग चढ़े
हर ख्वाहिश पूरी हो जाए
और फिर
उसी प्रेम रंग में
ज़िन्दगी तमाम हो जाए
फिर उस दिन की
कोई शाम न हो
कोई सुबह न हो
कोई कल न हो
कोई दिन न हो
कोई रात न हो
सिर्फ़ इसी एक दिन में
पूरी उम्र गुजर जाए

तड़पता तो तू भी होगा

नींद तुझे भी न आती होगी
तू भी करवट बदलता होगा
मुझे खामोश करने वाले
तू कौन सा चैन से सोता होगा

दिल तो तेरा भी तड़पता होगा
आँख तो तेरी भी रोती होगी
मुझे बेवफा कहने वाले
तू कौन सा बफा निभाता होगा

कसक तो तेरे सीने में भी उठती होगी
मिलन को निगाह तरसती होगी
मुझे बेचैन करने वाले
तू कौन सा चैन से रहता होगा

क्या मुझे हर मोड़ पर ना ढूंढता होगा
मेरे निशां को तरसता होगा
मेरा नामोनिशां दिल से मिटाने वाले
क्या ख़ुद के निशां कहीं पाता होगा

एक मुलाक़ात —–सायों की

एक अनजाने
अनदेखे
अजनबी से मोड़ पर
तेरा साया
मेरे साये से
टकरा गया
चारों आँखें
जब टकराई
तो देखा
मेरे साये ने
तेरे साये की
आंखों में
वहां शमशान की
वीरानी थी
सूखे हुए
अश्कों के निशान
तेरी कहानी
कह गए
एक वीराने की
खामोशी
एक अजनबियत
लिए तेरी आँखें
सब हाल बयां
कर गयीं
मेरे साये ने
तेरे साये की
आंखों में
मेरी तस्वीर
ढूंढनी चाही
राख के ढेर में
चाहत की
इक चिंगारी
ढूंढनी चाही
पर वहां तो
एक बेजुबान चीख
दबी दिखी
बिना किसी हलचल के
बिना किसी चाहत के
छुपी हुयी खामोशी देखी
तेरी चाहत की
इंतहा देखी
कोई उम्मीद
न बाकी देखी
पहचानना तो
दूर की बात थी
तेरे साये की
आंखों में
मेरे साये ने
लाश की सी
वीरानी दखी
और फिर
उस अजनबी मोड़ पर
बिना रुके
बिना मुडे
बिना देखे
बिना बात किए
तेरा साया
आगे बढ़ता गया
और मेरा साया
तेरे साये के
क़दमों के निशां तले
तेरे मेरे रिश्ते की
राख को
संजोता रहा

टैग का बादल