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Archive for नवम्बर, 2009

निशा का दर्द

रवि और निशा
कभी न मिल पाए
संध्या माध्यम भी बनी
मगर रवि ने तो
सिर्फ़ संध्या को चाहा
उसे ही अपना बनाया
अपना स्वरुप उसमें ही डुबाया
और निशा अपने
दर्द को समेटे
हर नई सुबह
भोर के उजाले पर
आस लगाये
टकटकी बांधे
अपने रवि का
इंतज़ार करती रही
मगर रवि ना कभी
निशा के दामन में झाँका
न उसके प्रेम की इम्तिहाँ
कभी जान पाया
निशा चातक सी
तरसती रही
सिसकती रही
और रवि ने ना
निशा का दर्द जाना
न ही उस ओर निहारा
मगर प्रतीक्षारत निशा
अपना इंतज़ार निभाती रही
सिर्फ़ एक दिन के
मिलन की चाह में
अपना पल -पल मिटाती रही
आस का दिया
हर क्षण जलाती रही
और फिर एक दिन
उसके इंतज़ार को
विराम मिला
जब संध्या से
मिलन को आतुर
रवि को ग्रहण ने
निगलना चाहा
उसके चेहरे पर
कालिमा का रंग
गढ़ना चाहा
अचानक निशा ने
अपना दामन फैला
रवि को अपने
आगोश में समेट लिया
उसकी ज़िन्दगी भर की
बेरुखी को भुला
अपने दामन में पनाह दी
आज रवि और निशा का
अद्भुत मिलन था
जिस इंतज़ार में
उसने अपना हर पल
जलाया था
आज उसके
हर जलते पल पर
रवि ने अपने प्रेम का
मरहम लगाया था
आह ! शायद आज रवि
संध्या और निशा के
प्रेम का फर्क जान पाया था

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कैसे करूँ नमन ———२६/११

शहीदों को नमन किया
श्रद्धांजलि अर्पित की
और हो गया कर्तव्य पूरा
ए मेरे देशवासियों
किस हाल में है
मेरे घर के वासी
कभी जाकर पूछना
हाल उनका
बेटे की आंखों में
ठहरे इंतज़ार को
एक बार कुरेदना तो सही
सावन की बरसात
तो ठहर भी जाती है
मगर इस बरसात का
बाँध कहाँ बाँधोगे
कभी बिटिया के सपनो में
झांकना तो सही
उसके ख्वाबों के
बिखरने का दर्द
एक बार उठाना तो सही
कुचले हुए
अरमानों की क्षत-विक्षत
लाश के बोझ को
कैसे संभालोगे
कभी माँ के आँचल
को हिलाना तो सही
दर्द के टुकड़ों को
न समेट पाओगे
पिता के सीने में
जलते अरमानो की चिता में
तुम भी झुलस जाओगे
कभी मेरी बेवा के
चेहरे को ताकना तो सही
बर्फ से ज़र्द चेहरे को
एक बार पढ़ना तो सही
सूनी मांग में
ठहरे पतझड़ को
एक बार देखना तो सही
होठों पर ठहरी ख़ामोशी को
एक बार तोड़ने की
कोशिश करना तो सही
भावनाओं का सैलाब
जो आएगा
सारे तटबंधों को तोड़ता
तुम्हें भी बहा ले जाएगा
तब जानोगे
एक ज़िन्दगी खोने का दर्द
तब शायद समझ पाओगे
कर्तव्य सिर्फ़ नमन तक नही होता
सिर्फ़ नमन तक नही होता

बेरुखी का दर्द

पास होकर
क्यूँ दूर
चले जाते हो
दिल को मेरे
क्यूँ इतना
तड़पाते हो
तेरी बेरुखी
लेती है
जान मेरी
मत कर ऐसा
कहीं ऐसा न हो
तेरी बेरुखी पर
अगली साँस आए
या न आए
और तेरी दिल
तोड़ने की अदा
कहीं तेरी
सज़ा न बन जाए
फिर लाख
सदाएं भेजो
मुझे न
जहाँ में पाओगे
मेरी याद में
फिर तुम भी
इक दिन
तड़प जाओगे
मेरे रूठने पर
मुझे ना मना पाओगे
और इक दिन
इसी दर्द के
आगोश में
सिमट जाओगे
फिर मेरे दर्द के
अहसास को
समझ पाओगे
दिल तोड़ने की
सज़ा जान पाओगे
हर पल तड़पोगे
मगर मुझे न
पास पाओगे
तब तुम बेरुखी
का दर्द जान पाओगे

श्रीमद्भागवद्गीता से ………………….

श्रीमद्भागवद्गीता के ७ वें अध्याय के २४ वें श्लोक की व्याख्या स्वामी रामसुखदास जी ने कुछ इस प्रकार की है जिससे परमात्मा के साकार और निराकार स्वरुप की सार्थकता समझ आती है ।

श्लोक

बुद्धिहीन मनुष्य मेरे सर्वश्रेष्ठ परमभाव को न जानते हुए अव्यक्त (मन – इन्द्रियों से पर ) मुझ सच्चिदानंदघन परमात्मा को मनुष्य की तरह शरीर धारण करने वाला ही मानते हैं।

व्याख्या

जो मनुष्य निर्बुद्धि हैं और जिनकी मेरे में श्रद्धा भक्ति नही है वे अल्पमेधा के कारण अर्थात समझ की कमी के कारण मेरे को साधारण मनुष्य की तरह अव्यक्त से व्यक्त होने वाला अर्थात जन्मने मरने वाला मानते हैं । मेरा जो अविनाशी अव्यय भाव है अर्थात जिससे बढ़कर कोई दूसरा हो ही नही सकता और जो देश , काल , वस्तु व्यक्ति आदि में परिपूर्ण रहता हुआ इन सबसे अतीत सदा एकरूप रहने वाला ,निर्मल और असम्बद्ध है ——ऐसे मेरे अविनाशी भाव को वे नही जानते इसलिए वे मेरे को साधारण मनुष्य मानकर मेरी उपासना नही करते प्रत्युत देवताओं की उपासना करते हैं ।
मेरे स्वरुप को न जानने से वे अन्य देवताओं की उपासना में लग गए और उत्पत्ति विनाशशील पदार्थों की कामना में लग जाने से वे बुद्धिहीन मनुष्य मेरे से विमुख हो गए । यद्यपि वे मेरे से अलग नही हो सकते तथा मैं भी उनसे अलग नही हो सकता तथापि कामना के कारण ज्ञान ढक जाने से वे देवताओं की तरफ़ खिंच जाते हैं । अगर वे मेरे को जान जाते तो केवल मेरा ही भजन करते ।
१) बुद्धिमान मनुष्य वे होते हैं जो भगवान के शरण होते हैं । वे भगवान को ही सर्वोपरि मानते हैं।
२)अल्पमेधा वाले मनुष्य वे होते हैं जो देवताओं के शरण होते हैं । वे देवताओं को अपने से बड़ा मानते हैं जिससे उनमें थोड़ी नम्रता , सरलता रहती है।
३)अबुद्धि वाले मनुष्य वे होते हैं जो भगवान को देवता जैसा भी नही मानते , किंतु साधारण मनुष्य जैसा ही मानते हैं । वे अपने को ही सर्वोपरि , सबसे बड़ा मानते हैं ।
यही तीनो में अन्तर है ।
भगवान कहते हैं कि मैं अज रहता हुआ ,अविनाशी होता हुआऔर लोकों का ईश्वर होता हुआ ही अपनी प्रकृति को वश में करके योगमाया से प्रकट होता हूँ ————इस मेरे परमभाव को बुद्धिहीन मनुष्य नही जानते। कहने का तात्पर्य है की जिसको क्षर से अतीत और अक्षर से उत्तम बताया है अर्थात जिससे उत्तम दूसरा कोई है ही नही ऐसे मेरे अनुपम भाव को वे नही जानते।
जो सदा निराकार रहने वाले मेरे को केवल साकार मानते हैं , वे निर्बुद्धि हैं क्यूंकि वे मेरे अव्यक्त, निर्विकार और निराकार स्वरुप को नही जानते । ऐसे ही मैं अवतार लेकर तेरा सारथि बना हूँ ——-ऐसे मेरे को केवल निराकार मानते हैं वे निर्बुद्धि हैं क्यूंकि वे मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी भाव को नही जानते।
उपर्युक्त दोनों अर्थों में से कोई भी अर्थ ठीक नही है कारण कि ऐसा अर्थ मानने पर केवल निराकार को मानने वाले साकाररूप की और साकार रूप के उपासकों की निंदा करेंगे और केवल साकार मानने वाले निराकार रूप की और निराकार रूप के उपासकों की निंदा करेंगे । यह सब एकदेशियपना है।
पृथ्वी , जल तेज़ आदि जितने भी विनाशी पदार्थ हैं वे भी दो -दो तरह के होते हैं ——–सूक्ष्म और स्थूल । जैसे स्थूल रूप से पृथ्वी साकार है और परमाणु रूप से निराकार है , जल बर्फ , बूँद , बादल रूप से साकार है और परमाणु रूप से निराकार है तेज काठ और दियासलाई में रहता हुआ निराकार है और प्रज्वलित होने पर साकार है आदि। इस तरह से भोतिक सृष्टि के भी दोनों रूप होते हैं और दोनों होते हुए भी वास्तव में दो नही होती । साकार होने पर निराकार में बाधा नही होती और निराकार होने पर साकार में बाधा नही लगती तो फिर परमात्मा के साकार और निराकार दोनों होने में क्या बाधा है ? अर्थात कोई बाधा नही है । वे साकार भी हैं और निराकार भी हैं , सगुण भी हैं और निर्गुण भी। गीता साकार और निराकार दोनों को मानती है। भगवान कहते हैं कि मैं अज होता हुआ भी प्रगट होता हूँ , अविनाशी होता हुआ भी अंतर्धान हो जाता हूँ और सबका ईश्वर होता हुआ भी आज्ञापालक बन जाता हूँ । अतः निराकार होते हुए साकार होने में और साकार होते हुए निराकार होने में भगवान में किंचिन्मात्र अन्तर नही आता।

‘ तू ‘ और ‘ मैं ‘

मैं , मैं रही
तुम , तुम रहे
कभी ‘मैं ‘ को
‘हम’ बनाया होता
तो जीवन भी
मुस्कुराया होता
कभी जिस्म के
पार गए होते
कभी रूह को अपना
बनाया होता
कभी प्रेम का वो दीप
जलाया होता
जहाँ तुम , तुम न होते
जहाँ मैं , मैं न होती
कभी संवेदनाओं की जाली में
समय के झरोखों से
कुछ अप्रतिम प्रेम की
बरखा बरसाई होती
तन नही , मन को
भिगोया होता
कुछ देर वहां रुका होता
तो वक्त वहीँ ठहर गया होता
हमारे मिलन के लिए
ठिठक गया होता
प्रेम को प्रेम में
डूबते देखा होता
अंतर्मन की दरारों से
कभी प्रेमरस छलकाया होता
मधुर ह्रदय के तारों से
कभी प्रेम धुन गायी होती
सूनी अटरिया कभी तो
सजाई होती
तो जीवन की विष बेल
सुधा सागर में नहायी होती
फिर वहां
न ‘तू’ होता
न ‘ मैं होती
सिर्फ़ प्रेम की ही
बयार होती
और ‘ तू ‘ और ‘ मैं ‘
अलग अस्तित्व न होकर
प्रेमास्पद बन गए होते

ये कैसी बेबसी?

प्यार, त्याग और समर्पण से घर संसार बनाया जाता है । ये शब्द कूट-कूटकर भर दिए जाते हैं बचपन से ही स्त्री के मन में । राधा भी इन्ही शब्दों और भावनाओं के साथ ज़िन्दगी गुजार रही थी मगर इन शब्दों का खोखलापन उसके ह्रदय को बींध जाता था । सारी ज़िन्दगी उसने इसी पाठ के सहारे गुजार दी थी मगर क्या मिला उसे? आज मुड़कर देखती है तो अपना वजूद कहीं दिखाई ही नही देता। पति के लिए तो पत्नी ही थी उससे आगे कभी वो जान ही नही पाए। मन के भीतर तो कभी झांक ही न पाए। पत्नी में ऐसे गुण होने चाहिए कि पति को घर गृहस्थी की सभी जिम्मेदारियों से मुक्त रखे। घर की हर छोटी बड़ी परेशानी जो अकेले ढोना जानती हो । हर मुश्किल का सामना करने की हिम्मत हो मगर अपने हक़ के लिए या अपनी चाहत के लिए जो कभी जुबान न खोले। एक भावनाविहीन कठपुतली सी जो सबके इशारों पर नाचती चली जाए। ऐसी सर्वगुन्सम्पन्ना स्त्री ही वास्तव में पत्नी का दर्जा पाने की हक़दार होती है—-ये तो उसकी पति की सोच थी । मगर अब तो बच्चे भी बड़े हो चुके थे । दो बेटों और एक बेटी की माँ होने के नाते उसे अब उनके हिसाब से जीना पड़ता था। बेटों का विवाह तो वो कर चुकी थी मगर बेटी के लिए उसके दिल में कुछ सपने थे। वो नही चाहती थी कि जो वो ज़िन्दगी भर सहती रही उसकी बेटी भी वो सब सहे। इसलिए उसने एक संकल्प ले लिया था कि जब तक उसे लड़का पसंद नहीं आएगा वो अपनी बेटी की शादी नही करेगी। अपने विचारों से उसने घर में भी सबको अवगत करा दिया था और सबने यही सोचकर हाँ भी कर दी कि एक माँ का बेटी से कुछ खास लगाव होता है इसलिए जो करना चाहती हैं करने दो वरना उसे कब ऐसा अधिकार मिला था ।
अब तो राधा अपनी बेटी अंतरा के लिए रिश्ते खोजने में जुट गई। जब भी कोई रिश्ता आता तो लड़के से अकेले में बैठकर कुछ प्रश्न करती । उसके प्रश्न थे या उसके मन का डर मगर वो अपने प्रश्नों का जवाब एक संयत और उच्च सोच से संपन्न चाहती थी । उसके प्रश्न कुछ ऐसे होते थे जैसे— उस लड़के की नज़र में स्त्री का क्या स्थान है ? स्त्री को आप महान सिर्फ़ कहने के लिए कहते हैं या उसे उसकी स्वतंत्रता देकर आगे बढ़ने के लिए भी प्रेरित कर सकेंगे। आप अपने जीवन में पत्नी से क्या अपेक्षा रखते हैं ? आपके जीवन में पत्नी का क्या दर्जा है ?वो सिर्फ़ माँ, बहन,बेटी और पत्नी ही है या उससे अलग भी उसका अपना कोई अस्तित्व भी है?क्या निर्णय लेने की स्त्री की क्षमता को आप उचित सम्मान दे सकेंगे? उसके निर्णय आपको स्वीकार्य होंगे? एक पत्नी का मान सम्मान आपके मान सम्मान से ऊंचा दर्जा रखता है या नही आपके जीवन में। जमीन जायदाद में उसका अधिकार क्या समझते हैं और पत्नी की कमाई पर किसका हक़ समझते हैं ———पत्नी का , स्वयं का या दोनों का? ऐसे अनगिनत प्रश्न जो उसके दिमाग में कौंधते वो पूछती चली जाती । कोई भी लड़का उसके सभी प्रश्नों का वैसा उत्तर नही दे पाता जैसा वो चाहती थी या कहो उसे संतुष्ट नही कर पाता अपने जवाबों से। कहीं न कहीं कोई न कोई कमी रह ही जाती और रिश्ता नकार दिया जाता। इस प्रकार एक से एक अच्छे रिश्ते हाथ से छूटते जा रहे थे मगर वो अपनी सोच से बाहर निकल ही नही पा रही थी। घर वाले चाहे कितना समझाते मगर इस बार तो राधा ने जैसे कमर कस ली थी कि वो अपनी सर्वगुन्सम्पन्ना , पढीलिखी , उच्च पद पर कार्यरत बेटी के लिए एक सर्व्गुन्सम्पन्न उच्च सोच वाला लड़का ही ढूंढकर लाकर देगी जिसकी निगाह में स्त्री का दर्ज़ा सबसे ऊपर हो , तभी उसका ब्याह करेगी।
वक्त खिसकता जा रहा था और अंतरा की उम्र भी बढती जा रही थी । अब तो धीरे -धीरे लोगों ने रिश्ते बताने बंद ही कर दिए थे। कभी- कोई भूले भटके रिश्ता आ ही जाता तो वो भी राधा की सोच की बलि चढ़ जाता। और इस तरह साल पर साल गुजर गए मगर राधा को अपनी बेटी के लिए वैसा लड़का नही मिला जैसा वो चाहती थी। अंतरा की उम्र उस मोड़ पर आ गई थी जहाँ उसके ऊपर बालों में भी सफेदी चमकने लगी थी । अपनी माँ की इच्छा का सम्मान करते करते एक उम्र गुजर गई उसकी। और राधा भी अपनी बेटी के लिए लड़का ढूंढते -ढूंढते थक चुकी थी। अब उसे भी अहसास होने लगा था मगर अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। वो समझ नही पा रही थी कि उससे चूक कहाँ हो गई । क्या अपनी बेटी का भविष्य सँवारना गुनाह है?क्या एक माँ का ये कर्तव्य नही कि वो अपनी बेटी जिसके लिए पल -पल मर -मरकर जीती रही ,उसके बारे में उचित निर्णय ले सके या शायद इस संसार में ऐसे लोग बचे ही नही थे जो स्त्री मन की भावनाओं को उचित सम्मान दे सकें। शायद सभी संवेदनहीन दोहरी ज़िन्दगी जीते लोग हैं इस दुनिया में –जिनकी कहने और करने की बातों में गहन अन्तर होता है । शायद आज भी कहीं न कहीं पुरूष मन में वो भावनाएं अब भी नही पनपीं या कहो वो अपने अधिकार अभी बाँटने में सक्षम नही हुआ है या शायद उसे अभी किसी का हुक्म मानना अपना अपमान लगता है । जो भी है सिर्फ़ कागज़ी है—भावनाशून्य। वरना क्या इतने बड़े जहान में कोई भी एक ऐसा उच्च सोच वाला लड़का उसे अपनी बेटी के लिए नही मिलता।आज राधा भी राजा जनक की तरह इस समाज से , इसके चलन से और शायद इस समाज के पुरूष ठेकेदारों से हार गई थी . आज भी पुरूष का वर्चस्व कायम था———बेशक दुनिया आगे बढ़ रही थी , तरक्की के नए आयाम पेश कर रही थी मगर पुरूष की कुंठाग्रस्त सोच के आगे आज भी एक स्त्री विवश थी अपने अधिकार पाने के लिए। आज फिर एक स्त्री अपनी बेबसी से लड़ रही थी ………………..

समाप्त

ज़ख्मों के फूल

कुछ मौन मौन होकर भी कितने मुखर होते हैं
और कभी शब्दों को भी जुबान नही मिलती

कभी मेरे मन को सहलाया होता
तो दर्द तेरी उँगलियों में सिमट आया होता

नासूरों पर कभी अश्क टपकाया होता
तो अश्क को भी जलता पाया होता

मोहब्बत के ज़ख्मों की इम्तिहाँ तो देख
हर ज़ख्म में अपना ही चेहरा पाया होता

कभी किसी रोयें को छुआ होता
तो हर रोयें पर लिखा अपना ही नाम पाया होता

टैग का बादल