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Archive for जनवरी, 2009

क्यूँ ऐसा होता है

भावुक मन की भावुक बातें भावुक दिल ही समझता है
हर भावुक मन में इक भावुक दिल धड़कता है

नारी ह्रदय की पीड़ा को
जब नारी ह्रदय भी
नही समझता है
हाय! ये कैसे दंश है
जो हर पल दिल में सिसकता है
पुरूष ह्रदय को कठोर कहने वालों
क्या तुम्हारा ह्रदय तड़पता है
नारी क्यूँ नारी की तड़प को
समझ नही पाती है
क्या वो तपिश उसने नही सही थी
हर पल हर नारी जब
उन्ही हालत से गुजरी हो
फिर कैसे नारी होकर
नारी का दर्द नही समझती है
ये कैसे नारी रूप है
ये कैसे नारी ह्रदय है
जो नारी के लिए न रोता है
नारी मन होकर भी
नारी का दुश्मन बन
नारी को ही तडपता है
फिर कहो कैसे
नारी ह्रदय को
कोमल ह्रदय मानें
ये तो पुरूष की
कठोरता से भी
कठोर बन जाता है
जब पुरूष नारी के
उत्थान में साथ हो सकता है
उसके दर्द को समझ सकता है
फिर क्यूँ
नारी ही नारी की नही बन पाती है

अब तो दर्द को भी दर्द होता है

आज हम हँसते हैं और दर्द रोता है
अब तो दर्द को भी दर्द होता है
जो दर्द कभी किसी का न हुआ
वो आज दर्द के सागर में डूबा है
अब हमें दर्द क्या डराएगा
जो ख़ुद हर पल छटपटाता हैं
हमने जीने का ढंग सीख लिया
ज़हर को भी अमृत समझ पी लिया
अब तो दर्द सहते सहते हम
पत्थर के सनम हो गए
अब हमारे दर्द पर हम नही
हमारा दर्द रोता है
अब तो दर्द को भी दर्द होता है

उस मोड़ पर

तुम्हें तलाश है आज भी
जिस मोड़ पर ज़िन्दगी के
हम तुम अलग हुए थे
बार बार तुम्हारी निगाह
उसी मोड़ तक जाकर
क्यूँ ठहर जाती है
उसी मोड़ पर ज़िन्दगी के
तुम क्यूँ ठहर गए हो
उस मोड़ के बाद भी
ज़िन्दगी आगे बढती गई
मैं रुकी नही,चलती रही
उस मोड़ पर ज़िन्दगी के
तुम्हें कुछ न मिलेगा
यादों के काफिले को
वहीँ छोड़ देना होगा
क्यूँ उदास निगाहें तुम्हारी
उसी मोड़ पर ठहर गयीं
क्यूँ नही तुम उस मोड़ के
आगे मुड पाते हो
क्यूँ अपने दर्द को उसी मोड़ पर
छोड़ नही पाते हो
ज़िन्दगी तुम्हें उस मोड़ के
आगे भी नज़र आएगी
फिर किसी मोड़ पर शायद
हमारी मुलाक़ात हो जायेगी
तुम एक बार उस मोड़ के आगे
मुड कर तो देखो
ज़िन्दगी को फिर एक बार
जीकर तो देखो
देखना——
ज़िन्दगी फिर से हसीं हो जायेगी
फिर उस मोड़ तक
तुम्हारी निगाह नही जायेगी

मैं इक खुली किताब हूँ
जिसको तूने कभी पढ़ा ही नही
इस किताब के किसी भी पन्ने पर
प्यार का रंग चढा ही नही
हर पन्ने पर इक कहानी थी
कोई आंसू से भीगी
कोई खून से लिखी
कोई दर्द से लिपटी
कोई तन्हाई में डूबी
हर कहानी में
काली स्याही से लिखा
हर शब्द जैसे
तुम्हें पुकार रहा हो
मगर तुमने तो उधर
देखा ही नही
हर शब्द में छुपे
दर्द को जाना ही नही
जब तूने मुझे जाना ही नही
तो कैसे प्यार का रंग चढ़ता
किताब तो आज भी खुली की खुली है
मगर तेरे पास ही वो नज़र नही है
आज भी इस किताब के पन्ने
तेरे पढने के इंतज़ार में पड़े हैं
देखो इतनी देर न करना
कि वक्त की दीमक इन्हें खा जाए
हर पन्ने पर तेरी मेरी दास्ताँ है
बस तू कोशिश तो कर इक बार पढने कि

मुझे तुमसे कुछ नही चाहिए

मुझे तुमसे कुछ नही चाहिए
प्यार नही दे सकते , मत दो
अपना नही बना सकते , मत बनाओ
इज़हार नही कर सकते, मत करो
इकरार नही कर सकते, मत करो
ख्यालों में जगह नही दे सकते, मत दो
याद नही कर सकते, मत करो
मुझे तुमसे कुछ नही चाहिए
अगर कर सकते हो तो इतना करो
जब भी कहीं,कभी भी
मैं तुम्हें दिखूं तो
इक नज़र भर कर देख लेना
तुम्हारी उसी नज़र पर
हम ज़िन्दगी गुजार देंगे
मुझे तुम्हारी ज़िन्दगी में जगह नही चाहिए
मुझे तुम्हारी नज़र में भी जगह नही चाहिए
मुझे तुमसे कुछ नही चाहिए
अगर कर सको तो इतना करना
रुखसती पर मेरी इस जहान से
मेरे जनाजे को नज़र भर देख लेना
तुम्हारे इसी नज़र भर देखने पर
मेरी मौत का जशन हसीं हो जाएगा
मेरी रूह को सुकून मिल जाएगा
मुझे तुमसे कुछ नही चाहिए

प्रेम

प्रेम रस की जब अनुभूति होती है
रोम रोम वाद्य यन्त्र सा झंकृत होता है
प्रेम रस में आप्लावित तन मन
प्रेम के दरिया में आकंठ डूबे होते हैं
जब प्रेमी ह्रदय उडान भरता है
तब प्रेम रस छलक छलक जाता है
प्रेमानंद में डूबे प्रेमी की आंखों में
सिर्फ़ प्यारे की छवि नज़र आती है
जब प्रेम की परिभाषा को बदलते प्रेमी
प्रेम की पराकाष्ठा को चूम लेते हैं
तब अनंत प्रेम के प्रबल प्रवाह में
द्वि का परदा हट जाता है
अब तो प्रेम के सागर में हिलोरें लेते प्रेमी
प्रेम पथ पर,प्रेम की लहरों
की ताल पर नृत्य करते हुए
अपने अनंत में समां जाते हैं

और वो हार गया

वो कहीं नही हारा
हर पल जीतता रहा
आगे बढ़ता ही रहा
कोई राह,कोई डगर
उसका रास्ता न रोक सकी
हर कठिनाई से जूझता हुआ
ज़िन्दगी की हर कठिन
परीक्षा देता हुआ
हर पल सिर्फ़ आगे ही
आगे बढ़ता गया
अपने अनंत लक्ष्य की ओर
चलते चलते
सिर्फ़ एक ठोकर ने उसे
यथार्थ के धरातल par
ला खड़ा किया
जो कहीं नही हारा
जो कहीं नही झुका
वो आज लहूलुहान
हो गया
आज उसे जिसने मारा
वो उसके अपने थे
जिनके लिए वो
ता-उम्र जीता रहा
हर पल लड़ता रहा
आज उन्ही रिश्तों ने
उसे कितना बेबस कर दिया
जिन रिश्तों पर उसका
भरोसा टिका था
जिन रिश्तों के बिना
उसका अस्तित्व ही न था
आज उन्ही रिश्तों ने
उसे बेसहारा कर दिया
आज हर पल जितने वाला
वो इंसान
रिश्तों से हार गया
रिश्तों ने उसे तोड़
तोड़ दिया और
वो बिखर गया

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