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Archive for अप्रैल, 2011

>जो बचता है शून्यता के बाद भी

>

शून्य शून्य और सिर्फ़ शून्य
पता नही फिर भी लगता है
कुछ बचता है कहीं शून्य से परे
स्वंय का बोध
या कोई कडी
अगली सृष्टि की
अलग रचना की
अलग सरंचना की
कुछ तो ऐसा है जो
बचता है शून्य के बाद भी
शून्य से शून्य मे समाना
बदलना होगा इस विचार को
खोजना होगा उस एक तारे को
उस नव ब्रह्मांड को
उस नव निर्माण को

जो बचता है शून्यता के बाद भी

जो मिट्कर भी नही मिटता

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>कान्हा तुम्हारी याद में राधा पुकारती

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कान्हा तुम्हारी याद में कलियाँ पुकारती -२-
काँटों की शैया पर कैसे रातें  गुजारतीं
कान्हा तुम्हारी याद में…………………….
कान्हा तुम्हारी याद में राधा पुकारती -२-
रो – रो के प्रेम दीवानी जीवन गुजारती 
 कान्हा तुम्हारी याद में………………..
कान्हा तुम्हारी याद में मीरा पुकारती-२-
पग घुँघरू बाँध दीवानी तुमको रिझाती 
 कान्हा तुम्हारी याद में……………………

कान्हा तुम्हारी याद में शबरी पुकारती-२-
राम आयेंगे इस आस में रस्ता बुहारती 
 कान्हा तुम्हारी याद में ……………………

कान्हा तुम्हारी याद में गोपियाँ पुकारती -२-
परसों आऊँगा की बाट में  रस्ता निहारतीं 
 कान्हा तुम्हारी याद में …………………….

कान्हा तुम्हारी याद में भक्त मण्डली पुकारती -२-
गा – गा के गीत तुम्हारे जीवन गुजारती 
 कान्हा तुम्हारी याद में ……………………

कान्हा तुम्हारी याद में दासी पुकारती -२- 
नयनों की प्यास को अब कैसे संभालती 
कान्हा तुम्हारी याद में ……………………..

>धूप भी मजबूर होती है

>

अब नहीं उतरती धूप
मेरे चौबारे पर
शायद कहीं और
आशियाँ बना लिया उसने
कौन उतरता है
सीले हुए मकान में
घुटन , बदबूदार
अँधेरी कोठरियां
डराती हैं
बंद तहखाने
हजारों कीड़ों की
शरणस्थली बन जाते हैं
ये रेंगते हुए
कीड़े मकौड़े
किसी और के
अस्तित्व को
स्वीकार नहीं पाते
डँस लेते हैं
अपने दंश से
धराशायी कर देते हैं
लहूलुहान हो जाता है
बिखरा हुआ अस्तित्व
ऐसी चौखटों पर
कौन आशियाना
बनाना चाहेगा
जिस पर सुबह
का पैगाम ना
पहुँचता हो
जिस पर सांझ की
बाती ना जलती हो
जहाँ सिर्फ और सिर्फ
अंधेरों का वास हो
बताओ कैसे
उन चौबारों पर
धूप उतरेगी
किसे गर्माहट देगी
किसे अपने रेशमी
स्पर्श से सहलाएगी
कैसे अँधेरी खोह में
छुपी नमी को सुखाएगी
आखिर उसकी भी
एक सीमा होती है

सीमाओं का अतिक्रमण 
चाह कर भी नही कर पाती
एक मर्यादा होती है
शायद इसलिए
अपना आशियाना
बदल देती है
धूप भी मजबूर होती है

दस्ताने पहनने को………

>"मै" और" मेरा"

>

अहंकार के दो बच्चे
“मै” और” मेरा”
खूब फ़ले फ़ूले
अहंकार की चाशनी मे
बहुत मीठे लगे
वक्त के साथ
परवान चढते रहे
अहंकार के शिखर
तक पहुंच गये
और फिर लगी
इक ठेस
और धरातल भी
नसीब ना हुआ
“मै” तो पल मे
चकनाचूर हुआ
दर्प अहंकार का
नेस्तनाबूद हुआ
जब “मेरा” ने
उसे दुत्कार दिया
“मै” ने “मेरा” को
कुछ ऐसे पोषित किया
“मेरा” ने “मै” का
सब कुछ छीन लिया
अब ना “मै” है
ना “मेरा” है
जीवन मे आया
नया सवेरा है
छोड दिया “मै” ने
“मेरा” को और
ओढ ली चादर
हरि नाम की
तन राखा संसार मे
मन कर दिया अर्पण
कृपानिधान को

>बताओ ना कौन सी रिश्वत देते हो

>

ए ………सुनो
बहुत कहना चाह
रहा है आज ये दिल
मगर शब्द साथ
नही दे रहे
ना जाने कौन सी
खोह मे छुप गये
ज़रा देखना
तुम्हारे दिल के
पास तो नही
टहलने आ गये
ज़रा देखना
तुमसे तो
नही गुफ़्तगू
कर रहे
मेरे दिल की तो
कहीं नही कह रहे
ज़रा देखना
कोई नया
फ़साना तो नही
गढ रहे
ये शब्द बहुत
बेईमान हो गये है
आजकल
जब भी देखते हैं तुम्हे
मेरा दामन छोड
तुम्हारे पहलू मे
सिमट आते हैं
बताओ ना
कौन सी
रिश्वत देते हो

>दरिया वापस नही मुडा करते

>

मै तो आज भी
वहीं उसी मोड पर
खडी हूँ
जहाँ समय ने
तुम्हे मुझसे
छीना था
मगर तुम ही
ना जाने कब
और कैसे
समय के साथ
बह गये
दरिया वापस
नही मुडा करते

>.क्या होगा इसका जवाब सरकार के पास ?

>

ना जाने कब से एक प्रश्न कुलबुला रहा है कि आज जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक लडाई लड़ी गयी तब उसका कुछ हल निकालने की दिशा में कदम उठाने शुरू हुए मगर किसी ने ये नहीं सोचा अब तक कि इतना भ्रष्टाचार फैला कैसे और किसके कार्यकाल में और क्यों? देखा जाये तो भ्रष्टाचार का हमेशा बोलबाला रहा फिर भी पिछले कुछ सालों में भ्रष्टाचार ने अपनी जडें इतनी फैला लीं कि कोई टहनी , कोई शाखा भ्रष्टाचार से मुक्त दिखाई नहीं देती …………जहाँ भी नज़र दौड़ाओ सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार की व्यापकता नज़र आती है ………कोई ना कोई घोटाला तैयार है हर दिन …………अब तो लगता है हम गिनती भी भूलने लगेंगे कि कौन से कौन से कामों में भ्रष्टाचार फैला और कौन कौन उसमे शामिल था ………….कौन सा ऐसा कार्य रहा जहाँ भ्रष्टाचार का बोलबाला ना रहा हो और वो भी पिछले दस सालों में तो भ्रष्टाचार सीमा से बाहर होता जा रहा है ………..अब तो भारत देश को भ्रष्टाचार का देश कहा जाने लगा है तो ऐसे में ये प्रश्न उठना वाजिब है कि आखिर इसके लिए दोषी कौन है और किसके कार्यकाल में भ्रष्टाचार सबसे ज्यादा फैला ?

क्या नैतिकता की दृष्टि से सरकार को अपना पड़ नहीं छोड़ देना चाहिए ?

सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार एक ही सरकार के कार्यकाल में हुआ है सभी जानते हैं तो ये प्रश्न क्यूँ नहीं उठाया जाता ?

आखिर इसके लिए आन्दोलन क्यों नहीं किया जाता?

शायद इसलिए क्योंकि हमाम में सभी नंगे हैं लेकिन जनता को तो अपनी शक्ति और एकता का परिचय देना चाहिए और एक आह्वान ऐसा भी करना चाहिए ………….क्यों नहीं जनता सरकार से जवाब  मांगे कि उनके ही कार्यकाल में भ्रष्टाचार आसमान को कैसे छूने  लगा ?

क्या सरकार की कोई जवाबदेही नहीं है?

सरकार तो एक मिनट में किसी से भी कुछ भी पूछने को तैयार रहती है यहाँ तक कि अन्ना के अनशन को किसने प्रायोजित किया , कितने पैसे लगे ऐसे सवाल एक पल में सरकार ने उठा दिए मगर क्या जनता फिर उनसे ये सवाल नहीं कर सकती कि आपके कार्यकाल में इतना भ्रष्टाचार कैसे हुआ और अब उन्हें नैतिकता के आधार पर अपने सभी मंत्रिमंडल के साथ त्यागपत्र दे देना चाहिए ?

ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके जवाब जनता जरूर जानना चाहेगी ……….क्या होगा इसका जवाब सरकार के पास ?

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