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Archive for सितम्बर, 2009

आ मेरी चाहत ……………..


मेरी चाहत
तुझे दुल्हन बना दूँ
तुझे ख्वाबों के
सुनहले तारों से
सजा दूँ
तेरी मांग में
सुरमई शाम का
टीका लगा दूँ
तुझे दिल के
हसीन अरमानों की
चुनरी उढा दूँ
अंखियों में तेरी
ज़ज्बातों का
काजल लगा दूँ
माथे पर तेरे
दिल में मचलते लहू की
बिंदिया सजा दूँ
अधरों पर तेरे
भोर की लाली
लगा दूँ
सिर पर तेरे
प्रीत का
घूंघट उढा दूँ

मेरी चाहत
तुझे दुल्हन बना दूँ

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अमर प्रेम ———भाग १०

गतांक से आगे ………………………

अर्चना और अजय की ज़िन्दगी न जाने किस मुकाम पर आ गई थी । दोनों एक दूसरे को समझते भी थे ,एक दूसरे को जानते भी थे मगर मानना नही चाहते थे। दोनों ही अपनी- अपनी जिद पर अडे थे । समय का पहिया यूँ ही खिसकता रहा और दोनों के दिल यूँ ही सिसकते रहे।
प्रेम का अंकुर किसी जमीं पर पलमें ही फूट जाता है और किसी जमीं पर बरसों लग जाते हैं । प्रेम हो तो ऐसा जहाँ शरीर गौण हों सिर्फ़ आत्मा का मिलन हो । शुद्ध सात्विक प्रेम हो जहाँ कोई चाह ही न हो सिर्फ़ अपने प्यारे के इशारे पर मिटने को हर पल तैयार हो। लगता है प्रेम की उस पराकाष्ठा तक पहुँचने के लिए अभी वक्त को भी वक्त की जरूरत थी। वक्त भी साँस रोके उस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था ——कब इन दोनों का प्रेम (जिसे एक मानता है मगर दूजा नही ) चरम स्थिति में पहुंचे और कब वो भी उस दिव्यता के दर्शन करे ।

वक्त इंतज़ार के साथ अपनी गति से चल रहा था। एक दिन अर्चना समीर और बच्चों के साथ घूमने गई । इत्तेफाक से उसी शहर में पहुँच गई जहाँ अजय रहता था। या नियति उसे वहां ले गई थी । एक दिन रेस्तरां में जब अर्चना अपने परिवार के साथ खाना खाने गई हुई थी वहीँ पर अजय भी अपने परिवार के साथ आया हुआ था। दोनों में से किसी को भी एक -दूसरे की मौजूदगी का पता न था। आज का दिन अर्चना की ज़िन्दगी का एक खास दिन था। उस दिन अर्चना की शादी की सालगिरह थी और उसके पति और बच्चे उस दिन को खास बनाना चाहते थे इसलिए समीर ने अर्चना से उसकी समीर के लिए लिखी एक खास कविता सुनाने को कहा ——-जिस कविता पर अर्चना को अपने पाठकों से भी बेहद सराहना मिल चुकी थी। आज अर्चना मना भी नही कर सकती थी क्यूंकि समीर ने जिस अंदाज़ में उसे सुनाने को कहा था वो अर्चना के अंतस को छू गया। अर्चना कविता सुनाने लगी। कविता के बोल क्या थे मानो अमृत बरस रहा हो । आँखें मूंदें समीर कविता सुन रहा था और उसके भावों में डूब रहा था। जब अर्चना कविता सुना रही थी उसे मालूम न था कि ठीक उसके पीछे कोई शख्स बड़े ध्यान से उस कविता को सुन रहा है । जैसे ही कविता पूरी हुई समीर और बच्चों के साथ एक अजनबी की आवाज़ ने अर्चना को चौंका दिया। अर्चना ने सिर उठाकर ऊपर देखा तो एक अजनबी को तारीफ करते पाया। एक पल को देखकर अर्चना को ऐसा लगा कि जैसे इस चेहरे को कहीं देखा है मगर दूसरे ही पल वो सोच हकीकत बन गई जब उस शख्स ने कहा ———-“कहीं आप अर्चना तो नही”। अब चौंकने की बारी अर्चना की थी। इस अनजान शहर में ऐसा कौन है जो उसे नाम से जानता है। जब अर्चना ने हाँ में सिर हिलाया तो उस शख्स ने अपना परिचय दिया ———मैं अजय हूँ ,चित्रकार अजय , जिसके चित्र आपकी हर कविता के साथ छपते हैं। ये सुनकर पल भर के लिए अर्चना स्तब्ध रह गई। एक दम जड़ हो गई————आँखें फाड़े वो अजय को देख रही थी जैसे वो कोई अजूबा हो।वो तो ख्वाब में भी नही सोच सकती थी कि अजय से ऐसे मुलाक़ात हो जायेगी। अब समीर ने अर्चना को एक बार फिर मुबारकबाद दी कि आज का दिन तो खासमखास हो गया क्यूंकि आज तुम्हारे सामने तुम्हारा एक प्रशंसक और एक कलाकार दोनों एक ही रूप में खड़े हैं । एक ही पल में इतना कुछ अचानक घटित होना—————–अर्चना को अपने होशोहवास को काबू करना मुश्किल होने लगा। जैसे तैसे ख़ुद को संयत करके अर्चना ने भी अपने परिवार से अजय का परिचय कराया और फिर अजय ने भी अपने परिवार से अर्चना के परिवार को मिलवाया। दोनों परिवार इकट्ठे भोजन का और उस खास शाम का आनंद लेने लगे। मगर इस बीच अर्चना और अजय दोनों का हाल ‘जल में मीन प्यासी ‘वाला हो रहा था।
आज दोनों आमने- सामने थे मगर लब खामोश थे . दोनों के दिल धड़क रहे थे मगर धडकनों की आवाज़ कानों पर हथोडों की तरह पड़ रही थी। सिर्फ़ कुछ क्षण के लिए नयन चोरी से दीदार कर लेते थे। सिर्फ़ नयन ही बोल रहे थे और नयन ही समझ रहे थे नैनो की भाषा को। बिना बतियाये बात भी हो गई और कोई जान भी न पाया। अपनी- अपनी मर्यादाओं में सिमटे दोनों अपने -अपने धरातल पर उतर आए।
ये शाम दोनों के जीवन की एक अनमोल यादगार शाम बन गई । अजय अपनी सारी नाराज़गी भूल चुका था . आज अजय पर वक्त मेहरबान हुआ था. अजय के लिए तो ये एक दिवास्वप्न था। वो अब तक विश्वास नही कर पा रहा था कि उसकी कल्पना साकार रूप में उसके सामने थी आज। उस दिन के लम्हे तो जैसे सांसों के साथ जुड़ गए थे हर आती-जाती साँस के साथ अजय का दिल धड़क जाता———–वो सोचता ——–वो स्वप्न था या हकीकत। अजीब हालत हो गई अजय की । कई दिन लगे अजय को पुनः अपने होश में आने के लिए। एक स्वप्न साकार हो गया था। बिना मांगे ही अजय को सब कुछ मिल गया था।अजय की खुशी का ठिकाना न था । इन्ही लम्हों की तो वो बरसों से प्रतीक्षा कर रहा था शायद उसकी चाहत ,उसका प्रेम सच्चा था तभी उसे उसके प्रेमास्पद का दीदार हो गया था।

क्रमशः ……………………………………

अमर प्रेम ———–भाग ९

गतांक से आगे ……………………..

धीरे धीरे अजय के जीवन में परिवर्तन आता चला गया । उसने चित्रकारी करना छोड़ दिया । ज़िन्दगी जैसे बेरंग सी हो गई । बिना प्रेरणा के कैसी कला और कैसे रंग और कैसा जीवन। उसने अपने आप को अपने दायरों में समेट लिया । किसी मौसम का कोई असर अब उस पर नही होता । उधर अर्चना की कवितायेँ अब बिना अजय के चित्रों के छप रही थी इसलिए अर्चना परेशान होने लगी । उसने अजय को न जाने कितने ख़त लिखे मगर किसी का कोई जवाब नही मिला । अब तो अर्चना के लिए जैसे वक्त वहीँ थम गया । उसे समझ नही आ रहा था कि क्या करे । अब उसका भी दिल नई कवितायेँ गढ़ने का नही होता था। न जाने कौन सी कमी थी जो उसे झंझोड़ रही थी । उसका अंतः मन बेचैन रहने लगा। उसके कारण एक अनमोल जीवन बर्बादी के कगार पर पहुँच रहा था और वो कुछ कर नही पा रही थी ।ये ख्याल उसे खाए जा रहा था । उसे समझ नही आ रहा था कि ये उसे क्या हो रहा है ——-क्यूँ वो अजय के बारे में इतना सोचने लगी है । अर्चना के जीवन का ये एक ऐसा मोड़ था जहाँ उसे हर ओर अँधेरा ही अँधेरा दिखाई दे रहा था । न वो अजय को समझ पा रही थी न ही अपने आप को । जब अजय पुकारता था तो वो मिलना नही चाहती थी और अब जब अजय ने पुकारना छोड़ दिया तो तब भी उसे अच्छा नही लग रहा था ।अब उसका दिल करता एक बार ही सही अजय उसे आवाज़ दे। उसे समझ नही आ रहा था कि उसे क्या हो रहा है । वो अजय के रूप में मिला दोस्त खोना भी नही चाहती थी साथ ही उसकी जिद पर वो भी कहना नही चाहती थी जो अजय कहलवाना चाहता था। वो एक उगते हुए सूरज को इतनी जल्दी डूबते हुए नही देखना चाहती थी इसके लिए स्वयं को दोषी समझती थी मगर समझ नही पा रही थी कि कैसे इस उलझन को सुलझाए । कैसे अजय के जीवन में फिर से बहार लाये। कैसे अजय को ज़िन्दगी से मिलवाए । अजीब कशमकश में फंस गई थी अर्चना । उसने ख़ुद को और अजय को नियति के हाथों सौंप दिया । शायद वक्त या नियति कुछ कर पाएं जो वो नही कर पा रही है । अब उसे अजय के लौटने का इंतज़ार था …………………….

क्रमशः…………………………………….

तेरे आने से

कभी मिलोगी?
साँस छूटने से पहले मुझसे
पकडोगी हाथ मेरा
मौत का हाथ पकड़ने से पहले
बस इतनी सी इल्तिजा है
इक नज़र देख लूँ तुमको
और सुकून की नींद सो जाऊँ
फिर न जगाने आए कोई
कब्र पर मेरी
कोई फूल भी न चढाये
तमाम हसरतें, आरजुएं
इक दीदार के साथ
तमाम हो जाएँगी
मेरा उम्र भर का इंतज़ार
करार पा जायेगा
सिर्फ़ एक बार
तेरे आने से ……………….

अमर प्रेम ———–भाग ८

गतांक से आगे ……………………..

वक्त पंख लगाकर उड़ रहा था । ऐसे सुखद अहसासों के साथ दोनों जी रहे थे । कई साल गुजर गए । फिर एक दिन अजय ने अर्चना से मिलने की इच्छा जाहिर की । अजय जब भी ख़त लिखता उसमें अपने आत्मिक प्रेम का भव्य वर्णन करता और चाहता अर्चना भी उसके प्रेम को स्वीकारे।उसका प्रेम तो सिर्फ़ आत्मिक था हर बार अर्चना को समझाता । कहीं कोई वासना नही थी उस प्रेम में । सिर्फ़ एक बार देखने की चाह ,एक बार मिलन की चाह……………सिर्फ़ एक छोटी सी चाह अपने जज्बातों को बयां करने की । मगर अर्चना —–वो तो सिर्फ़ अहसासों के साथ जीना चाहती थी क्यूंकि उसकी मान्यताएं , उसकी मर्यादाएं उसे कभी ऐसा सोचने पर मजबूर ही नही करती थी। उसे कभी वो कमी महसूस ही नही होती थी जो अजय को हो रही थी । अर्चना अपनी सम्पूर्णता में जी रही थी इसलिए कभी भी अजय के प्रेम को स्वीकार ही नही कर पाई क्यूंकि उसके लिए अजय का प्रेम न आत्मिक प्रेम था न ही कुछ और , वो सिर्फ़ एक सुखद अहसास था जिसे वो अपनी रूह से महसूस करती थी ।
अब इसी बात पर अजय अर्चना से नाराज़ हो गया। आए दिन दोनों की इसी बात पर बहस होने लगी और नाराज़गी बढ़ने लगी । अब अजय ने धीरे धीरे अर्चना को ख़त लिखना ,उसकी कविताओं की सराहना करना बंद कर दिया । शायद वो सोचता था कि उसके इस कदम से अर्चना आहत होगी तो उसके प्रेम को स्वीकार कर लेगी ।इक तरफा प्रेम का अद्भुत मंज़र था । मगर अर्चना के इरादे पर्वत के समान अटल थे । उसका विश्वास ,उसकी मर्यादाएं सब अटल। लेकिन अर्चना ने कभी भी अजय के चित्रों की प्रशंसा करना नही छोडा। वो उसके लिए आज भी वैसा ही था जैसा कल। अर्चना बेशक अजय की ऐसी आदतों से आहत होती थी और तब फिर एक नई कविता का जन्म होता था । अपने उदगारों को अर्चना कविता के माध्यम से व्यक्त करती रहती मगर अजय पर तो जैसे अपनी जिद मनवाने की धुन सवार रहती । इसलिए उसने भी अपने चित्रों की नायिका के रंग और रूप बदलने शुरू कर दिए । उसकी इस दीवानगी से अर्चना परेशान हो जाती । शायद इसीलिए वो उससे कभी मिलना नही चाहती थी।
जहाँ अपूर्णता होती है वहां मिलन की चाह होती है मगर जहाँ पूर्णता होती है वहां कोई चाह बचती ही नही। अर्चना शायद उसी प्रकार की नारी थी।

क्रमशः…………………………………..

मेरे संवेदनहीन पिया

मेरे संवेदनहीन पिया
दर्द के अहसास से विहीन पिया
दर्द की हर हद से गुजर गया कोई
और तुम मुस्कुराकर निकल गए
कैसे घुट-घुटकर जीती हूँ मैं
ज़हर के घूँट पीती हूँ मैं
साथ होकर भी दूर हूँ मैं
ये कैसे बन गए ,जीवन पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
जिस्मों की नजदीकियां
बनी तुम्हारी चाहत पिया
रूह की घुटती सांसों को
जिला न पाए कभी पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
आंखों में ठहरी खामोशी को
कभी समझ न पाए पिया
लबों पर दफ़न लफ्जों को
कभी पढ़ न पाए पिया
ये कैसी निराली रीत है
ये कैसी अपनी प्रीत है
तुम न कभी जान पाए पिया
मैं सदियों से मिटती रही
बेनूर ज़िन्दगी जीती रही
बदरंग हो गए हर रंग पिया
मेरे संवेदनहीन पिया
आस का दीपक बुझा चुकी हूँ
अपने हाथों मिटा चुकी हूँ
अरमानों को कफ़न उढा चुकी हूँ
नूर की इक बूँद की चाहत में
ख़ुद को भी मिटा चुकी हूँ
फिर भी न आए तुम पिया
कुछ भी न भाए तुम्हें पिया
कैसे तुम्हें पाऊँ पिया
कैसे अपना बनाऊं पिया
कौन सी जोत जगाऊँ पिया
मेरे संवेदनहीन पिया

अमर प्रेम ————भाग ७

गतांक से आगे ………………………………

एक बार अर्चना को पत्रिका वालों की तरफ़ से एक सूचना मिली कि पत्रिका में अपनी कविता छपवाने के लिए फोटो का होना जरूरी है ————– अर्चना की कविताओं के दीवानों के आग्रह के कारण पत्रिका वालों को अर्चना से ये गुजारिश करनी पड़ी। अब इस आग्रह को अर्चना को स्वीकार तो करना ही था । और फिर जब अर्चना की फोटो उसकी नई कविता के साथ छपी तो जैसे तहलका सा मच गया । जितने पाठक थे उनकी इच्छा तो पूरी हो ही चुकी थी मगर जिसके ह्र्दयान्गन पर ,जिसकी कुंवारी कल्पनाओं पर जिस हुस्न की मलिका का राज था जब उसने अपनी कल्पना को साकार देखा तो जैसे होश खो बैठा। उसकी कल्पनाओं से भी सुंदर थी उसकी हकीकत । अपने ख्वाब को हकीकत में देखना ——–आह ! एक चिराभिलाषा पूरी होना। अजय अब तो जैसे दीवाना हो गया और उसके चित्रों की नायिका का भी जीवन बदलने लगा , वहाँ अब प्रेम का सागर हिलोरें मारने लगा। अब अजय की अभिव्यक्ति और भी मुखर हो गई। उसकी नायिका और चित्रों के रंग और रूप दोनों ही बदलने लगे।
अजय की चित्रकारी देखकर अर्चना को भी एक नया अहसास होने लगा । उसे भी लगने लगा कि उसका भी एक आयाम है किसी के जीवन में । वो भी किसी की प्रेरणा बन सकती है ———उसे कभी इसका विश्वास ही नही होता था। अर्चना के जीवन का ये एक नया मोड़ था । जहाँ उसके अस्तित्व को एक पहचान मिल रही थी जिसका उसे सपने में भी गुमान न था । उसके लिए ये एक सुखद अहसास था …………..अपने अस्तित्व की पहचान का ।

क्रमशः ……………………………

टैग का बादल