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Archive for अगस्त, 2007

रिश्ते

मौसम की तरह रंग बदलते यह बेलिबास रिश्ते,
वक़्त की आँधियों में ना जाने कहॉ खो जाते हैं,
हम रिश्तों की चादर ओढ़े हुये ऐसे मौसम में ,
दिल को यह समझाए चले जाते हैं,
मगर रिश्तों का बेगानापन हर पल यह बताता है,
पत्थरों के शहर में अपनों को खोजा जाता नहीं,
हर पल दर्द देते यह रिश्ते बेमानी हैं,
क्यूंकि पत्थरों से पत्थरों को तोड़ा जाता नहीं,
ग़र मौसम कि तरह हम भी बदल जाते हैं,
तो रिश्तों के अर्थ ना जाने कहॉ खो जाते हैं,
फिर क्यों हम ऐसे रिश्तों को ढोने को मजबूर हो,
जिनके लिबास वक़्त के साथ बदल जाते हैं

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रिश्ते

कुछ तो है

कुछ तो है जो दिल को सुकून नहीं मिलता
कहीँ चैन कहीँ आराम नहीं मिलता
ना जाने यह दिल क्या चाहता है
हर वक़्त कहीँ खोया रहता है
इसको ढूँढा बहुत मगर कहीँ मिलता नहीं
ना जाने कौन सी गलियों में गुम हो गया
इसकी ख्वाहिशों का कहीँ पता नहीं मिलता
कैसे मिले सुकून वो दवा नहीं मिलती
अरमानों को कहीँ मंजिल नहीं मिलती
कुछ तो है जो खो गया है
जिसे पाने के लिए ये दिल बेचैन हो गया है
दिल को खुद का पता नहीं मिलता
कुछ तो है जो दिल को सुकून नहीं मिलता

दिल कहीँ खो गया

आज ना जाने क्या हो गया है ,यह दिल कहीँ खो गया है,
ना पूछो किधर ना पूछो कहॉ,बस कहीँ गुम हो गया है,
ना कोई याद है ना कोई ख्वाहिश फिर भी कहीँ कुछ है,
जिसे ढूँढने के लिए बेचैन हो गया है,
हाँ आज यह दिल कहीँ खो गया है,
कहॉ ढूँढें इसे यह तो आज मचल गया है,
किसी भूली बिसरी याद में उलझ गया है,
कुछ तो है जिसे पाने को मचल गया है,
कैसे पता लगाऊं इसकी चाहत का,
क्या इसे चाहिऐ,बताता भी नहीं,
इस दिल का पता किसी को मिल जाये ,
तो मुझे भी बताना जरूर क्यूंकि
आज यह दिल कहीँ खो गया है,कहीँ खो गया है………………….

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