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बालार्क की दसवी किरण डॉक्टर कौशलेन्द्र मिश्र


डॉक्टर कौशलेन्द्र मिश्र एक उद्देश्य के साथ लेखन करते हैं।  साहित्य के माध्यम से अपने आदर्शों , संस्कृति और मूल्यों को बचाने के लिए प्रयासरत रहना और इसी का दर्शन उनकी कविताओं   में होता है जब “एक ही दृश्य ” कविता में ह्रास होते जीवन मूल्यों को देखते हैं कवि मन पीड़ा से भर उठता है जब देखता है आज के युग की विडम्बना कि कैसे शैतान काबिज़ हो रहा है , उसी की जय जयकार हो रही है हर तरफ और दूसरी तरफ इंसानियत किसी हारे जुआरी सी मूँह छुपाये किसी कोने में दुबकी सिसक रही है उस क्षण कवि मन ईश्वर से प्रश्न कर ही उठता है कि आखिर ऐसा भेदभाव क्यों कुछ इस तरह :

“कभी मिलेगा ईश्वर / तो पूछूंगा जरूर/ मीठे कुएं इतने कम क्यों हैं / और सागर इतने फैले हुए क्यों हैं “

“विश्व मानचित्र में ” यही पीड़ा आगे आकार लेती है जब कवि उद्द्वेलित होता है ये सोचकर कि जिन मूल्यों से उसके देश की पहचान थी आज वो कहाँ खो गए हैं कि अगर कोई दूर खड़ा देखे तो उसे वो भारत दिखेगा ही नहीं जहाँ राम , सीता , लक्ष्मण  कृष्ण जैसे चरित्रों ने जन्म लिया था और एक आदर्श स्थापित किया था क्योंकि आज तो चारों तरफ नैतिक मूल्यों का सिर्फ ह्रास ही हो रहा है, कहीं कोई मर्यादा नहीं रही , चरों तरफ फैली अराजकता ही दया , प्रेम और करुणा को लील चुकी है , ये कैसा परिदृश्य है , दुखी होने के साथ चकित है कवि :

“आर्यों के देश में / आर्य ही मिलता नहीं / आर्यत्व का अब कोई / अनुसन्धान करता नहीं / सीता के हरण पर / उद्वेलन होता नहीं / रावणों की भीड़ से निकलकर / कोई एक / लक्ष्मण को निति का / उपदेश अब देता नहीं। / मूल्य कहाँ होंगे शेष?”

“नाली का कीड़ा ” के माध्यम से स्वदेश से पलायन करती प्रतिभाओं और विदेश के  कटाक्ष किया है और देशप्रेम की भावना को भी चंद  शब्दों में ही भर दिया है साथ ही एक सन्देश भी दिया है कि इंसान चाहे तो अपने देश में रहकर भी उत्थान और प्रेरणा की अलख जगा सकता है। 

“पहरुए” अर्थात पहरेदार………आज की जीवन शैली का आने वाली पीढ़ी पर पड़ते हुए असर को इंगित करती है कि आज हम चकाचौंध में खो गए हैं और उसी में आने वाली पीढ़ी को डुबो रहे हैं जबकि आने वाली पीढ़ी का दोष नहीं , कहीं न कहीं हमारी ही पहरेदारी में कमी है , हम ही नहीं दिखा पा रहे सही राहें क्योंकि आज के बच्चे ही कल का भविष्य हैं और जो और जैसे संस्कार हैम उन्हें देंगे वैसे ही देश का निर्माण होगा , वैसे ही चरित्र बनेगे और वो वक्त आने से पहले हमें जागना होगा और अपने कर्त्वयों को समझना होगा :

“सहिष्णुता को भगाकर / उद्दंडता आयी है / संयम को भगाकर / उच्छृखलता आयी है / घरवाली गयी है बहार / घर में कामवाली आयी है /बच्चे घर से भागने लगे है / शहर शहर / गली गली भटकने लगे हैं / बच्चे स्वयं को बच्चा नहीं जानते / सामाजिक नियमों को अच्छा नहीं मानते “

कुल मिलाकर कवि व्यथित है आज गिरते जीवन मूल्यों से , प्रभाव खोती संस्कृति से जो किसी भी देश की पहचान होते हैं और दोबारा उन्ही को स्थापित करने का स्वप्न देखते हैं अपने लेखन के माध्यम से बस यही तो है लेखन का औचित्य और सार्थकता जो किसी उद्देश्य के तहत किया जाए , जो समाज को सही दिशा दे सके और आने वाली पीढ़ी का सही मार्गदर्शन कर सके और उसमे कवि सक्षम है।  कवि की सूक्ष्म दृष्टि इसी तरह सभी बुराइयों पर पड़ती रहे और वो इसी तरह जागरूकता की अलख जगाता रहे इसी कामना के साथ कवि को उत्तम व् प्रेरक लेखन के लिए बधाई देती हूँ। 

मिलती हूँ अगले कवि के साथ जल्दी ही………… 
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