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बालार्क की आठवीं किरण हैं सुधा ओम ढींगरा जी जो किसी पहचान की मोहताज नहीं।  जो अपनी पहचान आप हैं , उनका लेखन स्वयं बोलता है।  


” रिश्ते ” शब्द ही जाने कितने रिश्तों की ऊष्मा साथ लिए आ जाता है जेहन के दरवाज़े पर मगर क्या जरूरी है हर रिश्ते को नाम देना , क्या बिना नाम के रिश्ते , रिश्ते नहीं होते या उनमे भावनाएं नहीं होतीं या उनमे कलुषता होती है ये एक ऐसा प्रश्न है जिससे हर कोई जूझता है और खास तौर से एक स्त्री जब उसे कसा ही रिश्तों की कसौटी पर जाता है ना कि उसके स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकारा ………यही है हमारे समाज की सबसे बड़ी विडंबना और कवयित्री इसी विडंबना से उसे मुक्त करना चाहती हैं और एक नए समाज का निर्माण जहाँ स्त्री केवल स्त्री ना हो बल्कि एक इंसान भी हो

“भावनाएं/ संवेग / खुले रहकर भी / मर्यादित रह सकते हैं / फिर बंधना -बांधना क्यों ?”


“कठपुतली ” के माध्यम से स्त्री की दलित अवस्था  का सटीक चित्रण किया है क्योंकि डोर है उसके हाथों में 

“कराये हैं नौ रस भी अभिनीत / जीवन के नाट्य मंच पर / हंसें या रोयें / विरोध करें या हों विनीत /  धागे वो जो थामे है “


“स्मृतियाँ ” नाम ही काफी है , कौन है जो बचा है स्मृतियों के गेसुओं में उलझने से , कौन होगा ऐसा जिसकी रूह पर कोई स्मृति दस्तक न देती हो , शायद ही कोई प्राणी हो जो अच्छी या बुरी स्मृतियों से ज़िन्दगी में रु-ब -रु ना होता हो और जब ये स्मृतियाँ जब बिन बुलाये मेहमान सी जब चाहे चली आती हैं तो यादों के पर्दों को यूं हिलाती हैं कि ना चाहते हुए भी स्वागत करना ही पड़ता है फिर न कोई होश रहता है बस यही तो भाव संजोया है कवयित्री ने कविता में 

“तेरा मेरा साथ “ ज़िदगी की धूप  छाँव का एक खूबसूरत चित्रण हैं , एक के बिना दूजे का कोई अस्तित्व ही नहीं , एक के होने से ही दूसरे के होने के अहसास से गुजरा जा सकता है , सुख हो या दुःख ज़िन्दगी के ऐसे पहलू हैं जिनसे गुजरे बिना ज़िन्दगी जी ही नहीं जा सकती और सुख और दुःख हैं तो ज़िन्दगी की धूप और छाँव से भी बचा नहीं जा सकता और यही ज़िन्दगी का अनुपम सौंदर्य होता है जिससे गुजरने के बाद ही जीवन कुंदन बनता है 

” और कहती है / ऐ पथिक ! / दो पल मेरे पास आ / सहला दूं / ठंडी सांसों से / तरोताजा कर दूं तुम्हें / ताकि चहकते महकते / बढ़ सको अपनी / मंज़िल की और “

“नींद चली आती है “ एक ऐसी संवेदनशील कविता है जिससे गुजरते तो सभी हैं मगर उन भावों में रचता बसता  कोई कोई है।  यूं तो आज के दौर में जब संवेदनहीन हो गया है समाज और रिश्ते भी , जहाँ माता पिता को भी एक अवांछित तत्व समझ किनारा कर लिया जाता है वहाँ कवयित्री की संवेदनाएं इतनी सौम्यता से मुखर हुयी हैं कि एक चारपाई के माध्यम से उसने एक जीवन की पूरी  ना केवल कहानी कही है बल्कि रिश्तों की नमी को भी उकेरा है जो इस कविता का अक्षुण्ण सौंदर्य है 

“चारपाई के फीके पड़े रंग / समय के धोबी पाठकों से / मौसी के चेहरे पर आयी / झुर्रियों से लगते हैं “

कभी कभी इंसान एक क्षण में एक लम्बी यात्रा तय कर लेता है जब कोई लम्हा उसे छूकर गुजरता है तभी तो कवयित्री “वर्षों की यात्रा ” तय कर लेती हैं सर्दियों की उतरती धूप के मखमली अहसासों के साथ खो जाती है अपने बचपन की दुनिया में , जो जीवन की रोजमर्रा की स्थितियाँ हैं उनमे भी स्पर्श की ऊष्मा महसूसना और उसे शब्दों में पिरोना ही तो कवि के लेखन की सार्थकता है जिसमे कवयित्री सक्षम रही हैं :

” आँगन में धीरे धीरे / सरकती , फैलती , सिकुड़ती / सर्दियों की धुप / उस पर लहराते / पाइन वृक्ष के साये / दादी की चटाई की याद दिल गए”

रिश्तों की आत्मीयता का क्या महत्त्व है उसे महसूसने और कहने की क्षमता से लबरेज है कवयित्री का ह्रदय तभी तो हर और उसकी निगाह है , हर पल को जैसे साँसों संग महसूसती हैं , धड़कनों में राग बन जैसे बजती हों घंटियाँ कुछ ऐसा ही नाता है कवयित्री का जीवन से और जीवन में उतरे हर रिश्ते से तभी रिश्तों के सौंदर्य को इस खूबसूरती से उकेरा है कि पाठक उसके साथ अपनी स्मृतियों के खो जाता है और एक यात्रा वो खुद कर आता है और यही होती है किसी भी कवि के लेखन की सार्थकता जब पाठक उसमे अपना अक्स ढूँढता है और वो उसे वहाँ मिलता है।  कवयित्री को सार्थक लेखन के लिए बधाई देती हूँ। 

मिलती हूँ अगले कवि के साथ जल्दी ही ………. 
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