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ओ मेरे !…….10

आँख में उगे कैक्टस के जंगल में छटपटाती चीख का लहुलुहान अस्तित्व कब हमदर्दियों का मोहताज हुआ है फिर चाहे धुंधलका बढता रहा और तुम फ़ासलों से गुजरते रहे ……ना देख पाने की ज़िद पर अडी इन आँखों का शगल ही कुछ अलग है …………नहीं , नहीं देखना ………मोहब्बत को कब देखने के लिये आँखों की लालटेन की जरूरत हुयी है …………बस फ़ासलों से गुजरने की तुम्हारी अदा पर उम्र तमाम की है तो क्या हुआ जो तुम्हें मैं नज़र ना आयी , तो क्या हुआ जो तुम्हारे कदमों में ना इस तरफ़ मुडने की हरकत हुयी ………इश्क के अंदाज़ जुदा होते हैं फ़ासलों में भी मोहब्बत के खम होते हैं ………जानाँ !!! 

अब मुस्कुराती हूँ मैं अपने जीने के अन्दाज़ पर ………फिर क्या जरूरत है रेगिस्तान में भटकने की …………कैक्टस के फ़ूल यूँ ही नहीं सहेजे जाते …………उम्र फ़ना करनी पडती है धडकनो का श्रृंगार बनने को…………और मैंने तो खोज लिया है अपना हिमालय …………क्या तुम खोज सकोगे कभी मुझमें , मुझसा कुछ ………यह एक प्रश्न है तुमसे ओ मेरे !


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Comments on: "ओ मेरे !…….10" (13)

  1. ापने लिखा… हमने पढ़ा… और भी पढ़ें…इस लिये आपकी इस प्रविष्टी का लिंक 26-07-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल पर भी है…आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाएं तथा इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और नयी पुरानी हलचल को समृद्ध बनाएं…. आपकी एक टिप्पणी हलचल में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान और रचनाकारोम का मनोबल बढ़ाएगी… मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।जय हिंद जय भारत… मन का मंथन… मेरे विचारों कादर्पण…

  2. वाह बहुत बढ़िया प्रस्तुति..

  3. बहुत सुंदर रचना ,

  4. अच्छा प्रश्न है…!रचना भी सुन्दर है!

  5. गहरा मंथन … मैंने तो खोज लिए है अपना हिमालय … क्या आ सकोगे उन ऊंचाइयों तक … छू सकोगे उन्हें … शायद कभी नहीं … अंदर की कशमकश को दिए शब्द …

  6. ख़ुद से जूझता हुआ प्रश्न…जिससे पूछा गया है प्रश्न… वही समझ सके शायद…~सादर!!!

  7. वाह! बहुत सुंदर.

  8. बढ़िया प्रस्तुति.

  9. सशक्त और प्रभावशाली रचना…..

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