Just another WordPress.com weblog

मेरे अन्दर की स्त्री भी 

अब नहीं कसमसाती 
एक गहन चुप्पी में 
जज़्ब हो गयी है शायद 

रेशम के थानों में 
अब बल नहीं पड़ा करते 
वक्त की फिसलन में 
ज़मींदोज़ हो गए हैं शायद 

बिखरी हुयी कड़ियाँ 
अब नहीं सिमटतीं यादों में 
काफी के एक घूँट संग 
जिगर में उतर गए हैं शायद 

बेतरतीब ख़बरों के 
अफ़साने नहीं छपा करते 
अख़बार की कतरनों में 
नेस्तनाबूद हो गए हैं शायद 

(खुद से खुद को हारती ………. एक स्त्री अपनी चुप से लड रही है )
Advertisements

Comments on: "खुद से खुद को हारती ………. एक स्त्री" (11)

  1. सब को,हर क्षण,अपने से ही जूझना होता है,क्या करें,क्या न करें,स्वयं से पूछना होता है।

  2. इस स्त्री को हारने नहीं देना है ….

  3. बहुत गहरी बात …दिल को छू गई रचना …बहुत बहुत

  4. नमस्कार मित्र आपका ब्लॉग पढ़ा काफी अच्छा लिखते हो। हमने एक सामूहिक लेखन का ब्लॉग बनाया है। जिसे हम आप जैसे अनुभवी लेखकों के साथ मिलकर चलाना चाहते है। आप हमारे ब्लॉग के लेखक बने और अपनी ब्लॉग्गिंग को एक नया आयाम दें। हमे आशा है कि आप अवश्य ऐसा करेंगे। हमसे जुड़ने के लिए हमे कॉल करे 09058393330 हमारा ब्लॉग है http://www.naadanblogger.blogspot.in

  5. अब जब यहाँ असमवेदानाओं की हद नहीं रही तो भला एक संवेदन शील इंसान या स्त्री कब तक इस भावना से वंचित रह सकते है यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं जब शायद एक भी संवेदनशील इंसान न हो इस धरती पर और किसी को किसी भी बात का कोई असर ही न हो गहन भाव अभिव्यक्ति…

  6. दिल को छूती बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति…

  7. इस मौन में छिपा बहुत शोर है

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

टैग का बादल

%d bloggers like this: