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ढूँढता हूँ शहर मैं जो बरसों पहले खो गया 

जाने किस सभ्यता में दफ़न कैसे हो गया 

जहाँ तिलिस्मों के बाज़ार में बिकती हों ख्वाहिशें 
उन ख्वाहिशों का कोई खरीदार कैसे हो गया 

इक अंगरखे के नकाब में निकलते हैं जो सड़कों पर 
पैरों की जूतियों का कोई तलबगार कैसे हो गया 

ये मौसमों की बदलती सीरत जो देखी हर तरफ 
जाने उन हवाओं का कोई पहरेदार कैसे हो गया 

वक्त की नुमाइशे जो क़त्ल भी किया करती थीं कभी 
जाने उन चौबारों पर आज ऐतबार कैसे हो गया 
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Comments on: "ढूँढता हूँ शहर मैं जो बरसों पहले खो गया" (15)

  1. वाह जीअच्छी रचनासुबह सुबह मन प्रसन्न हुआ रचना पढ़कर !

  2. आज ०४/०६/२०१३ को आपकी यह पोस्ट ब्लॉग बुलेटिन – काला दिवस पर लिंक की गयी हैं | आपके सुझावों का स्वागत है | धन्यवाद!

  3. बेहद सुन्दर रचना वन्दना जी।

  4. वक्त की नुमाइशे जो क़त्ल भी किया करती थीं कभी जाने उन चौबारों पर आज ऐतबार कैसे हो गया …बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति…

  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति…!आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (05-06-2013) के "योगदान" चर्चा मंचःअंक-1266 पर भी होगी!सादर…!डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

  6. बहुत बढ़िया -सुन्दर प्रस्तुति !

  7. ये मौसमों की बदलती सीरत जो देखी हर तरफ जाने उन हवाओं का कोई पहरेदार कैसे हो गया वक्त की नुमाइशे जो क़त्ल भी किया करती थीं कभी जाने उन चौबारों पर आज ऐतबार कैसे हो गया बहुत खूब…प्रभावशाली रचना…

  8. बहुत ही सुन्दर रचना, प्रस्तुति का ढंग, प्रयोग किये गए शब्द और उनका प्रभाव सब अति उत्तम.

  9. उस शहर को तो हम भी खोज रहे हैं ।

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