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सुनो 

मत खाना तरस मुझ पर 
नहीं करना मेरे हक़ की बात 
न चाहिए कोई आरक्षण 
नहीं चाहिए कोई सीट बस ,ट्रेन या सफ़र में 
मैंने तुमसे कब ये सब माँगा ?
जानते हो क्यों नहीं माँगा 
क्योंकि 
तुम कभी नहीं कर सकते मेरी बराबरी 
तुम कभी नहीं पहुँच सकते मेरी ऊँचाईयों पर 
तुम कभी नहीं छू सकते शिखर हिमालय का 
तो कैसे कहते हो 
औरत मांगती है अपना हिस्सा बराबरी का 
अरे रे रे …………..
फ़िलहाल तो 
तुम डरते हो अन्दर से 
ये जानती हूँ मैं 
इसलिए आरक्षण , कोटे की लोलीपोप देकर 
अपने कर्त्तव्य की इतिश्री करते हो 
जबकि मैं जानती हूँ 
तुम मेरे बराबर हो ही नहीं सकते 
क्योंकि 
हूँ मैं ओत-प्रोत मातृत्व की महक से 
जनती हूँ जीवन को ……जननी हूँ मैं 
और जानते हो 
सिर्फ जनते समय की पीड़ा का 
क्षणांश भी तुम सह नहीं सकते 
जबकि जनने से पहले 
नौ महीने किसी तपते रेगिस्तान में 
नंगे पाँव चलती मैं स्त्री 
कभी दिखती हूँ तुम्हें थकान भरी 
ओज होता है तब भी मेरे मुख पर 
और सुनो ये ओज न केवल उस गर्भिणी 
गृहणी के बल्कि नौकरीपेशा के भी 
कामवाली बाई के भी 
वो सड़क पर कड़ी धूप  में 
वाहनों को दिशा देती स्त्री में भी 
वो सड़क पर पत्थर तोडती 
एक बच्चे को गोद में समेटती 
और दूजे को कोख में समेटती स्त्री में भी होता है 
और सुनना ज़रा 
उस आसमान में उड़ने वाली 
सबकी आवभगत करने वाली में भी होता है 
अच्छा न केवल इतने पर ही 
उसके इम्तहान ख़त्म नहीं होते 
इसके साथ निभाती है वो 
घर परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी भी 
पूरी निष्ठां और ईमानदारी से 
जरूरी तो नहीं न 
हर किसी को उपलब्ध हों वो सहूलियतें 
जो एक संपन्न घर में रहने वाली को होती हैं 
कितनी तो रोज बस ट्रेन की धक्कामुक्की में  सफ़र कर 
अपने गंतव्य पर पहुँचती हैं 
कोई सब्जी बेचती है तो कोई होटल में 
काम करती है तो कोई 
दफ्तर में तो कोई कारपोरेट ऑफिस में 
जहाँ उसे हर वक्त मुस्तैद भी रहना पड़ता है 
और फिर वहां से निकलते ही 
घर परिवार की जिम्मेदारियों में 
उलझना होता है 
जहाँ कोई अपने बुजुर्गों की सेवा में संलग्न होती है 
तो कोई अपने निखट्टू पति की शराब का 
प्रबंध कर रही होती है 
तो कोई अपने बच्चों के अगले दिन की 
तैयारियों में उलझी होती है 
और इस तरह अपने नौ महीने का 
सफ़र पूरा करती है 
माँ बनना आसान नहीं होता 
माँ बनने के बाद संपूर्ण नारी बनना आसान नहीं होता 
तो सोचना ज़रा 
कैसे कर सकते हो तुम मेरी बराबरी 
कैसे दे सकते हो तुम मुझे आरक्षण 
कैसे दे सकते हो कोटे में कुछ सीटें 
और कर सकते हो इतिश्री अपने कर्त्तव्य की 
जबकि तुम्हारा मेरा तो कोई मेल हो ही नहीं सकता 
मैंने तुमसे कभी ये सब नहीं चाहा 
चाहा तो बस इतना 
मुझे भी समझा जाए इंसान 
मुझे भी जीने दिया जाए 
अपनी इच्छाओं आकांक्षाओं के साथ 
बराबरी करनी हो तो 
आना मेरी ऊँचाई तक 
मेरी जीवटता तक 
मेरी कर्मठता तक 
मेरी धारण करने की क्षमता तक 
जब कर सको इतना 
तब कहना बराबर का दर्जा है हमारा 
जानना हो तो इतना जान लो 
स्त्री हूँ ………कठपुतली नहीं 
जो तुम्हारे इशारों पर नाचती जाऊं 
और तुम्हारी दी हुयी भीख को स्वीकारती जाऊं 
आप्लावित हूँ अपने ओज से , दर्प से 
इसलिए नही स्वीकारती दी हुयी भीख अब कटोरे में 
जीती हूँ अब सिर्फ अपनी शर्तों पर
और उजागर कर देती हूँ स्त्री के सब रहस्य बेबाकी से 
फिर चाहे वो समाजिक हों या शारीरिक संरचना के 
तोड देती हूँ सारे बंधन तुम्हारी बाँधी
वर्जनाओं के , सीमाओं के 
और कर देती हूँ तुम्हें बेनकाब
इसलिय नवाजी जाती हूँ “बेबाक महिला ” के खिताब से 
और यदि इसे तुम मेरी बेबाकी समझते हो तो 
गर्व है मुझे अपनी बेबाकी पर 
क्योंकि 
ये क्षमता सिर्फ मुझमे ही है 
जो कर्तव्यपथ पर चलते हुए 
दसों दिशाओं को अपने ओज से नहला सके 
और अपना अस्तित्व रुपी कँवल भी खिला सके 
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Comments on: ""बेबाक महिला "" (18)

  1. बहुत खूब …. जानते हैं कि नहीं छु सकते पाँव की उंगलियों का नाखून भी इसी लिए अपनी श्रेष्ठता दिखाने के लिए हावी हो जाना चाहते हैं ।

  2. बिल्कुल सच है।बहुत बढिया

  3. कोई बराबरी कही है ही नहीं…. न कोई होड़ ही,कुंवर जी,

  4. महिला ने महिला को मारा …पुरुष तो बना बेचारा …सुन्दर अभिव्यक्ति

  5. सचाई का आईना दिखाती बहुत सटीक अभिव्यक्ति..नमन नारी शक्ति और उसकी सहनशीलता को…

  6. वाह ! स्त्री की गरिमा को प्रस्तुत करतीं जोश भरी पंक्तियाँ…

  7. यह आक्रोश जायज है ..आपके ब्लॉग के नाम को सार्थक करता हुआ ..हर बार लगता है कोई नया जख्म उभर आया ..आपके बिचारों से पूर्णतया इतेफाक रखता हूँ ..सादर बधाई के साथ

  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (08-04-2013) के "http://charchamanch.blogspot.in/2013/04/1224.html"> पर भी होगी! आपके अनमोल विचार दीजिये , मंच पर आपकी प्रतीक्षा है .सूचनार्थ…सादर!

  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति…!आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (22-05-2013) के कितनी कटुता लिखे …….हर तरफ बबाल ही बबाल — बुधवारीय चर्चा -1252 पर भी होगी!सादर…!

  10. सबकी क्षमता खुलकर आये।

  11. पुरुष की सोच के प्रति आपके आक्रोश समझा जा सकता है।आपको महिला होने पर गर्व होगा और आप महिला को महान मानती है इसमें भी कुछ गलत नहीं।लेकिन पुरुष को केवल इसलिए कमतर और हीन बताना की वह पुरुष है और माँ नहीं बन सकता?आपके आक्रोश को समझते हुए भी मुझे तो यह तरीका सही नहीं लगता।

  12. @राजन जी क्या जननी होना आसान है ? बहुत मुश्किल है राजन जी और उसके साथ अपने हर कर्तव्य को शिद्दत से निभाना और फिर उफ़ ना करना उस पर भी उसी स्त्री को तोहमत देता ये समाज , ये पुरुषवर्ग जो हर कदम पर उसका शोषण करता है क्या सही है ये ? मैने तो सिर्फ़ कुछ परिस्थितियों को ही लिखा है मगर ना जाने एक औरत किन किन हालात से गुजरती है ये तो सोचा भी नही जा सकता , लिखना और कहना जितना आसान होता है भोगना उतना ही मुश्किल और यदि आज के बदलते युग के साथ यदि कोई औरत कुछ सामाजिक वर्जनाओं को तोडते हुये आगे बढने की , पुरुष से कदम से कदम मिलाकर चलने की कोशिश करती है या कहिये अपना अस्तित्व बनाने की , उसे बचाने की कोशिश करती है और पुरुष को मूँहतोड जवाब देती है तो कुछ लोगों को नागवार गुजरता है और वो उसके चरित्र तक की धज्जियाँ उडाने लगते हैं बिना सच को जाने परखे ………क्या तब वो पुरुष दोषी नहीं होते …………इस पितृसत्तात्मक समाज के कारण ही औरत का ये हाल हुआ है और इसलिये वो मुखर हुयी है और बता रही है अपनी अहमियत तो क्या बुरा कर रही है ………………आज जरूरत है उस जड सोच को बदलने की , उन्हें अहसास कराने की कि नारी केवल शोषण की वस्तु नहीं एक पृथक व्यक्तित्व है जिसकी समाज को भी उतनी ही जरूरत है इसलिये उसे उसके हिसाब से जीने दिया जाये

  13. बहुत खूब….वाकई हमें नहीं चाहि‍ए कोई आरक्षण

  14. महिला की कथा-व्यथा को दर्शाती बढ़िया पोस्ट!

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