Just another WordPress.com weblog



मोहन !
तुमने असमंजस में मुझको डाला
और अपने ही वजूद पर प्रश्नचिन्ह लगवा डाला

एक तरफ़ तुम खुद को
निर्विकार , निर्लेप , निर्द्वंद बताते हो
जिसका कोई मन नहीं होता
जो भक्तों या प्रेमियों की चाह पर ही
उसी रूप में आकार लेता है
और जैसा वो बनाते हैं
उसी में ढल जाता है
दूसरी तरफ़ इसी का उलट
करते दिखते हो
जब एक से बहुत होने का तुम्हारा मन होता है
तब सृष्टि की रचना करते हो
तो बताना ज़रा छलिया
मन तो तुम्हारे भी हुआ ना
क्यों फिर तुमने अपनी इच्छा को
भक्त या प्रेमी की इच्छा से जोड दिया
क्या ये मानने से तुम छोटे हो जाते ?

मोहन ! मानना होगा तुम्हें इस बात को
क्योंकि
अकेलापन और उसकी उदासी
कैसे वजूद मे घुन की तरह लग जाती है
ये तो शायद तुमसे बेहतर कोई नहीं जानता होगा
क्योंकि
तुम भी तो सारे ब्रह्मांड में तन्हा ही हो
कोई नही है तुमसे बतियाने को
कोई नही है तुम्हारा हाल जानने वाला
कोई नहीं है तुमसे अपनी कहने
और तुम्हारी सुनने वाला
और जब अपने अकेलेपन से
तुम उकता जाते हो
तब बहुत होने का तुम्हारा मन यूँ ही नहीं होता मोहन
इसका भी एक कारण है
तुम्हें भी एक प्यास है
एक चाह है
एक ख्वाहिश है
एक जिज्ञासा है
एक तडप है
एक दर्द है
एक बेचैनी है
कि कोई तो हो जो सिर्फ़ तुम्हें चाहे
कोई तो हो जो सिर्फ़ तुम्हारे लिये जीये और मिट जाये
कोई तो हो जो सिर्फ़ तुम्हारा हो
और तुम इसी चाह की पूर्णता के लिये
रच बैठते हो एक संसार अपनी चाहत का
मगर क्या कभी सोचा है तुमने
हम तुम्हारे बनाये प्राणी
तुम्हारी बनायी सृष्टि में
तुम्हारे ही हाथों की कठपुतली होते हैं
तुम जैसे चाहे डोर घुमा देते हो
जैसे चाहे जिसे जिससे जुदा कर देते हो
जैसे चाहे जिसका दिल तोड देते हो
और हम विवश प्राणी तुम पर आक्षेप
भी नहीं लगा सकते क्योंकि
तुमने तो सिक्के के दोनो पहलू
अपने ही हाथ में रखे हैं
और कर्मों का लेखा कह तुम खुद से पल्ला झाड लेते हो
और हम तुम्हारी चाहतों पर कुर्बान होते
वो बलि के बकरे हैं जिन्हें पता है ज़िबह होना है यूँ ही रिसते रिसते
अच्छा ज़रा सोचना
क्या तुम जी सकते थे ऐसा जीवन?
देखो, हमें पता है……… फिर भी जीते हैं
हर ख्वाहिश, हर चाहत , हर मजबूरी, हर वेदना से आँख मिलाते हुये

सुना है बहुत कोमल हो तुम 🙂
क्या सच में ?
मुझे तो नहीं लगे
तभी तो अपनी बनायी दुनिया में
कैसे सबका जीना मुहाल करते हो
और इतना सब झेलने के बावजूद
कोई बेचारा प्रेम का मारा तुम तक पहुँच भी जाता है
जो तुम्हारी सारी शर्तों का पालन करता हुआ
 सिर्फ़ तुम्हें चाहता है
उसे भी कब परीक्षा के नाम पर सूली पर चढा देते हो
पता ही नहीं चलता
और वो बेचारा …………जानते हो
उस पल कहीं का नहीं रहता
ना दुनिया का ना तुम्हारा
और वो पल उसे ऐसा लगता है
जैसे किसी ने उसे ठग लिया हो
जैसे बीच मझधार में माझी छोड गया हो
और चप्पू चलाना भी वो ना जानता हो
जैसे किसी धनी की सारी पूँजी
एक ही पल में स्वाहा हो गयी हो
कभी सोचा है ………क्या गुजरती होगी उन पर उस पल?

वैसे एक बात और कहनी है तुमसे
तुम कहते हो या तुम्हारी गीता या अन्य ग्रंथ कहते हैं
ये सारी दुनिया भ्रम है
सच नहीं है ………जो भी तुम आँखों से देख रहे हो
ये एक निद्रा है जिसमें तुम सो रहे हो
जिस दिन जागोगे अपने अस्तित्व को पहचान लोगे
उसी दिन खुद को पा लोगे
इसलिये यहाँ किसी से मोह मत करो
बस कर्तव्य समझ अपना कर्म करो
जैसे किसी नाटक में कोई कलाकार करता है
और नाटक के खत्म होने पर फिर अपने रूप में होता है
मान ली तुम्हारी बात
मगर ये तो सोचना ज़रा
नाटक मे काम करते पात्र को पता होता है
वो नाटक कर रहा है
वो उसका मात्र पात्र है
हकीकत में तो वो दूसरा इंसान है
मगर हम?
क्या हमें पता है ये सच्चाई?
क्या कराया तुमने कभी ये आभास?
अरे हम तो जब से पैदा हुये
जो देखा उसे ही सत्य माना
फिर कैसे इस जीवन को नाटक मान लें ?
कैसे आँखों का भ्रम मान लें?
कैसे झूठ मानें जब तक ना आभास हो हकीकत का?
क्या कभी सोचा तुमने?
नहीं ना ………तुम क्यों सोचते
तुम्हें तो अपनी चाहतों की पूर्णाहूति के लिये
कुछ खिलौनों की जरूरत थी सो तुमने पूरी की
मगर एक बात नहीं सोची
कि जैसा तुम कहते हो उसके अनुसार
यदि हम झूठ हैं , हमारा वजूद झूठा है
ये संसार झूठा है, नश्वर है
तो फिर कैसे तुम एक झूठ से सत्य की चाह रखते हो
जो चीज़ ही झूठी होगी वो कैसे सत्य सिद्ध होगी?
वो कैसे सच दिखा सकती है जिसका आईना ही झूठा हो?
नहीं समझे मेरी बात तो सुनो
तुम्हारी चाहत की ही बात कह रही हूँ
तुम्हें भी चाह होती है ना
कोई सिर्फ़ तुम्हें चाहे
फिर चाहे वो भक्त बने या प्रेमी
माँ यशोदा हो या तुम्हारी गोपियाँ
मीरा हो या राधा
मगर मोहन ! विचारना तो
हम सब तुम्हारे बनाये मिथ्या संसार की मिथ्या वस्तुयें ही तो हैं
फिर कैसे तुम्हें अखंड, अनिर्वचनीय, शाश्वत प्रेम का सुख दे सकती हैं ?
शायद कभी सोचा नहीं होगा तुमने
या किसी ने ये सत्य नहीं कहा होगा तुमसे
और तुम ना जाने कितने कल्पों से
एक ही रचनाक्रम में लगे हो ये सोचते
या खुद को भरमाते
कि हाँ मेरे भक्त सिर्फ़ मुझे चाहते हैं
जबकि सभी जानते हैं ……झूठ के पाँव नहीं होते
और रेत में पानी का आभास किसी मरीचिका से जुदा नहीं होता
फिर भी तुम इस भ्रम के साथ जीना चाहते हो तो तुम्हारी मर्ज़ी
हमने तो आज उस हकीकत से पर्दा हटा दिया जिसका शायद तुम्हें भी ज्ञान नहीं था ………
क्या सच नहीं कहा मैने मोहन ?
जवाब हो तो देना जरूर ………इंतज़ार रहेगा!!!

अरे रे रे ………ये आत्मश्लाघा जैसा कुछ नही है
ना किसी बात पर गर्व है हमें
हम जानते हैं अपनी हैसियत , अपना वजूद
जो क्षणिक है
तुम्हारे हाथों की कठपुतली है
फिर भी ये ख्याल उभरा है तो सोचा तुम्हें बता दूँ
शायद तुम समझ पाओ इसके गहन अर्थ ………

हमारा पानी के बुलबुले सा क्षणभंगुर जीवन ही सही
मगर हम जिस झूठ में जन्म लेते हैं (तुम्हारे कहे अनुसार “झूठ” यानी ये संसार ये जीवन)
उस झूठ को भी सार्थकता से जीते हैं एक सत्य समझकर
क्योंकि हमारे लिये तो यही सत्य है 

जब तक हमें पता ना चले कि हम किसी कहानी के पात्रभर हैं
और उस पर तुम्हारी माया के प्रहार झेलते हैं
जिसमें तुम खुशियों की सब्ज़ी में
किसी ना किसी गम की बघार लगाने से बाज नही आते
फिर भी जीवटता से जी ही लेते हैं हम
तुम्हारे झूठे संसार को सत्य समझकर
क्या तुम कर सकते हो ऐसा ? ज़रा सोचना
क्योंकि हाथ मे चाबु्क लेकर तो कोई भी मदारी बन सकता है …………

Advertisements

Comments on: "क्योंकि हाथ मे चाबु्क लेकर तो कोई भी मदारी बन सकता है …………" (16)

  1. बहुत ही शानदार और सराहनीय प्रस्तुति….बधाईइंडिया दर्पण पर भी पधारेँ।*प्यार भरी होली*शुभकामनायें !!

  2. हर बार की तरह खूबसूरत रचना |

  3. मुझसे तगड़ा भी है…सामने आता भी नहीं…

  4. मुझसे तगड़ा भी है…सामने आता भी नहीं…

  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच-1198 पर भी होगी!सूचनार्थ…सादर!–होली तो अब हो ली…! लेकिन शुभकामनाएँ तो बनती ही हैं।इसलिए होली की हार्दिक शुभकामनाएँ!

  6. बहुत अच्छा भाव है ,अच्छा यह भी लगा कि जम्बुरे ने मदारी को कठघड़े के खडा किया.latest post हिन्दू आराध्यों की आलोचनाlatest post धर्म क्या है ?

  7. ये संसार झूठा है, नश्वर है लेकीन आपकी प्रस्तुति सत्य है !

  8. सटीक और सुंदर प्रस्तुति बहुत बहुत बधाई

  9. बाप रे बाप….क्या किसी ने अपने बनाने वाले से इतने सवाल जवाब किए होंगे..सिक्के के दोनो पहलू अपने पास भी रखता है…फिर कर्मों का लेखा जोखा कह कर पल्ला भी झाड़े लेता है…हे कान्हा सुन रहो हो न पुकार .बोलो अब क्या कहोगे..पता नहीं क्या जवाब मिले..कहेगा बार बार ये भी तु्म्हारे कर्मों का फल है..जब खुद अनेक होने का मन करे तो हो ले..फिर हमें में क्यों इतनी संवेदना डाल देता है….सटीक सवाल है..जाने कब इनका जवाब मिलेगा..क्योंकि जो बताई पद्धती है उसपर चलना हमारी सीमाओं से परे है…

  10. लडती हो झगडती हो ……… चाहती हो मैं आऊँ इस नोक झोंक,मनुहार पर मैं कृष्ण वारि वारि जाऊं

  11. मोहन से मन ही मन जुड़ाव कितने प्रश्न खड़े कर देता है ? गहन प्रस्तुति

  12. वन्दना जी, जब कान्हा इस दुनिया में आया तो उसके लिए भी वही मानदंड थे जो हमारे लिए हैं..यानि माया का आवरण उस पर भी था..ध्यान में गए बिना माया का पर्दा नहीं हटता, गीता में तो कृष्ण ने यह भी कहा है..वैसे बहुत आनंद आया आपकी इस बतकही को पढकर..

  13. @अनिता जी फिर भी उसे पता था वो भगवान है बस यहाँ मापदंड स्थापित करने आया है ताकि दुनिया उस पर चल सके मगर हम क्या है ……सिवाय उसके हाथ की कठपुतली के चाहे जैसे नचा सकता है वो ……मैने जहाँ तक जाना है समझा है उसी के आधार पर कह रही हूं कि सब उसके चाहे से होता है चाहे वो अच्छे विचार हों या बुरे, शुभ कर्म हों या अशुभ, उसकी इच्छा के बिना तो पत्ता भी नही हिल सकता तो फिर हम क्या और हमारी हस्ती क्या और ये जो लिख रहे हैं आप और हम वो भी उसकी इच्छा से ही हो रहा है वो ही लिखवा रहा है मेरा तो ये ही मानना है ………बस मदारी नाच नचा रहा है हम सबको और आनन्द ले रहा है अकेला बैठे बैठे 🙂

  14. सटीक और बहुत सुन्दर….होली की हार्दिक शुभकामनाएं ।।पधारें कैसे खेलूं तुम बिन होली पिया…

  15. बहुत सही व् सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

टैग का बादल

%d bloggers like this: