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उम्मीद तो नहीं थी कि इतनी जल्दी ये पुस्तक पढ लूँगी और इस पर अपने विचार भी रख दूँगी क्योंकि सिर्फ़ दो दिन पहले ही पुस्तक मिली है मगर आज मौका ऐसा मिला कि 4-5 घंटे खाली व्यतीत करने थे तो ये ही रख ली साथ में और पढती चली गयी । पढने के बाद दिल ने कहा जो गुना है उसे लफ़्ज़ों में भी अभी पिरो दिया जाये क्योंकि बाद मे शायद वो अहसास रहें ना रहें और उसी का नतीजा है कि और किताबें अभी पढ ही रही हूँ और जो सबसे आखिर में आयी है उसी का नम्बर पहला हो गया ……तो चलिये मेरी नज़र से पगडंडी के इस सफ़र पर 

जीवन एक ऐसा सफ़र है जिसमें नही मालूम किन राहों से गुजरना  होगा और कैसे कैसे मोड़ आयेंगे . उन्ही राहों से गुजरते कभी तीखे तो कभी संकरे मोड़ आते हैं तो कहीं कहीं किसी बड़ी राह पर पहुँचने के लिए छोटी छोटी पगडंडियों से गुजरना पड़ता है क्योंकि जरूरी नहीं सभी को खुला सीधा सपाट रास्ता ही मिले फिर सीधे रास्ते पर चलते जाने में ज़िन्दगी नीरस सी होने लगती है अगर उसमे उतार चढ़ावों की, दुःख सुख की ,अपनेपन और विश्वास की तो कभी अकेलेपन और अवसाद की पगडंडियाँ न हों और उन्ही भावों को 28 कवियों ने पगडंडियों में समेटा है जिसका संपादन रंजू भाटिया, मुकेश कुमार सिन्हा और अंजू चौधरी ने किया है .


ज़िन्दगी सिर्फ खोने का नाम नहीं , ज़िन्दगी सिर्फ पाने का नाम नहीं फिर चाहे सपनों की बेल कितनी ही सजायी जाए व्याकुल मानवता हार ही जाती है जब बदगुमानी का अहसास होता है . कितना ही रोष हो कभी तो कहीं तो उतरेगा ही किसी न किसी माध्यम से फिर दामिनी प्रकरण हो या ज़िन्दगी की कशमकश . ज़िन्दगी और रिश्तों की पगडण्डी पर चलते कहीं चिनार झूमते मिलेंगे तो कहीं किसी सरहद पर कोई किसी के इंतज़ार में भीगा . यकीन के रिश्तों को तराजू पर तोलती ज़िन्दगी अनकही बातें कहती किसी समर का शंखनाद करती सी प्रतीत होती है . कोई महामानव नहीं आता किसी उदबोध के साथ । कामना के दीप कितने जलाओ त्रिशंकु का जीवन विभीषणी नीतियों का शिकार होने से नहीं बच पाता. सुबह का अख़बार सच बोलता डराता है , पन्ने पलटने से मन डरता है क्योंकि बहुत कठिन है डगर पनघट की उस खामोश लड़की के लिए जो नहीं जानती इस प्रेम को क्या नाम दूं और पिया मिलन की आस में कोई मासूम खाली बर्तन सा नेह और चित की विभीषिका में पाप और पुण्य का फैसला नहीं कर पाता .

अनुभोतियों का महासागर लहलहा रहा है तभी तो कवि को गुब्बारों में भी अंतर दिख रहा है ज़िन्दगी को कौन कैसे लेता है मुख पर अंकित हो जाता है ………सकारात्मक या नकारात्मक . सबके लिए हर वस्तु का अपना महत्त्व है फिर केवल एक पृष्ठ की बात ही क्यों न हो . कोई हाल-ए-दिल बयां करता है तो कोई नारी या पुरुष की दास्ताँ , कोई उम्मीद की कश्ती पर सवार होता है तो कोई ज़िन्दगी की जद्दोजहद में मन की बात भी नहीं कह पता क्योंकि मोहब्बत हो या इंसान या उसका ईमान इनका कोई अर्थशास्त्र नहीं होता फिर चाहे कोई कितने ही जिज्ञासा के पहाड़ बना ले जान ही नहीं पाता जाने कैसा था वो मन . कुछ व्यक्तित्व फ़ना होने से पहले पी जाना चाहते हैं वोडका का शाट बनाकर अपनी मोहब्बत को …….इन्तहा यही तो है मोहब्बत की तो दूसरी तरफ़  एक आवाज़ उस लड़की की जो लड़कों से प्रतिस्पर्धा करती है वो भी ख्यालों की सेज पर फिर चाहे खिड़की की झिर्रियों से झांकते हुए अहसासों की सत्य बेहद रपटीली क्यों ना हो कैनविस पर तो चढ़ते सूरज की तस्वीर ही उभरा करती है 

ज़िन्दगी श्वेत श्याम रंगों का समावेश ही तो है कब बेबसी, व्याकुलता के दंश दे दे और कब प्रियतम का दीदार करा दे पता नहीं चलता और मुसाफिर बढ़ता जाता है . किसी का नाम लिखकर तो मिटाया जा सकता है मगर दिल से मिटाना नामुमकिन होता है फिर चाहे कितना ही अस्थि कलश प्रवाहित करो पता नहीं कर सकते अस्थियों से उसके लिंग का , वर्ण का . यूं तो इंसान चाँद को छू चूका है मगर मन की उड़ान का पार पाना  संभव कहाँ सिर्फ एक आह व्यथित कर देती है और सिर्फ एक गुजारिश रिश्ते में कभी गर्दो गुबार तो कभी उल्लास के कँवल भर देती है अनिश्चितता की पगडंडियाँ भी एक सीमा पर आकर रुक जाती हैं क्योंकि और भी राहे होती हैं जीवन में अंतिम सच की फिर मुंबई बम ब्लास्ट से आतंकित चेहरे हों या भुक्तभोगियों की पीड़ा का आकलन संभव नहीं . फिर भी भूली बिसरी यादों की किताब में सब दर्ज हो जाता है बिछड़ना क्या है उसकी पीड़ा क्या है और कोशिश की पगडण्डी पर साँसों को हारते सफ़र तो तय करना ही पड़ता है क्योंकि सांसें कभी पुरानी नहीं होतीं जैसे वैसे ही ज़िन्दगी सिर्फ एक हस्ताक्षर से जुड़ जाती है और बना देती है वो राहों को जोड़ने वाला पुल जिसके हर कण में तुम हो का अहसास काबिज़ रहता है क्योंकि देखा है अक्सर पाना और खोना का खेल जिसमे बिना पाए भी सब खो जाता है फिर टूटी फूटी ज़िन्दगी को कितना सहेजने की कोशिश करो यादों की दुल्हन तो दरवाज़े की ओट से सिसकती ही मिलेगी क्योंकि रिश्तों की जब स्व-मौत होती है तो लावा रिसना बेमानी नहीं क्योंकि सर्दी की शाम भी तब तक सुहानी नहीं लगती जब तक किसी अपने का ऊष्मामयी साथ न हो उसके स्पर्श का अहसास न हो और रिश्तों की पगडण्डी पर सबसे अहम् रिश्ता माँ का होता है जो हो या न हो हमेशा आस पास ही रहता है मगर दर्द के अहसासों को रौंदता लैंड क्रूज़र का पहिया सोचने पर विवश करता है आखिर इंसानियत की कोई पगडण्डी क्यों नहीं होती . 

२8 कवियों की भाव रश्मियों को यूँ तो चंद लफ़्ज़ों में सहेजा नही जा सकता फिर भी कोशिश की है उन भावों को आप तक पहुँचाने की ताकि आप भी इन पगडंडियों के उतार चढावों से गुजर सकें और महसूसें उन अहसासों को जो हर कवि के अन्तर्मन मे खलबली मचा रहे हैं, बाहर आने को आतुर हैं अपनी मंज़िल पर पहुँचने को बेचैन हैं , हर रचना अंतस को भिगो देती हैं . हर पगडण्डी से गुजरते अहसास जब मन पर दस्तक देते हैं तो उनमे अपना ही  चेहरा तो दीखता है . अरे ! ये तो मैं ही हूँ , मैं भी तो गुजरा हूँ और गुजर रहा हूँ इन्ही पगडंडियों से और बस सफ़र पूरा होने तक जारी रहता है और इसी तरह इन सबका सफर जारी रहे और अपनी मंजिल तक पहुंचे इसी कामना के साथ अपने लफ़्ज़ों को विराम देती हूँ ।कहीं मीठे भीने से अहसास हैं तो कहीं ज़िन्दगी की तल्खियाँ , चोटें तो कहीं रुसवाइयाँ कौन सा पक्ष है ज़िन्दगी का जो ना छुआ गया हो , कौन सी पगडंडी ऐसी है जिससे ज़िन्दगी ना गुजरी हो । मैने तो बस सिर्फ़ कुछ कविताओं के नामो और भावों को ही इसमे सहेजा है वरना तो पूरा संग्रह ही जैसे ज़िन्दगी की एक किताब है जिसे हर कोई पढना चाहेगा । ना जाने कितनी ही पंक्तियाँ , कितने ही भाव ऐसे हैं जिन्हें बार बार गुना जाये , उन्हें जीया जाये, उनसे एक वार्तालाप किया जाये मगर सबको उद्धृत करना तो संभव नहीं और फिर आपके पढने के लिये क्या रह जायेगा यदि मैं ही यहाँ सब बता दूँगी इसलिये अगर उन भावों के सागर मे गोते लगाने हैं तो उतरना तो खुद ही पडेगा। 

संपादक त्रय को बधाई जो उन्होंने इतनी मेहनत और लगन से सभी कवियों की रचनाओं को सहेजा और काव्य संकलन के रूप में एक बेशकीमती तोहफा पाठकों को दिया । अगर आप भी पढने को उत्सुक हैं तो 
एक भावनाओं से लबरेज़ संग्रहणीय संस्करण  हिन्द युग्म पर …………आपकी प्रतीक्षा में

हिन्द युग्म 
१, जिया सारे 
हौज़ खास 
नयी दिल्ली ………१ १ ० ० १ ६ 
sampadak!hindyugm.com
M: 9873734046
9968755908


ये संकलन  infibeam.com या ebay.in पर भी उपलब्ध है 
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Comments on: "सफ़र में पगडंडियाँ भी हुआ करती हैं" (10)

  1. धन्यवाद् पगडंडियाँ को शब्द देने के लिए …अपने पारखी नजरो से पुरे कविता संग्रह को पढना और फिर ये बताना की पुस्तक आपके नजर में कैसी लगी… बहुत बहुत शुक्रिया

  2. "pagadandiyaan "की समीक्षा पढ़ कर तो वन्दना जी ,कब पढ़ डालूँ ,यह काव्य संग्रह, एसा लग रहा है ….धन्यवाद.

  3. आभार आपने अपने अंतर मन भाव को शब्दों में ढाल दिया आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में एक शाम तो उधार दोआप भी मेरे ब्लाग का अनुसरण करे

  4. बहुत ही सुन्दर समीक्षा..

  5. mujhe ye padkar bahut acha laga ji aur ummed karta hu aage bhi aur padne ko milega

  6. आपकी कलम से पुस्‍तक का परिचय … और प्रस्‍तुति दोनो ही उत्तम आभर आपका

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