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सुनो कन्हाई
तुम्हारी प्रीत ना हमें रास आयी

इकतरफ़ा प्रेम धुन की जो मुरली तुमने बजायी
उसी धुन ने हममें भी ये बात जगायी

जो तुम चाहो मोहना किसी एक का सर्वस्व
तो क्यों ना हम भी चाहें तुमसे तुम्हारा सर्वस्व

जो तुम चाहो मोहना कोई बिना शर्त तुम्हें चाहे
तो क्यों ना यही चाहत हमारे भी मन में जागे

हम भी तो युगों से प्यासे तडप रहे हैं
निस्वार्थ प्रेम को पाने की चाह में भटक रहे हैं

फिर क्यों तुमने सिर्फ़ अपनी चाहत ही जनायी
क्यों हमारी चाहत पर बन्दिशों की फ़ेहरिस्त लगायी

जो इसी को चाहत कहते हो
जो इसे ही प्रमाणित करते हो
जो इसी को सर्वोपरि प्रेम की परिणति कहते हो
तो सुन लो मोहन
इसी प्रेम की हमने भी तुमसे है आस लगायी
गर कर सकते हो इसी तरह प्रेम का प्रतिदान
तभी रखना तुम प्रेम के ऐसे उच्च पायदान
जो तुम खुद नहीं कर सकते
फिर कैसे हो हमसे उम्मीद करते
क्योंकि
हैं तो अंश तुम्हारे ही
जो तुम्हारी चाहत होगी
जो तुम्हारी भाव भंगिमा होगी
उसी का तो प्रतिबिम्ब बनेगा
और हम तुम्हारा ही तो प्रतिबिम्ब हैं
इसलिये कहती हूँ कृष्णा
उम्मीद वो ही करना जो तुम खुद निभा सको
वरना सुनो कन्हाई
ये इकतरफ़ा प्रेम की कहानी ना हमें रास आयी
बिना सूरत के भी भला कहीं अक्स बना करते हैं
इसलिये
सुनो कन्हाई

तुम्हारी प्रीत ना हमें रास आयी

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Comments on: "सुनो कन्हाई तुम्हारी प्रीत ना हमें रास आयी" (10)

  1. बहुत सुन्दर प्यारभरा उलाहना …

  2. बहुत ही सरस भक्तिमय रचना,आभार.

  3. भक्तिभाव में चूक नहीं होनी चाहिए।प्रीत-रीत सब रास आ जायेंगी…!

  4. बहुत सुन्दर भाव – ये प्रेम ही शाश्वत भाव है.

  5. बहुत सुन्दर भाव – ये प्रेम ही शाश्वत भाव है.

  6. भक्ति भी है ,सर्त भी है ,प्रेम भी है .वाह! वन्दना जी ! अति उत्तम latest postऋण उतार!

  7. कितना भी उलाहना दें, लेकिन उसके प्रेम से मुक्त कहाँ हो पाते हैं…बहुत सुन्दर भावमयी अभिव्यक्ति..

  8. बहुत खूब भाव पूर्ण प्रस्तुति आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में एक शाम तो उधार दोमेरे भी ब्लॉग का अनुसरण करे

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