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Archive for सितम्बर, 2010

>कोपभाजन से कोखभाजन तक ……………..

>तुम्हारे 
कोपभाजन से
कोखभाजन तक 
सिसकती मर्यादा
आहत हो जाती है 
जब बर्बरता की
चरम सीमा को 
लाँघ जाते हैं
अपने ही लहू 
के दुश्मन
अपना ही लहू
बहाते  हैं 
फिर भी 
मुख पर ना
मलाल लाते हैं
तब सड़ांध भरे 
घुटते कमरों में
सिसकती ममता 
आहत हो जाती है 
मुखौटे पर
लगे मुखौटे 
भयावहता का 
दर्शन करा
जाते हैं 
फिर भी 
मर्यादा की 
हर सीमा को 
लाँघ कर भी 
इंसान कहाते हैं

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>नई सुबह ———अंतिम भाग

>मेरा संपादक हमेशा चाहता था कि मैं दुनिया के सामने आऊं मगर अब कोई इच्छा बाकी नहीं थी इसलिए चाहता था कि अपने लेखन से कुछ ऐसा कर जाऊं ताकि कुछ लोगों का जीवन बदल जाए . 


बस यही मेरी ज़िन्दगी की सारी हकीकत है सर, इतना कहकर माधव चुप हो गया …………….


अब आगे ……..


अब हर्षमोहन बोले , ” चलो , उठो , मेरे साथ चलो. माधव ने पूछा , ” कहाँ “? मगर बिना कोई जवाब दिए हर्षमोहन चलते गए और उनके पीछे पीछे माधव को भी जाना पड़ा. 


वो उसे अपने साथ लेकर एक आश्रम में गए और उसे एक कमरे में बैठाकर चले गए. माधव सारे रास्ते पूछता रहा मगर हर्षमोहन खामोश बैठे रहे  सिर्फ इतना बोले ,”आज का दिन तुम कभी नहीं भूलोगे “. 


थोड़ी देर में हर्षमोहन आये और बोले , ” माधव , तुम परेशान हो रहे होंगे   कि ये मैं तुम्हें कहाँ ले आया हूँ . देखो ये एक विकलांग बच्चों  का आश्रम है . यहाँ देखो , बच्चों को उनकी विकलांगता का कभी भी अहसास नहीं होने दिया जाता और उन्हें हर तरह से आगे बढ़ने के लिए हर संभव सहायता प्रदान की जाती है . मुझे यहाँ आकर बड़ा सुकून मिलता है . पता है माधव , मैं खुद को भी एक विकलांग महसूस करता हूँ . आज मेरे पास धन- दौलत ,प्रसिद्धि सब kuch है . देखने में हर इन्सान यही कहेगा कि इसे क्या कमी हो सकती है मगर देखो मेरी धन -दौलत सब एक जगह  आकर हार गयी और मैं कुछ ना कर सका . चाहे सारी दुनिया की खुशियाँ भी समेट कर अगर एक पलड़े में रख दी जायें तो भी चेहरे की सिर्फ एक मुस्कान के आगे वो सब फीके हैं. अब बताओ , मुझसे ज्यादा विकलांग कौन होगा जो सब कुछ होते हुए भी अपंगों की ज़िन्दगी जीने को बेबस हो गया हो ” . 


माधव को कुछ समझ नहीं आ रहा था . वो तो सिर्फ उनकी सुने जा रहा था और इस असमंजस में था कि इतना सब कुछ होते हुए भी उनके दिल की ऐसी कौन सी फाँस है जिसने उन्हें या कहो उनकी सोच को विकलांग बना रखा है और वो खुद को असहाय  महसूस कर रहे हैं. फिर उसने  पूछा , ” ऐसी कौन सी कमी है जो आप अपने को विकलांग महसूस करते हैं “.
तब उन्होंने कहा कि माधव  , आज  अपनी विकलांगता से मिलवाता हूँ और वो उसे एक कमरे में लेकर गए वहाँ माधव ने देखा कि एक लड़की छोटे- छोटे विकलांग बच्चों की बड़ी तन्मयता से सेवा करने में लगी है मगर पीठ होने की वजह से वो उसे देख नहीं पा रहा था  मगर हर्षमोहन ने जैसे ही पुकारा ,” बिट्टो देखो तो आज मैं क्या लेकर आया हूँ. तुम्हारी सारी ज़िन्दगी की तपस्या का फल आज मैं अपने साथ लाया हूँ. जो तुम स्वप्न में भी नही सोच सकती थीं आज वो हो गया .बस एक बार ज़रा नज़र तो घुमा कर देखो और फिर माधव से बोले ,”ये लो मिलो मेरी विकलांगता से जिसके प्यार ने मुझे पंगु बना दिया . जिसके चेहरे की एक मुस्कान के लिए मैं पिछले कितने सालों से एक पल में कितनी मौत मर- मर  कर जीता रहा हूँ “.

और जैसे ही लड़की मुड़ी और माधव की तरफ देखा तो  माधव की आँखें फटी की फटी रह गयीं . उसके सामने शैफाली खडी थी और शैफाली  , वो तो जैसे पत्थर की मूरत सी खडी रह गयी. कुछ बोल ही नहीं पाई. ऐसी अप्रत्याशित घटना थी जिसके बारे में उन तीनो में से किसी ने नहीं सोचा  था. तीनो को ही आज संसार की सबसे बड़ी दौलत मिल गयी थी. तीनो को ही उनकी चाहत मिल गयी थी क्योंकि शैफाली ने ज़िन्दगी भर शादी किये बिना विकलांग बच्चों की सेवा करने की ठान ली थी और पिता का घर छोड़कर उसी आश्रम में रहने आ गयी थी और हर्षमोहन के लिए तो ये बात मरने  से भी बदतर थी मगर शैफाली के आगे उनकी एक नहीं चली थी और मजबूरन उन्हें उसकी इच्छा के आगे अपना सिर झुकाना पड़ा था मगर वो ऐसे जी रहे थे जैस किसी ने शरीर से आत्मा निकाल ली हो और आज का दिन तो जैसे तीनो की जिंदगियों में एक नयी सुबह का पैगाम लेकर आया था जिसमे तीनो की ज़िन्दगी में एक नयी उर्जा और रौशनी का संचार कर दिया था . 


समाप्त 

>एक मिनट

>जब कोई 
कहता है 
रुकना  ज़रा
एक मिनट !
आह – सी 
निकल जाती है
ये एक मिनट
कितने सितम
ढाता  है 
ज़रा पूछो उससे 
जो इंतजार 
के पल 
बिताता है
इस एक 
मिनट में
वो कितने 
जन्म जी 
जाता है 

ये एक मिनट
किसी के लिए
एक युग बन 
जाता है 
और उस युग में
दिल ना जाने
कितने जन्म 
जी जाता है 
और हर जन्म 
किसी के 
 इंतज़ार में
गुज़र जाता है 
मगर वो 
एक मिनट
वहीं रुक 
जाता है

>नई सुबह ——-भाग ८

>उसका नाम कृष्णा था. मगर मुझे ये नहीं पता चल पाया कि पागलखाने से भाग जाने के बाद मैं कहाँ रहा ? कैसे दिन गुजरे? किसने देखभाल की? इस बारे में मुझे कुछ पता नहीं चल पाया. 

अब कृष्णा ने कहा ,”अब तुम क्या करोगे भैया “?…………….

अब आगे …………..


मैंने कहा , ”  मुझे तो समझ नहीं आ रहा क्या करूँ , कहाँ जाऊं? मैं आखिर जिंदा ही क्यों हूँ ? अब किसके लिए जियूँ ? कौन है मेरा? मेरा तो सारा संसार ही लुट चुका “. तब कृष्णा ने कहा ,” अगर आप बुरा ना मानो तो या तो आप ज़िन्दगी को नए सिरे से शुरू करो या मेरे साथ मेरी झोंपड़ी में रहने चलो”. मैंने कहा , ” अब किसके लिए नए सिरे से ज़िन्दगी शुरू करूँ ? अब तो जीने की चाह ही नहीं रही  “. तब कृष्णा मेरा हाथ पकड़कर मुझे अपनी झोंपड़ी में ले गया .


झोंपड़ी क्या थी सिर्फ इतनी कि दो लोग मुश्किल से पैर फैला सकते थे . एक नया ही अनुभव था मेरे लिए. जैसा जीवन जीने के बारे में कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा था आज वो नारकीय जीवन मेरे सामने था मगर मुझे इस सब की कोई परवाह ना थी . जब इन्सान की जीने की चाह ख़त्म हो जाए तो फिर वो किसी भी हाल में रह लेता है . कृष्णा भीख माँग कर गुजारा करता था . जो भी मिलता उसी से अपना और मेरा पेट भरता था . यहाँ तक कि कभी -कभी वो खुद भूखा सो जाता मगर मेरा पेट जरूर भरता . हाँ ,यदि कुछ ना मिलता तो दोनों भूखे पेट ही सो जाते . 


कुछ दिन तक सब यूँ ही चलता रहा और अब मैं भी उसका अभ्यस्त हो चला था तब मुझे बहुत ही आत्मग्लानि होने लगी कि मेरी वजह से वो बेचारा इतना दुखी होता है मगर कभी उफ़ नहीं करता . मैं उसका लगता क्या हूँ……..कुछ भी नहीं मगर फिर भी उसके चेहरे पर कभी शिकन नहीं आती . हमेशा हर हाल में मुस्कुराता रहता है. क्या मैं उस पर बोझ बनकर रहूँगा हमेशा ………..जब ये अहसास हुआ तो मुझे लगा कि मुझे भी कोई  काम करना चाहिए  इसलिए मैंने एक दिन उससे कहा कि मुझे भी अपने साथ काम पर लगा दो . घर में खाली बैठा रहता हूँ. उसने काफी मना किया मगर मैं उसके साथ अगले दिन ज़बरदस्ती चला गया मगर मुझसे भीख मांगी ही नहीं गयी क्योंकि ये तो मेरे संस्कारों में ही नहीं था . 


मैंने अगले दिन से दूसरी जगहों पर काम करने की कोशिश की मगर मुझे तो कोई काम आता नहीं था इसलिए लाख कोशिशों के बाद भी मुझे काम नहीं मिला.मजदूरी भी करनी चाही मगर कभी इतनी मेहनत की नहीं थी तो शरीर ने साथ नहीं दिया और बीमार पड़ गया ……….इसका बोझ भी कृष्ण पर ही पड़ा , इससे तो मैं और बेचैन हो गया . एकतो खुद पहले ही उस पर बोझ था ही अब मेरी बीमारी की वजह से वो और परेशान था .मुझे अपने आप से घृणा होने लगी………..क्या है मेरे जीवन का उद्देश्य ………..क्या यही कि दूसरों को दुःख ही देता रहूँ……………अपनी हर मुमकिन कोशिश की मगर कहीं कोई नौकरी भी नहीं मिली क्योंकि हर किसी को कोई ना कोई जमानत चाहिए थी और मेरा तो इस संसार में अपना कहलाने वाला कोई नहीं था इसलिए थक हार कर मैं एक बार फिर उसके साथ जाने लगा . मुझसे भीख तो नहीं मांगी गयी मगर एक कटोरा लेकर खड़ा रहता था . जो भी अपने आप डाल जाता तो ठीक मगर मैं कभी खुद नहीं माँगा करता था.

तभी एकदिन लाल बत्ती पर खडी एक गाडी पर लिखा शेर मैंने पढ़ा तो याद आया कि कभी मैं भी इस फन में माहिर हुआ करता था. तभी एक विचार कौंधा कि क्यों ना अपने उसी हुनर का प्रयोग करूँ और मैंने एक बार फिर से लिखना शुरू कर दिया और भीख से मिले पैसे बचाने लगा ताकि जब पैसे इकठ्ठा हो जाएँ तो अपनी एक किताब छपवाऊं और जितने भी मेरे आस पास के भिखारी दोस्त हैं इनके जीवन में खुशियों का कुछ तो उजाला कर सकूँ . मेरे इस प्रयत्न का जब कृष्णा को पता चला तो वो भी इसमें सहयोग करने लगा और पैसे बचाने लगा . यहाँ तक कि इस चाह में ना जाने कितनी ही रातें वो भूखा सोया होगा.



फिर एक दिन मैं  प्रकाशन के लिए सम्पादक के पास अपनी किताब छपवाने के आशय से गया और अपना लिखा उन्हें पढवाया . वैसे तो ये काम इतना आसान नहीं था मगर मेरा लिखा पहला पृष्ठ पढ़ते ही संपादक मेरे लेखन का कायल हो गया और उसने कम से कम पैसों में मेरी पुस्तक छापने और बिक्री का प्रबंध किया . शायद मेरी नेकनीयती की वजह से भगवान को मुझ पर पहली बार दया आ गयी थी तभी मेरा पहला ही संस्करण इतना लोकप्रिय हुआ कि हाथों हाथ बिक गया और उसके बाद मुझे कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा . बस मैंने इतना किया  कि वहाँ भी मैंने अपना परिचय किसी को नहीं दिया क्योंकि अब कोई लालसा बची ही नहीं थी . अपने लिए जीने की चाह तो कब की मिट चुकी थी बस अब तो उन किताबों की बिक्री से प्राप्त पैसे को मैं पूरा का पूरा सिर्फ अपने भिखारी दोस्तों और आस- पास के दूसरे झुग्गी- झोंपड़ी वासियों पर खर्च कर दिया करता था . यहाँ तक कि उस पैसे का एक भी रुपया अपने ऊपर खर्चा नहीं करता था और सिर्फ भीख के पैसे से ही अपना गुजर -बसर करता था क्योंकि मेरे मन में एक विश्वास घर कर गया था कि ये सब उन सबकी दुआओं और भूखे पेट सोकर बचे पैसे की बदौलत ही संभव हो पाया है और वो पैसा मेरे लिए मेरी पूजा का प्रशाद बन चुका था जिसे मैं सबमे बाँटकर बेहद शांत और खुश महसूस करता था …………जब किसी चेहरे पर ख़ुशी देखता तो मुझे आत्मिक शांति मिलती ……….बस उस पल लगता शायद ईश्वर ने मुझे इन सबकी सेवा के लिए भी बचा कर रखा था ………..जो सुख देने में है वो लेने में कहाँ ………..ये तब जान पाया था और अब इसे ही मैंने अपने जीवन का ध्येय बना लिया था. 

मेरा संपादक हमेशा चाहता था कि मैं दुनिया के सामने आऊं मगर अब कोई इच्छा बाकी नहीं थी इसलिए चाहता था कि अपने लेखन से कुछ ऐसा कर जाऊं ताकि कुछ लोगों का जीवन बदल जाए . 


बस यही मेरी ज़िन्दगी की सारी हकीकत है सर, इतना कहकर माधव चुप हो गया …………….


क्रमशः……………..अगली किस्त आखिरी है 

 

>गर होती कोई कशिश हम में

>किसी के 
ख्वाबों में 
पले होते
किसी के 
दिल की 
धडकनों की
आवाज़ होते
किसी के
सुरों की
सरगम होते
किसी के 
छंदों का
अलंकार होते
किसी के
दिल के
उदगार होते
किसी के लिए
ऊषा की
पहली किरण होते
किसी के 
अरमानों में
सांझ की 
दुल्हन से 
सजे होते
किसी के 
गीतों में
प्यार बन
ढले होते
किसी कवि की
कल्पना होते
मगर यूं ना
ठुकराए जाते 
गर होती 
कोई कशिश 
हम में

>दुनिया की अदालत में खड़े भगवान ?

>कल कन्हैया 
सपने में आया 
उदास , हताश
बड़ा व्यथित था 
दुनिया के
आरोपों से
प्रश्न उठाया 
क्यूँ दुनिया 
जीने नहीं देती है 
किसी भी युग में 
हर युग में 
आरोप लगाया 
और जनता की 
अदालत में 
मुझे ही दोषी 
ठहराया

जब राम 
बनकर आया 
मर्यादा में रहा 
मगर वो भी ना
किसी को भाया 
नारी का 
सम्मान किया 
उसे यथोचित 
स्थान दिया 
एक पत्नी व्रत लिया
ता- उम्र उस 
व्रत को निभाया
मगर फिर भी
खुद को ही
कटघरे में 
खड़ा पाया
क्यूँ सीता को
बनवास दिया?
क्यूँ उस पर 
अविश्वास किया?
क्यूँ उसकी 
अग्निपरीक्षा ली?
ताने मारा 
करती है 
दुनिया
मगर इतना ना 
समझ पाती है
मर्यादा में रहकर
राजा का कर्त्तव्य 
भी निभाना था
प्रीत को एक बार
फिर सूली पर 
चढ़ाना था 
मेरा तो विशवास
अटल था
मगर दुनिया के
आरोपों से 
सीता को मुक्त 
करना था
और दुनिया में 
रहकर 
दुनिया का धर्म 
भी निभाना था
इसीलिए 
उस दर्द  से
मुझे भी तो 
गुजरना था 
वो बनवास 
महलों में रहकर
मुझे भी तो
भोगना था 


जब कृष्ण बन 
कर आया
तब भी 
खुद को
दुनिया की 
अदालत
में दोषी ही पाया
क्यूँ राधा के प्रेम
को ना स्वीकारा ?
उसे पत्नी का दर्जा
क्यूँ ना दिया?
क्यूँ उससे 
विश्वासघात किया?
क्यूँ उसके प्रेम 
को ना स्वीकार किया?
मगर मेरा दर्द
ना किसी ने जाना
संसार का दिया
वाक्य मुझे भी
निभाना था 
“कर्त्तव्य हर 
भावना से 
बड़ा होता है “
इसी को ज़िन्दगी 
भर निभाता रहा
प्रीत का दीया 
अश्रुओं से 
जलाता रहा
मगर कभी भी 
कोई भी भाव 
ना मुख पर 
लाता रहा 
निर्मोही, निर्लिप्त 
भाव से हर 
कार्य निभाता रहा
गर राधा को 
पत्नी बना
लिया होता तो
ये ज़माना उसे भी
धरती में समा 
जाने को विवश 
कर देता 
या फिर कोई 
एक नया 
इलज़ाम उस पर
भी लगा देता
और फिर एक बार
दो प्रेमी
विरह अगन में
जल रहे होते
मिल कर भी
ना मिले होते


तब भी तो दुनिया 
ने ही विवश किया था
वो निर्णय लेने के लिए
एक आदर्श राजा के 
फ़र्ज़ की खातिर
पति हार गया था
और ये दुनिया 
जीत गयी थी
इसीलिए प्रण 
किया था मैंने
अगले जन्म 
अपने प्रेम को 
दुनिया के हाथ 
की कठपुतली 
ना बनने दूँगा
वचन लिया था
सीता ने मुझसे   
ना यूँ अगले जन्म
रुसवा करना
चाहे पत्नी का
दर्जा ना देना
मगर हमारे 
प्रेम को
अमर कर देना
जो इस जन्म
अधूरा छूट गया
उसे अगले जन्म
पूरा कर देना
नहीं चाहिए 
संग ऐसा जो
दुनिया दीवार बने
वो ही वादा 
मैंने निभाया
मगर वो भी 
दुनिया को 
ना रास आया
ना पत्नी को 
किसी ने जाना
ना ही प्रेम को
पहचाना


राधा संग 
अपने प्रेम को
दिव्यता की
ऊँचाइयों तक
पहुँचाया 
खुद से पहले
राधा को पुजवाया 
संसार को 
प्रेम करना सिखाया
मैंने और राधा ने
तो प्रेम की पूर्णता
पा ली थी
दूर होकर भी
कभी दूर ना हुए थे
ह्रदय तो हमारे
इक दूजे में ही
समाये थे
दिखने में ही
दो स्वरुप थे
असल में तो
एकत्त्व में 
विलीन थे 


फिर कहो कैसे
राधा को 
धोखा दिया मैंने
उसी को दिया
वचन अगले 
जन्म में 
निभाया मैंने
मगर तब भी
दुनिया की कसौटी 
पर खरा ना 
उतर पाया मैं
अब बताओ
कैसे खुद को
निर्दोष साबित करूँ
अपनी ही बनाई
दुनिया के 
इल्जामों से
कहो कैसे
खुद को 
मुक्त करूँ 
दुनिया ना 
खुद जीती है
चैन से  
ना मुझे
जीने देती है
आखिर क्या 
चाहती है 
दुनिया मुझसे ?




राधा अष्टमी पर राधा जी को समर्पित श्रद्धा सुमन .



>नई सुबह …………भाग ७

> और मैं अपने घर की और चीखते -चिल्लाते हुए दौड़ा. मेरे पीछे -पीछे एक भिखारी दोस्त भी भागा मुझे आवाज़ देते हुए -रूक जाओ भैया, रूक जाओ लेकिन मुझे तो होश ही नहीं था. मुझे तो वो ही याद था कि मेरे माँ बाप इस दुनिया में नहीं रहे और मुझे उनका अंतिम संस्कार करना है …………….अब आगे ………..


जब मैं अपने घर पहुँचा तो वहाँ तो एक  आलिशान कोठी खडी थी और उसमे कोई और रहता था . मैंने कहा ये मेरा घर है मगर वहाँ मेरी कोई सुनवाई नहीं हुई . आस- पास वालों से बात करने पर पता चला कि मेरे माता- पिता की मृत्यु का गहरा सदमा लगा था मुझे और मैं पागल हो गया था इसलिए मुझे पागलखाने में दाखिल करा दिया गया था . कुछ दिन तो जान- पहचान वाले आते रहे और दोस्त भी, मगर धीरे- धीरे सबने आना बंद कर दिया . ना ही किसी ने घर को देखा और ना ही मुझे . यहाँ तक कि मेरे मकान पर भी असामाजिक तत्वों ने कब्ज़ा कर लिया और फिर उसे ऊँचे दामों पर बेच दिया और जिसने ख़रीदा वो भी वहाँ कोठी बनाकर रहने लगा था . पडोसी तो क्या कर सकते थे ………बदमाशों से सभी डरते हैं इसलिए वो सब भी चुप रहे ……….रिश्तेदार सब सुख के ही साथी होते हैं और जिसका कुछ ना रहा हो उस तरफ कौन ध्यान देता है इसलिए सभी ने किनारा कर लिया . 


पड़ोसियों ने ही बताया कि एक लड़की आया करती थी . उसी से तुम्हारा हाल- चाल मिला करता था मगर पिछले ३-४ साल से उसका भी कोई पता नही क्योकि आखिरी बार जब वो आई थी तो उसी से पता चला था कि एक दिन तुम पागलखाने से भाग गए थे और वो तुम्हें ढूंढती हुई ही आई थी मगर उसके बाद उसका भी कुछ पता नहीं था. 


ये सब सुनकर मुझे ऐसा लगा जैसे भगवान ने सारे जहान के  दुःख मेरे ही हिस्से में लिख दिए है . मैंने अपनी तरफ से हर मुमकिन कोशिश की कि किसी तरह शैफाली  का पता चल जाये मगर मुझे उसका पता नहीं मिला . यहाँ तक कि कॉलेज से भी पूछने की कोशिश की तो वहाँ भी किसी ने कोई जानकारी नहीं दी क्यूँकि किसी लड़की के बारे में जानकारी तो वैसे भी मुहैया नहीं कराते जल्दी से .आज अपनी बेवकूफी पर अफ़सोस हो रहा था कि कभी शैफाली के घर क्यूँ नहीं गया , उसका पता क्यूँ नहीं पूछा . फिर भी अपनी तरफ से हर कोशिश के बाद भी मैं हारता ही गया . हर जगह निराशा ही हाथ लगी. 


यहाँ तक कि मुझे अफ़सोस होने लगा कि भगवान तू मुझे होश में ही क्यों लाया ? कम से कम बेहोशी में दुनिया के हर गम से दूर  तो था मगर इस भरी दुनिया में अपना कहने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं था . यार- दोस्तों का भी नहीं पता कौन कहाँ चला गया था और वैसे भी उनसे क्या उम्मीद जिन्होंने मुझे किस्मत के भरोसे छोड़ दिया हो. अब तो मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं जिंदा ही क्यूँ हूँ? 

मगर इतना सब कुछ होते हुए  भी मेरे साथ जो मेरा भिखारी दोस्त था वो मेरे साथ साये की तरह था और हर बार मेरा होंसला बढ़ा रहा था .अब मैंने उससे पूछा ,”मैं तुम्हें कैसे मिला “? तब उसने बताया कि जब उन लोगों के झगडे में तुम्हें चोट लगी थी तो सब तुम्हें तड़पता हुआ छोड़ कर चले गए थे और तुम बेतहाशा कराह रहे थे तब मैंने ही तुम्हारी देखभाल की थी और उसी पल से मैं तुम्हारे साथ हूँ. उसका नाम कृष्णा था. मगर मुझे ये नहीं पता चल पाया कि पागलखाने से भाग जाने के बाद मैं कहाँ रहा ? कैसे दिन गुजरे? किसने देखभाल की? इस बारे में मुझे कुछ पता नहीं चल पाया. 


अब कृष्णा ने कहा ,”अब तुम क्या करोगे भैया “?…………….


क्रमशः ………………

टैग का बादल