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>मैं 
दरिया हूँ 
ना बाँधो 
मुझको 
बहने दो
अपने किनारों से 
लगते – लगते
मत तानो 
बंदिशों के 
बाँध 
मत बाँधो
पंखों की 
परवाज़ को
मत लगाओ 
मेरे आसमानों पर
हवाओं के पहरे 
एक बार
उड़ान 
भरने तो दो
एक बार 
बंदिशें तोड़
बहने तो दो
एक बार
खुले आसमान में 
विचरने तो दो
फिर देखो 
मेरी परवाज़ को
मेरी उडान को
धरती आसमां में
सिमट जाएगी 
आसमां धरती सा
हो जायेगा 
और शायद 
क्षितिज  पर 
एक बार फिर
मिलन हो जायेगा 

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Comments on: ">क्षितिज पर एक बार फिर……………." (20)

  1. >एक बार बंदिशें तोड़बहने तो दोएहसास बहुत खूबसूरत हैंबन्दिशे तो तोड़नी ही होगी

  2. >अच्छी पंक्तिया की रचना की है ……..(क्या अब भी जिन्न – भुत प्रेतों में विश्वास करते है ?)http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_23.html

  3. >बंदिशों के बाँध मत बाँधोपंखों की परवाज़ कोमत लगाओ मेरे आसमानों परहवाओं के पहरे एक बारउड़ान भरने तो दो—-पागल झरनों को मत, संयत बाध तोड़कर बहने दो।अपने अरमानों को मत,बहशी दुनिया से कहने दो,गुल गुलाब की तरह रहो,और खिलो खूब बगिया में-कोमल तन पर काँटों की,कुछ मृदुल चुभन रहने दो।।

  4. >कई रंगों को समेटे एक खूबसूरत भाव दर्शाती बढ़िया कविता…बधाई

  5. >Bahut Sundar baav sanjoye aapne is sundar kavita me

  6. >वंदना जी बहुत ही अच्छी कविता !बधाई !

  7. >"खुले आसमान में विचरने तो दोफिर देखो मेरी परवाज़ कोमेरी उडान कोधरती आसमां मेंसिमट जाएगी आसमां धरती साहो जायेगा और शायद क्षितिज पर एक बार फिरमिलन हो जायेगा "… प्रेम और जीवन की कविता… बहुत ही खूबसुरती से कह रही है आप!

  8. >धरती आसमा में सिमट जायेगी …… आसमा धरती सा हो जायेगा…. वह बहुत खूब….. मन मोह लिया आपके इस कविता ने…..

  9. >उडानों की ऊँचाइयों के सामने आसमान, पहाड़ और सागर नतमस्तक हो जायेंगे।

  10. >बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है। मशीन अनुवाद का विस्तार!, “राजभाषा हिन्दी” पर रेखा श्रीवास्तव की प्रस्तुति, पधारें

  11. >Haan Hhai! aaj Vandana ji ko dariya bn jane do' jaise "Ganga" bn gayi thi "Ganga Saagar". Usi prakar Vandana ji ab ho jayengi "Vandniya"……..aur yahi to hamari kaamna hai, Shubh kamna hai—-गंगा एक नदी हैजो निकलती है गोमुखगंगोत्री से औरआकर नीचे हिमालय सेहरिद्वार – प्रयाग – काशी होते हुएऋषि – मुनियों के कुटीरों कास्पर्श – संश्पर्शन करते हुए ..जा मिलती है – सागर से.और बन जाती है – "गंगा सागर".

  12. >धारा प्रवाह अभिव्यक्ति के लिए बधाई !!

  13. >मत रोको …उड़ने दो इन्हें …पंछी- साबहने दो …नदिया- सीमैंने भी लिखा था कुछ ऐसा ही ..संवेदनशील स्त्रियों की प्रतिक्रियां एक जैसी ही होती हैं …!

  14. >बहुत सुन्दर ..उड़ान की अभिलाषा ..बंदिशों को तोडने की ख्वाहिश ..सुन्दर शब्दों में बाँधी है …

  15. >बहुत खूब…सुंदर रचना…बधाई

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